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अराजकतावाद पर भगत सिंह का दृष्टिकोण – 1

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 9, 2018
in गेस्ट ब्लॉग
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[19वीं सदी में जन्म लिये अराजकतावादी विचारधारा को 21वीं सदी में लाने का श्रेय 2014 में सत्तारूढ़ भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री बने नरेन्द्र मोदी को जाता है, जब वह आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को अराजकतावादी घोषित करते हुए उन्हें बदनाम करने की कोशिश करते हैं.

ऐसे समय में अराजकतावाद पर भगत सिंह का स्पष्ट दृष्टिकोण सामने आता है जब वे अराजकता के विचारधारा का बेहद बारीकी से अध्ययन करते हैं और साफ तौर पर कहते हैं कि ‘जब कोई व्यक्ति अपनी स्वतन्त्रता के लिए कहीं से पिस्तौल या बम लेकर निकलता है तो सभी नौकरशाह और उनके पिट्ठू ‘अनार्किस्ट-अनार्किस्ट’ कहकर दुनिया को डराते हैं. अनार्किस्ट एक बड़ा ख़ूंख़ार व्यक्ति समझा जाता है, जिसके दिल में कि ज़रा भी दया न हो, जो रक्तपिपासु हो, नाश-महानाश देखकर जो झूम उठता हो. अनार्किस्ट शब्द इतना बदनाम किया जा चुका है कि भारत में राज-परिवर्तनकारियों को भी – जनता में घृणा पैदा करने के लिए – अनार्किस्ट कहा जाता है.

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‘हालांकि अराजकतावादी सर्वाधिक संवेदनशील मनवाले, सारी दुनिया का भला चाहने वाले होते हैं. उनके विचारों के साथ भिन्नता रखते हुए भी उनकी गम्भीरता, जनता से स्नेह, त्याग और उनकी सच्चाई आदि पर किसी प्रकार की शंका नहीं हो सकती.’

भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन के अध्ययन के साथ-साथ भगतसिंह ने अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का भी पर्याप्त अध्ययन किया व उस पर मनन किया. इसी सिलसिले में ‘किरती’ में ‘अराजकतावाद क्या है’ आदि लेख व कुछ अनुवाद छपे थे. मई 1928 से ‘किरती’ में भगतसिंह ने अराजकतावाद पर यह लेखमाला शुरू की, जो अगस्त तक चलती रही.]

संसार में आज बहुत हलचल मची है. जाने-माने विद्वान दुनिया में शान्ति-स्थापना के कार्य में उलझे हैं लेकिन जिस शान्ति-स्थापना के प्रयास किये जा रहे हैं, वह अस्थायी नहीं वरन स्थिर, हमेशा स्थापित रहने वाली शान्ति है. उस तक पहुंचने के लिए बड़े-बड़े महापुरुष अपना जीवन अर्पित कर गये और कर रहे हैं लेकिन आज हम ग़ुलाम हैं. हमारी निगाहें कमज़ोर हैं, हमारे दिमाग़ कुन्द हैं. हमारा मन कमज़ोर होकर रो रहा है. हम दुनिया की शान्ति के लिए क्या चिन्ता करें, अपने देश के लिए ही कुछ नहीं कर पा रहे हैं. इसे अपनी बदक़िस्मती ही कहें. हमें तो अपने दकियानूसी विचार ही तबाह कर रहे हैं. हम भगवान और स्वर्ग पाने के लिए आत्मा-परमात्मा के विलाप में फंसे हैं. यूरोप को हम तुरन्त ही भौतिकवादी कह देते हैं. उनके जो विचार हैं, उनकी ओर ध्यान ही नहीं देते. हम आध्यात्मिक रुझान वाले जो हैं ! हम बड़े त्यागी जो हैं ! हमें इस संसार की बातें ही नहीं करनी चाहिए ! हमारी ऐसी दुरावस्था हो गयी है कि रोने को मन करता है. बीसवीं सदी में हालात सुधर रहे हैं. नौजवानों के सोच-विचार पर यूरोप के विचारों का कुछ-कुछ असर पड़ रहा है. और जो नौजवान दुनिया में कुछ तरक्की करना चाहते हैं, उन्हें वर्तमान युग के महान तथा उच्च विचारों का अध्ययन करना चाहिए.

आज समाज में होने वाले दमन के विरुद्ध कौन-सी आवाज़ उठ रही है और स्थायी शान्ति-स्थापना के लिए कैसे विचार उठ रहे हैं, उन्हें ठीक से समझे बिना इन्सान का ज्ञान अधूरा रह जाता है. आज हम संक्षेप में साम्यवाद और समाजवाद आदि अनेक है.

जनता ‘अराजकता’ शब्द से बहुत डरती है. जब कोई व्यक्ति अपनी स्वतन्त्रता के लिए कहीं से पिस्तौल या बम लेकर निकलता है तो सभी नौकरशाह और उनके पिट्ठू ‘अनार्किस्ट-अनार्किस्ट’ कहकर दुनिया को डराते हैं. अनार्किस्ट एक बड़ा ख़ूंख़ार व्यक्ति समझा जाता है, जिसके दिल में कि ज़रा भी दया न हो, जो रक्तपिपासु हो, नाश-महानाश देखकर जो झूम उठता हो. अनार्किस्ट शब्द इतना बदनाम किया जा चुका है कि भारत में राज-परिवर्तनकारियों को भी – जनता में घृणा पैदा करने के लिए – अनार्किस्ट कहा जाता है. डॉक्टर भूपेन्द्रनाथ दत्त ने बंगला में लिखी पुस्तक ‘अप्रकाशित राजनीतिक इतिहास’ के प्रथम भाग में इसका ज़िक्र किया है कि हमें बदनाम करने के लिए सरकार भले ही अनार्किस्ट-अनार्किस्ट कहती रहे, वास्तव में वह राज-परिवर्तनकारियों की टोली थी और अराजकतावाद तो एक बहुत ऊंचा आदर्श है. उस ऊंचे आदर्श तक तो हमारी साधारण जनता क्या सोचती, क्योंकि वह तो राज-परिवर्तनकारियों से आगे युगान्तकारी भी नहीं थे. वे लोग मात्र राज-परिवर्तनकारी ही थे. ख़ैर.

हम चर्चा कर रहे थे कि अराजकतावादी शब्द बहुत बदनाम किया गया है और स्वार्थी पूंजीपतियों ने जिस तरह ‘बोल्शेविक’, ‘कम्युनिस्ट’, ‘सोशलिस्ट’ आदि शब्द बदनाम किये हैं, उसी प्रकार इस शब्द को भी बदनाम किया हालांकि अराजकतावादी सर्वाधिक संवेदनशील मनवाले, सारी दुनिया का भला चाहने वाले होते हैं. उनके विचारों के साथ भिन्नता रखते हुए भी उनकी गम्भीरता, जनता से स्नेह, त्याग और उनकी सच्चाई आदि पर किसी प्रकार की शंका नहीं हो सकती.

‘अनार्किस्ट’, जिसके लिए हिन्दी में ‘अराजकतावादी’ शब्द ही प्रयोग में लाया जाता है, यूनानी भाषा का शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है – एन = नॉट, आर्की = रूल, अर्थात शासनविहीन – किसी भी प्रकार से शासित न होना. इन्सान में पहले से ही अधिक से अधिक स्वाधीनता पाने की चाह रही है और बीच-बीच में पूर्ण स्वतन्त्रता, जोकि अराजकतावादी आदर्श है, से मिलता-जुलता विचार प्रकट हुआ. उदाहरणस्वरूप काफ़ी पहले एक यूनानी दार्शनिक ने कहा था –

We wish neither to belong to the governing class nor to the governed. अर्थात, हम न शासक बनना चाहते हैं और न ही प्रजा.

मैं समझता हूँ कि हिन्दुस्तान में विश्व-भ्रातृत्व और संस्कृत के वाक्य ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ आदि में भी यही भाव है. अगर हम बहुत पुरानी मान्यताओं से किसी ख़ास नतीजे तक न भी पहुँच सकें तो भी यह तो स्वीकारना पड़ेगा कि यह विचार उन्नीसवीं अर्थात पिछली सदी के आरम्भ में एक फ्रांसीसी दार्शनिक प्रूद्धों ने स्पष्ट तौर पर जनता के समक्ष रखा और उसका खुलेआम प्रचार किया इसलिए उन्हें अराजकतावाद का जन्मदाता कहा जाता है. उन्होंने इसका प्रचार आरम्भ किया. बाद में एक रूसी बहादुर, बैकुनिन ने इसके प्रसार और सफलता के लिए काफ़ी काम किया. बाद में जॉन मास्टर प्रिन्स क्रोपोटकिन जैसे अनेक अराजकतावादियों ने जन्म लिया. आजकल अमेरिका में श्रीमती एमा गोल्डमैन और अलेक्ज़ेण्डर ब्रैकमैन आदि इसके प्रचारक हैं.

अराजकतावाद के सन्दर्भ में श्रीमती गोल्डमैन ने लिखा है –

Anarchism – The philosophy of a new social order based on liberty unrestricted by man-made law. The theory that all forms of Government rest on violence, and therefore wrong and harmful, as well as unnecessary. (अर्थात) अराजकतावाद एक नया दर्शन है जिसके अनुसार एक नया समाज बनेगा. जनता का रहन-सहन या भ्रातृत्व ऐसा होगा जिसमें कि मनुष्य के बनाये नियम कोई अवरोध न पैदा कर सकेंगे. उनके अनुसार किसी भी शासन की ज़रूरत नहीं महसूस होती, क्योंकि प्रत्येक सरकार दमन पर टिकी होती है इसलिए यह अनावश्यक है.

इससे पता चलता है कि अराजकतावादी किसी भी प्रकार की सरकार नहीं चाहते और यह बात सत्य है लेकिन यह सुनकर हम भयभीत होते हैं. हमारे मनों में कई प्रकार के हौवे पैदा किये जाते हैं. हम अंग्रेज़ी सरकार के बाद अपनी सरकार बनाकर भी भूत देख-देखकर डरें और हमेशा थर-थर कांपते रहें, यही हमारे शासकों की नीयत होती है. ऐसी हालत में हम कैसे एक मिनट के लिए भी सोच सकते हैं कि ऐसा भी कोई समय आयेगा कि जब सरकार के बिना भी हम सुखी और स्वतन्त्र रह सकेंगे लेकिन इसमें हमारी स्वयं की दुर्बलताएं हैं. आदर्श या भावना का कोई क़सूर नहीं है.

अराजकतावाद के अनुसार जिस आदर्श स्वतन्त्रता की कल्पना की जाती है वह पूर्ण स्वतन्त्रता है, जिसके अनुसार न तो मन पर भगवान या धर्म का भूत सवार हो, न माया या सम्पत्ति के लालच का जनून समाया हुआ हो और न ही शरीर पर किसी प्रकार की या सरकारी ज़ंजीरें कसी हुई हों. इसका अर्थ यह है कि वह (निम्नोक्त) तीनों मोटी-मोटी बातों को दुनिया से पूरी तरह ख़त्म कर देना चाहते हैं: 1. चर्च, भगवान और धर्म, 2. स्टेट (सरकार), 3. प्राइवेट प्रापर्टी (निजी सम्पत्ति).

यों तो यह विषय बहुत रोचक और विस्तृत है जिसके लिए काफ़ी कुछ लिखा जा सकता है लेकिन अब यह लेख हम बहुत अधिक बढ़ा नहीं सकते, क्योंकि स्थानाभाव है इसलिए हम मोटी-मोटी बातों का ही उल्लेख करेंगे.

1. भगवान और धर्मः सबसे पहले हम भगवान और धर्म को लेते हैं. हिन्दुस्तान में भी अब इन दोनों भूतों के विरुद्ध आवाज़ उठ रही है, लेकिन यूरोप में तो पिछली सदी से ही इसके विरुद्ध विद्रोह उठ खड़ा हुआ था. वह तो आरम्भ ही उस युग से करते हैं जबकि जनता का ज्ञान बहुत ही कम था. उस समय वह प्रत्येक चीज़ से, विशेषकर दैवी शक्तियों से डरते थे. उनमें आत्मविश्वास क़तई न था. वे स्वयं को ‘ख़ाक का पुतला’ कहते थे. वे कहते हैं कि धर्म और दैवी शक्तियां ईश्वर और अज्ञानता का परिणाम हैं, इसलिए उनके अस्तित्व का भ्रम मिटा देना चाहिए. साथ ही यह भी कि हम छुटपन से बच्चों को यह बताना शुरू कर देते हैं कि सबकुछ भगवान है, मनुष्य तो कुछ भी नहीं अर्थात मिट्टी का पुतला है. इस तरह के विचार मन में आने से मनुष्य में आत्मविश्वास की भावना मर जाती है. उसे मालूम होने लगता है कि वह बहुत निर्बल है. इस तरह वह भयभीत रहता है. जितने समय यह भय मौजूद रहेगा उतनी देर पूर्ण सुख और शान्ति नहीं हो सकती.

हिन्दुतान में महात्मा बुद्ध ने पहले भगवान के अस्तित्व से इन्कार किया था. उनकी ईश्वर में आस्था नहीं थी. अब भी कुछ साधु ऐसे हैं जो भगवान के अस्तित्व को नहीं मानते. बंगाल के सोहमा स्वामी भी उनमें हैं. आजकल निरालम्ब स्वामी सोहमा स्वामी की एक पुस्तक ‘कामन सेंस’ अंग्रेज़ी में प्रकाशित हुई है. उन्होंने भगवान के अस्तित्व के विरुद्ध बहुत जमकर लिखते हुए यह सिद्ध करने का प्रयास किया है, लेकिन वे अराजकतावादी नहीं हो गये. ‘त्याग’ एवं ‘योग’ के बहाने वे अब यों ही नहीं भटकते. इस प्रकार वैज्ञानिक युग में ईश्वर के अस्तित्व को समाप्त किया जा रहा है जिससे धर्म का भी नामोनिशान मिट जायेगा. वास्तव में अराजकतावादियों के सिरमौर बैकुनिन ने अपनी किताब ‘गॉड एण्ड स्टेट’ (ईश्वर और राज्य) में ईश्वर को अच्छा लताड़ा है. उन्होंने एंजील की कहानी सामने रखी और कहा कि ईश्वर ने दुनिया बनायी और मनुष्य को अपने जैसा बनाया. बहुत मेहरबानी की. लेकिन साथ ही यह भी कह दिया कि देखो, बुद्धि के पेड़ का फल मत खाना. असल में ईश्वर ने अपने मन-बहलाव के लिए मनुष्य और वायु को बना तो दिया मगर वह चाहता था कि वे सदा उसके ग़ुलाम बने रहें और उसके विरुद्ध सर ऊंचा न कर सकें इसलिए उन्हें विश्व के समस्त फल तो दिये लेकिन अक्ल नहीं दी. यह स्थिति देखकर शैतान आगे बढ़ा. But here steps in Satan, the eternal rebel, the first free thinker and the emancipator of the world. यानी, दुनिया के चिर विद्रोही, प्रथम स्वतन्त्रचेता और दुनिया को स्वतन्त्र करने वाले शैतान – आदि आगे बढ़े, आदमी को बग़ावत सिखायी और बुद्धि का फल खिला दिया. बस, फिर सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञाता परमात्मा किसी निम्न दर्ज़े की कमीनी मानसिकता की भांति क्रोध में आ गया और स्वनिर्मित दुनिया को स्वयं ही बद्दुआएं देने लग पड़ा. ख़ूब !

प्रश्न उठता है कि ईश्वर ने यह दुखभरी दुनिया क्यों बनायी ? क्या तमाशा देखने के लिए ? तब तो वह रोम के क्रूर शहंशाह नीरो से भी अधिक ज़ालिम हुआ. क्या यह उसका चमत्कार है ? इस चमत्कारी ईश्वर की क्या आवश्यकता है ? बहस लम्बी हो रही है इसलिए इसे यहीं समाप्त करते हुए इतना ही कहेंगे कि हमेशा से स्वार्थियों ने, पूंजीपतियों ने धर्म को अपनी-अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए इस्तेमाल किया है. इतिहास इसका साक्षी है. ‘धैर्य धारण करो! अपने कर्मों को देखो!’ ऐसे दर्शन ने जो यातनाएं दी हैं, वे सबको मालूम ही हैं.

लोग कहते हैं कि ईश्वर के अस्तित्व को अगर नकारा जाये तो क्या होगा ? दुनिया में पाप बढ़ जायेगा. अन्धेरगर्दी मच जायेगी. लेकिन अराजकतावादी कहते हैं कि उस समय मनुष्य इतना अधिक ऊंचा हो जायेगा कि स्वर्ग का लालच और नरक का भय बताये बिना ही वह बुरे कार्यों से दूर हो जायेगा और नेक काम करने लगेगा. वास्तव में बात यह है कि हिन्दुस्तान में श्रीकृष्ण निष्काम कर्म करने का बहुत उपदेश दे गये हैं. गीता दुनिया की एक प्रमुख पुस्तक मानी जाती है, लेकिन श्रीकृष्ण निष्काम भाव के साथ कर्म की प्रेरणा देते हुए भी अर्जुन को मृत्योपरान्त स्वर्ग और विजय प्राप्त कर राजभोग का लालच देने से पीछे न रहे. लेकिन आज हम अराजकतावादियों के बलिदान देखते हैं तो मन में आता है कि उनके पैर चूम लें. साको और वेंजरी की कहानियां हमारे पाठक पढ़ ही चुके हैं. न ईश्वर को प्रसन्न करने का कोई लालच है और न स्वर्ग में जाकर मौज़ मारने का लोभ, न पुनर्जन्म में ही सुख मिलने की आशा लेकिन फिर भी हंसते-हंसते लोगों के लिए, सत्य के लिए जीवन न्योछावर कर देना क्या कोई मामूली बात है ! अराजकतावादी तो कहते हैं कि एक बार मनुष्य स्वतन्त्र हुआ तो उसका जीवन बहुत ऊंचा हो जायेगा. ख़ैर, एक-एक प्रश्न पर लम्बी बहसें हो सकती हैं, लेकिन यहां स्थानाभाव है.

May, 1928

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