Friday, July 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

किसान आंदोलन : लड़ाई को दूसरे पायदान पर ले जाने की ज़रूरत

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 26, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

 

Subrato Chaterjiसुब्रतो चटर्जी

सवाल ये नहीं है कि क्यों किसानों का एक जत्था अपना आपा खो बैठा ? सवाल ये है कि कोई भी चुनी हुई सरकार कैसे किसी को गणतंत्र दिवस अपनी मर्ज़ी से मनाने से रोक सकती है ?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दिल्ली पुलिस की ज़िम्मेदारी थी कि वे किसानों के ट्रैक्टर पैरेड का रूट तय करे. ग़लती यहीं से शुरु होती है. दिल्ली या किसी भी पुलिस का काम क़ानून व्यवस्था को बनाए रखने का है, इससे ज़्यादा क्राईम अनुसंधान की ज़िम्मेदारी है और क्रिमिनल के धर पकड़ की.

You might also like

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

दरअसल, हम जब भी कोई सभा या प्रदर्शन करते हैं तो इसकी अनुमति या पूर्व सूचना स्थानीय कलेक्टर से लेते हैं या देते हैं, पुलिस कमीश्नर या एसपी को नहीं. ज़िलाधिकारी या एसडीओ परमिशन देने की क्षमता रखता है, पुलिस नहीं. हांं, पुलिस स्थानीय प्रशासन को धरना प्रदर्शन को शांतिपूर्ण रखने के लिए कुछ सुझाव दे सकती है, रूट इत्यादि के संबंध में. आख़िरी फ़ैसला ज़िलाधिकारी का होता है. सिविल गवर्नमेंट की कार्य प्रणाली यही होती है.

अब इस तथ्य के आलोक में सुप्रीम कोर्ट की राय को देखें. क्या सुप्रीम कोर्ट को नहीं मालूम कि दिल्ली एक लेफ़्टिनेंट गवर्नर के हाथों में है, जो कि सिविल प्रशासन का मुखिया है ? क्या सुप्रीम कोर्ट नहीं जानती कि दिल्ली पुलिस लेफ़्टिनेंट गवर्नर के अधीन काम करती है ? अगर हांं, तो किसान रैली को दिल्ली में प्रदर्शन की परमिशन सिर्फ़ दिल्ली पुलिस के हाथों कैसे सकती है ?

दरअसल, दिल्ली पुलिस सीधे तो नहीं लेकिन परोक्ष रूप से गृह मंत्रालय के अधीन है, और यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने लेफ़्टिनेंट गवर्नर की भूमिका को शून्य कर दिया. जिस समय हमारे बेवकूफ या जज़्बाती बुद्धिजीवी सुप्रीम कोर्ट की राय पर जयकारा लगा रहे थे, वे इस साज़िश को समझ ही नहीं पाए.

अब आईए आज की घटना पर. पहले ख़ुद को सत्तर दिनों तक ठंढ और बारिश में सड़क पर लाईए. पुलिस की आंंसू गैस और वाटर कैनॉन का सामना कीजिए. अपने आजू बाजू सगे संबंधियों और परिचितों को असमय मरते देखिए, फिर अहिंसा और सहिष्णुता पर भाषण झाड़ने के लिए मुंंह खोलिए.

बारिश और सूखे, क़र्ज़ और ब्याज, दलाल और बैंक, पैरों तले खिसकती हुई ज़मीन और गले में फंसते हुए फंदे की वृत्ताकार रोशनदान से अपने भूखे बच्चों के चेहरे पर लिखे सवालों को पढ़िए, फिर आईए अपनी नपुंसकता को अहिंसा का जामा पहनाने. अस्तित्व बचाने की लड़ाई अस्मिता बचाने की आख़िरी और निर्णायक लड़ाई होती है. युद्ध और प्रेम में सबकुछ जायज़ है इस बिंदु पर. इस बिंदु पर युद्ध सिर्फ़ अस्तित्व और अस्मिता बचाने के प्रेम की ही अभिव्यक्ति है.

अपराधियों के सरकार की उदासीनता और अहंकार को कोई भी अहिंसक (कनपुंसक) आंदोलन नहीं मिटा सकेगा, ये लिख कर रख लीजिए. कृपया मुझे गांंधी न पढ़ाएंं; आपसे पढ़ने की उम्र बहुत पहले चली गई है. बस इतना याद रखिये कि गांंधी जी का सामना विक्टोरियन नैतिकता से सुसज्जित अंग्रेज़ों से था, जिनको लोक-लाज की परवाह थी. आपका मुक़ाबला अपने नंगेपन पर गर्व करने वाले अपराधियों से है, जो न संविधान मानते हैं और न क़ानून.

आप खूंंख्वार जानवर से मंत्रोच्चारण कर कभी नहीं जीत सकते. ये गिरोहबंद फ़ासिस्ट हैं, जिन पर न आपकी हत्या का कोई असर होता है और न आपकी आत्महत्या का. इनके लिए आप महज़ एक गिनती हैं, वयस्क हुए तो ज़्यादा से ज़्यादा एक वोट, वो भी अगर ख़ुद को इस देश का नागरिक साबित कर सकें तो जहांं आपकी पीढ़ियांं दफ़्न हैं.

अपने शत्रु की सही पहचान ही लड़ाई का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. कल मैंने रुमानियत की ज़रूरत पर कुछ लिखा था, बहुत कम लोगों ने पढ़ा. अरोबिंदो घोष का आध्यात्मिक विद्रोह भी एक रुमानियत है, सुभाष की आज़ाद हिंद फ़ौज भी और गांंधी का सत्याग्रह भी. सवाल है कि आप किस रुमानियत को किस तरह के शत्रु के ख़िलाफ़ कब और कैसे इस्तेमाल करते हैं ?

आज के बाद लड़ाई को दूसरे पायदान पर ले जाने की ज़रूरत है. इस सरकार को इस्तीफ़ा देने पर बाध्य करने की. अंतिम पायदान तो हमेशा हर तरह के शोषण और उत्पीड़न को ख़त्म कर एक समतामूलक समाज बनाने की है ही.

Read Also –

 

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]

Previous Post

ये बचाएंगे

Next Post

लाल किले पर ‘निशान साहिब’ : किसान आंदोलन का शानदार शक्ति प्रदर्शन

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

by ROHIT SHARMA
July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

लोकतंत्र के अंतिम किले का पतन : भाजपा की ढाल बना चुनाव आयोग

by ROHIT SHARMA
June 16, 2026
Next Post

लाल किले पर 'निशान साहिब' : किसान आंदोलन का शानदार शक्ति प्रदर्शन

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

दक्षिणपूर्वी एशिया के बोर्नियो अन्तर्द्वीप में एक देश है, जिसका नाम है ब्रूनेई

July 20, 2020

लालू प्रसाद यादव को खत्म करने की ब्राह्मणवादी साजिश की गूंज सदियों तक गुंजती रहेगी

March 5, 2022

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
Uncategorized

‘ऑपरेशन कगार के खिलाफ और भारत में जनयुद्ध के समर्थन में लामबंदी जारी रखें’ – ICSPWI इटली

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

July 20, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.