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भोजन की बहुतायत के बावजूद विश्वव्यापी भुखमरी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 6, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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भोजन की बहुतायत के बावजूद विश्वव्यापी भुखमरी

भोजन की बहुतायत के बावजूद विश्वव्यापी भुखमरी है. इस वक़्त संसार के अनाज भंडार भरे पड़े हैं. हमारे पास इतना भोजन है जो मौजूदा आबादी से डेढ़ गुणा अधिक आबादी के लिए भी पर्याप्त है. फ़रवरी 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार संसार की आबादी 7 अरब 60 करोड़ बताई गई है. उस वक़्त संसार के अनाज भंडार 10 अरब लोगों की भोजन की ज़रूरतों को पूरा कर सकने में समर्थ थे. उस रिपोर्ट के लेखक जेरेमी एर्डमैन लिखते हैं कि भोजन की बहुतायत के बावजूद, दुनिया में 79 करोड़ 50 लाख लोग रोज़ाना भूखे सोते हैं और 2050 तक भूखे सोने वालों की संख्या में 2 अरब लोग और शामिल हो जाएँगे. समय-समय पर ऐसे अनुमान छपते रहते हैं. ‘द हंगर प्रोज़ेक्ट डॉट ऑर्ग’ की एक रिपोर्ट के अनुसार संसार की मौजूदा आबादी लगभग 7 अरब 70 करोड़ है, जिसमें 82 करोड़ 16 लाख लोगों को पर्याप्त भोजन नहीं मिलता. ये लोग ‘चिरकालिक भूख’ के शिकार हैं, जिसका अर्थ है कि लंबे वक़्त से भूख इनकी ज़िंदगी का हिस्सा है. कुपोषण का शिकार इन लोगों की 99 प्रतिशत आबादी विकासशील देशों में रहती है. चिरकालिक भूख की शिकार यह आबादी भोजन के अभाव से होने वाली बीमारियों तथा उम्र से पहले बूढ़े होकर मरने के लिए अभिशप्त है. औरतें और बच्चे कुपोषण के कारण मर रहे हैं.

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अतंरराष्ट्रीय संस्थाएंं भूख की समस्या संबंधी आंंकडे जारी करते वक़्त, दो प्रकार की भूख का उल्लेख करती हैं. एक चिरकालिक भूख जिसका ज़िक्र ऊपर किया गया है, इसे अंग्रेज़ी में ‘क्रोनिक हंगर’ कहते हैं. दूसरी है ‘संगीन भूख’, जो युद्धों, बीमारियों एवं प्राकृतिक आपदाओं के चलते अकाल जैसी परिस्थितियों में तेज़ी से मौतों का कारण बनती हैं. ‘संगीन भूख’ को अंग्रेज़ी में ‘एक्यूट हंगर’ कहते हैं.

भूख अकाल और शासक वर्ग

मानव इतिहास में भोजन के अभाव से उत्पन्न होने वाले अकालों का संबंध अधिकतर वर्षा ना होने के कारण, कई-कई साल फ़सलें ना होने के साथ जोड़ा जाता रहा है. ऋतु परिवर्तन के कारण अकाल की वज़ह से, युद्धों के दौरान लूट-मार से, अनाज तथा अन्य भोजन के स्रोतों के अधिग्रहण से पूर्व-पूंंजीवादी व्यवस्थाओं में ग़रीब आबादी को भुखमरी का सामना करना पड़ता था. आम तौर पर लोग समझते थे कि अकाल जैसी हालत, प्राकृतिक प्रकोप के कारण उत्पन्न होती है. लेकिन वास्तव में प्राकृतिक वातावरण में रहने वाले संसार के किसी भी जीव की भुखमरी के कारण मौत नहीं होती. यह मनुष्य तथा मनुष्यों पर निर्भर जीव-जंतु ही हैं, जिनमें भुखमरी की वज़ह से बीमारियांं या मौतें होती हैं. एक बात स्पष्ट है कि भुखमरी की समस्या प्राकृतिक परिघटना नहीं है. क्या सभी मनुष्य इसके लिए ज़िम्मेदार हैं ? नहीं, जब से वर्गीय समाज अस्तित्व में आया है तथा भोजन सहित मानव द्वारा पैदा किए गए सभी नियामतों पर मुट्ठी भर शासक वर्गों का क़ब्ज़ा हो गया है, तभी से संकटों के दौरान बहुसंख्यक मेहनतकश लोगों को अभावों का सामना करना पड़ता है. लेकिन सबसे भयानक त्रासदियों का युग पूंंजीवादी व्यवस्था के आगमन से शुरू होता है.

मुनाफ़े की बेलगाम हवस और सरेआम ख़ुदगर्ज़ एवं संवेदनहीन लालसा का युग शुरू होता है. पूंंजीवाद के इस चमकते महल की नींव में अफ़्रीका के दासों, अमरीका, लातिनी अमरीका, ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के साथ-साथ भारत और विशेषकर बंगाल के अकालों में भूख से मरे मेहनतकशों की हड्डियांं भी मौजूद हैं. संसार के प्रत्येक भूखंड का इतिहास, मानवता को शर्मसार करने वाली ऐसी कहानियों से सराबोर है. हम इस परिघटना को समझने के लिए बंगाल के अकालों की मिसाल दे रहे हैं.

1765 में इलाहाबाद समझौते के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के मुग़ल बादशाह शाह आलम द्वितीय के साथ समझौता किया. समझौते के अनुसार बादशाह को भेजे जाने वाले टेक्सों के लिए बंगाल तथा आस-पास के इलाक़ों से लगान वसूलने का अधिकार कंपनी को मिल गया. मौसम के उतार-चढ़ाव के कारण, फ़सलों की पैदावार में कमी के दौरान, पारंपरिक तौर पर ज़रूरी इस्तेमाल के लिए बचाए गए, मेहनतकश जनता के अनाज पर ईस्ट इंडिया कंपनी का डाका पड़ना शुरू हुआ. परिणामस्वरूप 1770 का अकाल तथा मौतों का भयानक मंज़र सामने आया. उस अकाल के कारण ही भारत के अन्य हिस्सों में ‘भूखे बंगाली’ शब्द प्रचलित हुआ था.

सामंतवादी दौर में भी लोगों की मांंग पर कई बार राजा लगान माफ़ कर देता था या कम कर देता था. परंतु पूंंजी की गति से चलने वाली व्यापारिक पूंंजी की वाहक कंपनियों के तौर-तरीक़ों में इस प्रकार की दया के लिए कोई जगह नहीं थी/नहीं है. हालत यह थी कि रियायतों की बजाए 1771 में कंपनी ने ज़मीनी लगान 60 प्रतिशत बढ़ा दिया. इस तरह कुछ जैसे-तैसे गुज़ारा करने वाले बंगाली किसानों का अनाज भी हड़प लिया गया.

पूंंजी की भूख बढ़ती गई

1770 के बड़े अकाल के बाद बंगाल को 1783, 1866, 1873, 1892 और 1897 में भी अकाल का सामना करना पड़ा. इसी दौरान उपनिवेशवादी पूंंजीवादी शासकों ने कंपनी की बजाए अपनी सीधी हुकूमत क़ायम करनी शुरू कर दी थी. 1857 के ग़दर के बाद भारत में प्रत्यक्ष ब्रिटिश राज के तहत हुकूमती ढांंचा चालू हो गया. विश्व पूंंजीवाद के इन बड़े केंद्रों का विकास, एशिया, अफ़्रीका और लातिनी अमरीका के देशों के कच्चे माल और सस्ते श्रम के दम पर हो रहा था. 19वीं सदी के आख़ि‍र में और 20वीं सदी की शुरुआत में विश्व पूंंजीवाद, साम्राज्यवाद के दौर में प्रवेश कर चुका था. पूंंजीवाद के परजीवी चरित्र और कभी ना ख़त्म होने वाली दरिंदगी भरी भूख में बेहिसाब वृद्धि का दौर शुरू हो जाता है. दुनिया को सभ्यता का सबक़ सिखाने का दावा करने वालों का वहशी और ख़ूनी चेहरा भी इतिहास ने देखा. ब्रिटिश उपनिवेशवादियों द्वारा पैदा किया गया बंगाल का अकाल इसकी एक मिसाल है.

भारत की सत्ता ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के हाथ आने के बाद पारंपरिक तौर पर चावल व सब्जि़यांं पैदा करने वाले बंगाली किसानों को अफ़ीम और नील जैसी व्यापारिक फ़सलें उगाने के लिए विवश किया गया. भारतीय मेहनतकशों और किसानों की बली दे दी गई, क्योंकि ब्रिटेन के पूंंजीवादी विकास के लिए इसकी ज़रूरत थी. आगे चलकर 1943-44 के अकाल के दौरान बंगाल में इंसानी लाशों के ढेर लग गए. उधर दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था. यूरोप में युद्ध के दौरान महानायक के रूप में प्रसिद्ध हो रहे, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चर्चिल का बंगाल के अकाल की त्रासदी को लेकर बयान देखिए, ‘मैं भारतीयों से घृणा करता हूंं, ये जंगली धर्म वाले जंगली लोग हैं. खरगोशों की तरह बच्चे पैदा किए जाते हैं. इसलिए अकाल के लिए ये स्वयं दोषी हैं.’

भारत में अकाल से राहत के नाम पर जो दवाइयांं और भोजन भेजा जा रहा था, चर्चिल के आदेश पर उसे रोक दिया गया और युद्ध के मोर्चे पर भेज दिया गया, जहांं पहले ही इसकी कोई कमी नहीं थी. बेहद भयानक हालतों के कारण उपनिवेशवादी ब्रिटेन का दिल्ली के प्रतिनिधियों ने जब भारत में अकाल से होने वाली मौतों की गंभीरता की ओर ध्यान दिलाया तो चर्चिल ने बड़ी बेरुख़ी से कहा कि, ‘यदि हालात इतने ही गंभीर हैं, तो अब तक गांंधी क्यों नहीं मरा.’

कोविड-19, लॉकडाउन तथा भुखमरी

विश्व पूंंजीवादी व्यवस्था पहले ही गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रही थी. ऊपर से कोविड-19 का बवाल मच गया. कोरोना वायरस और लॉकडाउन के बाद भूख का संकट बेहद तीखा हो गया है. रोज़ कमाकर पेट भरने वाली आबादी के लिए यह एक बड़ी आफ़त खड़ी हो गई. प्रवासी मज़दूरों की दर्दनाक कहानियों के कि़स्सों से सभी वाक़िफ़ हैं. ग़रीब मज़दूरों और मेहनतकश लोगों में भुखमरी की समस्या के सामने कोरोना का ख़तरा बेमानी हो गया. भले ही अन्य मध्यवर्गीय तबक़ों को भी काफ़ी समस्याओं का सामना करना पड़ा, लेकिन भूख की ओर से वे सुरक्षित रहे. ‘विश्व भूख सूचकांक’ के मामले में दुनिया के 117 देशों में भारत 102वें नंबर पर है. दुनिया के सामने संगीन भूख का ख़तरा बेहद बढ़ गया है. संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार कोविड-19 से पहले 13 करोड़ लोग संगीन भूख वाली असुरक्षा का सामना कर रहे थे, जो कि बढ़कर 30 करोड़ तक होने की आशंका है. बहुत बड़ी संख्या में लोगों के सीधे मौत के मुंंह में जाने का ख़तरा बढ़ गया है. साम्राज्यवादी साज़िशों, घेराबंदियों और युद्ध के हालातों के चलते, मध्यपूर्व के देशों, अफ़्रीकी देशों – सुडान, सोमालिया वग़ैरह और वेनेज़ुएला जैसे लातिनी देशों में हालात बेहद गंभीर हैं.

आर्थिक ग़ैर-बराबरी और भुखमरी

पूंंजीवादी व्यवस्था के कारण होने वाली बीमारियों और मौतों के बारे में मज़दूर वर्ग के महान अध्यापक फ्रे़डरिक एंगेल्स ने अपनी रचना ‘इंग्लैंड में मज़दूर वर्ग की दशा’ में इसे ‘सामाजिक हत्या’ कहा था. हम इतिहास के सबसे बड़ी ग़ैर-बराबरी के दौर से गुज़र रहे हैं. दुनिया परजीवी वित्तीय पूंंजी के नियंत्रण में है. वित्तीय पूंंजी चंद हाथों तक ही सिमटकर रह गई है. दुनिया के 42 अरबपतियों की दौलत सारे संसार की आधी आबादी की दौलत के बराबर है. अमरीका के तीन बड़े ख़रबपतियों – जेफ़ बेजोस, बिल गेट्स और वॉरेन बफे़ट की दौलत अमरीका की आधी आबादी की दौलत से अधिक है. बेरोज़गारी आसमान छू रही है. इस वक़्त रोज़गार में लगी हुई कुल आबादी का 60 प्रतिशत खस्ताहाल इलाक़ों में गुज़ारे की तनख़्वाह और ग़रीबी की हालत में रह रही मज़दूर आबादी है.

आर्थिक गतिरोध की मारी इस दुनिया का दूसरा पहलू वैज्ञानिक तकनीकी उन्नति और डिजिटल उन्नति का है. बेहद विकसित वैज्ञानिक तकनीक के मालिक पूंंजी की नीतियों ने लोगों को भोजन सुरक्षा और आज़ादियांं नहीं दीं. वैज्ञानिक तकनीक का मक़सद मानव के श्रम करने के अमल को आसान बनाना होता है, उल्टा यह मेहनतकश जनता के पांंव की ज़ंजीर बन गई है. वैज्ञानिक तकनीक की सहायता से लोगों पर सख़्त नियंत्रण और निगरानी बढ़ाई जा रही है. पारंपरिक पूंंजीवादी जनवादी संस्थाएंं नकारा हो गई हैं. परिणामस्वरूप फासीवाद का उभार हुआ है. अनाज के भंडार भरे पड़े हैं, लेकिन आम जनता की उन तक पहुंंच नहीं है.

क्या पूंंजीवादी व्यवस्था फेल हो गई है ?

इसमें कोई शक नहीं है कि जीवन के किसी भी क्षेत्र में पूंंजीवादी व्यवस्था जनता का नेतृत्व करने में असमर्थ हो चुकी है. पूंंजीवाद ऐतिहासिक तौर पर फेल हो चुका है. यह मानवता को और कुछ नहीं दे सकता. समाज में पैदा हुए गतिरोध को तोड़ नहीं सकता. परंतु ढहने को तैयार, अप्रासंगिक हो चुकी यह खोखली इमारत अभी भी खड़ी है. भविष्य के इतिहास की वाहक शक्तियों के सचेत प्रयासों से मानवता के लिए ख़तरा बन चुकी इस इमारत को गिराना होगा. भविष्य के नायक मज़दूर वर्ग की अपनी तैयारी की कमी और पूंंजीवाद के वैचारिक प्रभुत्व की ताक़त के दम पर राजनीतिक तौर पर पूंंजीवादी व्यवस्था का महत्व बना हुआ है. लेकिन कोविड-19 के झटके ने जहांं विश्व पूंंजी की बड़ी मज़बूत नज़र आती इस व्यवस्था की कमियों को नंगा करने में मदद की है, वहीं पूंंजी व श्रम के संग्राम के गुणात्मक तौर पर नए दौर में प्रवेश करने के संकेत भी नज़र आने लगे हैं. संसार में भोजन की कोई कमी नहीं है, परंतु भोजन तक पहुंंच के लिए बड़े परिवर्तन की दरकार है.

  • सुखदेव

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