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Home गेस्ट ब्लॉग

एक बुद्धिजीवी की आत्म-स्वीकारोक्ति

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 25, 2017
in गेस्ट ब्लॉग
1
3.3k
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प्रकृति पर किसी का वश नहीं चलता लेकिन उसे वश में करने के लिए हर हथकंडे अपनाये जाते हैं. उससे छेड़छाड़ हमेशा होती रहती है. इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ता है. लेकिन आदत तो आदत होती है और हम अपने आप से मजबूर होते हैं. छेड़छाड़ का नतीजा मौसमों पर पड़ता है. मौसम का असर हम पर पड़ता है.

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इधर मौसम का रूख बिगड़ा हुआ है. चारों ओर अंधेरे की छाया बढ़ती जा रही है. बीच-बीच में भूकम्प आती रहती है. बड़ी भूकम्प आने की भविष्यवाणी हो रही है. पर उससे मुझे क्या ? मैं तो कुंभकर्णीय निन्द्रा में मस्त रहता हूं. निन्द में प्रायः सपने आते रहते हैं. सपने में क्या-क्या आते हैं समझना बड़ा मुश्किल हो जाता है.

एक दिन मेरे सपने में भीड़ की शक्ल में कुछ लोग आये. वे मुझसे कहने लगे, ‘‘देखिये, हम चाहते हैं कि कोई हमारी भी जीवनी लिखें. इसके लिए हम आपको अपनी आत्मकथा सुना रहे हैं. इसे सुनने के बाद अगर आपको जीवनी लिखने लायक लगे तो आदमी खोज दीजियेगा.’’ इतना कहकर वे आगे बोलने लगे. उनकी भाषा में उनकी बातें हम यहां रख रहे हैं:

‘‘हम बुद्धिजीवी हैं. पहले हम बुद्धि की खाते थे, अब हम बुद्धि को खाते हैं. हम लोगों को ‘है’ से हमेशा दूर रखते हैं. उन्हें हम ‘था’, ‘थे’, ‘थी’ या ‘गा’, ‘गे’, ‘गी’ में जीना सीखाते हैं. इसके लिए हमें कई तरह की पारितोषिकें भी मिलते हैं या यूं कहें मिलती रहती है. हमें सबसे ज्यादा पारितोषिक लोगों का ध्यान असली बिन्दुओं से हटा कर भ्रम की स्थिति बनाये रखने के लिए मिलती है. जैसे रात में पेड़ के नीचे क्यों नहीं सोना चाहिए ? हम इसके असली जबाव रात में पेड़ भी आॅक्सीजन लेते हैं, को छोड़कर यह समझाने में लगे रहते हैं कि रात में पेड़ पर चिड़ियां रहती है. बीट कर देती है. सांप-बिच्छु गिर सकते हैं. पेड़ की डाली गिरते समय पता नहीं चल सकेगा आदि-आदि जैसे भ्रम फैलाने की कोशिश करते हैं. हम इसका ध्यान रखते हैं कि जबाव सच जैसा ही लगे, पर असल में यह ‘सच’ से कोसों दूर होती है.

‘‘सर्वमान्यरूप से हममें कई गुण होते हैं, जैसे-महात्वाकांक्षी होना, व्यक्तिवादी होना, दूसरों को नीचा दिखलाना, अपने को बड़ा दिखलाकर पेश करना आदि. हम किसी भी रूप से हो सकते हैं. साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार, नेता, अभिनेता में हमारी संख्या प्रचुर मात्रा में मिलेगी. हम सरकारी, गैर-सरकारी दोनों जगहों पर अपना वर्चस्व रखते हैं. हम ‘था’ को ‘ना’ या ‘ना’ को ‘था’ यानि जो है वह नहीं है, या जो नहीं है वह है, यह साबित करने में भी माहिर होते हैं. वैसे यह काम थाना का है, वह करता भी है, पर वह दिन-व-दिन महत्वहीन होता जा रहा है. अब हम इसे बखूबी निभा रहे हैं. हम दस बातें ‘साकारात्मक’ बोल सकते हैं तो दस बातें ‘नाकारात्मक’ भी बोल सकते हैं. लेकिन ‘नाकारात्मक’ बातों को ‘साकारात्मक’ रूप में पेश करने से सरकारें खुश होती है. उनकी नजर में हमारा मान-सम्मान भी बढ़ जाता है, जिसके अनेक फायदे मुझे मिलते हैं.

‘‘देखिये, हम सीसे के घर में रहने वाले लोग हैं. सरकार हमेशा हाथ में पत्थर लिये रहती है. अतः हमें सरकारों के साथ-साथ ही अपना चाल-चलन और चरित्र बदलना पड़ता है. गिरगिट की क्या मजाल जो रंग बदलने में हमसे आगे निकल जायें. वैसे भी हम बोलचाल में वामपंथी, अपनों के लिए गांधीवादी और दूसरों के लिए व्यवहारिक रूप से सामंती चरित्र के होते हैं. अब समय बदल गया है. अतः ‘व्यवहारिक रूप वाला’ ही हमारे लिए उपयोगी साबित हो रहा है.

‘‘किसी ने कहा है, बुद्धिजीवियों को शोषण करने का तरीका भी बुद्धिजीवी होता है. अब बताईये भला ऐसी भी कोई बात करता है. हम तो हमेशा ही शोषण, दमन, अत्याचार के खिलाफ ही सेमिनार-सम्मेलन-गोष्ठी-मीटिंग आदि करने में व्यस्त रहते हैं. इसके लिए हमें सरकार से भी भरपूर सहायता मिलती है. अतः हर सुख-सुविधा से लैस हमारा कार्यक्रम होता है. हमारे नजर में हर वह कार्यक्रम महान होता है, जिसमें हमें मुख्य वक्ता या मुख्य अतिथि बनाया जाता है. भला वह कार्यक्रम कैसे महान हो सकता है, जिसमें हमारी पूछ न हो ?

‘‘ सेमिनार-सम्मेलन-गोष्ठी-मीटिंग का अपना महत्व होता है. इसके द्वारा हमें सरकार के प्रति वफादारी दिखलाने का एक शानदार मौका मिल जाता है. इससे हमें इस बात का भी पता लगते रहता है कि हमारी कौन-सी बातों का महत्व अब नहीं रहा. उसकी जगह अब कौन-सी नयी राग अपनाने की जरूरत है. इसका हमें हमेशा ध्यान रखना पड़ता है अथवा सरकार के नजर में खुद के निरर्थक हो जाने का डर बना रहता है.

‘‘भाई, हम ठहरे बुद्धिजीवी. अब पानी में रहकर मगर से वैर से नहीं ले सकते न ? इसलिए तब हमें बहुत दुःख महसूस होता है, जब हमारे किसी वक्तव्य पर जनता वाह ! वाह ! कर उठती है क्योंकि तब सरकार के नाराज हो जाने की गारंटी बनी रहती है. वैसे पानी में मछलियां भी होती है. उनसे क्या डरना ? वह तो मगर के साथ-साथ हमारे भी भोजन के काम में आती रहती है.

‘‘आप हमारे ही एक दोस्त की वह कहानी तो सुने ही होंगे जिसमें नदी पार करने के लिए एक तैराक द्वारा बहती धारा में नदी के दोनों किनारों के बीच कई जगहों पर पानी नपवाता है और उसका औसत निकाल कर नदी पार करने की कोशिश में डूब जाता है. लेकिन हम तो लोगों को औसत में ही जीना सीखाते हैं. यह बात अलग है कि औसत के चक्कर में किनारे के लोग हमेशा डूबते रहते हैं और हम सरकारी नाव में बैठकर बीच नदी में मगरमच्छों के साथ अठखेलियां मनाते हैं.

‘‘अब आप यह न कहियेगा कि कुछ लोग इससे अलग करते हैं. जीते हैं, रहते हैं. अरे भाई, पारा को भी लोग धातु ही कहते हैं लेकिन क्या वह ठोस होता है ? उससे मारने से टन-टन की आवाज निकलती है ? कोई ठोस आकार होता है ? नहीं न् ! फिर भी वह धातु कहलाता है कि नहीं ! हां, हमारे बीच के ही कुछ लोग हमारे साथ गद्दारी कर रहे हैं. वे लोगों को बहकाने में लगे हुए हैं, हमारी सुनते ही नहीं हैं. वह ‘राष्ट्रभक्त’ बनने के बजाय ‘राष्ट्रद्रोह’ कर रहे हैं. हम उन्हें भी सबक सीखा कर अपनी ओर लाने के प्रयास में लगे हुए हैं. पर वे अपवाद में ही रहना पसंद करते हैं.

“अब आप बतायें ये भला अपवाद भी कभी बहुमत की पहचान बनती है ? अब आप कहियेगा कि कभी-कभी उल्टा भी होता है. अपवाद की सार्थकता महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि उनके साथ लोग होते हैं. वे हमारे साथ लोकतंत्र, गणतंत्र, प्रजातंत्र की नाकाबिले सरकार नहीं होती. अब आप कहियेगा कि सरकार लोगों से मजबूत नहीं होती. अतः अपवाद वाले अपना इतिहास बना लेते हैं और हम इतिहास बनकर रह जाते हैं. बनते हैं तो बने. बला से ! हम उनके जैसे नहीं हैं. हम बुद्धिजीवी हैं.’’ इतना कहकर सब जोर-जोर से हल्ला करने लगे और मेरी निन्द टुट गयी. सामने कोई नजर नहीं आ रहा था. लेकिन उसके द्वारा कही बातें याद रह गयी थी.

मैं उस पर लगातार सोचता चला जा रहा था कि यह हकीकत था या सपना ? या सपने में हकीकत ? मैं उधेड़बुन में पड़ा हुआ था. कुछ समझ में नहीं आ रहा है. कृपया क्या आप इसे समझने में मेरी मदद कर सकते हैं ? साथ ही साथ इनकी जीवनी लिखने की आपकी इच्छा हो तो मुझे जरूर बताये.

By Suman,
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Comments 1

  1. cours de theatre paris says:
    9 years ago

    Thank you for your article.Thanks Again. Great.

    Reply

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