
कॉमरेड डॉ. रफीक (मंदीप) का नाम एक ऐसे रहस्यमयी माओवादी डॉक्टर के रूप में सामने आता है, जिनकी जीवन-यात्रा पंजाब में एमबीबीएस की पढ़ाई से लेकर भारत के संघर्षग्रस्त और दूरस्थ इलाकों में चिकित्सा सेवाएं देने तक फैली हुई बताई जाती है.
सामाजिक परिवर्तन के महान आंदोलन अपने घोषित लक्ष्यों को प्राप्त कर पाएं या नहीं, इतिहास में उनका महत्व केवल उनकी सफलताओं या असफलताओं से तय नहीं होता. ऐसे आंदोलन मानवता को जीवन के कुछ महानतम आदर्श और उदाहरण भी प्रदान करते हैं.
कॉमरेड माओ ने उन लोगों को विशेष रूप से याद किया है जिन्होंने अपना जीवन जनता की सेवा के लिए समर्पित कर दिया. कनाडाई डॉक्टर नॉर्मन मैथ्यून पर लिखा गया उनका प्रसिद्ध लेख ऐसे ही एक आदर्श जीवन की कहानी है—एक ऐसे व्यक्ति की कहानी, जो एक पूंजीवादी देश में पैदा हुए, डॉक्टर बने और अपने आरामदेह जीवन को त्यागकर चीनी जनता और क्रांति की सेवा के लिए समर्पित हो गए. कहा जाता है कि भारत के क्रांतिकारी आंदोलन में भी ऐसा ही एक उदाहरण सामने आया—कॉमरेड डॉ. रफीक (मंदीप) का.
रहस्यमयी ‘माओवादी डॉक्टर’
डॉ. रफीक (मंदीप) के नाम से चर्चित यह रहस्यमयी व्यक्ति, जिन्हें कई लोग ‘माओवादी डॉक्टर’ के रूप में जानते हैं, लंबे समय से खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की जांच का विषय रहे हैं. हालांकि सरकारी और जांच एजेंसियों की फाइलों के बाहर उनके बारे में बहुत कम जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है.
बताया जाता है कि पंजाब से एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त करने वाले डॉ. रफीक कई वर्षों तक माओवादी आंदोलन से जुड़े रहे और सामाजिक अन्याय के खिलाफ संघर्ष में सक्रिय रहे. उनकी जीवन-कथा से जुड़ी अधिकांश जानकारियां सरकारी दस्तावेजों और विभिन्न स्रोतों से सामने आती रही हैं. आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी कार्यकर्ताओं और आंदोलन से जुड़े लोगों के बयानों के माध्यम से भी उनके बारे में कुछ जानकारी सामने आई है.
दूरस्थ इलाकों में चिकित्सा सेवा
बताया जाता है कि डॉ. रफीक संघर्षग्रस्त और दूरस्थ इलाकों में वर्षों तक चिकित्सा कार्य से जुड़े रहे. कुछ स्रोतों के अनुसार, वे माओवादी पार्टी सदस्यों के साथ-साथ आदिवासी समुदायों का भी इलाज करते थे. सुरक्षा एजेंसियों द्वारा उनकी गतिविधियों और मौजूदगी को लेकर अलग-अलग दावे किए जाते रहे हैं. खुफिया सूत्रों के अनुसार, वे वर्ष 2016 से झारखंड क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं.
चंदू नाम से पहचाने जाने वाले एक व्यक्ति के अनुसार, दंडकारण्य क्षेत्र में डॉ. रफीक अपनी चिकित्सा सेवाओं के कारण कार्यकर्ताओं, जनमिलिशिया के सदस्यों और आदिवासियों के बीच सम्मानित थे. उनका कहना है कि उन्होंने लोगों को, घायलों की प्राथमिक चिकित्सा और गोली लगने जैसी चोटों के इलाज का प्रशिक्षण भी दिया.
वर्ष 2013 में गिरफ्तार किए गए कुछ कार्यकर्ताओं के बयानों के आधार पर भी डॉ. रफीक को एक प्रशिक्षित और पेशेवर डॉक्टर बताया गया, जो सर्जरी करने में सक्षम थे और चिकित्सा टीम का नेतृत्व करते थे.
आदिवासियों के बीच एक डॉक्टर की भूमिका
ऐसे इलाकों में, जहां औपचारिक स्वास्थ्य सुविधाओं का गंभीर अभाव है, डॉक्टर की भूमिका असाधारण रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है. बताया जाता है कि डॉ. रफीक ने अनेक आदिवासियों का इलाज किया और लोग दूर-दराज के गांवों से उनके पास पहुंचते थे.
ग्रामीण सामान्य बुखार से लेकर गंभीर चिकित्सा स्थितियों तक के लिए उन पर निर्भर रहते थे. चंदू के अनुसार, एक घटना में अत्यंत सीमित सुविधाओं के बावजूद डॉ. रफीक ने एक घायल व्यक्ति के शरीर में हृदय के बेहद करीब फंसी गोली निकालने का सफल प्रयास किया था.
चंदू कहते हैं, ‘आदिवासियों के बीच डॉक्टर को भगवान की तरह देखा जाता है.’
चिकित्सा नियमावली और स्वास्थ्य प्रशिक्षण
डॉ. रफीक के काम का एक महत्वपूर्ण पक्ष चिकित्सा संबंधी ज्ञान को व्यवस्थित रूप से दर्ज करना भी बताया जाता है. उन्होंने कथित तौर पर ऐसी चिकित्सा नियमावली तैयार की, जिसमें गोली और युद्ध संबंधी घावों, मलेरिया, सांप के काटने, गैस्ट्रोएंटेराइटिस तथा जंगल के वातावरण में होने वाली विभिन्न चोटों और बीमारियों के उपचार संबंधी दिशानिर्देश शामिल थे.
बताया जाता है कि इस सामग्री का उपयोग माओवादी संगठन से जुड़े चिकित्सा कार्यकर्ताओं के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर उपचार और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए किया जाता था.
उन्होंने स्थानीय युवाओं और कार्यकर्ताओं को प्राथमिक चिकित्सा तथा बुनियादी स्वास्थ्य देखभाल का प्रशिक्षण भी दिया. कहा जाता है कि विभिन्न दस्तों या इकाइयों में कम-से-कम एक प्रशिक्षित चिकित्सा सहायक तैयार करने पर जोर दिया जाता था.
पारंपरिक जड़ी-बूटी ज्ञान का संकलन
डॉ. रफीक के कार्यों में पारंपरिक आदिवासी चिकित्सा ज्ञान के संकलन का भी उल्लेख मिलता है. स्थानीय आदिवासी चिकित्सकों और समुदायों से प्राप्त जड़ी-बूटियों के ज्ञान को व्यवस्थित कर चिकित्सा कार्य में इस्तेमाल करने की कोशिश की गई.
व्यावहारिक दृष्टिकोण यह बताया जाता है कि जहां आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं और दवाइयां उपलब्ध हों, वहां उनका उपयोग किया जाए और उनकी अनुपस्थिति में स्थानीय पारंपरिक ज्ञान एवं जड़ी-बूटियों का सहारा लिया जाए.
आज भी एक रहस्य
माओवादी आंदोलन पर बढ़ते दबाव, आत्मसमर्पणों और सुरक्षा अभियानों के बीच डॉ. रफीक के वर्तमान ठिकाने और गतिविधियों को लेकर अलग-अलग दावे हैं. कुछ स्रोतों में झारखंड को उनके संभावित कार्यक्षेत्र के रूप में बताया गया है, लेकिन उनके बारे में स्वतंत्र और विस्तृत सार्वजनिक जानकारी बहुत सीमित है.
बाहरी दुनिया के लिए कॉमरेड डॉ. रफीक (मंदीप) आज भी काफी हद तक एक रहस्यमयी व्यक्तित्व हैं—एक ऐसा नाम, जिसके पीछे पंजाब के एक एमबीबीएस स्नातक से लेकर दूरस्थ और संघर्षग्रस्त इलाकों में चिकित्सा सेवा से जुड़ी एक असाधारण यात्रा की कहानी बताई जाती है.
उनकी कहानी, चाहे जितनी भी अधूरी और रहस्यमयी हो, एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर छोड़ती है—क्या चिकित्सा केवल एक पेशा है, या जनता की सेवा और सामाजिक परिवर्तन के संघर्ष में इसकी कोई व्यापक भूमिका भी हो सकती है ?
- स्रोत: सुर्ख रेखा (पंजाबी से हिन्दी अनुवाद)
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