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दलित समाज का महाराष्ट्र बंद परजीवी ब्राह्मणवादी तबकों की आकांक्षा पर आघात

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 3, 2018
in ब्लॉग
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दुनिया का इतिहास गरीब, असहाय, दुःखी लोगों के खून से लिखा गया है. इस खून से इतिहास लिखने वाले हमेशा से ही समाज का वह परजीवी तबका रहा है जो हमेशा ही बेहद क्रूर, अमानवीय, हत्यारा और विश्व इतिहास में सर्वाधिक अविश्वसनीय चरित्र का है. यह परजीवी श्रम को बेहद ही घृणा की दृष्टि से देखते हैं परन्तु शोषण के यंत्र से पूरे इतिहास पर छाये हुए हैं. इन परजीवियों ने अपने शोषण को स्थायित्व भाव प्रदान करने के लिए समय-समय पर नये-नये शिगूफे छोड़े हैं, जिसमें धर्म, देश, देशप्रेम, मानवता, राष्ट्रवाद आदि है. इन शिगूफों को हर देशकाल की शोषित जनता को जन्म के साथ ही घुट्ठी में डाल कर पिलाया जाता है, ताकि वह इन परजीवियों की रक्तपिपाशु इच्छा को हरकाल में पूरा कर सके.

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भारत के इतिहास पर भी यह पूरी तरह सच है. परन्तु यहां इन परजीवी तबकों ने अपने शोषण के जाल को ज्यादा बेहतर और सटीक तरीके से समाज पर लागू किया है, जिसने एक बेहद क्रूर शोषण प्रणाली को जन्म दिया है, जिसे मनुस्मृति जैसे शोषक साहित्य ने प्रतिपादित किया. शोषण की इस ब्राह्मणवादी मनुस्मृति प्रणाली ने समाज की बहुतायत आबादी, जो श्रम को श्रेयस्कर मानते थे, को अछूत घोषित कर उनके साथ हद दर्जे की क्रूरता को सर्वमान्य बना दिया. इन्हें मुख्य धारा से अलग कर दिया गया और परजीवी तबकों जिन्हें सवर्ण कहा गया, की क्रूरता को झेलना सहज सौभाग्य बना दिया. इन क्रूरता में शुद्रों के कान में पिघला सीसा डालना, वेद उच्चारण करने मात्र पर जिह्वा काट लेना, उनके स्त्रियों को भोग्या बना डालना, उनके बेटों को दास बना कर रखना आदि जैसे कृत्यों को सर्वमान्य बना दिया.

भारत के इन दलितों-शुद्रों ने जब कभी भी परजीवी तबकों के जुल्मों के खिलाफ आवाज उठाया, बेहद की क्रूरता से दमन कर दिया गया. हलांकि भारत के इतिहास में दलितों-शुद्रों के विद्रोह की बहुत ही कम घटनाये सामने आयी है क्योंकि जन्म के साथ ही उनको इन क्रूरताओं को झेलने के लिए इन परजीवी सवर्ण तबकों के द्वारा धर्म के माध्यम से तैयार किया जाता है.

इन परजीवी सवर्ण तबकों के क्रूर शोषण-दमन के खिलाफ इन दलित-शुद्र-अछूत समाज के लोगों में घृणा की कितनी बड़ी मात्रा जमा थी, इसका सबसे बड़ा उदाहरण महाराष्ट्र के पेशवाओं के खिलाफ अंग्रेजों के युद्ध के उपरान्त पेशवाओं की पराजय से उपजी खुशी के इजहारस्वरूप दलित समाज के लोगों द्वारा 1 जनवरी को विजय दिवस के रूप में मनाना है. देश के इतिहास में संभवतः पहली बार अंग्रेजों के आगमन के फलस्वरूप देश के दलित-शुद्र-अछूत समाज के लोगों को अपने अस्तित्व को पता लगा और आजादी का शायद स्वाद भी पहली बार चखा. तब से लेकर आज तक में बदलाव केवल इतना ही हो पाया है कि इन परजीवी तबकों में अब वैसे लोग भी शामिल हो गये, जो दलित-शुद्र और अछूत समाज से आते थे.

परन्तु आज भी यह सवर्ण तबका अपने पुराने काल की याद में छटपटाते रहते हैं और गाहे-बगाहे इसका प्रदर्शन भी ऊना, सहारनपुर और पुणे के भीमा-कोरेगांव जैसे स्थानों में करते रहते हैं. अंग्रेजों के आगमन के पूर्व इन परजीवी तबकों को शोषितों के तरफ से जहां किसी भी प्रकार के विरोध का सामना नहीं करना पड़ता था, वहीं अब उन्हें हर कदम पर विरोध का सामना करना पड़ता है. यही कारण है कि सवर्ण तबका शोषण के उस पुराने काल को स्वर्ण युग कहकर उसे वापस लाने के लिए हर प्रकार का प्रयास कर रहे हैं.

चूंकि इन सवर्ण परजीवी तबकों ने मनुस्मृति के माध्यम से ब्राह्मणवादी जैसी शोषण की प्रणाली को दलित-शुद्र-अछूत समाज के लोगों में इतने गहरे बिठा रखा है कि आज जब समाज एक नये रूप में ढल चुका है फिर भी इन ब्राह्मणवादी शोषण प्रणाली के बचाव में कई बार खुद दलित-अछुत समाज से निकले लोग सामने आ खड़े होते हैं.

यह सवर्ण परजीवी तबका अपने शोषण के पुराने यंत्र को फिर से स्थापित करने के लिए हिन्दुत्व के नाम पर एक संगठन खड़ा कर आज देश की सत्ता पर काबिज हो गया है. ऐसे में इनकी पुरानी आकांक्षा फिर से हिलोरे लेने लगी है. परन्तु अंग्रेजी हूकूमत का एक अच्छा पहलू यह भी रहा है कि उसने समाज के दलित-शुद्र-अछूत तबकों के अन्दर जीवन की लालसा और आजादी का स्वाद चखा गया है. जिस कारण यह शोषित तबका अपने विरोध के झंडे को हर जगह उठा रहे हैं और अपने जीने का अधिकार और समानता की मांग को लेकर उठ खड़ा हुए हैं.

भीमा-कारेगांव में दलित समाज के र्शार्य दिवस पर इन सवर्ण परजीवी तबकों का हमला और प्रतिक्रिया में दलित समाज का आज के महाराष्ट्र बंद के ऐलान को इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए. यह शौर्य दिवस इन सवर्ण परजीवियों के शोषण के खिलाफ दलित-शोषित तबकांे के विरोध का पहला जीत है, जिसे अंग्रेजों ने पेशवाओं को पराजित कर इन दलित-शोषित तबकों को उपहार में दिया है.

आज भी यह परजीवी तबका धर्म, देश, देशप्रेम, मानवता, राष्ट्रवाद आदि जैसे इन शिगूफों के माध्यम से देश की विशाल आबादी को शोषित बनाये रखना चाह रही है. जबकि शोषित तबकों के लिए कोई भी धर्म, देश, देशप्रेम, मानवता, राष्ट्रवाद आदि नहीं होता है. यह केवल शोषण के यंत्र को बचाये रखने की शोषकों की साजिश है, जिसके बहकावे में आना शोषण की उस पुरानी पद्धति को स्थापित करने की हामी भरना है. शोषक तबकों को धर्म, देश, देशप्रेम, मानवता, राष्ट्रवाद आदि तभी याद आते हैं जब शोषित वर्ग अपने हक-अधिकार की मांग के लिए विद्रोह का झंडा बुलन्द करते हैं.

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