Wednesday, July 29, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

लोकतंत्र के अंतिम किले का पतन: भाजपा की ढाल बना चुनाव आयोग

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 27, 2025
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
लोकतंत्र के अंतिम किले का पतन: भाजपा की ढाल बना चुनाव आयोग
लोकतंत्र के अंतिम किले का पतन: भाजपा की ढाल बना चुनाव आयोग
Anand Teltumble आनंद तेलतुंबड़े

हक़ीक़त बेहद डरावनी है जिसका हम सामना कर रहे हैं. चुनाव आयोग वही आख़िरी संस्था है जिस पर जनता का भरोसा टिका होता है, क्योंकि वही चुनाव के नतीजे घोषित करता है. लेकिन अगर चुनाव आयोग जनता के असली जनादेश को ताक़ पर रखकर सत्ता की मर्जी से नतीजे सुनाने लगे, तो फिर भाजपा को सामान्य हालात में सत्ता से हटाना नामुमकिन हो जाएगा.

2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी मामूली अंतर से सत्ता से बाहर हुए थे. लेकिन उसके बाद हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में हैरतअंगेज़ नतीजे आए. असल में, लोकसभा चुनाव के दौरान ही कई जगह गड़बड़ी और धांधली के साफ़-साफ़ संकेत दिखने लगे थे. इसी धांधली के लिए ज़मीन तैयार की गई थी मार्च 2023 में, जब मोदी सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) कानून, 2023 बनाया.

You might also like

विश्व सर्वहारा क्रांति के दो नये गद्दार : विश्व विजय और सीमा

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

इस कानून ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई निष्पक्ष चयन प्रक्रिया को ख़त्म कर दिया. पहले चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की चयन समिति करती थी. लेकिन मोदी सरकार ने इस समिति से मुख्य न्यायाधीश को बाहर कर दिया और उनकी जगह प्रधानमंत्री का चुना हुआ मंत्री बिठा दिया. मतलब साफ़ है—अब चुनाव आयोग की बागडोर पूरी तरह सरकार के हाथ में थमा दी गई. यह कानून 2 जनवरी 2024 से लागू हुआ और इसके बाद चुनाव आयोग पूरी तरह सत्ता का औज़ार बनता नज़र आया और आगे होने वाले चुनावों में चिंताजनक घटनाओं के लिए मंच तैयार कर दिया.

अरुण गोयल की नियुक्ति और सुप्रीम कोर्ट के दख़ल देने की नौबत इसका सबसे बड़ा सबूत थी. 1985 बैच के आईएएस गोयल ने 18 नवंबर 2022 को अचानक रिटायरमेंट लिया और अगले ही दिन चुनाव आयुक्त बना दिए गए. इतनी तेज़ और गोपनीय नियुक्ति पर जनता के बीच सवाल उठे—क्या सब पहले से ही तय था? पारदर्शिता नाम की चीज़ तो थी ही नहीं.

और तो और, उनका कार्यकाल भी कम अजीब नहीं रहा: मार्च 2024 में, लोकसभा चुनाव से ठीक पहले, गोयल ने बिना कोई ठोस वजह बताए इस्तीफ़ा दे दिया. उसके बाद उन्हें साइप्रस में भारत का राजदूत बना दिया गया. यह साफ है कि चुनाव आयुक्त का पद अब सौदेबाजी का अड्डा बन गया है, जहां वफादारी का इनाम मिलता है और संस्था की स्वतंत्रता खत्म हो चुकी है.

इन घटनाओं की पूरी कड़ी यही दिखाती है कि मोदी सरकार योजनाबद्ध तरीक़े से हमारे लोकतंत्र की संस्थाओं को कमजोर कर रही है. कभी निष्पक्षता की मिसाल और जनता के भरोसे की पहचान रहा चुनाव आयोग अब सरकार की कठपुतली बन चुका है

अरुण गोयल का मामला एक चेतावनी है कि सत्ता किस तरह संवैधानिक पदों को अपनी पार्टी के फ़ायदे के लिए इस्तेमाल कर रही है. चुनाव आयोग अब न तो आज़ाद संस्था रहा और न जनता का पहरेदार, बल्कि सत्ताधारी दल का हथियार बन चुका है. यह जनता के जनादेश पर सीधा हमला है और लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रहा है.

2024 के लोकसभा चुनावों के बाद कांग्रेस ने बार-बार धांधली पर सवाल उठाए और ऐसे पैटर्न दिखाए जो सामान्य नहीं थे. कई सीटों पर वोटर लिस्ट से असली वोटरों के नाम ग़ायब कर दिए गए, जबकि फर्ज़ी नाम बाक़ी रहे. और फिर वही हुआ—कई सीटों पर भाजपा की जीत बेहद मामूली और एक जैसी अंतर से हुई, जबकि वहां कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक के मज़बूत होने की उम्मीद थी.

राहुल गांधी और विपक्ष ने बार-बार कहा कि चुनाव आयोग ने अपनी तटस्थता छोड़ दी है. शिकायतों पर कोई जांच नहीं हुई, सबको रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया. यहां तक कि वीवीपैट पर्चियों की गिनती बढ़ाने से भी साफ़ इनकार कर दिया गया. यह सब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों पर जनता के भरोसे को और कमज़ोर करता है.

2024 लोकसभा चुनावों के बाद

अक्टूबर 2024 में हरियाणा विधानसभा चुनावों पर गड़बड़ियों के गंभीर संदेहों से घिरे रहे. साफ़ दिख रही जनता की नाराज़गी और ग्रामीण इलाक़ों में असंतोष के बावजूद भाजपा उम्मीद से कहीं बेहतर प्रदर्शन करती नज़र आई. ये नतीजे विपक्ष और स्वतंत्र पर्यवेक्षकों की ज़मीनी हक़ीक़त से मेल नहीं खाते थे.

वोटर लिस्ट में हेराफ़ेरी, पोस्टल बैलेट में संदिग्ध रुझान, और कई सीटों पर असामान्य तौर पर बढ़े हुए जीत के अंतर ने चुनाव की निष्पक्षता पर गहरे सवाल खड़े किए. ऊपर से चुनाव आयोग का अपारदर्शी रवैया—चुनाव क्षेत्रवार विवरण जारी करने में देरी और विपक्षी शिकायतों की अनदेखी—ने शक़ को और गहरा कर दिया.

इन सब वजहों से जनता का अविश्वास और गहरा हो गया और यह धारणा मज़बूत हुई कि पूरा चुनावी तंत्र सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में झुक चुका है, जिससे हरियाणा के जनादेश की वैधता पर भरोसा टूट गया.

अगर हरियाणा ने चिंताजनक सवाल खड़े किए, तो उसके तुरंत बाद हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों ने शायद हाल के वर्षों का सबसे चौंकाने वाला राजनीतिक उलटफेर दिखाया. महज़ पाँच महीने पहले 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को राज्य में शर्मनाक झटका लगा था, जहाँ उसे 48 में से सिर्फ 17 सीटें मिली थीं जबकि इंडिया गठबंधन ने जीत दर्ज की थी. लेकिन विधानसभा चुनावों में, नतीजे एकदम उलट थे.

भाजपा-शिवसेना (शिंदे) गठबंधन ने अप्रत्याशित रूप से शानदार प्रदर्शन किया, जिसने न सिर्फ़ लोकसभा चुनाव नतीजों बल्कि चुनाव-पूर्व सभी अनुमानों को धता बता दिया. और हैरत की बात यह रही कि पूरे प्रचार अभियान के दौरान देवेंद्र फडणवीस बेहद आत्मविश्वास से भरे रहे. लोकसभा नतीजों में जनता का ग़ुस्सा साफ़ नज़र आने के बावजूद वे बार-बार कहते रहे कि भाजपा आसानी से सत्ता में लौटेगी—जैसे उन्हें पहले से ही नतीजों का पता हो. जब नतीजे आए, तो उन्होंने सिर्फ़ महाराष्ट्र के राजनीतिक विश्लेषकों ही नहीं बल्कि पूरे मुल्क को चौंका दिया और चुनाव प्रक्रिया की ईमानदारी पर नए शक़ खड़े कर दिए.

कुछ ही महीनों के भीतर आए ये विरोधाभासी नतीजे इतने साफ़ थे कि इन्हें मतदाताओं की ‘पसंद में सामान्य बदलाव’ कहकर खारिज नहीं किया जा सकता था. लोकसभा चुनाव में जनता ने भाजपा को ठुकरा दिया था, लेकिन विधानसभा चुनाव में वही मतदाता अचानक उसके पक्ष में नज़र आए. यह नाटकीय पलटाव तर्क से परे था और चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा और डगमगा गया.

इस विरोधाभास ने चुनावी धांधली की चर्चाओं को और हवा दी. विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की अपनी संवैधानिक ज़िम्मेदारी निभाने में नाकाम रहा है. बहुतों के लिए महाराष्ट्र इस बात का उदाहरण बन गया कि भाजपा, जो कभी चुनावी हार के कगार पर खड़ी थी, अब चुनावी तंत्र पर पकड़ मज़बूत कर सत्ता में टिके रहने का रास्ता खोज चुकी है.

चुनाव आयोग का शर्मनाक बर्ताव

महाराष्ट्र विधानसभा इलेक्शन में बड़े पैमाने पर धांधली का शक और गहरा हो गया जब ये बात सामने आई कि वोटर लिस्ट में अचानक नामों की तादाद असामान्य तौर पर बढ़ गई. सबसे हैरतअंगेज़ बात ये रही कि शाम 6 बजे वोटिंग ख़त्म होने के बाद अचानक वोटिंग परसेंटेज़ में उछाल दर्ज हुआ. चुनाव विशेषज्ञों ने साफ़ कहा कि इतने कम वक़्त में इतनी बड़ी तादाद में वोट पड़ ही नहीं सकते. इससे गड़बड़ी की आशंका और मज़बूत हो गई.

कांग्रेस ने इसकी जांच और पारदर्शिता के लिए उन पोलिंग बूथों की वीडियो रिकॉर्डिंग मांगी जहाँ देर तक वोटिंग चली थी. लेकिन चीफ़ इलेक्शन कमिश्नर राजीव कुमार ने फुटेज देने से साफ़ इनकार कर दिया. प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कांग्रेस की मांग का मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि सारी वीडियो देखने में “3600 साल” लग जाएंगे.

ये बेहूदा जवाब, जो हूबहू भाजपा की ज़ुबान जैसा था, न सिर्फ़ विपक्ष की चिंता का मज़ाक उड़ाता है बल्कि ये भी दिखाता है कि चुनाव आयोग अब अपनी संवैधानिक भूमिका छोड़कर सता का औज़ार बन चुका है.

इसी तरह के शक कर्नाटक लोकसभा इलेक्शन में भी उठे. बेंगलुरु सेंट्रल सीट पर कांग्रेस का कैंडिडेट शुरू में साफ़ बढ़त पर था, लेकिन महादेवपुरा इलाके में वोटिंग के आंकड़ों में अचानक उछाल के बाद रिज़ल्ट भाजपा के हक़ में चला गया. कांग्रेस ने यहाँ भी डिजिटल वोटर लिस्ट की मांग की, मगर आयोग ने सिर्फ़ काग़ज़ी सूची दी, जिसे बड़े पैमाने पर चेक करना नामुमकिन था.

राहुल गांधी ने खुद इस मामले में दिलचस्पी ली और अपनी टीम से छह महीने तक जांच करवाई. नतीजे चौंकाने वाले थे. कुल 1,00,250 संदिग्ध प्रविष्टियों में से 11,965 डुप्लिकेट वोटर पाए गए जो कई बूथों में पंजीकृत थे और कभी-कभी तो अलग-अलग राज्यों में भी. इसके अलावा 40,009 वोटरों के पास फर्जी या गलत पते मिले जिनमें शून्य जैसे घर के नंबर या फिर पूरी तरह निरर्थक पते थे. वहीं 10,452 थोक पंजीकरण के मामले सामने आए जहाँ दर्जनों वोटरों को एक कमरे के घरों में दिखाया गया था या फिर व्यापारिक जगहों पर दिखाया गया था. एक शराब की फैक्ट्री में तो 68 वोटरों का पता दर्ज था. इसके साथ ही 4,132 वोटरों की फोटो या तो गलत थी या पहचान में नहीं आ रही थी. सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि 33,692 मामलों में फॉर्म 6 का दुरुपयोग हुआ था जिसमें नब्बे साल से ऊपर के बुजुर्गों तक का अविश्वसनीय पंजीकरण शामिल था.

कुछ उदाहरण इतने बेतुके थे कि यक़ीन करना मुश्किल था, लेकिन रिकॉर्ड पर मौजूद थे. आखिरकार भाजपा ने बेंगलुरु सेंट्रल सीट 32,707 वोटों से जीती. इस जीत में सिर्फ़ महादेवपुरा इलाके के 1,14,046 वोटों का भारी फ़र्क़ निर्णायक साबित हुआ. दिलचस्प ये कि बाकी छह हिस्सों में कांग्रेस उम्मीदवार आगे थे. महादेवपुरा बस एक मिसाल थी—कई और जगहों पर भी ऐसे ही शक थे. बावजूद इसके जब कांग्रेस ने दोबारा डिजिटल वोटर लिस्ट मांगी ताकि ठीक से जांच हो सके, आयोग ने साफ़ इनकार कर दिया.

अगर राजीव कुमार का रवैया संदिग्ध था, तो उनके बाद आए ग्यानेश कुमार—जो मोदी सरकार के नए विवादित क़ानून के तहत पहले मुख्य चुनाव आयुक्त बने—उन्होंने तो पक्षपात को और खुलकर दिखा दिया. 19 फ़रवरी 2025 को विपक्षी पार्टियों का डेलीगेशन उनसे मिलने गया, मगर उन्होंने घंटों इंतज़ार कराया और पूरी टीम से मिलने की जगह सिर्फ़ हर पार्टी के एक प्रतिनिधि को बुलाया. मीटिंग तल्ख़ी में बदल गई और नेताओं को बाहर आकर मीडिया के सामने बोलना पड़ा. उनका ये अहंकारी और तिरस्कार भरा बर्ताव हर तरफ़ से शर्मनाक माना गया और एक संवैधानिक संस्था की साख और भी गिर गई.

मुख्य चुनाव आयुक्त के गुमराह करने वाले जवाब

राहुल गांधी के इल्ज़ाम को झुठलाने के लिए जो प्रेस कॉन्फ़्रेंस मुख्य चुनाव आयुक्त ने बुलाई, उसी ने उल्टा आयोग की कमज़ोरियों को बेनक़ाब कर दिया. उनकी सफ़ाईयाँ न भरोसे के लायक़ थीं, न ही तकनीकी तौर पर मज़बूत. कोई भी समझदार आदमी – ख़ासकर जो डेटा सिस्टम्स जानता हो – उन्हें मानने से इंकार करेगा.

चुनाव आयोग की असल ज़िम्मेदारी है वोटर लिस्ट की पूरी तरह जांच करना और व्यवस्थित तरीक़े से डुप्लीकेशन रोकना. आज के कंप्यूटर के ज़माने में नाम, पता, उम्र या आधार लिंकिंग जैसे पैमानों से डुप्लीकेट एंट्रीज़ को हटाना कोई मुश्किल काम नहीं. इसके बावजूद अगर वोटर लिस्ट में डुप्लीकेट नाम और अजीबो-ग़रीब रिकॉर्ड बने रहते हैं, तो इसका साफ़ मतलब है: या तो आयोग ऐसे टूल्स का इस्तेमाल ही नहीं करता – जो ड्यूटी से सीधी लापरवाही है – या फिर जानबूझकर चुनिंदा तरीक़े से करता है और गड़बड़ियों को जारी रहने देता है. यह सीधे-सीधे उसकी राजनीतिक तरफ़दारी को उजागर करता है.

दोनों ही सूरतों में आयोग का रवैया बचाव के क़ाबिल नहीं. अपनी नाकामियों को मानने की बजाय, मुख्य चुनाव आयुक्त ने उन्हें “सामान्य” बताने की कोशिश की और जनता को गुमराह किया कि वोटर लिस्ट बिलकुल सही है, जबकि असलियत में उसमें पहले ही छेड़छाड़ हो चुकी है.

वीडियो फ़ुटेज का मामला भी बिल्कुल साफ़ है. सरकार का वो नियम जिसमें 45 दिन बाद बूथ रिकॉर्डिंग मिटाने का आदेश है, असल में सबूत ख़त्म करने की सोची-समझी साज़िश है. आज के बिग डेटा के ज़माने में ऐसे रिकॉर्ड्स को संभाल कर रखना न तो मुश्किल है और न महंगा. अगर आयोग अपनी संवैधानिक ज़िम्मेदारी समझता, तो कम से कम इन रिकॉर्ड्स को अगले चुनाव नतीजों तक सुरक्षित रखने की मांग करता.

ये ना करके, आयोग ने न सिर्फ़ पारदर्शिता को कमज़ोर किया बल्कि सीधे सरकार के राजनीतिक हितों से खुद को जोड़ लिया. जबकि हकीकत यह है कि संवैधानिक संस्थाओं को सरकार पर नियंत्रण रखना चाहिए, न कि इसका उल्टा. जो व्यक्ति इस बुनियादी सिद्धांत को नहीं समझता, उसे ऐसे अहम ओहदे पर बने रहने का कोई हक़ नहीं.

इसी तरह ये दलील भी बिल्कुल बेबुनियाद है कि वोटर लिस्ट की ग़लतियाँ मायने नहीं रखतीं क्योंकि बूथ लेवल चेकिंग से धांधली रोकी जा सकती है. यह दलील न सिर्फ़ ग़लत बल्कि ख़तरनाक भी है. बूथ लेवल इंतज़ामात काग़ज़ पर चाहे मज़बूत नज़र आएं, हक़ीक़त में वही सबसे कमज़ोर साबित होते हैं – ख़ासकर वहाँ जहाँ सत्ताधारी पार्टी को असली चुनौती मिलती है.

वोटर लिस्ट में फर्जी और डुप्लिकेट नाम एक ऐसा जखीरा बनाते हैं, जिसे अधिकारी वोटिंग के दिन इस्तेमाल करते हैं. पीठासीन अफ़सर और रिटर्निंग अफ़सर की मिलीभगत से इन फर्ज़ी पहचान के नाम पर वोट डलवाना आसान हो जाता है. जब वही सिस्टम, जो चुनाव की हिफ़ाज़त का दावा करता है, खुद हेराफेरी का औज़ार बन जाए तो ये लोकतंत्र में जनता के भरोसे की बुनियाद को हिला देता है.

भाजपा के एजेंट की तरह काम करता हुआ चुनाव आयोग

भाजपा के एजेंट की तरह चुनाव आयोग की पक्षपाती भूमिका इस समय बिहार में चल रहे विवादित स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR) के ज़रिये सबसे साफ़ नज़र आती है. विपक्षी पार्टियों को भरोसे में लेने के बजाय आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में उनके ख़िलाफ़ पूरी ताक़त से लड़ाई छेड़ दी है और इस गड़बड़ियों से भरी कवायद का बचाव कर रहा है.

अभी तक, वोटर लिस्ट से लगभग 65 लाख नाम पहले ही काटे जा चुके हैं, और यह अंदेशा है कि यह तादाद एक करोड़ तक पहुंच सकती है. जिन लोगों के नाम काटे गए हैं, उनमें ज़्यादातर ग़रीब और मज़दूर तबक़े के लोग हैं. इनका नाम वोटर लिस्ट से ग़ायब होना सिर्फ़ वोट डालने के हक़ से वंचित होना नहीं है, बल्कि राशन कार्ड और बाक़ी अधिकारों का भी छीन जाना है जो नागरिकता के रिकॉर्ड से जुड़े होते हैं.

आख़िर चुनाव आयोग इतना ख़तरनाक और जनविरोधी क़दम क्यों उठाएगा? इसका कोई तर्कसंगत कारण नहीं दिखता, सिवाय इसके कि वह भाजपा की राजनीतिक रणनीति को अंजाम दे रहा है. 2024 लोकसभा चुनावों में करारी हार के बाद भाजपा अब चुनावी शिकस्त के ख़तरे से खुद को बचाने पर आमादा लगती है. उसने चुनाव आयोग को अपने क़ब्ज़े में ले लिया है, ताकि जनता चाहे जैसे भी वोट डाले, नतीजा हमेशा उसी के हक़ में जाए.

यही वह सबसे डरावनी हकीकत है जिसका हम सामना कर रहे हैं: चुनाव नतीजे घोषित करने का अंतिम अधिकार चुनाव आयोग के पास है. अगर वह जनता के फ़ैसले को रद्दी की टोकरी में डालकर भाजपा के पक्ष में नतीजे देने लगे तो सामान्य तरीक़े से भाजपा को सत्ता से हटाना नामुमकिन हो जाएगा. फिर ऐसी हालात में जनता के पास क्या रास्ता बचेगा? शायद वक़्त आ गया है कि भारतीय लोकतंत्र के लिए विदाई गीत गाना पड़े.

  • अनुवाद: मनमोहन, The Wire, 22 August,2025 से

Read Also –

चुनाव आयोग पर उठते सवाल क्या माओवादियों को सही साबित कर रहा है ?
मैच फिक्स्ड चुनाव किसी भी लोकतंत्र के लिए जहर हैं – राहुल गांधी
फ़ासिस्ट भाजपा से संवैधानिक (चुनावी) तरीके से नहीं जीत सकते हैं !

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लॉग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate

Previous Post

चुनाव आयोग पर उठते सवाल क्या माओवादियों को सही साबित कर रहा है ?

Next Post

विपक्ष के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार, न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) बी सुदर्शन रेड्डी के साथ पत्रकार का साक्षात्कार

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

विश्व सर्वहारा क्रांति के दो नये गद्दार : विश्व विजय और सीमा

by ROHIT SHARMA
July 27, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

by ROHIT SHARMA
July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
Next Post

विपक्ष के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार, न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) बी सुदर्शन रेड्डी के साथ पत्रकार का साक्षात्कार

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

यूक्रेन में हथियारों के प्रदर्शन से अमेरिकी साम्राज्यवाद की बांछें खिली

March 14, 2022

27 सितम्बर, 1907 जन्मदिन के अवसर पर : कहां हो भगत सिंह ?

September 27, 2021

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

गेस्ट ब्लॉग

विश्व सर्वहारा क्रांति के दो नये गद्दार : विश्व विजय और सीमा

July 27, 2026
Uncategorized

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
Uncategorized

‘ऑपरेशन कगार के खिलाफ और भारत में जनयुद्ध के समर्थन में लामबंदी जारी रखें’ – ICSPWI इटली

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

July 12, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

विश्व सर्वहारा क्रांति के दो नये गद्दार : विश्व विजय और सीमा

July 27, 2026

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.