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धर्म का धंधा

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 10, 2021
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गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा नूतन प्रकाशित ‘महाभारत’ अनुशासन पर्व के 82वें अध्याय में लिखा गया है कि ‘गाय के दूध, दही और घी में भी वह बात नहीं है, जो गाय के गोबर और मूत्र में है.’ ऐसे ही तो मूर्खों को गोबरभक्त बनाया जाता है जो दूध-घी जैसी शुद्ध चीज़ों को छोड़कर अशुद्ध (मल-मूत्र) का आस्वादन करते हैं और खुद को धन्य मानते हैं.

धर्म का धंधा

पं. किशन गोलछा जैन, ज्योतिष, वास्तु और तंत्र-मंत्र-यन्त्र विशेषज्ञ
  • हिन्दू धर्म – करीब करीब 10 करोड़ मंदिर. (इसमें मठों की गिनती शामिल नहीं है)
  • मुस्लिम धर्म – 4 करोड़ मस्जिद और मजार. (इसमें मदरसे शामिल नहीं है)
  • सिख धर्म – लगभग 2 करोड़ गुरुद्वारे.
  • ईसाई धर्म – लगभग 2 करोड़ चर्च.
  • बुद्ध धर्म – लगभग 1 करोड़ (बौद्धमन्दिर) शेरेटन. (इसमें बौद्धमठ शामिल नहीं है)
  • जैन धर्म – लगभग 1 करोड़ जैन देरासर और उपाश्रय.

क्या आप जानते हैं कि भारत में धर्म का धंधा सबसे बढ़िया है. और भारत में इस धंधे की ठगी के कुल मिलाकर लगभग 20 करोड़ अंधी आस्था वाले (अ)धार्मिक स्थान है, जहां लोगों की मूर्खता और अंधश्रद्धा का धंधा होता है. भारतीय आबादी में से लगभग 50 करोड़ लोग रोज के 10 रूपये एवरेज के हिसाब से इन स्थानों में दान/चंदा/चढ़ावा इत्यादि देते हैं, अर्थात रोज के 500 करोड़ रूपये. अगर इनमें से हरेक स्थान पर अगर एक आदमी को प्रमुख माना जाये तो 20 करोड़ लोग ऐसे हैं जो बिना कोई काम-काज किये इस धंधे से ऐश करते है और देश को गर्त में धकेलने का कार्य करते है. क्योंकि ये सब वो मुफ्तखोर है, जो लोगों की मूर्खता का फायदा उठाकर नशे से लेकर वो सब कार्य करते है जो अनुचित कहे जाते हैं.

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मैं सोचता हूं कि अगर इन मुफ्तखोरों को सजा के तौर पर मनरेगा में काम पर लगा दिया जाय तो देश का इंफ्रास्ट्रक्चर ही बदल जायेगा, वो भी सिर्फ एक साल में. साथ ही कभी-कभी ये भी सोचता हूं कि सरकार को इन स्थलों का अधिग्रहण कर इन्हें सरकारी अस्पताल और सरकारी स्कूल, कॉलेजों में परिवर्तित कर देना चाहिये तथा संविधान से धार्मिक आधार वाले सभी एक्ट ख़त्म कर एक नया एक्ट बनाना चाहिये, जो इन धार्मिक रीति-रिवाज़ों वाले पाखंडों को प्रतिबंधित कर दे, जिससे देश से अन्धविश्वास ख़त्म हो और लोगों की मूर्खतापूर्ण आस्था पर विराम लगे.

इन धर्मों के नाम पर चल रही लूट को बंद करवाना सरकार का प्राथमिक कार्य होना चाहिये, जिससे ये धंधा ख़त्म होने पर मुफ्तखोर धंधेबाज़ स्वतः ही कोई श्रम वाला रोजगार करेंगे और लोगों का पैसा भी बचेगा. (वे उसे पैसे अपनी आपातकालीन परिस्थितियों में प्रयोग कर सकते हैं अथवा अपने बच्चों को शिक्षित करने में खर्च कर सकते हैं). क्योंकि जब महामारियां आती है तब ये सारे स्थान बंद होते हैं और अस्पतालें खुली रहती हैं.

लोग बीमार होने या संक्रमित होने पर इन स्थानों पर प्रार्थना करने नहीं जाते बल्कि अस्पतालों में जाते हैं और डॉक्टर को कंसल्ट करते हैं. अपनी मूर्खतापूर्ण आस्था को वे भूल जाते हैं, कट्टरतावाद और सांप्रदायिकता तो पता नहीं किस बिल में जाकर छिप जाती है. उस समय मरने वाला व्यक्ति ये नहीं देखता कि जिसका खून उसे चढ़ाया जा रहा है वह किसी अछूत का तो नहीं, जो दवा दी जा रही है वो हड्डियों से बनी हो या खून से, वह जैन होने पर भी बिना सवाल किये खा लेता है.

अर्थात, स्वयं सिद्ध तथ्य है कि जान का जोखिम होने पर या बड़ी मुसीबत आने पर न तो व्यक्ति को स्वयं का धर्म याद रहता है और न ही वो किसी दूसरे का धर्म पूछता है. लेकिन ठीक होने पर वो डॉक्टर या संबंधित लोगों का धन्यवाद करने के बजाय वो इन्हीं स्थानों में जाकर अपनी अंधी आस्था को धन्यवाद देता है. फिर उसकी सांप्रदायिकता, कट्टरतावाद, श्रेष्ठ गोत्र, श्रेष्ठ खून सब उसके पास फिर से लौट आते हैं.

मेरे ख्याल से भारतीयों का खून इस प्रकार बांट देना चाहिये, यथा – आवारा खून, खानदानी खून, शुद्ध खून, अशुद्ध खून, राष्ट्रवादी खून, देशद्रोही खून, राजपुताना खून, कायराना खून, आस्तिक का खून, नास्तिक का खून, हिन्दू का खून, मुस्लिम का खून, सिख का खून, ईसाई का खून, बौद्ध का खून, जैन का खून ताकि ये जाति और धर्म का अफीम चटाने वालों को सिर्फ उन्हीं के ग्रुप का खून दिया जा सके. (दूसरा ग्रुप उन्हें न दिया जाय भले ही वो मर जाय), तभी शायद लोग अंधी आस्था का त्याग कर मानव की मूलभूत सुविधाओं के लिये आवाज़ उठायेंगे.

ये धर्म की अफीम कैसे चटाई जाती है, इसका एक उदाहरण अच्छे से समझ लीजिये. यथा – गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा नूतन प्रकाशित ‘महाभारत’ अनुशासन पर्व के 82वें अध्याय में लिखा गया है कि ‘गाय के दूध, दही और घी में भी वह बात नहीं है, जो गाय के गोबर और मूत्र में है.’ ऐसे ही तो मूर्खों को गोबरभक्त बनाया जाता है जो दूध-घी जैसी शुद्ध चीज़ों को छोड़कर अशुद्ध (मल-मूत्र) का आस्वादन करते हैं और खुद को धन्य मानते हैं.

जब धन और बल एक साथ मिलकर सरकार बनाते हैं तो जनता का सिर्फ दोहन और शोषण होता है. धार्मिक उन्माद, अन्धविश्वास, अंधश्रद्धा, सामाजिक भेदभाव के अलावा मोदी केयर्स जैसे माध्यमों से जनता का दोहन और उच्च-निम्न, श्रेष्ठ-हीन इत्यादि जातिवाद और गौ रक्षा के नाम पर शोषण इत्यादि तो आपको बीते सात सालों में अनुभव हो ही चुका होगा और जिस गोबर भक्तों का दिमाग पिछले सात सालो में भी नहीं खुला है, वो आने वाले सालो में जरूर खुल जायेगा.

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]

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