Saturday, June 13, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्षों में मुसलमानों की भूमिका (1763-1800)

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 14, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्षों में मुसलमानों की भूमिका (1763-1800)

भारत के बहुचर्चित इतिहास-लेखन में हमेशा ही मुसलमानों को बाहर से आये हमलावर और राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के गद्दार के रूप में देखने की एक प्रवृत्ति हमारे देश में पायी जाती है. इसके कारण बुनियादी रूप से दो हैं. इनमें पहला है, भारत के इतिहास-लेखन पर औपनिवेशिक प्रभाव. इसका शिकार होने की वजह से ही यहां तक कि डॉ. यदुनाथ सरकार से लेकर डॉ. आर. सी. मजुमदार जैसे इतिहासज्ञों ने भी मुसलमानों को सांस्कृतिक रूप से अलग ही माना है और अंततः धर्म के आधार पर इंसानों को बांटने की ब्रिटिश साम्राजयवादी साजिश को ही अमली जामा पहनाया है.

You might also like

मोदी सरकार का योजना जनता की आंखों में धूल झोंकने वाली ‘आंकड़ों की बाजीगरी’ है !

सशस्त्र संघर्ष के समर्थन में गणपति का साक्षात्कार

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

दूसरा कारण यह है कि स्वाधीनता के बाद के भारत के शासक वर्ग ने साफ-साफ यह समझ लिया था कि राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम में मुसलमानों की भूमिका का यदि सही-सही विश्लेषण करना हो तो एक-पर-एक होनेवाले ब्रिटिश-विरोधी सशस्त्र संघर्ष को स्वीकृति देनी होगी, जिससे कि एक तरह से उनका खुद का वर्ग-चरित्र सबों के सामने उजागर हो जाएगा. यही कारण है कि यहां तक कि कांग्रेस भी, भारत के स्वाधीनता संघर्ष में मुसलमानों की भूमिका सिर्फ उसी हद तक चर्चा करती है जिस हद तक कि वे खुद को पर्याप्त रूप से भारत की धर्मनिरपेक्षता के रक्षक के रूप में पेश कर सकें. इस तरह का नजरिया ब्रिटिश-विरोधी सशस्त्र किसान संघर्षों और जन संघर्षों में मुसलमानों की भूमिका को घटाकर दिखाता है, जबकि इन संघर्षों की उम्र कांग्रेस के जन्म से एक सौ साल पहले से भी ज्यादा है.




1964 ई. में बक्सर के युद्ध में जीत हासिल करने के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा में राजस्व उगाहने का अधिकार (दवानी) हासिल कर लिया. उन्होंने इन सारे क्षेत्रें में भारी लूट-पाट शुरू कर दी. मुगल शासन की कमजोर होती स्थिति का लाभ उठाकर कम्पनी धीरे-धीरे भारत के पुराने गांव केन्द्रित अर्थव्यवस्था को तहस-नहस करती रही और उसने एक अत्यन्त उत्पीड़नमूलक मुद्रा-आधारित मालगुजारी वसूलने वाली व्यवस्था की शुरूआत की. कम्पनी और किसानों के बीच यानी, इस स्तर-दर-स्तर सार आधारित शोषण-व्यवस्था के पिरामिड के सबसे ऊपरी और सबसे नीचे के स्तरों के बीच विभिन्न स्तरों पर विभिन्न तरह के शोषक विराजमान थे जैसे, नाजिम, जमींदार, तालुकेदार और सबसे भयानक खून-चूसनेवाले महाजन आदि.




वस्तुतः 1757 में पलासी के युद्ध में षड्यंत्र के सहारे जीत हासिल करने के बाद से ही कम्पनी ने बेलगाम शोषण-उत्पीड़न शुरू कर दिया था. ऐसी परिस्थिति में गरीब किसानों और करीगरों का जीवन असह्य हो गया था. नतीजतन 1763 से लेकर 1800 के बीच किसानों ने ब्रिटिशों के खिलाफ कई सशस्त्र विद्रोह किये थे. चूंकि सन्यासियों और फकीरों के विभिन्न सम्प्रदायों ने इन विद्रोहों में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी, इसीलिए ये विद्रोह सन्यासी-फकीर विद्रोह के नाम से ही ज्यादा लोकप्रिय हुए. हालांकि वास्तव में तीन अलग-अलग ताकतों ने इन विद्रोहों में एक साथ भाग लिया था, वे थीं – बंगाल और बिहार की दुर्दशाग्रस्त किसान और कारीगर जनता, (2) ढहते, कमजोर होते मुगल साम्राज्य में जीविका से वंचित और इधर-उधर भटकते रहने वाले सैनिकों के जत्थे, और (3) सन्यासियों और फकीरों के विभिन्न सम्प्रदाय जिन्होंने किसानों और कारीगरों के रूप में बंगाल और बिहार में बस्तियां बसा ली थीं और जो धार्मिक मामलों में अंग्रेजी शासकों के हस्तक्षेप (मसलन, तरह-तरह के धार्मिक क्रियाकलापों पर कर लगाना) की वजह से उनके प्रति भारी गुस्से से उबल रहे थे. [1]



इस विद्रोह के अधिकांश नेता और संगठक धर्म के लिहाज से मुसलमान थे, जिनमें से ढेरों ने अंग्रेजी फौज के साथ युद्ध में अपनी जानें न्यौछावर की थी, इनमें थे – मजनू शाह, मूसा शाह, फरागुल शाह, चिराग अली, नुरूल मोहम्मद, रमजानी शाह, जौहरी शाह, सुभान अली, आमदी शाह, नियागु शाह, बुधु शाह, ईमान शाह आदि. उनके साथ कंधों-से-कंधा मिलाकर जो गैर-मुस्लिम नेता भी लड़े थे, उनका भी नाम लेना जरूरी है, जैसे- भवानी पाठक, देवी चौधरानी, रामानन्द गोसाईं, हजारी सिंह, फटिक बरूआ आदि. [1,2] इन समूचे चार दशकों के दौरान विद्रोही फौजें बंगाल (दिनाजपुर, बोगुड़ा, जलपाईगुड़ी, रंगपुर) और बिहार (सारंगी, पूर्णिया) के विभिन्न स्थानों में अंग्रेजों की कोठियों और स्थानीय जमीदारों पर हमले करती रही. उन्होंने उनकी सम्पत्तियां लूटी, जो दरअसल इन किसानों और कारीगरों के ही श्रम की उपज थीं और सशस्त्र ब्रितानी फौज से वीरतापूर्वक लड़ते रहे. सही-सही कहें तो उस विद्रोह में धर्म कोई मसला ही नहीं था, बल्कि अपने-अपने धर्मों और सम्प्रदायों आदि से ऊपर उठकर किसान एवं कारीगर जनता इकट्ठी हुई थी और सामंतों, जमींदारों एवं साम्राज्यवादी अंग्रेजों के भयानक शोषण के खिलाफ संघर्ष में गरज उठी थी.




एक पर एक होनेवाले इन संघर्षों में मजनू शाह की भूमिका खास तौर पर महत्वपूर्ण थी. एक तरफ तो वे कुशल संगठक थे, तो दूसरी तरफ वे एक दुर्दम्य सैन्य-क्षमता से लैस योद्धा भी थे. उनके नेतृत्व में विद्रोही किसानों की सेना ने 1769 के दिसम्बर में कैप्टेन मैकेंजी और कमांडर कीथ के नेतृत्वाधीन संयुक्त फौज को नेपाल की सीमा के पास मोरंग के युद्ध में हरा दिया था. इस युद्ध में कमांडर कीथ मारा गया. [3] 1771 की फरवरी में मजनू शाह लेफ्रिटनेंट टेलर की फौज को चकमा देकर निकल गये और महास्थानगढ़ के अपने किले में अड्डा जमाया. वहां से वे बाद में बिहार निकल गये और वहां के किसानों और कारीगरों को संगठित करना शुरू किया. [1,2] 1776 की 14 नवम्बर के एक और बहादुराना संघर्ष में वे और उनकी विद्रोही फौजें विजयी हुई. इस युद्ध में सौ से ज्यादा ब्रितानी सैनिक मारे गये और कमांडर लेफ्रिटनेंट रॉबर्टसन गंभीर रूप से घायल हुआ. [4]



हलांकि यह बात भी सही है कि इस लम्बी अवधि के दौरान कभी-कभार सन्यासियों व फकीरों के विभिन्न गुटों के बीच एकता की कमी भी परिलक्षित हुई थी, पर मजनू शाह ने हमेशा यह कोशिश जारी रखी थी कि अंग्रेजों के खिलाफ एक एकताबद्ध संघर्ष निर्मित किया जाए. उस दौरान जब भी कोई विद्रोही गुट पराजित होकर बिखर जाता, तभी वे पुनः उसे संगठित करने का प्रयास करते. अन्ततः 1786 में बेगुड़ा जिले के मूंगड़ा गांव में लेफ्रिटनेंट ब्रेनॉन की फौजों के साथ युद्ध में गंभीर रूप से घायल होकर इस विद्रोह के सबसे महत्वपूर्ण नायक मजनू शाह ने अपने प्राण त्यागे. [5] उनकी मृत्यु के बाद उनके भाई और शिष्य मूसा शाह ने विद्रोह के संचालन की जिम्मेदारी ली, पर विद्रोह का सामग्रिक प्रभाव काफी घट गया.

1787 में भवानी पाठक और देवी चौधरानी के नेतृत्व में चले बहादुराना संघर्षों में मजनू शाह के अन्य दो शिष्यों- फरागुल शाह और चिराग अली ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी. रमजानी शाह और जौहरी शाह के नेतृत्व में एक दूसरी फौजी टुकड़ी असम की ओर गयी थी और वहां अंग्रेजी फौजों के खिलाफ सशस्त्र युद्ध में उनकी हार हुई. विद्रोह के अंतिम काल (1793-1800) में सुभान अली और उनके सहयोद्धाओं ने उत्तर बंगाल में कई-कई बार विद्रोह की काशिशें कीं, पर ब्रितानी फौजों के निर्मम दमन-उत्पीड़न के समक्ष ये विद्रोह वैसी कोई सफलता हासिल नहीं कर सकी.




वारेन हेस्टिंग्स ने, जो 1773 से लेकर 1785 तक भारत के गवर्नर जेनेरल थे, इस विद्रोह को विशुद्ध रूप से ‘हिन्दुस्तानी खानाबदोशों’ की डकैतियों के रूप में पेश किया था. अपने आकाओं के रास्तों का अनुकरण करते हुए भारत के शासक वर्ग ने भी इस विद्रोह को किसानों के सशस्त्र विद्रोह के रूप में स्वीकृति नहीं दी है. नतीजतन इस तरह के सच्चे स्वाधीनता संघर्ष में मुसलमानों की महत्वपूर्ण भूमिका भी अस्वीकृत ही रह गयी है. इस विद्रोह की पृष्ठभूमि में रचित उपन्यासों ‘आनन्द मठ’ (1882) और देवी चौधरानी (1884) के रचयिता बंकिमचन्द्र ने इन उपन्यासों में इस विद्रोह के साथ हिन्दु धर्म की एवं राष्ट्रीयतावादी अनुभूतियों का काल्पनिक सम्मिश्रण किया था, ताकि इस सम्मिश्रण की आड़ में दो वर्गों के बीच के वर्ग-संघर्षों का इतिहास दब जाए.

आज 130 वर्षों बाद भी हम अपने इस इतिहास के पक्षपातपूर्ण प्रस्तुतिकरण की कीमत अदा कर रहे हैं. मेहनती वर्गों को धर्म के आधार पर विभाजित करने की मंशा से मौजूदा भाजपा शासित सरकार ने साम्प्रदायिक दृष्टिकोण से इतिहास की व्यख्या करने से लेकर ऐतिहासिक घटनाओं को पूरी तरह छद्म रूप देने तक के हर तरह के तौर-तरीके अपनाकर भारत के इतिहास को नये सिरे से लिखने का एक भारी-भरकम प्रोजेक्ट हाथ में लिया है. अतः हमारे राष्ट्रीय इतिहास के कम चर्चित विषयों को सामने लाने के जरिये इस तरह के किसी भी बुरे मंसूबों को चुनौती देने की सख्त जरूरत है.




सन्दर्भ –

[1] “Bharater Krishak‐Bidroha O Ganatantrik Sangram” by Suprakash Roy, 1966.
[2] “Freedom Movement and Indian Muslims” by Santimay Ray 1979.
3] Rennel’s Journal, February 1766; cited in [1, 2].
[4] Letter from Lt. Robertson to the collector of Bogra, 14th November 1776; cited in [1, 2].
[5] “Sanyasi & Fakir Raiders of Bengal” by Jamini Mohan Ghose; cited in [1, 2].




Read Also –

भारतीय कृषि का अर्द्ध सामन्तवाद से संबंध : एक अध्ययन
1857 के विद्रोह को प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम कहने का क्या अर्थ है ?
‘स्तन क्लॉथ’ : अमानवीय लज्जाजनक प्रथा के खिलाफ आंदोलन
इतिहास से नफरत और नफरत की राजनीति !




[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]



Previous Post

सॉफ्ट-फासिज्म या मोडरेट-फासिज्म

Next Post

पुलवामा : घात-प्रतिघात में जा रही इंसानी जानें

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

मोदी सरकार का योजना जनता की आंखों में धूल झोंकने वाली ‘आंकड़ों की बाजीगरी’ है !

by ROHIT SHARMA
June 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

सशस्त्र संघर्ष के समर्थन में गणपति का साक्षात्कार

by ROHIT SHARMA
June 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

by ROHIT SHARMA
June 10, 2026
गेस्ट ब्लॉग

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

by ROHIT SHARMA
June 10, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

by ROHIT SHARMA
June 4, 2026
Next Post

पुलवामा : घात-प्रतिघात में जा रही इंसानी जानें

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

अतीत के नाम पर पीठ थपथपाना बंद करो

May 31, 2022

देश के सभी ‘अर्बन नक्सलों’ से एक ‘अर्बन नक्सल’ की कुछ बातें

July 8, 2021

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

मोदी सरकार का योजना जनता की आंखों में धूल झोंकने वाली ‘आंकड़ों की बाजीगरी’ है !

June 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

सशस्त्र संघर्ष के समर्थन में गणपति का साक्षात्कार

June 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 10, 2026
गेस्ट ब्लॉग

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 10, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

June 10, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

मोदी सरकार का योजना जनता की आंखों में धूल झोंकने वाली ‘आंकड़ों की बाजीगरी’ है !

June 12, 2026

सशस्त्र संघर्ष के समर्थन में गणपति का साक्षात्कार

June 12, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.