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कोराना संकट कितना प्राकृतिक, कितना मानव निर्मित

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 27, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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कोराना संकट कितना प्राकृतिक, कितना मानव निर्मित

हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

कई बांग्ला उपन्यासों में विवरण मिलते हैं कि जब बंगाल का अकाल पड़ा था तो स्थानीय व्यवसायियों ने इसका लाभ लेकर जम कर मुनाफाखोरी की थी. मुनाफाखोरी के लिये जमाखोरी अक्सर पूर्व शर्त्त होती है और यह सब करते हुए इन वणिकों ने अंग्रेज सरकार की उपेक्षा के शिकार निर्धन लोगों की जिंदगियों को तबाह करने में अपनी तरफ से कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी.

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अपवाद होंगे, पर स्थानीय जमींदारों ने भी अकाल के दौरान भूख से मरते लोगों के प्रति अधिक मानवता नहीं दिखाई. अंग्रेज प्रशासन की औपनिवेशिक साजिशों और बदइंतजामी के शिकार उन लाखों लोगों के साथ स्थानीय जमींदारों और व्यवसायियों की स्वार्थी, अमानवीय गतिविधियों ने बंगाल के अकाल को इतिहास के भयानक अध्यायों में शामिल कर दिया. इतिहास का यह दारुण अध्याय हमारे समाज के चरित्र को भी दर्शाता है।

कोरोना से भयाक्रांत समाज में लॉक डाउन की घोषणा और इससे उत्पन्न अफरातफरी का लाभ उठाने में हमारे वणिक वर्ग का उत्साह देखा जा सकता है. प्रशासनिक अमले का इन गोरखधंधों से आंखें फेरे रहना उसके सामान्य चरित्र के अनुसार ही है. वायरस के प्रकोप और निरन्तर सामने आ रही उसकी वैज्ञानिक व्याख्याओं के कारण कर्मकांडी पुरोहितों के लिये अवसर अधिक नहीं, वरना अंधविश्वासों से ग्रस्त इस अनपढ़ बहुल समाज में ग्रह शांति के लिये वे न जाने कितने अनुष्ठान कर रहे होते.

सदी बदल गई, लेकिन हमारा सामाजिक चरित्र नहीं बदला. यह इतनी आसानी से बदलता भी नहीं. इसके लिये पैगम्बरों को आना पड़ता है, अवतारों को जन्म लेना पड़ता है, जो जीवन मूल्यों और सामाजिक मूल्यों को पुनर्परिभाषित करते हैं.

राम आए, कृष्ण आए, बुद्ध और महावीर आए. इनके आदर्शों ने भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाई लेकिन, हमारे सामाजिक मूल्यों पर इन सांस्कृतिक आदर्शों की अधिक प्रभावी छाप कभी नजर नहीं आई.

गांधी आए, जो हमारे लिये सिर्फ राजनीतिक नेता ही नहीं थे. वे नैतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पथ प्रदर्शक भी थे लेकिन, हमने आम लोकप्रिय धारणाओं में उनका हश्र ‘लाचारी का नाम महात्मा गांधी’ करते हुए उन्हें नोट के फोटो और उन मूर्त्तियों तक सीमित कर दिया, जिस पर कौए अक्सर बीट कर दिया करते हैं.

बात सिर्फ यह नहीं है कि छोटे-बड़े दुकानदार आज आपदा पीड़ित आशंकित और हलकान लोगों से जम कर मुनाफाखोरी की जुगत में लगे हैं. बात यह भी है कि छोटे-बड़े शहरों में बीते हफ्तों में नकली मास्क और सैनिटाइजर का धंधा भी खूब फला-फूला है और प्रशासन इन तत्वों की नकेल कसने में नाकाम रहा है.

प्रभावितों के प्रति उपेक्षा और प्रशासनिक बदइंतजामी में भी हमारे प्रशासन का वही चरित्र सामने आ रहा है, जो ऐसे मौकों पर अक्सर आता रहा है. कमोबेश, यह ऊपर से नीचे तक है.

महीनों पहले से दुनिया कोरोना के आतंक से जूझ रही थी और प्रभावितों के साथ ही मौतों की संख्या भी बढ़ती जा रही थी. तय था कि वैश्वीकरण के दौर में विश्वग्राम बनती जा रही दुनिया में इसका फैलाव होना ही है और भारत भी इससे बचने वाला नहीं है.

लेकिन हमारी सरकारें वक्त रहते उतनी सक्रिय नहीं हुईं, जो उन्हें होना ही चाहिये था. न टेस्ट के लिये तैयारी हुई, न प्रवासी लोगों को उनके घरों तक लौटने के लिये समय और सुविधाएं देने की कोई गम्भीर कोशिश हुई.

आज यह सोच कर ही अजीब लगता है कि महज एक सप्ताह पहले, 18 मार्च तक बिहार में कोरोना संक्रमित लोगों की जांच के लिये एक भी केंद्र स्थापित नहीं किया जा सका था तब, जबकि देश के अनेक हिस्सों में इसके वायरस फैल चुके थे और बिहार में भी इस कारण स्कूल कॉलेज बंद किये जा चुके थे.

पहले से ही आधारभूत संरचना के नाम पर दरिद्र देश के नीति नियंताओं ने इस वायरस के प्रकोप से लोगों को बचाने के लिये गम्भीर तात्कालिक तैयारी नहीं की. न टेस्ट के लिये बड़े पैमाने पर सेंटर बनाए गए, न मेडिकल स्टाफ के लिये आपातकालीन आधार पर प्रतिरक्षक सुविधाओं का इंतजाम किया गया.

खबरें आ रही हैं, जो दिल दिमाग को सुन्न कर देने वाली हैं कि मास्क और मेडिकल स्टाफ के लिये प्रतिरक्षक उपकरणों के निर्माण में लगने वाले कच्चे माल का निर्यात भारत से 19 मार्च तक इसलिये किया जाता रहा क्योंकि इस वैश्विक घबराहट के दौर में 10 गुने मुनाफे की कमाई हो रही थी.

10 गुना अधिक मुनाफा के लोभ में उन कच्चे मालों के निर्यातक व्यवसायियों ने अपने देश के करोड़ों लोगों के हितों को ही नहीं, उनके जीवन को भी दांव पर लगा दिया और यह सब हमारी सरकार के संरक्षण में हुआ.

खबरें बता रही हैं कि भारत में कोरोना के प्रसार की आशंकाओं को देखते हुए उन कच्चे मालों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, जो मास्क और मेडिकल स्टाफ के किट बनाने के काम आते हैं लेकिन कोरोना पीड़ित देशों में भारी मांग को देखते हुए निर्यात के इस व्यवसाय में लगे बड़े व्यवसायियों की जीभें मुनाफाखोरी के लिये लपलपाने लगीं. उन्होंने सरकारी तंत्र में अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए इन कच्चे मालों के निर्यात पर लगा प्रतिबंध शिथिल करवा दिया और 10 गुना मुनाफा वसूल कर मालामाल होने लगे.

आज जब अपने देश में मास्क और मेडिकल स्टाफ के लिये किट की भारी मांग खड़ी हो गई है तो इनके निर्माण में लगने वाले कच्चे माल की भारी कमी का सामना है.

इतने बड़े निर्यातकों का यही है चरित्र और यही है हमारी सत्ता-संरचना का चरित्र. मुनाफाखोरी और देश के लोगों के हितों के साथ खिलवाड़ में दोनों एक दूसरे के साथ हो गए और आज न हमारे बाजारों में मांग के अनुसार मास्क उपलब्ध हो पा रहे हैं, न मेडिकल स्टाफ की जरूरतों के हिंसाब से प्रतिरक्षण सामग्रियां उपलब्ध हो पा रही हैं.

इतिहास में दर्ज है कि बंगाल अकाल में उतनी अधिक मौतों के लिये प्राकृतिक कारण कम, मानव निर्मित कारण अधिक जिम्मेदार थे. आज हमारे देश, खास कर करोड़ों ग्रामीण निर्धनों का भयानक आशंकाओं और खतरों से सामना है. इतिहास इसे भी तो दर्ज करेगा ही कि यह संकट कितना प्राकृतिक था और कितना मानव निर्मित था.

जाहिर है, इतिहास के उस अध्याय में हमारे सामाजिक और राष्ट्रीय चरित्र की भी चर्चा जरूर होगी कि संकट के लिये ये सब कितने जिम्मेवार थे.

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