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कार्ल मार्क्स (1857) : भारतीय विद्रोह

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 18, 2019
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[भाजपा की केन्द्र सरकार एक ओर जहां इतिहास बदलने की लगातार प्रयास कर रही है, ऐसे में इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों में दुनिया के महान दार्शनिक कार्ल-मार्क्स भारत के इतिहास पर एक गहरी निगाह डाले हैं, जिसे हम अपने पाठकों के लिए यहां प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे उन्होंने अलग-अलग समय में लिखा है.]

कार्ल मार्क्स (1857) : भारतीय विद्रोह

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विद्रोही सिपाहियों द्वारा भारत में किए गए अनाचार सचमुच भयानक, वीभत्स और अवर्णनीय हैं. ऐसे अनाचारों को आदमी केवल विप्लवकारी युध्दों में, जातियों, नस्लों और, सबसे अधिक, धर्म-युध्दों में देखने का खयाल मन में ला सकता है. एक शब्द में, ये वैसे ही अनाचार हैं जैसे वेंदियनों ने ‘नीले सैनिकों’ पर किए थे और जिनकी इंगलैंड के भद्र लोग उस वक्त तारीफ किया करते थे; वैसे ही जैसे कि स्पेन के छापेमारों ने अधर्मी फ्रांसीसियों पर, सर्बियनों ने जर्मन और हंगरी के अपने पड़ोसियों पर, क्रोट लोगों ने वियना के विद्रोहियों पर, कावेनाक के चलते-फिरते गार्डों अथवा बोनापार्ट के दिसंबरवादियों ने सर्वहारा फ्रांस के बेटे-बेटियों पर किए थे. सिपाहियों का व्यवहार चाहे जितना भी कलंकपूर्ण क्यों न रहा हो, पर अपने तीखे अंदाज में, वह उस व्यवहार का ही प्रतिफल है जो न केवल अपने पूर्वी साम्राज्य की नींव डालने के युग में, बल्कि अपने लंबे जमे शासन के पिछले दस वर्षों के दौरान में भी इंगलैंड ने भारत में किया है. उस शासन की विशेषता बताने के लिए इतना ही कहना काफी है कि यंत्रणा उसकी वित्तीय नीति का एक आवश्यक अंग थी. मानव इतिहास में प्रतिशोध नाम की भी कोई चीज होती हैं; और ऐतिहासिक प्रतिशोध का यह नियम है कि उसका अस्त्र त्रस्त होने वाला नहीं, वरन स्वयं त्रास देने वाला ही बनाता है. फ्रांसीसी राजतंत्र पर पहला वार किसानों ने नहीं, अभिजात कुलों ने किया था.

भारतीय विद्रोह का आरंभ अंग्रेजों द्वारा पीड़ित, अपमानित और नंगी बना दी गई रैयत ने नहीं किया, बल्कि उनके द्वारा खिलाए-पिलाए, वस्त्र पहनाए, दुलराए, मोटे किए और बिगाड़े गए सिपाहियों ने ही किया है. सिपाहियों के दुराचारों की तुलना के लिए हमें मध्य युगों की ओर जाने की जरूरत नहीं है, जैसा कि लंदन के कुछ अखबार झूठ-मूठ कहने की कोशिश करते हैं; उसके लिए हमें वर्तमान इंगलैंड के इतिहास से भी दूर जाने की आवश्यकता नहीं है. हमें केवल इस बात की जरूरत है कि प्रथम चीनी युध्द का, जो मानो कल की ही घटना है, अध्ययन कर लें. अंगरेज सिपाहियों ने तब केवल मजे के लिए अत्यंत घिनौने काम किए थे; उनकी भावनाएं तब न तो धार्मिक पागलपन से प्रेरित हुई थीं, न वे किसी अहंकारी और विजेता जाति के प्रति घृणा से भरकर उभर पड़ी थीं, और न वे किसी वीर शत्रु के कठिन प्रतिरोध के कारण ही भड़क उठी थीं. स्त्रियों पर बलात्कार करना, बच्चों को शलाखें भोंक देना, पूरे-पूरे गांवों को भून देनाये सब उनके खेल थे. इनका वर्णन मंदारिनों (चीनी अधिकारियों) ने नहीं, बल्कि स्वयं ब्रिटिश अफसरों ने किया है.

इस दु:खद संकट काल में भी यह सोच लेना भयानक भूल होगी कि सारी क्रूरता सिपाहियों की ही तरफ से हुई है और मानवीय दया-करुणा का सारा दूध अंगरेजों की तरफ से बहा है. ब्रिटिश अफसरों के पत्र कपटपूर्ण द्वेष से भरे हुए हैं. पेशावर से एक अफसर ने उस 10वीं अनियंत्रित घुड़सवार सेना के निरस्त्रीकरण का वर्णन लिखा है, जिसने आज्ञा दिए जाने के बावजूद, 55वीं भारतीय पैदल सेना पर आक्रमण नहीं किया था. यह इस बात पर बेहद खुशी प्रकट करता है कि न केवल वे निहत्थे कर दिए गए थे, बल्कि उनके कोट और बूट भी छीन लिए गए थे, और उनमें से हर आदमी को 12 पेंस देकर पैदल नदी के किनारे ले जाया गया था, और वहां नावों में बैठाकर सिंधु नदी से उन्हें नीचे की तरफ भेज दिया गया था, जहां कि, आह्लाद से भरकर लेखक आशा करता है, उनमें से हर माई का लाल तेज भंवरों में डूब जाएगा. एक और लेखक हमें बताता है कि पेशावर के कुछ निवासियों ने एक शादी के अवसर पर पटाखे छुटा कर (जो एक राष्ट्रीय रिवाज है) रात में घबराहट पैदा कर दी थी; तो अगली सुबह उन लोगों को बांध दिया गया था और ‘इतने कोड़े लगाए गए थे कि आसानी से वे उन्हें नहीं भूलेंगे.’ पिंडी से खबर मिली कि तीन देशी राजा साजिश कर रहे थे. सर जॉन लॉरेंस ने एक संदेश भेजा जिसमें आज्ञा दी गई कि एक जासूस उस मंत्रणा की खोज-खबर लाए. जासूस की रिपोर्ट के आधार पर, सर जॉन ने एक दूसरा संदेश भेजा, ‘उन्हें फांसी दे दो.’ राजाओं को फांसी दे दी गई. इलाहाबाद से सिविल सर्विस का एक अफसर लिखता है : ‘हमारे हाथ में जिंदगी और मौत की ताकत है, और हम तुम्हें यकीन दिलाते हैं कि उसका इस्तेमाल करने में हम कोताही नहीं करते !’ वहीं से एक दूसरा अफसर लिखता है : ‘कोई दिन नहीं जाता जब हम उनमें से (न लड़ने वाले लोगों में से) 10-15 को लटका न देते हों !’ एक बहुत प्रसन्न अफसर लिखता है : ‘होम्स, एक ‘बढिया’ आदमी की तरह, उनमें से 20-20 को एक साथ फांसी पर लटका रहा है.’ एक दूसरा, बड़ी संख्या में हिंदुस्तानियों को झटपट फांसी देने की बात का जिक्र करते हुए कहता है : ‘तब हमारा खेल शुरू हुआ.’ एक तीसरा : ‘घोड़ों पर बैठे-बैठे ही हम अपने फौजी फैसले सुना देते हैं, और जो भी काला आदमी हमें मिलता है, उसे या तो लटका देते हैं, या गोली मार देते हैं.’ बनारस से हमें सूचना मिली है कि तीस जमींदारों को केवल इसलिए फांसी दे दी गई है कि उन पर स्वयं अपने देशवासियों के साथ सहानुभूति रखने का संदेह किया जाता था; और इसी संदेह में पूरे गांव के गांव जला दिए गए हैं. बनारस से एक अफसर, जिसका पत्र लंदन टाइम्स में छपा है, लिखता है : ‘हिंदुस्तानियों से सामना होने पर यूरोपियन सैनिक शैतान की तरह पेश आते हैं.’ और यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अंग्रेजों की क्रूरताएं सैनिक पराक्रम के कार्यों के रूप में बयान की जाती हैं; उन्हें सीधे-सादे ढंग से, तेजी से, उनके घृणित ब्योरों पर अधिक प्रकाश डाले बिना बताया जाता है; लेकिन हिंदुस्तानियों के अनाचारों को, यद्यपि वे खुद सदमा पहुंचाने वाले हैं, जान-बूझकर और भी बढ़ा-चढ़ा कर बयान किया जाता है. उदाहरण के लिए, दिल्ली और मेरठ में किए गए अनाचारों की परिस्थितियों के उस विस्तृत वर्णन को, जो सबसे पहले टाइम्स में छपा था और बाद में लंदन के दूसरे अखबारों में भी निकला था किसने भेजा था ? बंगलौर, मैसूर में रहने वाले एक कायर पादरी नेजो एक सीध में देखा जाए तो घटना-स्थल से 1,000 मील से भी अधिक दूर था. दिल्ली के वास्तविक विवरण बताते हैं कि एक अंगरेज पादरी की कल्पना हिंद के किसी बलवाई की कल्पना की उड़ानों से भी अधिक भयानक अत्याचारों को गढ़ सकती है. निस्संदेह, नाकों, छातियों, आदि का काटना, अर्थात, एक शब्द में, सिपाहियों द्वारा किए जाने वाले अंग-भंग के वीभत्स कार्य यूरोपीय भावना को बहुत भीषण मालूम होते हैं.

‘मैंचेस्टर शांति समाज’ के एक मंत्री द्वारा कैंटन के घरों पर फेंके गए जलते गोलों, अथवा किसी फ्रांसीसी मार्शल द्वारा गुफा में बंद अरबों के जिंदा भून दिए जाने, या किसी कूढ़ मगज फौजी अदालत द्वारा ‘नौ दुम की बिल्ली’ नाम के कोड़े से अंगरेज सिपाहियों की जीते जी चमड़ी उधेड़ दिए जाने, या ब्रिटेन के जेल-सदृश उपनिवेशों में प्रयोग में लाए जाने वाले ऐसे ही किसी अन्य मनुष्य-उध्दारक यंत्र के इस्तेमाल की तुलना में भी सिपाहियों के ये कार्य उन्हें कहीं अधिक भीषण लगते हैं. किसी भी अन्य वस्तु की तरह क्रूरता का अपना फैशन होता है, जो काल और देश के अनुसार बदलता रहता है. प्रवीण विद्वान सीजर स्पष्ट बताता है कि किस प्रकार उसने सहस्रों गॉल सैनिकों के दाहिने हाथ काट लेने की आज्ञा दी थी. इस कर्म में नेपोलियन को भी लज्जा आती. अपनी फ्रंच रेजीमेंटों को, जिन पर प्रजातंत्रवादी होने का संदेह किया जाता था, वह सांटों डोमिन्गो भेजना अधिक पसंद करता था, जिससे कि वे प्लेग की चपेट में और काली जातियों के हाथ में पड़कर वहां मर जाएं. सिपाहियों द्वारा किए गए वीभत्स अंग-भंग हमें ईसाई बाईजैंटियन साम्राज्य की करतूतों, सम्राट चार्ल्स पंचम के फौजदारी कानून के फतवों, अथवा राजद्रोह के अपराध के लिए अंगरेजों द्वारा दी जाने वाली उन सजाओं की याद दिलाते हैं, जिनका जज ब्लैकस्टोन की लेखनी से किया गया वर्णन अब भी उपलब्ध है. हिंदुओं कोजिन्हें उनके धर्म ने आत्म-यंत्रणा की कला में विशेष पटु बना दिया है. अपनी नस्ल और धर्म के शत्रुओं पर ढाए गए ये अत्याचार सर्वथा स्वाभाविक लगते हैं; और, उन अंगरेजों को तोजो कुछ ही वर्ष पहले तक जगन्नाथ के रथ उत्सव से कर उगाहते थे और क्रूरता के एक धर्म की रक्तरंजित विधियों की सुरक्षा और सहायता करते थे वे इससे भी अधिक स्वाभाविक मालूम होने चाहिए.

‘बेहूदा खबीस टाइम्स’ कौवेट इसे इसी नाम से पुकारा करता थाका बौखलाहट भरा प्रलाप, मोजार्ट के किसी गीतिनाटय के एक क्रुध्द पात्र जैसा उसका अभिनय और फिर प्रतिशोध के आक्रोश से अपनी खोपड़ी के सारे बालों का नोच डालना. यह सब एकदम मूर्खतापूर्ण लगता यदि इस दुखांत नाटक की करुणा के अंदर से भी उसके प्रहसन की चालाकियां साफ-साफ न झलकती होतीं. मोजार्ट के गीतिनाटय का कु्रध्द पात्र इसी तरह पहले शत्रु को फांसी देने, फिर भूनने, फिर काटने, फिर कबाब बनाने, और फिर जीते जी उसकी खाल उधेड़ने के विचार को अत्यंत मधुर संगीत के द्वारा व्यक्त करता है. लंदन टाइम्स अपना पार्ट अदा करने में आवश्यकता से अधिक अतिरंजना से काम लेता हैऔर ऐसा वह केवल भय के कारण नहीं करता. प्रहसन के लिए वह एक ऐसा विषय बताता है जिसे मोलियर तक की नजरें न देख सकी थीं. वह प्रतिशोध के मुखौटा नाटय की रचना करता है. वह जो चाहता है वह केवल यह है कि सरकार का खजाना बढ़ जाए और सरकार के चेहरे पर नकाब पड़ा रहे. दिल्ली चूंकि महज हवा के झोंकों के सामने भरभरा कर उस तरह नहीं गिर पड़ी है जिस तरह जैरिको की दीवारें गिर पड़ी थीं, इसलिए जान बुल के लिए जरूरी है कि उसके कानों में प्रतिशोध की कर्णभेदी आवाजें गूंजती रहें और उनकी वजह से वह यह भूल जाए कि जो बुराई हुई है और उसने जो इतना विराट रूप ग्रहण कर लिया है, उसकी सारी जिम्मेदारी स्वयं उसकी अपनी सरकार पर ही है.

[16 सितंबर, 1857 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 5119, में प्रकाशित]

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