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भारत में ‘लिव इन’ भी स्त्रियों के प्रति अन्यायी और क्रूर व्यवस्था!

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 15, 2023
in गेस्ट ब्लॉग
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भारत में 'लिव इन' भी स्त्रियों के प्रति अन्यायी और क्रूर व्यवस्था!
भारत में ‘लिव इन’ भी स्त्रियों के प्रति अन्यायी और क्रूर व्यवस्था!
प्रियंका ओम

लिव इन रिश्ते में हत्याओं के बाद इन दिनों ‘लिव इन’ संबंध चर्चा में हैं, क़तई जायज़ चर्चा में अपनी हिस्सेदारी बांटते हुए ‘लिव इन’ रिश्ता है क्या ? यह जानना समझना बेहद ज़रूरी है.

‘लिव इन’ यूरोपिय देशों से आयातित स्त्री पुरुष संबंधित व्यबस्था है, हमारे अपने देश में पिछले दो दशक से तेज़ी से फलता-फूलता इतना विकसित हो गया है कि अब इसमें स्त्री-हिंसा ठीक उसी तरह घुलने मिलने लगा है जैसा कि अन्य भारतीय स्त्री-पुरुष संबंधों में. जबकि लिव-इन तमाम समाजिक, पारिवारिक और मानसिक बंधनों से मुक्त ऐसी व्यबस्था है, जब तक बनाव रहा, साथ रहे; तना-तनी होते ही अलग हो गये.

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किसी भी एक पार्टनर को कोई दूसरा पसंद आते ही साफ़-साफ़ कह अलग हो जाते हैं, साथ का किसी तरह का कोई दबाव नहीं, किसी ज़ोर ज़बरदस्ती की गुंजाइश भी नहीं. ‘लिव इन’ संबंध में मन मारने का कोई स्कोप नहीं होता, यह एक ऐसी कंफ़रटेबल व्यबस्था जिसमें युगल साथ रहकर भी बंधन मुक्त ही रहते है. ना भावनात्मक डिपेंडेंसी ना आर्थिक, यह संबंध एक अलिखित आज़ाद कॉंट्रैक्ट है, कभी भी कोई भी इससे बाहर निकल सकता है !

वैवाहिक संबंधों में असंतुष्टि, टूटन और बिखराव के बाद ‘लिव इन’ दबे पांव दाखिल हो अपने पैर पसार लिए, इसका सबसे अधिक लाभ स्त्री समाज को हुआ. समता की बात करते हुए हम स्त्रियों की प्राथमिकता आज भी शादी और बच्चा रहा है, सोशल हेरारकी से कभी मुक्त नहीं हुआ जबकि पुरुष समाज के लिए यह सब सेकेंडरी रहा है, इसका मुख्य कारण पुरुषों पर स्त्रियों की आर्थिक निर्भरता रही.

अब जबकि स्थिति बदल रही हैं, स्त्रियां आत्मनिर्भर हो रही हैं तब उनके लिए भी शादी सेकेंडरी बनता जा रहा है और कैरियर प्रथम. ऐसी स्त्रियां रिश्तों के जाल में नहीं उलझना चाहती, इनसे मुक्त वह अपने स्वतंत्र अस्तित्व को निखारना चाहती है. ‘लिव इन’ संबंध हज़ारों वर्षों से स्त्रियों पर कसे शादी, बच्चे, लोक लाज और वैधव्य जैसे बंधनों से मुक्ति का खुला आसमान जैसे हुआ !

आस पास नज़र दौड़ाकर देखने पर मिलेगा कि दफ़्तर से आकर स्त्रियां चूल्हा चौकी में घुसी हैं और टीवी के सामने सोफ़े पर पसरा आदमी टीवी के चैनल बदल रहा होता है. थकान उतारने वाली चाय भी ख़ुद बनाकर पीती है, वह भी रात के खाने की तैयारी करते हुए. सुबह दफ़्तर निकलते से पहले कितने काम निबटा जाती है.

दरअसल कामकाजी स्त्रियां घर और दफ़्तर के बीच कोल्हू के बैल की तरह पिसती है उस पर घर परिवार और समाज से मां बनने का दवाब, प्रेगनेंसी में भी कोई रियायत नहीं मिलती, इस दौरान हुए शारीरिक कष्टों का कहीं कोई व्योरा दर्ज नहीं होता उस पर स्त्रियों के काम को छोटा माना जाता है. काम से अधिक मां बनना ज़रूरी है, प्रमोशन से अधिक बच्चे की देखभाल ज़रूरी है, मैटरनिटी लीव के बाद दफ़्तर जॉइन तो लेती हैं स्त्रियां लेकिन सास/ नैनी या चाइल्ड केयर से पहला फ़ोन उसी को आता है, बच्चों के लिये पापा का नंबर सेकेंडरी ही होता है.

इस सबके बाद भी ऐसा नहीं कि उसकी सैलरी सिर्फ़ उसकी कमाई होती है. घर के ख़र्चों में हिस्सेदारी, प्रॉपर्टी में हिस्सेदारी कभी दबाव से तो कभी स्वाभिमान से. ‘लिव इन’ स्त्री-पुरुष संबंध का एक ऐसे वर्जन आया जहां बराबरी की सिर्फ़ बात नहीं हुई. असलता में बराबर रहें, खर्च हो या रसोई बराबर की भागीदारी होती है !

भारत ने यह पश्चिमी व्यवस्था अपना तो लिया लेकिन पश्चिमी मानसिकता नहीं अपना सके लिव इन में स्त्री को सम समझने की मानसिकता. जिस समाज में किसी तरह के इमोशनल अटैचमेंट से ख़ाली विवाह में भी अनकही मुक्ति होती है, वहां की व्यवस्था ‘लिव इन’ को हमने अपना तो लिया लेकिन अपने अन्दाज़ में, ठीक विवाह संबंध जैसा, ना पुरुष पितृसत्ता की लाठी छोड़ सके, न स्त्री दासता के घुटनों से उठ खड़ी हुई.

जान पहचान के एक लिव इन संबंध ठीक विवाह जैसा ही संबंध है, पुरुष सारे खर्चे उठाता है, यहां तक कि लड़की के पिता बीमार हुए तो इलाज का भी खर्च उठाया, लड़की किचन और बिस्तर संभालती है ठीक शादी के संबंध जैसा, बस कहीं दस्तख़त नहीं किये, लड़की मांग नहीं भरती, लड़का दोस्तों से उसे पार्टनर कहकर मिलवाता है, बच्चे का कोई प्लान नहीं; इस तरह के लिव इन का क्या औचित्य है मैं नहीं समझ पाती हूं गोकि अपनी तरबियतनुसार आस्था तो लिव इन में भी नहीं किंतु तब भी लिव इन को मैं स्त्री स्वतंत्रता का पक्षधर ज़रूर मानती हूं.

यदि कोई स्त्री बंधन निभाने में ख़ुद को अक्षम पाती है तो उसे भी स्वतंत्रता का पूरा हक़ है, यदि किसी स्त्री की प्राथमिकता उसका अपना कैरियर है तो इसका उसे पूरा हक़ है लेकिन तब भी मनुष्यगत ज़रूरतों के लिए सुभीत तो हैं ही !

लेकिन आधुनिकतावाद के नामे ‘लिव इन’ के असली स्वरूप को मोल्ड कर जिस रूप को अपनाया गया है, उसमें स्त्रियों के प्रति पुरुषों का वही हिंसात्मक रैवैया है, जैसा कि दूसरी संस्थाओं में रहा है. स्त्रियां पहले भी जलाई गई है, फांसी पर लटकाई गई है और ज़हर चटाई गई है तो कभी ख़ुद मौत को गले लगाया है. लिव इन में कुछ अलग या विशेष नहीं हो रहा बल्कि वहीं दुहराया जा रहा है जो सदियों से होता आया है – स्त्रियों के प्रति अन्यायी और क्रूर !!!

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