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राखीगढ़ी : अतीत का वर्तमान को जवाब

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 3, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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हमेशा से ही भारत के इतिहास के साथ छेड़छाड़ किया गया है और तथ्यों को विकृत कर पेश किया गया है. उससे भी बढ़कर देश में लिखित साहित्य का न लिखा जाना, इतिहास को समझने की दिशा में सबसे बड़ी बाधक है. ऐसे में यह पृथ्वी खुद एक प्रमाणित इतिहास है, जिसे बरगलाया नहीं जा सकता.

पुरातत्ववेत्ताओं के द्वारा राखीगढ़ी में खुदाई के बाद मिले मानव कंकाल वर्तमान के अनेक सवालों का जवाब देता है, जिसको लेकर हमेशा विवाद पैदा करने की कोशिश की जाती है. इसी में एक सवाल है क्या आर्य बाहर से आये थे ? राखीगढ़ी में मिले कंकाल ने स्पष्ट जवाब दिया है ‘हां, आर्य बाहर से आये थे.’ इसके बाद भी संघी इतिहासकार जिसे विज्ञान से कोई लेना देना नहीं होता है, राखीगढ़ी के जवाब को शोर में डूबा देना चाहते हैं.

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न्यूज क्लिक वेबसाइट ने राखीगढ़ी के कंकाल के दिये जवाब को प्रकाशित किया है, जिसे प्रवीण पुरकायस्थ ने लिखा है, हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं.

राखीगढ़ी : अतीत का वर्तमान को जवाब

प्राचीन डीएनए और दक्षिण एशिया में देशांतर गमन पर दो हालिया अध्ययन एक साथ और एक ही समय में अपने अपने क्षेत्रों में बेहद प्रतिष्ठित दो जर्नल में एक साथ प्रस्तुत हुए हैं, जिसमें से एक साइंस (Science) और दूसरा  सेल (Cell) मैगज़ीन हैं. दोनों ही पत्रिकाओं में कई लेखक ऐसे हैं जिन्होंने दोनों जगह अपने दस्तावेज प्रस्तुत किये हैं और हार्वर्ड के आनुवांशिकी प्रयोगशाला के संसाधनों का इस्तेमाल किया है. इनमें से हर लेख अपने आप में महत्वपूर्ण है.

साइंस (Science) मैगज़ीन ईरान, मध्य एशिया और अनातोलिया के बारे में कई साइटों से प्राचीन डीएनए के 523 नमूनों के बारे में रिपोर्ट प्रस्तुत करती है, और इसकी तुलना इस क्षेत्र की वर्तमान आबादी और दक्षिण एशिया से करती है. इस अध्ययन ने हमारे ऐसे प्राचीन डीएनए के नमूनों के बारे में अध्ययन की कुल संख्या को 25% तक बढ़ा दिया है.

जबकि सेल (Cell) पेपर केवल एक ऐसे नमूने को प्रस्तुत करता है, जो अपने आप में अभी तक एकमात्र नमूना दक्षिण एशिया से प्राप्त हुआ है, जो सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में एक सिन्धु घाटी से प्राप्त होता है. जैसा कि एक लेखक ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि, प्राचीनतम डीएनए ठंडे और शुष्क जलवायु में बेहतर तरीके से संरक्षित रह सकते हैं, और यह दोनों चीजें ही भारत में नहीं हैं. राखीगढ़ी में दफन 61 कंकालों में से, मात्र एक ही प्राचीन डीएनए के बारे में पर्याप्त जानकारी दे पाने में समर्थ था, जिसे ठीक से अनुक्रमित किया जा सकता था. यह, वैज्ञानिक समुदाय के लिए, वास्तव में उस समूह के लिए एक बड़ी उपलब्धि है. वाघीश नरसिम्हन, जिनका दोनों जर्नल में लेखक के रूप में प्रमुख स्थान है, और डेविड राइच, जो हार्वर्ड प्रयोगशाला के प्रमुख हैं, ने दोनों तरह की कठिनाइयों का वर्णन किया है कि उन्होंने किस प्रकार प्राचीनतम डीएनए के संकेतों को कई गुना बढ़ाकर और अन्य प्रदूषित करने वाले कारकों के बावजूद हासिल किया.

हमने हार्वर्ड में रीच ग्रुप और भारत सहित दुनिया भर में फैले उनके सहयोगियों के काम के पुराने परिणामों (पूर्ववर्ती संस्करण में उपलब्ध हैं) को  इन कॉलमों में स्थान दिया है. उन्होंने दिखाया है कि विस्तृत घास के मैदानों से प्रवासित होकर काले सागर और कैस्पियन सागर के मध्य प्रस्थान प्राचीन डीएनए में दिखाई देता है, जो यूरोपीय लोगों के साथ-साथ दक्षिण एशियाई आबादी के वर्तमान आनुवांशिकी प्रोफाइल को समझने में मदद करता है.

यह वितरण भाषाओं के वर्तमान वितरण को बारीकी से समझने के लिए भी प्रतीत होता है, जिसे भाषाओं के इंडो-यूरोपीय समूह के रूप में जाना जाता है। दक्षिण एशिया में, जनसंख्या के वर्तमान आनुवांशिक वितरण उत्तर भारत में पुरुष ब्राह्मण आबादी का विस्तृत घास के मैदानों से उपजे वंश को प्रमुखता से दर्शाता है. जब हम दक्षिण या पूर्व की ओर जाते हैं, तो इसमें गिरावट दिखती है, इसलिए उत्तरपश्चिम से दक्षिण एशिया में घास के मैदानों के लोगों के प्रवेश की पहचान होती है. जब हम ब्राह्मणवादी जातीय ढांचे को देखते हैं तो ये मैदानी प्रदेशों से आये लोगों का प्रतिनिधित्व महिला आबादी में और कम दीखता है. साइंस (Science) पत्रिका में प्रकाशित वर्तमान परिणाम बायोरेक्सिव संस्करण को और अधिक डेटा नमूनों से सिर्फ और अधिक बल ही देते हैं.

साइंस (Science) में छपे दस्तावेजों का वास्तविक महत्व सेल (Cell) द्वारा प्रकाशित राखीगढ़ी के पेपर को साथ पढ़ने में है. सेल (Cell) पेपर से पता चलता है कि एकमात्र कंकाल जिससे प्राचीन डीएनए के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिली, वह एक महिला का था, जिसे लगभग 4,500-5,000 साल पहले औपचारिक रूप से दफनाया गया था. इसका मतलब यह हुआ कि यह विस्तृत मैदानी इलाकों से दक्षिण एशिया में आगमन से पहले हुआ था जो गमन उसके बाद कम से कम 600-1000 साल बाद हुआ. राखीगढ़ी का यह प्राचीन डीएनए किसी भी विस्तृत मैदानी इलाके से आये प्रवासी की अनुपस्थिति को होने को दर्शाता है, और इसलिए पुरातात्विक और अन्य सबूतों को मजबूत करता है कि सिंधु घाटी सभ्यता उन लोगों द्वारा बनाई गई थी जिनके पास स्टेप्स इलाकों से आने के सबूत नहीं हैं. यह आज उस इलाके के लोगों की आनुवंशिक संरचना से मेल नहीं खाता है, जो आज दक्षिण एशिया में “उच्च” जाति के पुरुषों की है.

इससे भी अधिक चौंकाने वाली खोज है 11 कंकालों का 2 जगहों से पाया जाना, पूर्वी ईरान में शहर-ए-शोकता (Shahr-i-Sokhta) और आधुनिक तुर्कमेनिस्तान के गोनूर (Gonur ) में, जो बैक्ट्रिया-मर्जिअना आर्कियोलॉजिकल कॉम्प्लेक्स (बीएमएसी) का एक हिस्सा है। इन 11 कंकालों का उसी स्थानों से बरामद किए गए अन्य कंकालों से प्राप्त डीएनए से कोई संबंध नहीं है, लेकिन आनुवंशिक रूप से इनका सम्बन्ध राखीगढ़ी से प्राप्त डीएनए के बहुत करीब है. और सभी 12 कंकाल जिनमें से 11 गोनूर और शहर-ए-शोकता से और एक राखीगढ़ी से, मजबूत दक्षिण एशियाई जनसंख्या चिह्न दर्शाते हैं, जिसमें प्राचीन ईरानी शिकारी के लक्षण भी दीखते हैं.

इन 11 डीएनए प्रोफाइल्स के साथ एक और एक नमूना जो राखीगढ़ी से प्राप्त हुआ है वह हमें सिंधु घाटी सभ्यता की आबादी की बेहतर समझ प्रदान करने में मदद करते हैं.
इस खोज के आधार पर, हम अब दो निष्कर्ष रख सकते हैं.

एक, सिंधु घाटी के लोगों ने गोनूर और शहर-ए-शोकता में व्यापार की व्यवस्था की थी, लेकिन स्थानीय आबादी के साथ आपस में वैवाहिक सम्बन्ध नहीं थे.

दूसरा, राखीगढ़ी, गोनूर और सहर-ए-शोकता में कंकाल इस अवधि में स्टेप्स (विस्तृत घास के मैदानों से आगमन ) के चिह्न नहीं दिखाते, लेकिन बाद के समय और इस इलाके में वर्तमान आबादी क्षेत्र में इन विस्तृत घास के मैदानों से आगमन की मौजूदगी दिखाई देती है. स्पष्ट रूप से, उपरोक्त सभी तीन क्षेत्रों में इस अवधि में घास के मैदानों से आगमन होता नहीं दीखता.

दूसरी उल्लेखनीय खोज यह है कि सिंधु घाटी के लोग – वह एकमात्र राखीगढ़ी कंकाल और अन्य 11 गोनूर और सहर-ए-शोकता के बीच – जो कि, ज़ाग्रोस पर्वत शिकारी आबादी से निकटता से संबंधित थे, उनसे लगभग 12,000 साल पहले अलग चुके थे. यह ज़ाग्रोस (Zagros) की पहाड़ियों में कृषि के जन्म से पहले की तारीख से पृथक करता है और इस बात का सुबूत है कि कृषि स्वतंत्र रूप से सिंधु घाटी में उत्पन्न हुई, जैसा कि अनातोलिया और ज़ाग्रोस की पहाड़ियों में हुआ था. ये ईरानी किसान नहीं थे जो सिन्धु घाटी में अपने साथ कृषि का ज्ञान लेकर आये, बल्कि उनके भी पूर्वज थे, जो उस समय भी शिकारी थे, ने उत्तर पश्चिम से दक्षिण एशिया में प्रवेश किया, और फिर सिंधु घाटी में स्वतंत्र रूप से कृषि विकसित की.

यह उर्वरा और निरंतर विकसित होने वाले वे दो स्थान थे जिनमें कृषि स्वतंत्र रूप से विकसित हुई; और दोनों के बीच द्वि-दिशात्मक प्रवाह थे. इसी तरह के आनुवंशिकता प्रवाह ज़ाग्रोस पहाड़ के लोगों और सिंधु घाटी के लोगों के बीच नहीं हुआ, क्योंकि वे शिकारी आबादी के रूप में एक दूसरे से बिखर चुके थे, जिसका अर्थ है कि  कृषि सम्बन्धित ज्ञान तो साझा किया जा सकता था, लेकिन कोई खास पलायन या अंतर विवाह नहीं हो सका.

प्रोफेसर शिंदे, जो कि पूर्व में डेक्कन कॉलेज के कुलपति थे, ने राखीगढ़ी की खुदाई का नेतृत्व किया और प्रोफेसर रीच के ग्रुप को राखीगढ़ी कंकाल सौंपे. वह राखीगढ़ी दस्तावेजों के प्रमुख लेखकों में से एक हैं. वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से सम्बद्ध रहे हैं और उनके विज्ञान संगठन विज्ञान भारती (Vijnana Bharati ) की गतिविधियों से जुड़े हुए हैं, एक संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा कि राखीगढ़ी के आनुवंशिक प्रमाण से पता चलता है कि यह कोई आर्यन आक्रमण नहीं था, और सिंधु घाटी के लोग संस्कृत बोलते थे.

प्राचीन डीएनए से सिंधु घाटी के लोग किस भाषा में बात करते थे, इस बात को प्रमाणित करना अपने आप में किस तरह कपोल कल्पना है, यह स्पष्ट से समझा जा सकता है.  किसी भी इंसान का कोई डीएनए इस बात का संकेत नहीं देता कि वे किस भाषा में बात करते थे. प्रोफेसर शिंदे एक पुरातत्वविद् हैं, और प्राचीन डीएनए साक्ष्यों के आधार पर अपने विश्वास का दावा करना उनकी अकादमिक प्रतिष्ठा से उन्हें बहुत दूर भटकाता है. बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट, लखनऊ से नीरज राय और हार्वर्ड से वागेश नरसिम्हन सहित अन्य प्रमुख लेखकों ने ‘विनम्रता’ से इस बात की ओर इशारा किया कि, राखीगढ़ी के प्राचीन डीएनए साक्ष्य प्रो. शिंदे के दावे को प्रमाणित नहीं करते हैं.

दूसरे देशों में, प्राचीन डीएनए के ऐसे अध्ययन और निष्कर्ष सिर्फ उस विषय के विद्वानों की रूचि का विषय होते हैं लेकिन भारत में, यह तुरंत विवाद का विषय बन गया. हिंदुत्व ब्रिगेड के लिए जिनका विश्वास है कि संस्कृत बोलने वाले और वैदिक ग्रन्थ स्वदेशी हैं, उनके लिए अपने सिद्धांत को प्रमाणिक करने के लिए यह बात काफी मार्के की सिद्ध हो गई. यदि उन्हें यह दिखाया जाता है कि उनकी उत्पत्ति भारत से बाहर हुई, तब उनके इस सांप्रदायिक एजेंडा की हवा निकल जाती है, जिसमें वे दावा करते हैं कि भारत उनकी पितृभूमि और पुण्यभूमि है, और हिन्दुओं का इस धरती पर सबसे अधिक अधिकार है. जबकि हकीकत यह है कि ऋग्वैदिक आर्य, भारत में आने वाले कई अन्य आक्रमणकारियों की तरह ही उनमें से एक हैं.

आरएसएस और अन्य हिन्दू वर्चस्ववादी समूहों के लिए, ऐसा कोई प्रमाण जिससे यह साबित होता हो कि वैदिक संस्कृत बोलने वाले लोग, जो इंडो-यूरोपियन भाषा बोलते थे और बाहर से आये थे, को हर हाल में नकारना है; इसके लिए प्रमाण के बजाय विश्वास को आधार बनाया जाता है. भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (ICHR) के पूर्व अध्यक्ष, प्रोफेसर वाई. एस. राव तो एक कदम और आगे जाकर कहते हैं कि ‘हमारे मौखिक इतिहास – हमारे पौराणिक कथाओं और महाकाव्यों – को न सिर्फ वास्तविक ऐतिहासिक साक्ष्य के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए बल्कि किसी भी पुरातात्विक या भाषाई साक्ष्य से इन्हें बड़े साक्ष्य के रूप में स्थान दिया जाना चाहिए.’ प्रमाणों की इस सूची में जिसका संघियों के लिए ‘नगण्य’ स्थान है, में अब आनुवंशिक प्रमाणों को भी जोड़ना चाहिए; और यह स्वीकार करे कि क्या यह उस थिसिस को मान्यता देता है जिसमें इंडो-यूरोपियन भाषा बोलने वालों की उत्पत्ति दक्षिण एशिया में तो दर्शाई जाती है, लेकिन अगर झूठ साबित हो तो फिर अपने उस सिद्धांत को अस्वीकार भी करने का साहस हो ?

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