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अराजकतावाद पर भगत सिंह का दृष्टिकोण – 2

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 9, 2018
in गेस्ट ब्लॉग
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स्टेट या सरकार

इससे आगे की बात जो वे सामने नहीं लाना चाहते, वह है राजसत्ता। अगर हम राजसत्ता का मूल खोजें तो दो परिणामों पर पहुँचते हैं. कुछ लोगों की धारणा है कि जंगली मनुष्य की अक्ल विकसित होती रही, और लोगों ने मिल-जुलकर रहना आरम्भ कर दिया. इस तरह राजसत्ता का जन्म हुआ. इसे उद्भव कहते हैं. दूसरे यह कि लोगों को जंगली जानवरों से मुक़ाबले के लिए तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मिलना और एकजुट होना पड़ा. फिर गुटों में लड़ाइयाँ हुईं और प्रत्येक को ताक़तवर शत्रु का भय सताने लगा। इस प्रकार मिल-जुलकर राज क़ायम किये गये. उसके पश्चात आवश्यकता या यूटीलिटेरियन थ्योरी यही है. हम चाहे दोनों को ही लें. उद्भव वालों से पूछा जा सकता है कि अब ही क्यों उद्भव रुक गया ? पंचायती राज के बाद अराजकतावाद ही आता है और अन्यों को यह उत्तर है कि अब शासन की कोई ज़रूरत ही नहीं. यह बहस तो पहले हो चुकी है. अगर इन या अन्य ऐसी बातों की ओर अधिक ध्यान न भी दें तो भी यह स्वीकारना होगा कि लोगों ने वास्तव में सौदा किया था, जिसे फ्रांस के प्रसिद्ध युगान्तकारी रूसो ने सामाजिक सौदा कहा है. सौदा यह कि मनुष्य अपनी स्वतन्त्रता का एक विशेष भाग अर्थात अपनी आय का एक हिस्सा, बलिदान करेगा जिसके एवज में उसे सुरक्षा और शान्ति उपलब्ध करायेंगे. इस सबके पश्चात विचारणीय है कि क्या वह सौदा पूरी तरह ठीक रहा ? शासन क़ायम हो जाने के पश्चात राजसत्ता और ईश्वर ने साज़िश रच ली. लोगों से कहा कि हम ईश्वर की ओर से भेजे गये हैं. लोग ईश्वर से भयभीत रहे और राजा मनमाने ज़ुल्म करते रहे। ज़ार (रूस) और लुई (फ्रांस) के उदाहरण बहुत अच्छे ढंग से सब ढोल की पोल खोल देते हैं क्योंकि वह साज़िश बहुत समय तक चल नहीं सकी, पोप गेगोरी और किग हैनरी में फूट पड़ गयी। पोप ने लोगों को हैनरी शासन के विरुद्ध भड़काया. इसी तरह हैनरी ने ईश्वर का हौवा दूर करते हुए लोगों को पोप के विरुद्ध भड़काया. कहने का आशय यह है कि स्वार्थी लोग लड़े और वे आडम्बर टूटे. ख़ैर, पुनः लोग उठे और ज़ुल्मी लुई को मार डाला. दुनिया में भगदड़ मच गयी. पंचायती राज स्थापित हुए, लेकिन पूर्ण स्वतन्त्रता तब भी न मिली. उधर जिस वक़्त आस्ट्रिया का मन्त्री मैटरनिक एकतन्त्र शासन की तरफ़ से दमन कर लोगों को उसका विरोधी बना रहा था, उधर अमेरिका के पंचायती राज में बेचारे ग़ुलामों की बुरी स्थिति हो गयी थी. तब फ्रांस के ग़रीब लोग भी अनेक बार कोशिशें करके उठ और गिर रहे थे. आज भी फ्रांस में पंचायती राज है, लेकिन लोग पूरी तरह स्वतन्त्र नहीं हैं. इसलिए अराजकतावादी कहते हैं कि कोई भी राज नहीं चाहिए. बाक़ी सब बातों में वे साम्यवादियों के समान हैं लेकिन इन दोनों बातों का अन्तर है. प्रख्यात साम्यवादी कार्ल मार्क्स के प्रख्यात साथी फ़्रेडरिक एंगेल्स ने भी अपने और मार्क्स के साम्यवाद के सम्बन्ध में लिखा है कि हमारा भी यही आदर्श है: Communism also looks forward to a period in the evolution of society when the State will become superfluous and having no longer any function to perform, will die away. अर्थात वह भी समझते हैं कि अन्त में राजसत्ता की कोई ज़रूरत नहीं रहेगी.

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ख़ैर, तात्पर्य तो यह है कि वे चाहते हैं कि राजसत्ता न रहे और लोग भ्रातृत्व से रहें. मैकियावली इटली का राजनीतिज्ञ था. वह कहता था कि राज कोई न कोई ज़रूर होना चाहिए. चाहे वह पंचायती हो या एक राजा का. उसकी यह मान्यता थी कि राज हो और मज़बूत लोहे के हाथ-सा हो लेकिन अराजकतावादी कहते हैं कि नरम और गरम क्या ? हमें न पंचायती राज चाहिए और न कोई अन्य. वे कहते हैं: “Undermine the whole conception of a State and then and then and then only we have Liberty worth having.” अर्थात राजसत्ता का विचार भी दुनिया में ख़त्म किया जाये, तभी कोई स्वतन्त्रता प्राप्त हो सकेगी.

लोग कहेंगे कि भला यह कोई बात हुई, राजसत्ता न होगी, क़ानून न होगा, क़ानून मनवाने वाली पुलिस न होगी तो अन्धेरगर्दी मच जायेगी. राजनीति के प्रख्यात दार्शनिक डेविड थोरियन ने कहा है कि “Law never made man a whit more just, and by means of their respect for it even the well disposed are daily made gents of injustice.”

इसमें तो कोई असत्यता नज़र नहीं आती. हमें नज़र आता है कि ज्यों-ज्यों क़ानून सख़्त होते हैं त्यों-त्यों भ्रष्टाचार भी बढ़ता है. यह तो आम शिकायत है कि पहले किसी प्रकार की लिखा-पढ़ी के बिना हज़ारों रुपयों का लेन-देन होता था और कोई बेईमानी नहीं करता था. अब हस्ताक्षर, अँगूठे, साक्ष्य और रजिस्ट्रियाँ होती हैं लेकिन बेईमानी बढ़ रही है. फिर वे तो इसका निदान यही सुझाते हैं कि प्रत्येक मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहे, सभी कार्य उसकी इच्छानुसार होते रहें, तब कोई पाप या जुर्म न होगा.

“Crime is naught but misdirected energy. So long as every institution of today, economic, political, social and moral conspires to misdirect human energy into wrong channelsw, so long as most people are out of place doing the things they want to do, living a life they want to live, crime will be inevitable and all the laws on the statues can only increase but never do away with crime.”

अर्थात मनुष्य को अगर पूर्ण स्वतन्त्रता हो तो वह अपनी इच्छानुसार काम-काज कर सके, अन्याय न हों. अगर इस तरह पूँजीपतियों द्वारा शोषण जारी रहेगा तो बड़े-बड़े क़ानून भी कुछ नहीं कर सकते. लोग कहते हैं कि मनुष्य का स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि बिना शासन के रह ही नहीं सकता. बेलगाम होगा तो बहुत नुक़सान पहुँचायेगा. इस मानव-स्वभाव के सम्बन्ध में लॉर्ड ने अपनी किताब ‘प्रिसिपल्स ऑफ़ पोलिटिक्स’ में लिखा है कि चींटियाँ एकजुट रह सकती हैं, जानवर एकजुट रह सकते हैं, लेकिन मनुष्य नहीं रह सकते. मनुष्य ईश्वर की ओर से ही लालची, अमानवीय और सुस्त बना है. ऐसी बातें सुनकर एमा गोल्डमैन ग़ुस्से में आ गयीं और उन्होंने ‘अनार्किज़्म एण्ड अदर एसेज़’ किताब में लिखा है: “Every fool from king to policeman, from the flat headed person to the visionless dausier in science presumes to speak authoritavely of human nature.”

यानी जो भी गधा उठता है वही बढ़कर मानव स्वभाव पर अधिक ज़ोरदार राय देता है. वह कहती हैं कि जो जितना बड़ा मूर्ख हो उतना ही वह इस सम्बन्ध में अपनी राय को बहुमूल्य समझता है. आज तक किसी मनुष्य को पूर्ण स्वतन्त्रता देकर भी देखी है जो हमेशा उसकी बुराइयों का रोना रोया जाता है. वे कहती हैं कि छोटी पंचायतें बनें और स्वतन्त्रता से काम हो.

निजी सम्पत्ति

तीसरी सबसे आवश्यक और महत्त्वपूर्ण बात है निजी सम्पत्ति. वास्तव में दुनिया को पेट का सवाल ही चला रहा है. इसके लिए ही धैर्य, सन्तोष आदि उपदेश गढ़े गये. सभी कुछ इसके लिए किया जाता रहा. अब अराजकतावादी, साम्यवादी, समाजवादी सभी सम्पत्ति के विरुद्ध हो गये हैं. वे कहते हैं: “Property is robbery.” (Proudhon) but without risk or danger to the robber. – Emma Goldman.

सम्पत्ति बनाने का विचार मनुष्यों को लालची बना देता है. वह फिर पत्थर-दिल होता चला जाता है. दयालुता और मानवता उसके मन से मिट जाती है. सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए राजसत्ता की आवश्यकता होती है. इससे फिर लालच बढ़ता है और अन्त में परिणाम – पहले साम्राज्यवाद, फिर युद्ध होता है. ख़ून-ख़राबा और अन्य बहुत नुक़सान होता है. अगर सबकुछ संयुक्त हो जाये तो कोई लालच न रहे. मिल-जुलकर सभी काम करने लगें. चोरी, डाके की कोई चिन्ता न रहे. पुलिस, जेल, कचहरी, फ़ौज की ज़रूरत न रहे. और मोटे पेटवाले, हराम की खाने वाले भी काम करें. थोड़ा समय काम करके पैदावार अधिक होने लगे. सभी लोग आराम से पढ़-लिख भी सकें. अपनेआप शान्ति भी रहे, ख़ुशहाली भी बढ़े अर्थात वह इस बात पर ज़ोर देते हैं कि संसार से अज्ञानता दूर करना बहुत आवश्यक है.

असल में सम्पत्ति सबसे बड़ा प्रश्न है, इसलिए इस पर विचार के लिए एक अन्य लेख आवश्यक है. इसी वास्तविक प्रश्न पर कार्ल मैनिग ने स्पष्ट रूप से घोषित कर दिया था – ‘Ask for work and if they don’t give you work ask for bread and if they do not give you work or bread, then take bread.’ अर्थात काम भी न मिले और रोटी भी प्राप्त न हो तो रोटी छीनकर खा लो क्योंकि किसी को क्या अधिकार है कि वह केक खाते हुए मौज़ उड़ाये जबकि दूसरे को रोटी के सूखे टुकड़े भी न जुटें. इसी मसले पर उन्होंने कहा कि विपन्न के घर जन्म लेने से कोई उम्रभर घिसटते गुज़ारे एवं सम्पन्न के घर जन्मने से ही किसी को हराम की खाने का अवसर क्यों प्राप्त हो ? ‘माया से माया मिले’ वाली बात भी रोकी जाये. इन्हीं कारणों से सभी के लिए समान अवसर वाले सिद्धान्त के समक्ष उन्होंने निजी सम्पत्ति की पवित्रता का भ्रम तोड़ा. वे कहते हैं कि सम्पत्ति भ्रष्टाचार से जुटती है और उसकी रक्षा के लिए क़ानून की आवश्यकता पड़ती है जिससे कि राजसत्ता की आवश्यकता होती है. दरअसल यही सारी गड़बड़ियों की जड़ है. इसे समाप्त करते ही सारी गड़बड़ियाँ दूर हो जायेंगी. आख़िर वे क्या चाहते हैं, काम कैसे चलेगा ? यही काफ़ी विस्तृत प्रश्न है.

लेख में ऊपर यह बताया गया है कि अराजकतावादी पहले तो ईश्वर और धर्म के विरुद्ध हैं, क्योंकि वह मानसिक ग़ुलामी के कारण हैं. दूसरे राजसत्ता के विरुद्ध हैं, क्योंकि यह शारीरिक ग़ुलामी है. वे कहते हैं कि मनुष्य को स्वर्ग का लालच, नरक का भय या क़ानून का डण्डा दिखाकर भले काम की प्रेरणा देना ग़लत है. वैसे भी मनुष्य जैसे उच्च जीव का अपमान है. स्वतन्त्रता से ज्ञान प्राप्त करके अपनी इच्छा अनुसार काम करें और प्रसन्नता से जीवन व्यतीत करें. लोग कहते हैं कि इसका अर्थ यह हुआ कि हम उसे पहले की जंगली स्थितियों में रखना चाहते हैं, जिस प्रकार हम आरम्भ में थे लेकिन यह ग़लत है. उस समय अज्ञानता थी. मनुष्य अधिक दूर तक नहीं जा सकता था लेकिन अब पूर्ण ज्ञान से दुनिया में सम्पर्क स्थापित करते हुए भी वह स्वतन्त्र रहे. धन का लोभ न हो. और धन का प्रश्न भी समाप्त कर दिया जाये.

अगले लेख में हम इस दर्शन के सम्बन्ध में कुछ अन्य बातें, अनेक प्रकार के विचार, इतिहास और इसके बदनाम होने के कारण और इसमें हिंसा भी शामिल होने के बारे में लिखेंगे।

June, 1928
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