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कमजोर हो रही है लोकतंत्र की जड़ें

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 28, 2022
in ब्लॉग
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लोकतांत्रिक मूल्यों पर काम करने वाली संस्था इंटरनेशनल इंस्टिट्यूटन फॉर डेमोक्रेसी ऐंड इलेक्टोरल असिस्टेंस (IDEA) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत समेत दुनिया भर में ऐसे देशों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जहां लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हो रही हैं.

लोकतांत्रिक मूल्यों पर काम करने वाली संस्था आइडिया के मुताबिक ऐसे देशों की संख्या जिनमें लोकतांत्रिक मूल्य खतरे में हैं, इस वक्त जितनी अधिक है उतनी कभी नहीं रही. इसकी एक रिपोर्ट के मुताबिक लोक-लुभावन राजनीति, आलोचकों को चुप करवाने के लिए कोविड-19 महामारी का इस्तेमाल, अन्य देशों के अलोकतांत्रिक तौर-तरीकों को अपनाने का चलन और समाज को बांटने के लिए फर्जी सूचनाओं का प्रयोग जैसे कारकों के चलते लोकतंत्र खतरे में है.

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आइडिया ने 1975 से अब तक जमा किए गए आंकड़ों के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की है. रिपोर्ट कहती है, ‘पहले से कहीं ज्यादा देशों में अब लोकतंत्र अवसान पर है. ऐसे देशों की संख्या इतनी अधिक पहले कभी नहीं रही, जिनमें लोकतंत्र में गिरावट हो रही हो.’

अपनी रिपोर्ट में आइडिया ने सरकार और न्यायपालिका की आजादी एक अलावा मानवाधिकार व मीडिया की आजादी जैसे मूल्यों को भी ध्यान रखा है. 2021 में सबसे ज्यादा नाटकीय बदलाव अफगानिस्तान में देखा गया, जहां पश्चिमी सेनाओं के विदा होने से पहले ही तालिबान ने सत्ता पर कब्जा कर लिया. म्यांमार में 1 फरवरी 2020 को हुए तख्तापलट ने भी लोकतंत्र को ढहते देखा.

रिपोर्ट में ब्राजील, भारत और अमेरिका जैसे स्थापित लोकतंत्रों को लेकर भी चिंता जताई गई है. रिपोर्ट कहती है कि ब्राजील और अमेरिका में राष्ट्रपतियों ने ही देश के चुनावी नतीजों पर सवाल खड़े किए जबकि भारत में सरकार की नीतियों की आलोचना करने वालों को प्रताड़ित किया जा रहा है.

आइडिया की रिपोर्ट में हंगरी, पोलैंड, स्लोवेनिया और सर्बिया ऐसे यूरोपीय देश हैं जहां लोकतंत्र को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा है. तुर्की ने 2010 से 2020 के बीच लोकतांत्रिक मूल्यों में सबसे ज्यादा गिरावट देखी है. रिपोर्ट कहती है, ‘सच्चाई यह है कि 70 प्रतिशत आबादी ऐसे मुल्कों में रहती है जहां या तो लोकतंत्र है ही नहीं, या फिर नाटकीय रूप से घट रहा है.’

रिपोर्ट के मुताबिक कोविड-19 महामारी के दौरान शासकों और सरकारों का रवैया ज्यादा तानाशाह हुआ है. अध्ययन कहता है कि ऐसा कोई सबूत नहीं है कि तानाशाही शासकों ने महामारी से निपटने में दूसरी सरकारों से बेहतर काम किया हो. रिपोर्ट कहती है, ‘महामारी ने तो बेलारू, क्यूबा, म्यांमार, निकारागुआ और वेनेजुएला जैसे देशों में दमन को सही ठहराने के लिए और असहमति को चुप करवाने के लिए अतिरिक्त तौर-तरीके उपलब्ध करवा दिए.’

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