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अंतरिम संघीय बजट 2019 – एक सरसरी निगाह

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 21, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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गत 1 फरवरी, 2019 को कार्यकारी वित्त मंत्री पीयुष गोयल ने 2019-20 के लिए अंतरिम संघीय बजट पेश किया. आम तौर पर अंतरिम बजटों के जरिए सरकारें मतदाताओं को यह दिखाने की कोशिशें करती है कि यदि सत्तासीन पार्टी फिर एक बार निर्वाचित होकर सत्ता में आ जाए तो वह ठोस रूप से क्या-क्या करेगी. इस बार भी जैसी कि आशा थी, ऐसी सारी घोषणाएं विकास के नव उदारवादी मॉडल के साथ सामंजस्य बनाये रखते हुए ही की गयी है, जो कॉरपोरेट संस्थाओं के हितों की हिफाजत करेंगी और हाशिए पर पड़ी जनता को और भी किनारे धकेल देंगी.

अनैतिक होने पर भी मौजूदा जो संरचना है, उसमें इससे इतर कुछ नहीं हो सकता क्योंकि जब कॉरपोरेट संस्थाएं संससदीय पार्टियों के चुनावी प्रचार के खर्चे उठाएंगी तब वे तो इसकी गारंटी करके ही ऐसा करेंगी कि सरकार सत्ता में आने के बाद उनके लाभ को दिमाग में रखकर ही सारी व्यवस्थाएं करे और वैसी ही संरचनाएं निर्मित करें, भले ही वह सब हाशिए पर पड़ी जनता के अस्तित्व की कीमत पर ही क्यों न हो. इस बजट को अच्छी तरह समझने के लिए हम इस लेख में बजट में की गयी कुछ घोषणाओं पर ही चर्चा केन्द्रित करेंगे.




हमारे देश में स्वास्थ्य पर हमेशा से ही कम खर्च करने का एक लम्बा इतिहास है. इस बार भी इसका अपवाद नहीं हुआ है. फिलहाल स्वास्थ्य के क्षेत्र में जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का मात्र 0.31 % ही खर्च किया जाता है, जो एक दशक पहले 2009-10 के स्वास्थ्य खर्चे से भी कम है.[1] 2008 से 2015 के बीच स्वास्थ्य-क्षेत्र में कुल सरकारी खर्च (केन्द्रीय और राज्य सरकारों को मिलाकर) 1.3% पर ही अटका हुआ है[2] और 2016-17 में यह थोड़ा-सा बढ़कर मात्र 1.4% हुआ था.[3] तब भी यह दुनिया भर में स्वास्थ्य पर होने वाले औसत खर्च 6% से भी कम था.

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इतना ही नहीं यह तो कई सब सहारा अफ्रीकी देशों की तुलना में भी काफी कम था. राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में इसे 2025 तक बढ़ाकर जीडीपी का 2.5 प्रतिशत करने[4] का जो आश्वासन दिया गया है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि इस अंतरिम बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र में जो आवंटित खर्च है, वह इस देश की लाखों-लाख बीमार व पीडि़त जनता के मूंह पर एक कड़ा तमाचा है. मात्र इतने थोड़े से रूपयों में से ही फिर बीमा-आधारित आयुष्मान भारत योजना के लिए आवंटित पैसों में 167% की वृद्धि की गयी है, जो निःसंदेह काफी ज्यादा है. दूसरे और तीसरें दर्जे की स्वास्थ्य सेवाओं में जिनमें रोगी को अस्पतालों में दाखिल होना पड़ता है, यह योजना निजी पूंजी निवेश और भी ज्यादा प्रोत्साहित करती है. जबकि ढेर सारे शोधों के जरिए यह दिखलाया गया है कि भारत के मामले में कोई भी बीमा-आधारित मॉडल यथोचित नहीं है और इसका नतीजा यही होगा कि उल्टे जनता की जेब से होने वाला खर्च और भी भारी मात्र में बढ़ जाएगा[5] नतीजतन और भी ज्यादा परिवार गरीबी-रेखा के नीचे चले जाएंगे.




इन सारे कदमों के बजाए हमारे लिए जरूरी यह है कि सरकारी स्वास्थ्य-व्यवस्था को और भी बेहतर व उन्नत बनाया जाए. पर इस बजट में स्वास्थ्य-क्षेत्र में सरकार के मूल खर्चों को 2017-18 की तुलना में 43% कम कर दिया गया है. हाशिए पर पड़ी जनता के जीवन की कीमत पर सरकार जिस तरह स्वास्थ्य क्षेत्र के निजीकरण की कोशिशें कर रही है, वह आयुष्मान भारत योजना के प्रधाान डॉ. इन्दुभूषण के ट्वीट से साफ-साफ पकड़ में आ जा रही है. निजी अस्पतालों को संबोधित करते हुए उन्होंने लिखा है, ‘50 करोड़ लोगों से जुड़े इस व्यापार का प्रस्ताव हम तुन्हें दे रहे हैं.’ स्पष्ट है कि स्वास्थ्य क्षेत्र अब राज्य की जिम्मेदारी नहीं रह गयी है. यह सर्वाधिक गरीब जनता के जीवन की कीमत पर निजी संस्थाओं के एक व्यापार में परिणत हो गया है.

इस बजट में और एक योजना को लेकर खूब चिल्ल-पों मचायी जा रही है- वह है प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना. इस योजना के तहत सभी उन किसान परिवारों को जिनके पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है, साल में 6000 रूपये दिये जायेंगे. यदि परिवार में पांच सदस्य हों तो प्रत्येक को प्रतिदिन 3.29 रूपये मिलेंगे. आज किसान समाज जिन दुर्दिनों के दौर से गुजर रहा है, उसे देखते हुए यह रकम काफी कम है. इसके अलावा देश में तकरीबन 10 करोड़ भूमिहीन किसान हैं. उनके बारे में कोई घोषणा की ही नहीं गयी है.




इधर हाल के वर्षों में संसदीय राजनीतिक पार्टियों में कृषि-कार्यों के लिए उपयुक्त संरचना का निर्माण करने और नव-उदारवादी हमलों से कृषि-क्षेत्र की रक्षा करने के बदले किसानों के लिए एक न्यूनतम आय को निर्धारित व सुनिश्चित करने के विचार क्रमशः घनीभूत हो रहे हैं. इसे रोजगार के अवसरों का निर्माण करने और सभी लोगों के लिए पर्याप्त आमदनी की व्यवस्था करने में अर्थव्यवस्था की संरचनागत विफलता के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए.

नेशनल सैम्पल सर्वे ऑफिस द्वारा जारी पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे की रिपोर्ट से उद्घाटित हुए तथ्य ही बता रहे हैं कि पिछले 45 वर्षों में बेरोजगारी की दर फिलहाल सबसे अधिक है.[6] संसदीय पाटियां यह समझ गयी है कि इस समूची व्यवस्था को गतिशील बनाये रखने और गरीब जनता के बीच पूंजीभूत क्रोध के विस्फोट को रोकने के लिए उन्हें कुछ मदद देते रहना जरूरी है. अतः आमदनी की एक न्यूनतम मात्र को सुनिश्चित करने के जरिए इस परिस्थिति को एक सेफ्रटी वाल्व की सुरक्षा प्रदान की जा सके, इसी के लिए ये सारे लोग मिलकर ये सारा ताम-झाम कर रहे हैं.

अंतरिम बजट की एक दूसरी बड़ी घोषणा है – प्रधानमंत्री श्रमयोगी मानधन योजना, जो असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए एक स्वैच्छिक पेंशन योजना है- इस योजना के तहत श्रमिकों के लिए उनकी उम्र 60 वर्ष से अधिक हो जाने के बाद 3000 रू. प्रति माह पेंशन देने की व्यवस्था की गयी है. जो लोग 29 वर्ष की उम्र में इस योजना में शामिल होंगे, उनके लिए 100 रू. प्रति माह और जो 19 साल की उम्र में शामिल होंगे, उनके लिए प्रतिमाह 55 रू. सरकार की ओर से भी दिये जाएंगे, ये लोग तो इतना हर माह देंगे ही. ये कुल रूपये इनके पेंशन खाते में जमा होंगे.




इसके पहले राजग सरकार ने 2015 में जो अटल पेंशन योजना शुरू की थी, वह आज के तारीख में विफल हो गयी है.[7] फिर अब यह पेंशन योजना, जो वस्तुतः उसी में थोड़ा हेर-फेर करके सामने आयी गयी है. यह पेंशन पाने के लिए कम-से-कम कितने वर्षों तक कार्यरत रहना होगा, इस मामले में साफ-साफ कुछ बताया नहीं गया है. इसके अलावा नियमित नौकरी के अभाव में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों का कार्यकाल अधिकांश क्षेत्रों में ही लगातार चलता नहीं रहता यदि कार्यकाल की निरंतरता नहीं रहे, तो फिर ऐसे मामलों में उनके पेंशन फंड का क्या होगा, इस मामले में भी साफ-साफ कुछ कहा नहीं गया है.

मध्यम वर्ग की जनता के लिए पेंशन की शुरूआत 60 वर्ष की उम्र से होती है. पर इसीलिए असंगठित क्षेत्र के गरीब श्रमिकों के लिए, जिनमें से अधिकांश ही अत्यन्त खतरनाक परिवेश में काम करते हैं, उम्र की सीमा उतनी ही रखना बिल्कुल बेमतलब की बात है, इसे भी ध्यान रखा जाना चाहिए. एक शोध में पाया गया है कि ता-उम्र निर्माण व खदान क्षेत्रें और कारखानों आदि में कठोर मेहनतवाले कार्यों में लगे रहने के चलते उनकी उम्र की औसत अवधि 68.8 वर्षों से भी कम की है.[8] इस योजना के तहत् बने पेंशन फंडों में भारी-भरकम राशि जमा होती है.

ठीक इसी प्रकार एम्प्लाइज प्रोविडेंट फंड ऑर्गेनाईजेशन[9] के तहत भी भारी राशि जमा होती है, जिसका इस्तेमाल इक्विटी मार्केट में कॉरपोरेट घरानों को आसानी से मूलधन उपलब्ध कराने के लिए किया जाता है. श्रमिकों द्वारा कष्ट उठाकर जमा किये गये इन रूपयों का अधिकांश मामलों में ही अंत-अंत तक कोई भी दावेदार नहीं रह जाता और इस तरह ये कॉरपोरेशन बिना किसी खर्चे के भारी लाभ हासिल कर लेते हैं.




इस बजट में और एक मामले का जिक्र जरूरी है – वह है प्रतिरक्षा के क्षेत्र में आबंटित रकम. यह पूरी रकम है 2,82,733 करोड़ रूपये की. यह स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए आबंटित राशि से 4.8 गुनी है. हमारे देश में एक-के-बाद-एक आई सरकारें जनता के एक भारी हिस्से को यह समझाने में सफल रही है कि इस देश के अन्दरूनी और बाहरी दोनों क्षेत्रें में, सैन्य सुरक्षा की भारी जरूरत है. इसीलिए प्रतिरक्षा मद में भारी-भरकम राशि आबंटित करने जैसे अन्यायमूलक चीज वर्ष-दर-वर्ष जारी रहती है और किसी को भी इस सवाल पर कभी कठोर निन्दा करते नहीं देखा जाता. मौजूदा सरकार में यह सुरक्षा बजट आसमान छू रहा है और हाल के घटनाक्रमों के परिप्रेक्ष्य में आम जनसमुदाय में से ढेर सारे लोग पाकिस्तान से एक पूरे आकार का युद्ध चाह रहे हैं.

तकरीबन सभी देशों में हथियार के कारोबारियों का सारा कारोबार देश के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के प्रश्रय के सहारे चलता है. वर्तमान भारत सरकार द्वारा प्रतिरक्षा के मद में भारी राशि आवंटित करने और देश में भी अस्त्र-शस्त्र खरीदने के लिए एक अनुकूल माहौल बना देने के चलते इन कारोबारियों को भारी लाभ हासिल होने की संभावना है इसीलिए तो उनके चेहरे खुशी से दमक रहे हैं.

इसी तरह से संघीय बजट गरीबों को लूट-लूटकर अमीरों को और भी अमीर बनाने वाली इस व्यवस्था को सांस्थानिक रूप देते हैं. खर्च-आमदनी-खर्च का पहिया यदि चलता नहीं रहे तो अमीर और भी अमीर कैसे बनेंगे ? इसीलिए इसे सुनिश्चित करने के इंतजामात किये जाते हैं. इस साल भी सामग्रिक रूप से यही समझ में आ रहा है. वस्तुतः मध्यम वर्ग के मतदाताओं के कुछ सुख-सुविधाओं का चारा देने के साथ-ही-साथ देश की अधिकांश आबादी को ही हाशिए पर धकेल दिया जा रहा है.




सन्दर्भ :

[1]https://www.epw.in/journal/2019/6/letters/health‐interimbudget.
html
[2]https://www indiabudget gov in/budget2016 2017/es2014-15/echapter‐vol1.pdf
[3]https://www.indiabudget.gov.in/es2016‐17/echapter.pdf
[4] http://cdsco.nic.in/writereaddata/national‐health‐policy.pdf
[5] https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC5408909/
[6]https://www.business‐standard.com/article/economypolicy/
unemployment‐rate‐at‐five‐decade‐high‐of‐6‐1‐in‐2017‐18‐nssosurvey‐119013100053_1.html
[7]https://indianexpress com/article/business/business others/atalatalpension‐
yojana‐guaranteed‐monthly‐pension‐scheme‐fails‐to‐meettarget‐2950487/
[8] http://iipsindia.org/pdf/RB‐13%20file%20for%20uploading.pdf
[9]https://thewire.in/labour/budget‐2019‐pension‐schemeunorganised‐workers‐mirage

(अंग्रेजी की पत्रिका स्पार्का से अनुदित)




Read Aslo –

सरकार की जनविरोधी नीतियों से मालामाल होता औद्योगिक घराना
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