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भाजपा के टपोरी तंत्र, टपोरी भाषा और टपोरी कल्चर में विकसित होता फासिस्ट कल्चर और हिन्दी भाषा

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 20, 2023
in गेस्ट ब्लॉग
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भाजपा के टपोरी तंत्र, टपोरी भाषा और टपोरी कल्चर में विकसित होता फासिस्ट कल्चर और हिन्दी भाषा
भाजपा के टपोरी तंत्र, टपोरी भाषा और टपोरी कल्चर में विकसित होता फासिस्ट कल्चर और हिन्दी भाषा
जगदीश्वर चतुर्वेदी

भारत में इस समय दो महानतम थिंकर हैं नरेन्द्र मोदी और अमित शाह, बाकी सब भोंदू थिंकर हैं. महात्मा बुद्ध मूर्ख थे, आम्बेडकर टाइपिस्ट थे, नेहरू पापी थे, गांधीजी फुल्ली फालतू थे और कम्युनिस्ट चोर ! 130 करोड़ की आबादी में दो महान थिंकरों का होना अपने आप में महान गर्व और गौरव की बात है ! अब आप हिन्दू गौरव खाएं, हिंदू गौरव पीएं, गौरव के नशे में सोएं !

भारत को पहली बार दो जीनियस मिले हैं मोदी और अमित शाह. इनके ज्ञान और विचारों से इन दिनों भारत का मीडिया गूंज रहा है. सारे देश में शिक्षा के पाठ्यक्रम बदल दिए जाने चाहिए. कक्षा एक से एमए तक मोदी गीता, मोदी विज्ञान, शाह नागरिकशास्त्र, शाह नीतिशास्त्र, बटुक साहित्य, बटुक संगीत, बटुक सिनेमा, बटुक पत्रकारिता, बटुक भाषाविज्ञान के अध्ययन-अध्यापन पर जोर दिया जाना चाहिए !

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आज भारत जिन दो जीनियस के रास्ते पर चल निकला है उससे एकदम पीछे हटने की जरूरत नहीं है ! दुनिया कुछ भी कहे,ये दोनों जीनियस हिन्दू संस्कृति को स्वर्गवासी बनाकर ही दम लेंगे. नरेन्द्र-अमित शाह बहुत ‘अच्छे’ लगते हैं, ठेठ संघी भाषा बोलते हैं, तू-तू-मैं-मैं से अंतर्वस्तु पैदा करते हैं, राजनीति का न्यूनतम इस्तेमाल नहीं करते, सिर्फ लोकल टपोरी भाषा में बोलते हैं !

यह बम्बईया फिल्मों की टपोरी भाषा है. इन दोनों का महान योगदान यह है कि इन्होंने टपोरी भाषा को फिल्मों से निकालकर राजनीति के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचाया है. आपने संजय दत्त की ‘वास्तव’ फिल्म यदि न देखी हो तो एक बार मेरे कहने से देख लें और मोदी-अमित की भाषा और मुहावरे को देख लें, लगेगा कि फिल्मी भाषा का इन दोनों पर कितना गहरा असर है.

आज मोदी-अमितशाह की भाषा को युवाओं में एक वर्ग गर्व से बोल रहा है. यह राजनीति का नया मोड़ है, जिसमें टपोरी तंत्र, टपोरी भाषा और टपोरी कल्चर में फासिस्ट कल्चर और हिन्दी भाषा को रूपान्तरित होते हुए सहज ही देख सकते हैं. भारत इन दिनों टपोरी लोकतंत्र में विचरण कर रहा है !

उल्लेखनीय है आजादी के बाद भारत में हजारों साम्प्रदायिक दंगे हुए हैं, इनमें से अधिकांश दंगों में बटुक संघ और उनके समानधर्मा संगठनों की विध्वंसक भूमिका रही है. सवाल यह है विगत 75 सालों में इन दंगों के कारण देश की कितनी आर्थिक और सामाजिक क्षति हुई है ?

अफसोस की बात यह है कि दंगाईयों को वोट देते समय हम कभी यह नहीं सोचते कि हम शैतानों को वोट दे रहे हैं. भाजपा विभिन्न मौकों पर दंगों में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर शामिल रही है. उसे वोट या समर्थन देने का मतलब है सामाजिक जीवन को अशांत और असुरक्षित करना, देश को कंगाल बनाना. मोदी को वोट देने के बाद भारत आज जितना आर्थिक तौर पर खोखला, असुरक्षित और अशांत है उतना पहले कभी नहीं था.

मोदी की मीडिया इमेज

एक अन्य पहलू है वह है मोदी की मीडिया इमेज. कुछ लोग हैं जो मोदी को नपुंसक कहते हैं. उसे नपुंसक कहना सही नहीं है. वह सामंती मर्दानगी का प्रतीक है ! इस इमेज में आंतरिक तौर पर ‘डेथ ड्राइव’ के लक्षण हैं. ये लक्षण उनकी भंगिमाओं और इमेजों में साफ़ देख सकते हैं. यह इमेज आक्रामक भावबोध से लबालब भरी है. संघ वालों को संदेह हो तो फ्रॉयड पढ़ लें समझ में आ जाएगा.

इस इमेज में मोदी हमेशा परेशान करने वाले शासक या बेचैन आत्मा के रुप में नज़र आएंगे. यह रुप उनकी हर मीटिंग में नज़र आता है. सवाल यह है लोकतंत्र के लिए चैन ज़रुरी है या बेचैनी ज़रुरी है ? मोदी का मर्द बेचैन मर्द है !

मोदी की पुंसवादी इमेज को फ्रॉयड के नज़रिए से देखेंगे तो यह अंत की ओर ले जाने वाली इमेज है. यह अ-कामुक इमेज है. ध्यान रहे पुंसवादी के अंदर ड्राइव नहीं होती. यह ऐसी इमेज है जिसको किसी भी इमेज में समायोजित किया जा सकता है. यही वजह है मोदी का विभिन्न रुपों में प्रचार अभियान के तौर पर प्रयोग हो रहा है.

चायवाले से लेकर मुख्यमंत्री तक, संघ के कार्यकर्ता से लेकर पीएम तक की इमेजों को मोदी की पुंसवादी इमेज में पिरो दिया गया है. भाजपा ने मोदी की जो पीआर इमेज पेश की है, उसमें संरक्षक के भाव को पेश किया जा रहा है और यह बात यदि कांग्रेसी नेता नहीं समझते तो वे भूल कर रहे हैं. मोदी की समूची मार्केटिंग मर्द नेता की मार्केटिंग है.

भाजपा के तरक्की चक्र और उसके कार्यकर्ताओं के राष्ट्रवादी धंधे

केरल में नोटबंदी के दौरान नकली नोट छापने की मशीन के साथ भाजपाई धरा गया. बंगाल में बच्चों की स्मगलिंग, कोकीन के साथ दो हीरोइन, मध्य प्रदेश में पाक के लिए जासूसी करते युवा संघी पकड़े गए. भाजपा के जो सबसे करीब पुलिस ऑफीसर था वो जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के साथ रंगे हाथों पकड़ा गया. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष लक्ष्मण घूसखोरी करते पकड़े गए. नोटबंदी में संघियों ने जमकर कमीशनखोरी की.

गुजरात के 2002 के दंगों में कई दर्जन भाजपा समर्थक और सदस्य दंगों में भाग लेने, हत्या करने, लूटपाट मचाने आदि के कारण सजा काट रहे हैं. अमित शाह को भी कुछ समय के लिए गुजरात जाने से प्रतिबंधित किया गया, अमेरिका में तत्कालीन मुख्यमंत्री के प्रवेश पर पाबंदी थी. यूपी में बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय भाजपा मुख्यमंत्री को अदालत का आदेश लागू न कर पाने के लिए दोषी पाया गया और एक दिन की सजा हुई. अमित शाह के बेटे ने कुछ ही समय में करोडों की आय की. अनाप-शनाप संपत्ति बढ़ाई. यह सूची बहुत लंबी है.

कांग्रेस बुर्जुआ है, सपा-बसपा अपराधी दल हैं, भाजपा क्रांतिकारी दल !

भाजपा-मोदी के क्रांति के बढ़ते कदम देखो- जैसे शौचालय क्रांति, गंगा क्रांति, नोटक्रांति, कालेधन के खिलाफ संघी क्रांति, आतंकियों के खिलाफ बटुक क्रांति, सेना के हकों के खिलाफ राष्ट्रवादी क्रांति, गरीबों के खिलाफ अदानी-अम्बानी क्रांति, मध्यवर्ग के खिलाफ कैशलेस मनी क्रांति, बेकारों के लिए रोजगारविहीन स्कील क्रांति, शिक्षा के खिलाफ शिक्षकों को साइज करने वाली साइज क्रांति.

युवाओं के लिए महा-मोदी क्रांति, इतनी क्रांतियों से समय बचे तो सुबह ही सुबह भगवा क्रांति, दिनभर बटुक मार्का साइबर क्रांति, जिस नेता ने एक साथ इतनी क्रांतियों को जन्म दिया उसके लिए ड्रेस क्रांति, विज्ञापन क्रांति ! इन सारी क्रांतियों की जननी है विज्ञापन क्रांति ! विज्ञापन क्रांति यानी हिन्दू क्रांति. विज्ञापन महान, हिन्दू महान !

संघियों ने हिंदी को घृणा की भाषा में बदल दिया

हिंदी का परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है. खडी बोली हिंदी अब साइबर जगत और राजनीतिक जगत के संप्रेषण में ‘पत्थर हिंदी’ में तब्दील हो गयी है. अब हम भाषा में नहीं बोलते बल्कि शब्दों के जरिए पत्थर मारते हैं. गालियां देते हैं. हिंदी अब शोहदों की भाषा बन गयी है. अब हिंदी को ‘घृणा’ और ‘युद्ध ‘ की भाषा में रूपान्तरित कर दिया गया है.

भाजपा संचालित साइबर सेल यह काम सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों के जरिए और टीवी पर उनके प्रवक्ता अपने बयानों के जरिए रोज कर रहे हैं. इसका आम जनता के भाषिक आचरण पर गहरा और व्यापक असर हो रहा है. भाषा को शोहदों की भाषा बनाना सबसे बडा अपराध है और हम सब चुपचाप इस भाषायी पतन को देख रहे हैं.

आश्चर्य की बात है भाषा के इस पतन पर हिंदी के प्रोफेसर-लेखक-हिन्दी सेवी चुप्पी लगाए बैठे हैं. इनमें एक बडा वर्ग ऐसे लोगों का है जो आरएसएस और भाजपा से किसी न किसी रूप में जुडे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रगतिशील और जनवादी लेखक संघ और उनसे जुडे लेखकों की इस मसले पर चुप्पी मुझे तकलीफ दे रही है.

मोदी के सत्ता में आने के पहले से भाषा को आक्रामक भाषा, घृणा की भाषा बनाने का काम शुरू हो चुका था. साइबर सेल के गठन के बाद से इसने व्यापक संगठित हमले और संगठित कम्युनिकेशन की शक्ल अख़्तियार कर ली है. हिंदी भाषी होने के नाते हम सबकी यह जिम्मेदारी बनती है कि हिंदी के इस पतन के खिलाफ हर स्तर पर लिखकर विरोध करें. आरएसएस और भाजपा जैसे संगठनों से दूर रहें, जिनके जरिए हिंदी को नष्ट करने के प्रयास हो रहे हैं.

घृणा की भाषा का साइड इफेक्ट्स

घृणा की भाषा का पहला साइड इफ़ेक्ट है कि आप भाषा विहीन हो जाते हैं, असभ्य भाषिक प्रयोगों का इस्तेमाल करने लगते हैं. असभ्यता और सामाजिक बर्बरता को वैध और नॉर्मल मानकर चलते हैं. इसका दूसरा असर यह होता है कि हर क्षण उन्माद और कुतर्क में जीते हैं. विवेकवाद और नीतिसंगत संवाद को एक सिरे से खारिज करने लगते हैं. अब भाषा का मतलब सोचना-विचारना नहीं बल्कि एक्शन मात्र होता है. तीसरा असर यह होता है कि आपको हमेशा किसी न किसी शत्रु की तलाश रहती है. शत्रु भाव, घृणा और शत्रुता ही इसका स्थायी भाव है.

घृणा की भाषा की शुरूआत शीतयुद्ध के दौरान सबसे पहले अमेरिकी संस्थानों ने की. खासकर, मार्क्सवादी-क्रांतिकारियों और साम्यवादी सरकारों के खिलाफ इसके मुहावरे और भाषिक रूपों को गढ़ा गया. जमीनी स्तर पर मैकार्थीवाद और यहूदी विस्तारवादी संगठनों ने इसका स्थानीय स्तर पर, स्थानीय राजनीति में अमेरिका, इस्रायल और मध्यपूर्व के देशों में इस्तेमाल किया गया.

बाद अमेरिका में 9/11की घटना के बाद सारी दुनिया में नई आक्रामक मुद्रा में ‘घृणा’ की भाषा का व्यापक पैमाने पर मीडिया तंत्र के जरिए प्रचार प्रसार किया गया. मुसलमान मुख्य शत्रु, मुसलमान आतंकवादी, मुसलमान बर्बर, इस्लाम बर्बर धर्म आदि के प्रौपेगैंडा के जरिए घृणा की भाषा को नए सिरे से सजाया-संवारा गया.

दिलचस्प बात यह है कि हमारे यहां घृणा की भाषा सरकारी जांच एजेंसियों के जरिए सबसे पहले दाखिल होती है. खासकर नक्सलवाडी आंदोलन, उग्रवाद, पंजाब में आतंकवाद आदि समस्याओं के जरिए घृणा की भाषा दाखिल होती है लेकिन यह भाषा मूलत: सरकारी काग़ज़ों, कानूनी बयानों आदि तक ही सीमित थी लेकिन पहली बार राममंदिर आंदोलन और 1984 के सिख नरसंहार और श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या की घटना के साथ यह सार्वजनिक वाद-विवाद और विमर्श की भाषा बन जाती है. राजनीतिक लामबंदी की भाषा बन जाती है.

इस समस्या को सबसे ज्यादा व्यापक शक्ल मिली है मोदी सरकार के आने के बाद भाजपा के साइबर सेल और संघ आदि संगठनों द्वारा संचालित वेबसाइट के जन्म के बाद. इसने संगठित ढंग से घृणा की भाषा का पूरा नया भाषिक तंत्र और मुहावरा ही पैदा कर दिया है. सवाल यह है क्या आप इस खतरे को महसूस करते हैं ? यदि हां तो फिर चुप क्यों हैं ?

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Comments 2

  1. Subroto Chatterjee says:
    3 years ago

    Sanctity of language is not the forte of the illiterate and the criminals. RSS and BJP are gang of criminals. Very good article

    Reply
  2. Subroto Chatterjee says:
    3 years ago

    Sanctity of language is not the forte of the illiterate and the criminals. RSS and BJP are gang of criminals. Very good article

    Reply

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