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सरकार पूछती है कि नुकसान क्या है तो किसान बिल में जो कांट्रैक्ट फार्मिंग है, वह यही तो है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 30, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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मैं किसान हूं
आसमान में धान बो रहा हूं
कुछ लोग कह रहे हैं
कि पगले !
आसमान में धान नहीं जमा करता

मैं कहता हूं पगले !
अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है
तो आसमान में धान भी जम सकता है
और अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा
या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा
या आसमान में धान जमेगा

– रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’

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सरकार पूछती है कि नुकसान क्या है तो किसान बिल में जो कांट्रैक्ट फार्मिंग है, वह यही तो है

पिछले नौ महीने से चल रहे किसान आन्दोलन के फलस्वरूप जैसे ही हिमाचल के सेब खरीदी में अडानी की भूमिका सामने आयी, अचानक किसान आंदोलन को लेकर सरकारी दमनचक्र की गति तेज हो गया. हरियाणा के करनाल में परसों शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे किसानों के सर फोड़कर जलियांवाला बाग वाली क्रूरता का प्रदर्शन किया गया. सरकार समझ गयी है कि इसे कुचलने में अधिक देर की तो अडानी-अम्बानी की कृषि क्षेत्र में बढ़ती हुई हिस्सेदारी की सच्चाई को दबाया नहीं जा सकेगा.

आपको याद होगा कि किसानों आंदोलन अपने पूरे जोर पर था और अडानी और अंबानी ग्रुप के उत्पादों का बहिष्कार करने का ऐलान हुआ था, तब अडानी ने बयान जारी किया था कि वह देश में किसानों से सीधे फसल नहीं खरीदता, हिमाचल में उसका यह झूठ पकड़ा गया.

हम सब जानते हैं कि मुकेश अंबानी और गौतम अडानी, दोनों की नजरें भारत के कृषि क्षेत्र पर हैं. 2006 में शुरु हुए रिलायंस फ्रेश के आज 620 से ज्यादा स्टोर्स हैं, जिनमें 200 मीट्रिक टन फलों और 300 मीट्रिक टन सब्जियों की रोजाना बिक्री होती है. कंपनी का खुद भी कहना है कि वह अपने 77% फल सीधे किसानों से खरीदती है. जियो प्‍लेटफॉर्म पर तो जियो कृषि जैसा एक ऐप तक मौजूद है.

अडानी पूरे देश मे खाद्यान्न भंडारण के लिए नयी तकनीक के गोदामों (सायलो) की पूरी श्रृंखला का निर्माण कर रहा है. हिमाचल की सेब खरीद की प्रक्रिया में तो उसकी कंपनी अडानी एग्री फ्रेश सीधे शामिल हैं, जहां उसने सेब खरीद के 10 साल पुराने रेट घोषित किये हैं. वहां के किसानों का कहना है कि अदानी के कम रेट घोषित करने से मार्केट के सेंटिमेंट्स पर असर पड़ा है और सेब के दाम तेजी से गिरे हैं.

शिमला पहुंचे किसान नेता राकेश टिकैत प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल उठा रहे हैं कि अदानी ने हिमाचल प्रदेश में सेब के रेट 16 रुपये प्रति किलो कम कर दिए. वर्ष 2011 में जो सेब का रेट था, आज भी वही है. क्या देश में महंगाई नहीं बढ़ी ? क्या पेट्रोल-डीजल, उर्वरकोें और कीटनाशकों की कीमतेें नहीं बढ़ीं ?

वह आगे कहते हैं कि जब सरकार पूछती है कि नुकसान क्या है तो किसान बिल में जो कांट्रैक्ट फार्मिंग है, वह यही तो है. किसान को कमजोर किया जा रहा है, ताकि वह अपनी जमीन बेचने को मजबूर हो जाए.’

यह हम सभी जानते हैं किसान से औसतन 50 रुपए में खरीदा गए सेब अदानी 3-4 महीने बाद 150 से 200 रुपए में बेचेगा. अगर प्रति किलो पर कोल्ड स्टोरेज का 20-25 रुपए किलो का खर्च भी मान ले तो कंपनी को दोगुना-तिगुना मुनाफा होगा. वह यदि 10- 12 रुपये दाम बढ़ा भी दे तो उसे नुकसान नहीं है.

गांव कनेक्शन में सेब के दामों से कृषि कानूनों का लिंक बताते हुए प्रोग्रेसिव ग्रोवर एसोसिशएन (PGA) इंडिया के प्रेसिडेंट लोकेंद्र सिंह बिष्ट कहते हैं, ‘सीधे तौर पर हमारे ऊपर कोई असर नहीं है लेकिन आप चौतरफा देंखेंगे तो असर समझ आएगा. अडानी ने 72 रुपए का रेट खोला है अगर वो 62 रुपए रखता तो हम क्या कर लेते. जब सिर्फ कॉरपोरेट होंगे तो मिनियम प्राइज नहीं होगा. संरक्षण की लागत नहीं हो होती तो वो मनमानी करेंगे ही.’

जाने माने कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा सेब के रेट घटाए जाने पर लिखते हैं, ’26 अगस्त से शुरू हुए सेब विपणन सीजन के लिए अदानी एग्री फ्रेश कंपनी ने सेब के खरीद मूल्य में औसतन 16 रुपये प्रति किलो की कटौती की है. यही कारण है कि किसान केंद्रीय कानूनों का विरोध कर रहे हैं. यही कारण है कि वे एमएसपी को कानूनी अधिकार बनाने की मांग करते हैं.’

साफ है कि जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा आम जनता को यह समझ में आने लगेगा कि कृषि कानूनों का विरोध करना क्यों जरूरी है !

ऐसे ही वक्त के लिए अवतार सिंह संधू ‘पाश’ लिखते हैं –

मैं पूछता हूं आसमान में उड़ते हुए सूरज से
क्या वक़्त इसी का नाम है
कि घटनाएं कुचलती हुई चली जाए
मस्त हाथी की तरह
एक समूचे मनुष्य की चेतना को ?
कि हर सवाल
केवल परिश्रम करते देह की गलती ही हो

क्यों सुना दिया जाता है हर बार
पुराना लतीफा
क्यों कहा जाता है हम जीते है

ज़रा सोचें –
कि हममे से कितनो का नाता है
ज़िन्दगी जैसी किसी चीज़ के साथ !
रब्ब की वह कैसी रहमत है
जो गेहू गोड़ते फटे हाथों पर
और मंडी के बीच के तख्तपोश पर फैले मांस के
उस पिलपिले ढेर पर
एक ही समय होती है ?

आखिर क्यों
बैलों की घंटियों
पानी निकालते इंज़नों के शोर में
घिरे हुए चेहरों पर जम गयी है
एक चीखती ख़ामोशी ?

कौन खा जाता है तलकर
टोके पर चारा लगा रहे
कुतरे हुए अरमानो वाले पट्ठे की मछलियों ?

क्यों गिड़गिडाता है
मेरे गांव का किसान
एक मामूली पुलिस वाले के सामने ?

क्यों कुचले जा रहे आदमी के चीखने को
हर बार कविता कह दिया जाता है ?
मैं पूछता हूं आसमान में उड़ते हुए सूरज से

  • गिरीश मालवीय

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