‘गद्दारों से निपटने के लिए मार्क्सवादी-लेनिनवादी-माओवादी मार्गदर्शिका’ शीर्षक लेख गुरकीरत कौर द्वारा लिखे गये लेख का हिन्दी अनुवाद है, जिसे उन्होंने रवि नारला द्वारा फेसबुक पर लिखे उनके एक लेख का जवाब है, जिसे उन्होंने सीमा विश्वविजय के समर्थन में उनको माओवादी संगठन से निकाल बाहर करने के बाद लिखा था. हम समझते हैं कि सीमा विश्वविजय के अवसरवाद के समर्थन में रवि नारला के उठाए सवाल का उत्तर इससे बेहतर कोई नहीं हो सकता. गौरतलब हो कि खुद रवि नारला भी पूर्व माओवादी हैं, जो वर्षों जेल में रहने के बाद खुले में रह रहे हैं, और माओवादी संगठन ने ज्यों ही सीमा विश्वविजय को गद्दार बताते हुए संगठन से निकाल बाहर किया, रवि नारला फौरन उनके समर्थन में आ जुटें और फेसबुक पर तर्र से एक लेख लिख मारा, जिसके ही जवाब में यह लेख लिखा गया है – सम्पादक

साथियों, हाल के दिनों में हमने भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को एक गंभीर संकट में घिरा देखा है. एक ओर, ऑपरेशन कागार के तहत हजारों क्रांतिकारियों की निर्मम हत्या कर दी गई है: यह नरसंहारकारी राज्य द्वारा जनता पर किए जा रहे युद्ध का तीव्र विस्तार है. साथी बसवराजू, रेणुका, रूपी, हिडमा, राजू दा, कोसा दा, किशन दा जैसे क्रांतिकारी नायकों ने हार के बावजूद अपनी राजनीति को त्यागने से इनकार कर दिया. उनके लिए उनकी राजनीति उनके शरीर और हड्डियों से भी अधिक प्रिय थी।श. ये साथी शहीद हो गए लेकिन संघर्ष में सदा जीवित रहेंगे क्योंकि उनका रक्त जनयुद्ध को सींचेगा.
इन शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते समय हमें यह भी याद रखना चाहिए कि सैन्य आक्रमण से भी अधिक खतरनाक विचारों का युद्ध है. क्योंकि संकट के समय, शासक वर्ग मजबूत होता है, उसका वैचारिक प्रभाव सर्वत्र व्याप्त होता है. असफलता के समय कुछ निम्न बुर्जुआ सोच के व्यक्ति सशस्त्र क्रांति से उम्मीद खो देते हैं और क्रांतिकारी आंदोलन को कमजोर करके उसे सत्ताधारी वर्ग का हथियार बनाने की कोशिश करते हैं. इसलिए संकट मुख्य रूप से सैन्य कार्रवाई में नहीं, बल्कि क्रांतिकारी माओवादी आंदोलन के कुछ तत्वों में पनपे अवसरवाद, विघटनवाद और संशोधनवाद में देखा जाता है. ये तत्व दीमक की तरह आंदोलन को अंदर से ही वैचारिक रूप से नष्ट करने की कोशिश करते हैं. वास्तव में, उनमें से कुछ तो क्रांति के लिए सचमुच संघर्ष कर रहे साथियों के बारे में सरकार को जानकारी देने तक चले गए.
इस प्रवृत्ति को सीपीआई (माओवादी) में वेणुगोपाल राव, रूपेश, बलराज आदि जैसे लोगों ने बढ़ावा दिया. कुछ दिन पहले वेणुगोपाल राव उर्फ सोनू को 15 अगस्त को ‘आजादी’ का बेशर्मी से जश्न मनाते देखा गया. यह मेहनतकश जनता की आजादी नहीं है. सोनू, अगर हमारे प्यारे देश की मेहनतकश जनता के साथ विश्वासघात करना और लूट-खसोट के रास्ते खोलने में सरकार की मदद करना ही तुम्हारे लिए आजादी है, तो यह आजादी सिर्फ तुम्हारी ही रहे !
हाल ही में, इस बागी सूची में दो और नाम जुड़ गए हैं: सीमा आजाद और विश्वविजय. ये भी उसी तरह के निम्न बुर्जुआ बुद्धिजीवी हैं जो कहते हैं कि पार्टी को वैध और अवैध दोनों तरह के कामों पर समान रूप से ध्यान देना चाहिए. वे भूल गए हैं कि माओ ने कहा था कि सशस्त्र संघर्ष वर्ग संघर्ष का सर्वोच्च रूप है और यदि अवैध तरीकों से सत्ता पर कब्जा करना पार्टी का मुख्य लक्ष्य नहीं बनाया जाता, तो वे पूंजीवादी निजी संपत्ति के शासन को कैसे खत्म कर पाएंगे ? या क्या वे वाकई पूंजीवादी निजी संपत्ति के शासन को खत्म करना चाहते हैं ? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इन सबसे बड़े पैरोकारों को क्रांतिकारी और लोकतांत्रिक ताकतों द्वारा बेनकाब किए जाने पर इतना बुरा लगा कि उन्होंने कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के खिलाफ औपनिवेशिक काल के मानहानि के मुकदमे दायर कर दिए. इसके जरिए उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि वे किसके पक्ष में खड़े हैं.
कॉमरेड लेनिन ने 1908 के फैसलों में हमें सिखाया था कि ऐसे मोड़ पर, क्रांति के लिए मुख्य संघर्ष अवसरवाद, विघटनवाद और संशोधनवाद के खिलाफ होता है. ‘पार्टी पुरानी पार्टी की जगह किसी ऐसी अस्पष्ट, खुली चीज़ को लाने की कड़ी निंदा करती है जिसे पार्टी नहीं कहा जा सकता. पार्टी तब तक कायम नहीं रह सकती जब तक वह अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए संघर्ष न करे, जब तक वह उन लोगों से पूरी ताकत से न लड़े जो इसे खत्म करना चाहते हैं, इसे नष्ट करना चाहते हैं, जो इसे नहीं मानते या इससे किनारा कर लेते हैं.’ ‘लिक्विडेटर्स के तरीके और बोल्शेविकों के पार्टी कार्य’ (The Methods of Liquidators and the Party Tasks of the Bolsheviks) में लेनिन ने कहा था, ‘इसलिए, सही क्रांतिकारी सामाजिक – जनवादी रणनीतियों की रक्षा करने और पार्टी के निर्माण के लिए दो मोर्चों पर लड़ना एक ज़रूरी काम है.’ अपने पूरे इतिहास में, मार्क्सवाद, संशोधनवाद के खिलाफ एक संघर्ष रहा है. भारत में नक्सलबाड़ी का सही रास्ता भी कॉमरेड चारू मजूमदार ने CPI और CPI (मार्क्सवादी) के आधुनिक संशोधनवाद के खिलाफ संघर्ष करके तय किया था. आज भी क्रांतिकारी ताकतें विघटनवादियों और संशोधनवादियों के खिलाफ ऐसा ही संघर्ष कर रही हैं.
हालाँकि, कुछ बुद्धिजीवी जो ऐतिहासिक रूप से क्रांतिकारी आंदोलन के करीब रहे हैं, उन्होंने सार्वजनिक रूप से कुछ बहसें छेड़ी हैं, खासकर सीमा और विश्वविजय के अवसरवाद के खिलाफ अपनाए गए संघर्ष के तरीकों को लेकर. इस लेख में, मैं खास तौर पर एन. रवि द्वारा उठाए गए सवालों का जवाब देने की कोशिश करूंगी.
सबसे पहले, कॉमरेड रवि को डर था कि ‘खुले तौर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं’ को बेनकाब करने का यह तरीका क्रांतिकारी संगठन में गुप्त रूप से काम करने के सिद्धांत का उल्लंघन है. हालांकि, जब हम गोपनीयता की बात करते हैं, तो हमें यह पक्का करना चाहिए कि हम शब्दों को संदर्भ के बिना न चुनें और न ही इस्तेमाल करें. सर्वहारा वर्ग को एक गुप्त और भूमिगत संगठन की ज़रूरत होती है ताकि क्रांतिकारी काम राज्य के सामने उजागर न हो जाए. सत्ताधारी राज्य को हराने के लिए, क्रांतिकारी अग्रिम दस्ते (vanguard) में एक गुप्त रूप से काम करने वाला भूमिगत केंद्र (nucleus) होना चाहिए जो जनता से गहराई से जुड़ा हो. इसलिए, सर्वहारा वर्ग के संगठन में गोपनीयता का पालन गद्दारों को राज्य से बचाने के लिए नहीं, बल्कि क्रांतिकारी नेतृत्व को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है.
‘पार्टी संगठन के गुप्त केंद्र को बचाए रखना और मजबूत करना बहुत ज़रूरी है’ – लेनिन, पार्टी संगठन के सिद्धांत, 1906. सीमा और विश्वविजय इस गुप्त केंद्र को आम जनता से अलग करना चाहते थे. जबकि कॉमरेड लेनिन ने साफ कर दिया था कि सभी कानूनी कामों का मार्गदर्शन गैर-कानूनी भूमिगत कामों से होना चाहिए और अंततः उन्हें उसी की सेवा करनी चाहिए, सीमा और विश्वविजय का तर्क था कि खुली जन-गतिविधियों के लिए भूमिगत पार्टी के मार्गदर्शन की कोई ज़रूरत नहीं है. इसलिए, असल में ऐसे गुप्त कामकाज के सिद्धांत के खिलाफ़ आंदोलन के ये दो गद्दार ही हैं, जो गुप्त संगठन को आम जनता से अलग करने की कोशिश कर रहे थे.
इसके अलावा, रवि नारला ने क्रांतिकारी आंदोलन पर सीमा और विश्वविजय को ‘रेड-टैगिंग’ (माओवादी होने का ठप्पा लगाने) और उन्हें भेड़ियों (यानी राज्य/सरकार) के हवाले करने का आरोप लगाया है. सच तो यह है कि ये गद्दार क्रांतिकारी आंदोलन में अपने ओहदे का इस्तेमाल लोगों और क्रांतिकारियों के बीच अपनी साख बनाने और शासक वर्ग की विचारधारा का ज़हर फैलाने के लिए कर रहे थे. ऐसे में, उनके पुराने ओहदों का ज़िक्र करके उनका पर्दाफ़ाश करना ज़रूरी हो जाता है. और किसी भी क्रांतिकारी ताकत ने यह दावा नहीं किया है कि वे अभी किसी समिति में कोई पद संभाल रहे हैं बल्कि, सीमा और विश्वविजय को तो निकाल दिया गया है.
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि राज्य क्या है और यह कैसे काम करता है. राज्य वर्ग-शासन का एक साधन है. यह शासक वर्ग के कामकाज को संभालने वाला एक संगठन है. भारतीय राज्य का सबसे बड़ा दुश्मन देश में चल रहा माओवादी आंदोलन है. मोदी के हालिया 15 अगस्त के भाषण में, माओवादी आंदोलन के बारे में बात करते हुए उन्होंने खुलकर माना कि भारतीय राज्य का सबसे बड़ा दुश्मन बाहर नहीं, बल्कि देश की सीमाओं के भीतर है. जब यही माओवादी आंदोलन – जिसे राज्य सबसे बड़ा खतरा मानता है – किसी ऐसे व्यक्ति को बाहर निकालता है जो क्रांतिकारी आंदोलन के साथ गद्दारी करता है, तो राज्य उन्हें गिरफ्तार क्यों करेगा ? बल्कि, राज्य उनकी पीठ थपथपाएगा और क्रांतिकारी आंदोलन को नुकसान पहुंचाने के लिए इन गद्दारों का शुक्रिया अदा करेगा. यह ‘विच-हंटिंग’ (यानी किसी खास समूह को निशाना बनाना) नहीं है. असल में ‘विच-हंटिंग’ तो लोकतांत्रिक और क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं और पत्रकारों पर मानहानि के मुकदमे करना और क्रांतिकारियों को राज्य का एजेंट बताना है.
इसके बाद, ‘दस्तक’ पत्रिका को ‘मज़दूर अधिकार संगठन’ द्वारा जलाए जाने को बहुत कठोर कदम माना गया. सीमा और विश्वविजय के ख़िलाफ़ क्रांतिकारी आंदोलन का संघर्ष असल में मार्क्सवाद और संशोधनवाद के बीच का संघर्ष है, जो कि अंततः सर्वहारा वर्ग और बुर्जुआ वर्ग के बीच का संघर्ष है. ऐसा राजनीतिक संघर्ष कभी भी नरम नहीं रहा है, और क्यों होना भी चाहिए ? अवसरवाद को जड़ से उखाड़ फेंकना बहुत कठोर कदम नहीं है. संशोधनवादी अख़बारों, पत्रिकाओं और साहित्य को जलाना बहुत कठोर कदम नहीं है. असल में, सांस्कृतिक क्रांति के दौरान, जब लियू शाओकी को ‘चीन का ख्रुश्चेव’ करार दिया गया, तो उनकी किताबें, भाषण और पर्चे ज़ब्त कर लिए गए और कई जगहों पर ‘रेड गार्ड’ समूहों द्वारा निंदा अभियानों के दौरान उन्हें सार्वजनिक रूप से जला दिया गया या लुगदी बना दिया गया.
सामाजिक-साम्राज्यवादी सोवियत संघ के साहित्य को भी जलाया और नष्ट किया गया. हर निर्णायक राजनीतिक संघर्ष पर उन लोगों द्वारा ‘हद से आगे बढ़ने’ का आरोप लगाया गया है जो यथास्थिति (status quo) बनाए रखना चाहते थे. जिन्हें यह संघर्ष बहुत कठोर लगता है, वे आगे चलकर GPCR (महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति) को भी बहुत कठोर कहेंगे. आज, न केवल युवाओं और छात्रों पर, बल्कि पूरी क्रांतिकारी जनता के कंधों पर यह ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी है कि वे अवसरवाद-विघटनवाद-संशोधनवाद के ख़िलाफ़ ‘रेड गार्ड’ की तरह लड़ें और माओवाद को आगे बढ़ाएं.
इसके साथ ही, हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि N Ravi की ये सभी आलोचनाएं काम करने के तरीके (method) को लेकर हैं. जब हम सही क्रांतिकारी लाइन स्थापित करने के लिए गलत विचारों के खिलाफ संघर्ष करते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि सबसे ज़रूरी चीज़ बाहरी रूप नहीं, बल्कि उस चीज़ के भीतर का मुख्य विरोधाभास और मुख्य पहलू होता है. मुद्दा आलोचना का रूप नहीं, बल्कि उसका राजनीतिक कंटेंट है; संघर्ष का दिखावा नहीं, बल्कि उसका असली मकसद है. जहां N Ravi ने OLR (अवसरवाद, विघटनवाद और संशोधनवाद) के खिलाफ संघर्ष के तरीके पर अपनी आलोचना खुलकर सामने रखी, वहीं उन्होंने अपनी Facebook पोस्ट में साफ लिखा कि वे इसके कंटेंट पर ऑनलाइन कोई चर्चा नहीं करेंगे. जब किसी चीज़ के असली मकसद या सार (essence) पर बात करने की बारी आई, तो उन्हें अचानक कैसे याद आ गया कि बहस का समाधान ढांचागत (structurally) तरीके से होना चाहिए ? सच तो यह है कि इन लोगों के पास कंटेंट के खिलाफ कहने के लिए मार्क्सवादी नज़रिए से कुछ भी नहीं है. इसलिए वे संघर्ष के तरीकों को लेकर इधर-उधर की बातें करते हैं. यह अपने आप में आलोचना का एक ‘पोस्ट-मॉडर्न अवसरवादी’ तरीका है, न कि माओवादी तरीका—जो सच्चा और ईमानदार ‘दो-लाइन संघर्ष’ (two-line struggle) होता है.
इस संघर्ष के कंटेंट पर जो एकमात्र बहस उठी, वह सीमा आज़ाद के रेडिकल नारीवाद’ को लेकर थी, जिसकी तुलना N Ravi कॉमरेड अनुराधा गांधी के शानदार संघर्ष से कर रहे हैं. पितृसत्ता के खिलाफ कॉमरेड अनुराधा का संघर्ष नारीवादी आंदोलन में मौजूद उन प्रतिक्रियावादी और शासक वर्ग की विचारधाराओं के खिलाफ भी था, जिनमें रेडिकल नारीवाद भी शामिल है. उन्होंने कहा था, ‘रेडिकल नारीवादियों ने ऐतिहासिक विकास और ऐतिहासिक तथ्यों को हल्के में लिया है और स्त्री-पुरुष के विरोधाभास को ही मूल और मुख्य विरोधाभास मानकर अपनी समझ थोपी है—यह दावा करते हुए कि इसी ने असल इतिहास की दिशा तय की है… इसी मुख्य बिंदु से, रेडिकल नारीवादी विश्लेषण इतिहास को पूरी तरह छोड़ देता है, राजनीतिक-आर्थिक ढांचे को नज़रअंदाज़ करता है और केवल विकसित पूंजीवादी समाज के सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करता है, और वहां की स्थिति को ही सार्वभौमिक मानवीय स्थिति के तौर पर पेश करता है.’ रेडिकल नारीवाद आदर्शवाद (idealism) पर आधारित है और यह महिलाओं को कभी भी पितृसत्ता की बेड़ियों से आज़ाद नहीं करा सकता, क्योंकि यह इसकी भौतिक जड़ों—यानी वर्गीय समाज—का विश्लेषण करने से इनकार करता है. पितृसत्ता के खिलाफ अनुराधा के संघर्ष का उदाहरण देकर सीमा की महिला-विरोधी और जन-विरोधी प्रवृत्तियों को सही ठहराना, अपमानजनक है.
मैं कॉमरेड रवि नारला से गुज़ारिश करती हूँ कि वे ‘रेड-टैगिंग’, गुप्त रूप से काम करने के सिद्धांत और अनुराधा गांधी के नाम का इस्तेमाल बिना संदर्भ के न करें. आपको संघर्ष को हर पहलू से समझना चाहिए और इसके सही पक्ष में खड़ा होना चाहिए. हो सकता है कि आप सीमा को दशकों से जानते हों और हम सब जानते हैं कि उन्होंने लंबे समय तक वास्तव में अच्छा काम किया है. लेकिन यह कहना बेईमानी होगी कि वह बिना किसी विचारधारा वाली ‘स्वतंत्र’ मानवाधिकार कार्यकर्ता थीं. कोई भी चीज़ विचारधारा से अछूती नहीं होती. देश के बहुत सारे मेहनतकश लोगों के लिए इतने सालों तक काम करने की प्रेरणा उन्हें मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद की विचारधारा से मिली थी. अब जब उन्होंने वह रास्ता छोड़ दिया है, तो हम उनका समर्थन जारी नहीं रख सकते और न ही हमें ऐसा करना चाहिए. क्या प्रचंड और कोबाड गांधी ने भी कभी अच्छा काम नहीं किया था ? किस चीज़ ने उन्हें वह अच्छा काम करने के लिए प्रेरित किया ? वह उनकी क्रांतिकारी राजनीति थी. क्या उस राजनीति को छोड़ने और लोगों के साथ विश्वासघात करने के बाद भी हम उन्हें क्रांतिकारी कहते रहेंगे ? नहीं. जब कोई व्यक्ति क्रांतिकारी राजनीति करना बंद कर देता है, तो वह क्रांतिकारी नहीं रह जाता. वे या तो गैर-क्रांतिकारी बन जाते हैं या फिर प्रति-क्रांतिकारी. आज हमें अपनी समझ उनकी मौजूदा राजनीतिक लाइन के आधार पर बनानी चाहिए और यह देखना चाहिए कि क्या यह क्रांतिकारी आंदोलन को आगे बढ़ा रही है या उसे नुकसान पहुंचा रही है. आज सीमा और विश्वविजय सिर्फ़ बातों से क्रांतिकारी हैं, लेकिन असल कामों में वे शासक वर्गों की पिछलग्गू बन गई हैं.
हमें अपने दोस्तों और दुश्मनों का आकलन उनकी राजनीतिक लाइन के आधार पर करना चाहिए. आइए हम सब मिलकर मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद की सही क्रांतिकारी लाइन पर अडिग रहने का संकल्प लें और नवजनवादी क्रांति-समाजवाद-साम्यवाद की ओर बढ़ें, चाहे इस कांटों भरे रास्ते पर हमें कितनी भी मुश्किलों का सामना क्यों न करना पड़े. आइए, हम मुश्किलों या बुरे दौर से घबराएं नहीं. अच्छे समय में सर्वहारा वर्ग का दोस्त बने रहना आसान है, लेकिन हमें चीड़ और सरू के पेड़ों की तरह बनने का संकल्प लेना चाहिए जो कड़ाके की ठंड में भी अपनी मजबूती दिखाते हैं. आइए, हम उन सभी लोगों के खिलाफ़ अटूट संघर्ष की भावना को बुलंद रखें जो आंदोलन को खत्म करने या कमजोर करने की कोशिश करते हैं (विघटनवादी), चाहे वे कोई भी हों.
- गुरकीरत कौर
- अंग्रेजी से अनुवाद : प्रतिभा एक डायरी टीम
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उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)
उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)
उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी
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