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जब संविधान के बनाए मंदिरों को तोड़ना ही था तो आज़ादी के लिए डेढ़ सौ साल का संघर्ष क्यों किया ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 25, 2018
in गेस्ट ब्लॉग
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जब संविधान के बनाए मंदिरों को तोड़ना ही था तो आज़ादी के लिए डेढ़ सौ साल का संघर्ष क्यों किया ?

जब भारत की जनता गहरी नींद में सो रही थी, तब दिल्ली पुलिस के जवान अपने जूते की लेस बांध रहे थे. बेख़बर जनता को होश ही नहीं रहा कि पुलिस के जवानों के जूते सीबीआई मुख्यालय के बाहर तैनात होते हुए शोर मचा रहे हैं. लोकतंत्र को कुचलने में जूतों का बहुत योगदान है. जब संविधान की धज्जियां उड़ती हैं, तब रात को जूते बांधे जाते हैं. पुलिस के जवान सीबीआई दफ्तर को घेर लेते हैं. रात के पौने एक बज रहे होते हैं. वैसे अंग्रेज़ों में वह गुड मॉर्निंग कहने का होता है. हम रात को रात कहते हैं.

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मुल्क पर काली रात का साया गहरा गया है. तभी एक अफ़सर जो शायद जागा हुआ था, उस कुर्सी पर बैठने के लिए घर से निकलता है जिस कुर्सी पर बैठे आलोक वर्मा ने उसके ख़िलाफ़ CVC यानी केंद्रीय सतर्कता आयुक्त से गंभीर आरोपों में जांच की अर्ज़ी दी है. CVC के वी चौधरी एम नागेश्वर राव को सीबीआई का नया चीफ़ बनाने का रास्ता साफ कर देते हैं. एम नागेश्वर राव अपने नंबर वन चीफ आलोक वर्मा को हटाने के आदेश देते हैं, जिसे छुट्टी पर भेजना कहते हैं. राकेश अस्थाना, जिनकी गिरफ़्तारी की अनुमति मांगी गई थी, उन्हें भी हटा दिया जाता है. काली रात के बंद कमरे में बारह अफ़सरों को मुख्यालय से बाहर भेजने के आदेश पर दस्तखत होते हैं. नींद में सोई जनता करवट बदल लेती है, तख्ता पलट हो जाता है.




हम जिन आहटों की बात करते रहे हैं, वो सुनाई दें, इसलिए जूतों ने वफ़ादारी निभाई है. अब आप पर है कि आप उन जूतों का इशारा समझ पाते हैं या नहीं. मदहोश जनता और गुलाम मीडिया आंखें बंद कर लेती है. शहंशाह का इंसाफ़ शहंशाह के लिए होता है. शहंशाह ने अपने लिए इंसाफ़ कर लिया.

दि वायर में स्वाति चतुर्वेदी ने लिखा है कि सीबीआई के इतिहास में कभी नहीं हुआ कि इंस्पेक्टर जनरल ( IG) को चीफ़ बना दिया गया. स्वाति ने लिखा है कि वर्मा ने प्रधानमंत्री कार्यालय के करीबी यानी जिगरी राकेश अस्थाना की गिरफ़्तारी की अनुमति मांगी थी और वे राफेल डील मामले में जांच की तरफ बढ़ने लगे थे. प्रशांत भूषण, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी से मिल लेने की खबर से सरकार रातों को जागने लगी. दिन में प्रधानमंत्री के भाषणों का वक्त होता है इसलिए ‘इंसाफ’ का वक्त रात का चुना गया. आधी रात के बाद जब-जब सरकारें जागी हैं तब-तब ऐसा ही ‘ इंसाफ’ हुआ है. जूतों की टाप सुनाई देती है.

जनवरी 2017 में आलोक वर्मा को एक कोलेजियम से दो साल के लिए सीबीआई का चीफ़ बनाया गया. आलोक वर्मा का कार्यकाल अगले साल फ़रवरी तक था. इस कोलेजियम में चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया भी थे. जब आलोक वर्मा को हटाया गया तब कोई कोलेजियम नहीं बना. चीफ़ जस्टिस आफ इंडिया तक को नहीं बताया गया. जब आलोक वर्मा को हटाकर एम नागेश्वर राव को चीफ़ बनाया गया तब इसके लिए कोई कोलेजियम नहीं बनाया गया. चीफ़ जस्टिस आफ इंडिया की कोई भूमिका ही नहीं रही. आलोक वर्मा ने प्रधानमंत्री के ‘इंसाफ़’ के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट से इंसाफ की अपील की है.




आप हिन्दी के पाठकों की हत्या अगर हिन्दी के अख़बारों और चैनलों ने नहीं की होती तो आपको पता होता कि अगस्त महीने में जब सीबीआई लंदन की अदालत में अपने दस्तावेज लेकर पहुंची कि इन गवाहों के बयान के आधार पर विजय माल्या को भारत ले जाना ज़रूरी है, तब उन सात गवाहों के बयान पर दस्तखत ही नहीं थे. विजय माल्या 36 सूटकेस लेकर भागा था. स्वाति चतुर्वेदी ने दि वायर में इसे रिपोर्ट किया था.

विजय माल्या ने तभी तो कहा था कि भागने से पहले जेटली से मिला था, जेटली ने खंडन किया. राहुल गांधी ने दस्तावेज़ों के साथ आरोप लगाया कि जेटली की बेटी दामाद के लॉ फ़र्म को माल्या ने फ़ीस दी थी जो उसके भागने को विवाद के बाद लौटा दी गई. एक नैतिक सवाल उठाया गया था मगर तमाम अख़बारों ने इसे जनता तक पहुंचने से रोक दी. जब खबरों के पर कतरे जाते हैं तब जनता के ही पर कतरे जाते हैं. पांव परिंदों के कटते हैं और ख़ून जनता का बहता है.

राकेश अस्थाना जो एक वीडियो में ख़ुद को सरदार पटेल के जैसा बता रहे हैं, 2016 में आरके दत्ता को हटाकर सीबीआई में लाए गए थे. इनके बारे में आलोक वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट से अपनी फ़रियाद में कहा है कि यह आदमी अफ़सरों के बहुमत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ जाकर काम करता है और केस को कमजोर करता है. आलोक वर्मा ने कहा है कि वह ऐसे केस की डिटेल दे सकते हैं.

सवाल उस सीवीसी से है, जिसके पास अस्थाना और राव की शिकायतें थीं. धीमी गति के समाचार की तरह काम करने से सवालों से बचने का मौक़ा मिल जाता है. सीवीसी अपने कर्तव्य के निर्वाहन में फ़ेल रही इसलिए सबसे पहले केवी चौधरी को बर्खास्त करना चाहिए था, मगर चौधरी ने ‘चौधरी’ की लाज रख ली! जब अस्थाना मामले की शिकायत पहुंची तब सीवीसी ने क्या किया? जांच शुरू की?




इंडियन एक्सप्रेस के सुशांत सिंह की खबर है. जब अस्थाना ने आलोक वर्मा की शिकायत की तो सीबीआई से दस्तावेज मांगे गए. सीबीआई ने कहा कि अस्थाना ने क्या शिकायत की वो तो बताइए मगर सीवीसी ने नहीं बताया. सीबीआई के ज्वाइंट डायरेक्टर ने नौ अक्टूबर को सीवीसी को पत्र लिखकर पूछा था.

इस मामले में वित्त मंत्री जेटली बयान दे रहे हैं. दो अफसरों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाए हैं. संस्था का मज़ाक़ उड़ने नहीं दिया जा सकता था. यह ज़रूरी था कि दोनों के आरोपों की जांच के लिए एसआईटी बने और इन्हें अपने प्रभावों से दूर रखा जाए.

विनीत नारायण बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि सीबीआई के निदेशक का कार्यकाल तय समय के लिए स्थायी होगा. अगर विशिष्ठ परिस्थिति में तबादला करना भी होगा तब चयन समिति से अनुमति लेनी होगी. क्या अनुमति ली गई? अस्थाना कोर्ट में हैं, आलोक वर्मा कोर्ट में हैं. एक डीएसपी जेल में है और सरकार का आदमी सीबीआई के भीतर है.

इस मामले में इंसाफ़ हो चुका है. अब और इंसाफ की उम्मीद न करें. आइए हम सब न्यूज़ चैनल देखें. वहां सर्वे चल रहे हैं. बीजेपी की सनातन जीत की घोषणा हो रही है. चैनलों पर आपकी बेहोशी का इंजेक्शन फ्री में मिल रहा है. आइए हम सब संविधान के बनाए मंदिरों को ढहता छोड़कर अयोध्या में राम मंदिर बनाने पर बहस करें. ओ मेरे भारत की महान जनता, जब संविधान के बनाए मंदिरों को तोड़ना ही था तो आज़ादी के लिए डेढ़ सौ साल का संघर्ष क्यों किया ?

  • रविश कुमार
    एनडीटीवी के ब्लॉग के साभार







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