Monday, September 7, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

हिंदी दिवस की तरह ही संविधान दिवस भी मुबारक

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 26, 2018
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

हिंदी दिवस की तरह ही संविधान दिवस भी मुबारक

भारतीय संविधान पूरी दुनिया में शायद इकलौता ऐसा संविधान है, जिसका सीधा टकराव अपने ही सामाजिक मूल्यों से रहा है. जैसे हमारा संविधान सभी को बराबर मानता है लेकिन समाज एक दूसरे को छोटा-बड़ा मानता है. संविधान छुआछूत को अपराध मानता है लेकिन समाज उसे अपनी प्यूरिटी को बचाये रखने के लिए ज़रूरी मानता है. संविधान वैज्ञानिक सोच विकसित करने की बात करता है लेकिन समाज कर्मकांड को अपना प्राण मानता है. इसतरह हम कह सकते हैं कि सभी तरह के जातीय, साम्प्रदायिक और लैंगिक संघर्ष में शामिल लोग संविधान के दोनों छोर पर पाए जाने वाले लोग हैं और ये संघर्ष दरअसल संविधान को न मानने और मानने वालों के बीच का ही संघर्ष है.




मसलन दलित हिंसा के शिकार दलित चाहते हैं कि उनको संविधान प्रदत अधिकार मिले और हमलावर चाहते हैं कि उन्हें दलितों को पीटने का संविधान पूर्व का पारंपरिक अधिकार अभी भी मिलना जारी रहे. इसी तरह साम्प्रदायिक हिंसा के शिकार मुसलमान चाहते हैं कि देश संविधान में वर्णित धर्मनिरपेक्ष मूल्यों से चले, लेकिन उनके हमलावर चाहते हैं कि देश संविधान विरोधी संघ के इशारे पर चले. इस तरह, हम एक राष्ट्र के बतौर पिछले 70 साल से संविधान को उखाड़ने और लागू करने की लड़ाई लड़ रहे हैं.

You might also like

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

दुनिया के किसी भी दूसरे देश में संविधान को लेकर इतना तीखा और लम्बा संघर्ष फिलहाल कहीं नहीं चल रहा है. जो बहुत हद तक स्वाभाविक भी है क्योंकि आप सिर्फ एक दस्तावेज़ लिखकर हज़ारों सालों के सामाजिक रिश्तों को तो नहीं बदल सकते ना. वर्चश्वशाली तबका जिसे उस पारंपरिक व्यवस्था से लाभ था, ऐसे ही तो हथियार डाल नहीं देगा. हो सकता है वो मुह पर कुछ ना बोले लेकिन मन से वो तैयार थोड़े ही होगा इसके लिए.




मसलन समतामूलक संविधान देने वाले अम्बेडकर का सम्मान तो उनके सहयोगी करते थे लेकिन उनके घर जाने पर मंत्रिमंडल के ही कई लोग पानी पीने से इनकार करने के लिए कई तरह के बहाने बना देते थे. कोई कहता था कि उसका व्रत है तो कोई प्यास नहीं लगी है कह कर अपने मन मस्तिष्क को संविधान पूर्व की स्थिति में ही रखने की कोशिश करता था. लेकिन सभी तो अम्बेडकर हो नहीं सकते ना, जिन्हें सिर्फ मौखिक तरीके से ही टरकाया जा सके.

दशरथ मांझी जैसे आम लोगों को तो जिन्हें लगता था कि क़ानून बन जाने से देश अचानक अपने को उसके अनुरूप ढाल लेता है, चट्टी-चौराहों पर पिटना पड़ता था. तब उन्हें समझ में आता था कि जमींदारी उन्मूलन कानून बन जाने से ज़मींदार और हरवाहा बराबर नहीं हो जाते यानी उन्हें इस पिटाई से संदेश दिया जाता था कि संविधान बन जाने से वे ज़्यादा उड़े नहीं, नहीं तो ठीक कर दिए जाएंगे. लेकिन अम्बेडकर और दशरथ मांझी दोनों ने पलटवार किया. एक ने गुस्से में धर्म बदल लिया और एक ने पहाड़ ही काट दिया.




हां, जब कभी संविधान समर्थक लोगों का पलड़ा भारी रहा है, देश आगे बढ़ा है और हम आधुनिक दुनिया का हिस्सा लगने लगे हैं. लेकिन जब संविधान विरोधी खेमा मजबूत हुआ है तो देश प्राचीन युग की उल्टी यात्रा पर निकल गया है. फिलहाल हम इसी उल्टी यात्रा पर हैं जिसमें कई साल पीछे छूट चुके, कई स्टेशन हम लोग पिछमुकिया क्रॉस करेंगे. जैसे अभी कुछ दिन पहले ही हम कभी अविकसित से विकासशील घोषित होने वाले स्टेशन से गुज़रे हैं.

सबसे मजेदार कि इस उलट यात्रा में खूब लंबे-लंबे अंधेरे सुरंग हैं जिनसे गुज़रते हुए सभी यात्री खूब उत्साह से चिल्ला भी रहे हैं. वैसे भी हम अंधेरे में रोमांचित होने वाले समाज तो हैं ही. लेकिन इंतज़ार करिये जल्दी ही दूसरी तरफ जाने वाली इसी नाम की अप ट्रेन भी आने वाली है, जो रोशनी की तरफ जायेगी. ये रस्सा-कस्सी चलती रहेगी.




कई बार एक ही स्टेशन पर दोनों गाड़ियां एक दूसरे को क्रॉस करेंगी या एक साथ किसी तीसरी गाड़ी जो निश्चित है मालगाड़ी होगी, के निकल जाने का इंतज़ार करेंगी. इस दौरान बहुत से यात्री इसमें से उसमें और उसमें से इसमें भी आएंगे जाएंगे. खूब लिहो-लिहो भी होगा. पता नहीं कौन, कहां और क्यों पहुंचेगा ? लेकिन यात्रा मज़ा देगी, जैसे ये देश मज़ा देता है. इस मज़ेदार देश को हिंदी दिवस की तरह ही संविधान दिवस भी मुबारक हो.

  • शहनवाज आलम





Read Also –

भाजपा का सारा कुनबा ही निर्लज्ज और हिन्दू संस्कृति विरोधी है
इतिहास से नफरत और नफरत की राजनीति !
कांचा इलैय्या की किताबों से घबड़ाते क्यों हैं संघी-भाजपाई ?
जब संविधान के बनाए मंदिरों को तोड़ना ही था तो आज़ादी के लिए डेढ़ सौ साल का संघर्ष क्यों किया ?
ये कोई बाहर के लोग हैं या आक्रमणकारी हैं



[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]

Previous Post

देवदासी-प्रथा, जो आज भी अतीत नहीं है

Next Post

कांग्रेस और भाजपा एक सिक्के के दो पहलू

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

by ROHIT SHARMA
September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

by ROHIT SHARMA
September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

by ROHIT SHARMA
August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

by ROHIT SHARMA
August 27, 2026
Next Post

कांग्रेस और भाजपा एक सिक्के के दो पहलू

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

ईश्वर की सरकार – हरिशंकर परसाई

May 10, 2023

’आजादी’ के ’अमृत काल’ में भारत की अर्थव्यवस्था का बढ़ता संकट

January 7, 2024

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026
गेस्ट ब्लॉग

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

तौर-तरीकों को पकड़कर विघटनवाद के खिलाफ संघर्ष की सारवस्तु का गला घोटने के अवसरवादी-विघटनवादी इरादों का पर्दाफाश !

September 1, 2026
गेस्ट ब्लॉग

आत्मसमर्पण क्यों करते हैं क्रांतिकारी नेता ? 2019 के एक दस्तावेज में सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति की समझ

August 29, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत : अवसरवाद, परिसमापनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष तेज़ करें !

August 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

प्रशांत बोस उर्फ किशन दा के बारे में संक्षिप्त जानकारी

August 26, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

रूस यूक्रेन युद्ध में हार जीत के असल मायने

September 6, 2026

युवा शक्ति की पहली ललकार में ही बह निकली इनकी सप्तधारा !

September 1, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.