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धार्मिक नशे की उन्माद में मरता देश

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 4, 2018
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धार्मिक नशे की उन्माद में मरता देश

भाजपा प्रेरित रामराज्य के नाम पर देशभर में अंधविश्वास के जबरदस्त प्रसार का इससे खौफनाक चेहरा और क्या हो सकता है कि दिल्ली महानगर के बुराड़ी में मोक्ष प्राप्ति की लालसा में एक सम्पन्न परिवार के पूरे ग्यारह सदस्यों ने एक साथ फांसी के फंदे से लटक कर खुदकुशी कर ली, तो वहीं मंदसौर में बच्ची के साथ निर्मम बलात्कार की घटना को साम्प्रदायिक रंग चढ़ाने के लिए धार्मिक उन्माद में मदहोश हिन्दू युवा मुस्लिम नाम धारण कर अनाप-शनाप पोस्ट सोशल मीडिया पर डाल रहा है. भाजपा देश भर में जिस प्रकार धार्मिक साम्प्रदायिक माहौल का निर्माण कर रही है, वह देश को भयावह दौर में पहुंचा दी है. ऐसे में एक सप्ताहिक में प्रकाशित यह आलेख समीचीन है, जिसे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ध्रुव गुप्ता ने  ‘अथ गांजा पुराण‘ शीर्षक के तहत लिखा है, यहां प्रस्तुत है.

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गांजा को हेय दृष्टि से देखने वालों को इसकी अनगिनत विशेषताओं का शायद ज्ञान नहीं है. यह वही गांजा है जिसके बल पर हमारा देश हजारों वर्षों तक विश्वगुरु रहा है. यहां के ज्यादातर ऋषि-मुनियों, साधु-संन्यासियों ने गांजा और भांग के बल पर बड़ी-बड़ी आध्यात्मिक उपलब्धियां हासिल की है. गांजा का प्राचीन नाम ‘ज्ञानदा’ अर्थात ज्ञान का दाता था जो कालान्तर में बिगड़ कर गांजा हो गया. यह वह नायाब चीज है जिसके दो-चार सुट्टे मारते ही आदमी लोक का अतिक्रमण कर जाता है. जिस ध्यान के लिए लोग वर्षों तक तपस्या करते हैं, गांजे के मात्र दो कश के साथ ध्यान इतना गहरा हो जाता है कि कुछ ही देर में तपस्वी समाधि की स्थिति प्राप्त कर ले. उसके बाद तो सब कुछ दिखने लगता है – अतीत, वर्तमान, भविष्य, भूत-प्रेत, देवी-देवता, स्वर्ग-नर्क तथा मोक्ष के तमाम दरवाजें. अगर तपस्वी थोड़ा रूमानी तबियत का हुआ तो नशे में उसकी तपस्या भंग करने को एक से एक सुन्दर अप्सराएं भी पहुंच जाती हैं.

आध्यात्मिक गांजे का उपयोग राजनीति में भी सफलतापूर्वक हो सकता है, पहले किसी ने इसकी कल्पना नहीं की थी. सनातन हिन्दू संस्कृति की वाहक अपने देश की वर्तमान सरकार ने न केवल इसे संभव कर दिखाया है, बल्कि देश को गांजे की अथाह शक्तियों से भी अवगत भी कराया है. पिछले चार सालों से गांजे के निरंतर सेवन के बाद हमारी सरकार अभी समाधि की उस स्थिति में पहुंच गई है जहां उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं. अभी-अभी हमारे देश के प्रधानमंत्री ने सुट्टे मारकर अलग-अलग कालखंड में रहे तीन महापुरुषों – गुरु गोरखनाथ, संत कबीर और गुरु नानक को एक साथ मगहर में बिठाकर उनके बीच अध्यात्म-चर्चा कराने में सफलता पाई है. उनके इस कृत्य से देश ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व चमत्कृत है. वैसे नशे के झोंक में यह उनका पहला चमत्कार नहीं है. सत्ता में आने से पूर्व भी वे तक्षशिला को पाकिस्तान से खींचकर बिहार में स्थापित करने का कारनामा कर चुके हैं. एक दफा तो समाधि इतनी गहरी लगी थी कि उन्होंने भारत की उत्तर-पश्चिम सीमा से हजारों साल पहले लौट गए सिकंदर महान को बिहार में बुलाकर धूल चटा दी थी. प्रधानमंत्री ही क्यों, सरकार के तमाम मंत्री गांजे के नशे में हैं. इसी नशे में वित्त मंत्री देश की अर्थव्यवस्था चला रहे हैं. ज़ाहिर है कि अर्थव्यवस्था समाधि की स्थिति में होगी ही. रेल मंत्री नशे में रेल चला रहे हैं. अब अगर ट्रेनें बहुत विलंब से चल रही या पटरी से उतर जा रही हैं तो इसमें उन बेचारे का क्या कसूर ? अभी कुछ दिनों पहले हमारे वाणिज्य मंत्री को गांजे के लंबे कश के बाद कुछ मीठा खाने की तलब हुई तो वे महाराष्ट्र के चीनी मिलों के लिए उड़े, लेकिन नशे के झोंक में पाकिस्तान पहुंचकर वहां से लाखों टन चीनी ले आए. कृषि मंत्री ने किसानों की आत्महत्या की वजह जानने के लिए सुट्टा मारा तो उन्हें दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ कि कम्बख्त किसान अपनी परेशानियों की वजह से नहीं, मीडिया में प्रचार पाने के लिए आत्महत्याएं कर रहे हैं.

गांजे का यह प्रताप देखकर मोदी सरकार के भक्तों ने भी सुट्टा मारना आरम्भ कर दिया था. वे भी लगभग समाधि की स्थिति में हैं. उन्हें अपने आराध्य के हर काम में अलौकिक लीला दिखाई पड़ने लगी है. हर मोर्चे पर मार खाने के भावजूद उनका भरोसा है कि अगले चुनाव तक नहीं तो उसके अगले चुनाव तक मोदी सरकार देश में उनके सपनों का रामराज्य लाने में जरूर सफल होगी. भक्त जब आये दिन सीमा पर पाकिस्तान के अतिक्रमण, आतंकियों की हरकतों और चीन की बंदरघुड़कियों के कारण अपमानित महसूस करते हैं तो गंजेड़ी मीडिया उनके बचाव में आगे आ जाती है. मीडिया सरकार को बताए बिना कभी कश्मीर में तो कभी पाकिस्तान में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक कर आती है ताकि सरकार और भक्तों का इकबाल बना रहे. पाकिस्तान में रहने वाले आतंकियों को वह कई-कई बार ठोक चुकी है. जब उसके डर से पाकिस्तानी आतंकी भूमिगत हो जाते हैं तो वह सीधे हिन्द महासागर में जाकर चीनी नौसेना के छक्के छुड़ा आती है या इराक़ और सीरिया पहुंचकर आई.एस के सरगना बगदादी को कुत्ते की मौत मार डालती है. गांजे को ऐसे ही ‘दिव्य’ व्यसन नहीं कहा गया है. वैसे गांजे का असर उसकी क्वालिटी पर भी निर्भर करता है. एक क्वालिटी का गांजा पीकर सरकार के लोग ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात करते हैं तो दूसरी क्वालिटी का गांजा पीकर भक्त कभी विधर्मियों को मारते हैं तो कभी बीच चौराहों पर नंगा कर दलितों को उनकी औकात समझा देते हैं.

लोग कहते हैं कि यह सरकार गांजे के नशे में वादा तो करती है, लेकिन अपने वादे कभी पूरे नहीं करती. उन्हें यह समझना चाहिए कि यह दुनियादार नेहरू या इंदिरा की नहीं, गांजे के नशे में समाधिस्थ लोगों की सरकार है. नश्वर दुनिया से लोगों का मोहभंग हो और अपनी संस्कृति के अनुरूप वे परमसत्य की पहचान कर सकें, इसके लिए सरकार ने पिछले चार सालों में कई कदम उठाए हैं. पहले उसने नोटबंदी कर लोगों को संपत्ति की व्यर्थता का अनुभव कराया और पैसों के लिए बैंकों की लाइन में लगने वाले सैकड़ों लोगों को जीवन के दुखों से मुक्ति दी. देश में माया कम हो, इसके लिए उसने देश के बैंकों में जमा लोगों की अथाह रकम लेकर अपने कुछ भक्तों को विदेश भाग जाने दिया. स्विस बैंकों में जमा होने वाली देश की दौलत में पचास फीसदी की बढ़ोतरी कराई. पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस के दाम बढ़ाकर और नए-नए टैक्स लगाकर लोगों की जेबें खाली करवाई. अंत में सरकार ने विदेशी मुद्रा के मुकाबले रुपये का भाव इतना गिरा दिया कि लोगों का अपने रुपये पर से भरोसा ही उठ गया. सरकार जानती है कि विपक्षी जितना शोर मचा लें, उसके इन बेहतरीन प्रयासों से लोग सांसारिकता से मुक्त होकर बड़ी तेजी से धर्म-कर्म की तरफ मुड़ेंगे. धर्म की स्थापना होगी तो लोग भौतिक सुख-सुविधाओं की मांग करने के बजाय मोह-माया से मुक्त होकर मंदिर, श्मशान, स्वर्ग और मोक्ष के लिए प्रयत्नशील होंगे. यही तो सच्चा रामराज्य है.

चुनाव निकट है तो गांजे की डोज बढ़ेगी. डोज बढ़ेगी तो सरकार की धर्म और अध्यात्म के प्रति रुचि बढ़ेगी. धर्म की स्थापना के लिए नई-नई रणनीतियां बनेंगी. यह राममंदिर के निर्माण और सड़कों पर विधर्मियों के खिलाफ दंगों से लेकर पाकिस्तान से धर्मयुद्ध तक कुछ भी हो सकता है. गंजेड़ी भक्त अपनी धर्मनिष्ठ सरकार को एक बार फिर सिंहासन पर बिठाने के लिए धर्मध्वजा लेकर सड़कों पर उतरेंगे. जो लोग धर्म निरपेक्ष राजनीति से धार्मिक राजनीति के इस संक्रमण काल में बच गए, वे शायद राजनीति में धर्म की स्थापना का स्वर्ण-युग देख सकेंगे. ठीक वैसा ही स्वर्ण-युग जैसा अपने पड़ोस के पाकिस्तानी भाई-बंधु और इराक़ तथा सीरिया के करोड़ों लोग एक जमाने से सुखपूर्वक देख रहे हैं.

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