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लुंपेन ट्रंप के आने के मायने : मोदी सत्ता को लात मार कर भगाना ट्रंप की प्राथमिकता है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
February 11, 2025
in गेस्ट ब्लॉग
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लुंपेन ट्रंप के आने के मायने : मोदी सत्ता को लात मार कर भगाना ट्रंप की प्राथमिकता है
लुंपेन ट्रंप के आने के मायने : मोदी सत्ता को लात मार कर भगाना ट्रंप की प्राथमिकता है
Subrato Chatterjeeसुब्रतो चटर्जी

पहले राजनीति का अपराधीकरण हुआ, फिर अपराधियों का राजनीतिकरण हुआ और अब व्यापारियों का राजनीतिकरण हो रहा है. पूंजीवादी व्यवस्था रातोंरात फासीवादी व्यवस्था नहीं बनती है. एक ऐतिहासिक निरंतरता और मजबूरी होती है.

मस्क के मंत्री बन जाने के बाद हो सकता है कि भारत जैसे पंगु लोकतंत्र में बहुत जल्द आपको केंद्र सरकार के महत्वपूर्ण मंत्रालयों में बेईमान धंधेबाज़ों को देखना पड़े. वैसे धुरंधर क्रिमिनल तो पहले से ही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण पदों पर क़ाबिज़ हैं.

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शर्मनिरपेक्षता का अमृत काल सिर्फ़ भारत में ही नहीं चल रहा है, बल्कि पूरी पूंजीवादी दुनिया में चल रहा है. आम जनता को नंगों की पूजा करने से फ़ुर्सत नहीं है, चाहे वो कुंभ के मेले में हो या राजनीतिक मंचों पर हों.

जहां पर जनता जागरूक है और चुनाव के माध्यम से नंगे क्रिमिनल लोगों को लतिया कर निकालना चाहती है, वहां पर नंगा चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोठा तक है उनकी आकांक्षाओं को परास्त करने के लिए.

बाईडेन ने अपनी विदाई भाषण में जिस Oligarchy या कुलीन तंत्र की तरफ इशारा किया, वह सिर्फ़ तीन हज़ार सुपर रिच के सहारे नहीं चलता है, बल्कि इनको समर्थन देने वाली सरकारी संस्थाओं, न्यायपालिका और मीडिया के सहारे चलती है.

आने वाले दिनों में संकट और गहरा जाएगा. यूरोप इस ख़तरे को भांप चुका है और इसलिए ब्रिटेन से लेकर जर्मनी तक सभी जगह लोग ट्रंप के खिलाफ हैं, यद्यपि वहां की सरकारों की तरफ़ से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया अभी तक नहीं आई हैं.

वैसे देर सबेर अमरीका फर्स्ट की प्रतिक्रिया में जर्मनी फर्स्ट या फ्रांस फर्स्ट का नारा भी आपको सुनाई देने लगे. ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि प्रतिक्रियावादी राजनीति में यही होता है और जब ऐसा होगा तब ट्रंप के लाख कोशिशों के बावजूद दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध से नहीं बचाया जा सकेगा.

राष्ट्रवाद की अंत्येष्टि युद्ध के मैदान में ही होती है, जैसे कि प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुआ. न्यू वर्ल्ड ऑर्डर एक पंगु concept है और यह उन देशों और समाजों से निकला है जहां पर एक परिवार के अंदर ही किसी ऑर्डर की कल्पना आप नहीं कर सकते हैं. यह दरअसल बाजारवादी शक्तियों के सामूहिक एकाधिकार की एक बेहूदी कोशिश है, जिसे मेहनतकश जनता के अथक प्रयासों से हराना ही होगा.

विडंबना यह है कि लुंपेन ट्रंप के आने से सबसे ज़्यादा चिंतित वही लोग हैं, जिन्होंने लुंपेन मोदी को चुना है. अंध राष्ट्रवाद, नस्लवाद, धार्मिक असहिष्णुता और जनविरोधी नीतियों के समर्थन वाली मोदी सरकार और ट्रंप की घोषित नीतियों में समानता दीगर बात है, लेकिन दोनों के व्यक्तित्व में जो अहंकार (हीन भावना से उपजी हुई), मूर्खता, बड़बोलापन और नफ़रत दिखाई देती है, वह भी विलक्षण है.

दोनों अपने समर्थकों (जो वैसे भी जन्मजात गदहे हैं), और बेवकूफ बनाने में माहिर हैं. But reality bites and it bites very hard. चीन को लाल आंखें दिखाने वाले मोदी जी अपने गुजराती मित्रों के हित में सत्ता संभालने के बाद चीन के सामने बिछे दिखे और आज चीन के साथ हमारे व्यापार संतुलन को देखने से ही पता चल जाता है कि skill India to Make in India का क्या हश्र हुआ है.

ठीक इसी तरह की बातें ट्रंप कर रहे हैं. वे सोचते हैं कि आयात पर अतिरिक्त टैक्स लगा कर वे अमरीका के manufacturing sector को पुनर्जीवित कर देंगे, ऐसा हो ही नहीं सकता है.

कारण, जब आप वैश्विक लूट के आधार पर एक consumer society बना देते हैं तो उस समाज की उत्पादकता और सृजनशीलता दोनों ख़त्म हो जाते हैं. समाज बड़े बाप के बिगड़ैल बच्चों सा व्यवहार करने लगता है. इसलिए नीचे तबके के लोग भी बेरोजगारी भत्ते लेना पसंद करते हैं लेकिन छोटे काम करना नहीं.

यहीं पर अमरीका में प्रवासी लोगों की अहमियत बढ़ जाती है. यही कारण है कि नागरिकता संशोधन कानून के विरुध्द मात्र 36 घंटे के अंदर अमरीका के पचास में से बाईस राज्य अदालत चले गए.

इस बिंदु पर यह याद रखना चाहिए कि ट्रंप का आदेश executive order मूलतः असांविधानिक है, ठीक उसी तरह से जैसे कि मोदी के नोटबंदी का निर्णय ग़ैरक़ानूनी था. क्या भारत का कोई भी विपक्ष शासित राज्य इसके ख़िलाफ़ कोर्ट गया ? नहीं. क्यों ? इसका जवाब भारतीय खून में स्वैच्छिक ग़ुलामी की बहती हुई धारा से जोड़ कर देखें तो आपको मिल जाएगा.

क़ानूनी हों या ग़ैरक़ानूनी, सच तो यह है कि बिना लोक बल के अमरीका जैसा उपभोक्तावादी देश जी ही नहीं सकता है. H1 B visa के मातहत ट्रंप के सुर अभी से ही बदलने लगे हैं और आज वे कह रहे हैं कि कुशल कारीगरों और कार्य बल को वीज़ा देने के रास्ते वे नहीं आएंगे. मज़ेदार बात यह है कि वे होटलों के वेटर लोगों को भी इसी श्रेणी में मानते हैं. फिर बचा कौन ?

It’s impossible to walk the talk, when the talk itself is an empty rhetoric. ठीक यही स्थिति भारत की है. चीन को लाल आंखें दिखाते दिखाते हमारे cowboy कब अपने 56” के पिछवाड़े को दिखाने लगा, वह इस देश के चमन चूतिये लोगों को तब समझ आया जब चीन ने हमारे 38000 square kilometres को हथिया कर अपनी बस्तियां बसा ली.

अब आते हैं tariff war पर. अपने लाख बड़बोलेपन के वावजूद अमरीका में चीन की वस्तुओं और सेवाओं पर अमरीका अतिरिक्त कर नहीं लगा सकता है. दरअसल यह बंदर घुड़की अमरीका चीन से rare earth minerals और जेट इंजन के लिए जरूरी metal के लिए दे रहा है, जिसके बगैर उसका General Electricals भी बंद हो जाएगा और कंप्यूटर इंडस्ट्री भी. यही कारण है कि भारत तेजस का ढांचा बना कर बैठा है और अमरीका इंजन नहीं दे पा रहा है.

रही बात भारत की तो भारतीय सेवा और वस्तुओं पर अतिरिक्त कर लगा कर अमरीका भारत को क्वाड में बड़ी भूमिका निभाते हुए ब्रिक्स और चीन के विरुध्द इस्तेमाल कर सकता है. भारत को मानना ही होगा क्योंकि Beggars are not choosers.

पूरे परिदृश्य के मद्देनजर जो तस्वीर उभर रही है उसका लब्बोलुआब यह है कि ट्रंप भारत के बाजार का इस्तेमाल तो करेगा लेकिन भारतीय वस्तुओं और सेवाओं पर अतिरिक्त कर लगा कर भारत को और अधिक पंगु बनाएगा. वैसे हमारे क्रिमिनल श्रेष्ठ ने इसमें कोई कसर नहीं छोड़ी है.

दूसरे, चीन के साथ मिल कर अमरीका द्विध्रुवीय विश्व की तरफ जाने की कोशिश करेंगे.

तीसरे, नाटो और फ्रांस के पर्यावरण समझौते और विश्व स्वास्थ्य संगठन से अमरीका को अलग कर ट्रंप अमरीकी हितों और यूरोपीय हितों के बीच एक स्पष्ट लकीर खींचने की जुगत में हैं.

चौथे, पश्चिमी एशिया में ट्रंप इज़राइल के जायनिस्ट शासकों के खिलाफ जाने के लिए बाध्य हैं, क्योंकि, अमेरिका में यहूदियों की majority नेतनयाहु के खिलाफ है. अमरीका प्रथम का मतलब सिर्फ़ आर्थिक हित ही नहीं होता है, इसे समझने की ज़रूरत है.

पांचवें, पूर्वी यूरोप में ट्रंप रुस से दोस्ती बढ़ाने के लिए भी बाध्य है और रुसी तेल पर प्रतिबंध रुस के खिलाफ कम और भारत के खिलाफ ज़्यादा है, यह आने वाले समय में आपको पता चल जाएगा.

भारत की गति सांप छूछुंदर की है. मोदी सत्ता को लात मार कर भगाना ट्रंप की प्राथमिकता है. सात समंदर पार बैठे दो अलग-अलग लुंपेन लीडरशीप की चर्चा इसलिए ज़रूरी हो गई है क्योंकि दुनिया के सबसे ताकतवर देश की बागडोर जब एक लुंपेन के हाथों में आ गई है, तब दुनिया के सबसे ज़्यादा जनसंख्या वाले देश के शीर्ष लुंपेन लीडरशिप के चलते भारत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ना ही है.

बात सिर्फ़ इतनी नहीं है कि एक लुंपेन ने दूसरे लुंपेन को अपने शपथग्रहण समारोह में नहीं बुलाया. बात सिर्फ़ इतनी भी नहीं है कि एक लुंपेन अपनी निरर्थक अमरीकी यात्रा के दौरान दूसरे लुंपेन से बुलाए जाने पर भी नहीं मिला. दरअसल, यह सब सतही बातें हैं जो आपको दो कौड़ी के राजनीतिक विश्लेषक लोगों के मुंह से क़रीब क़रीब हरेक चैनल पर सुनाई दे जाएगा.

अब आते हैं असल मुद्दों पर. किसी भी देश का अंतरराष्ट्रीय महत्व कुछेक कारणों से होता है –

  1. पहला, उसकी भौगोलिक स्थिति, जिसके चलते उसका strategic importance बढ़ जाता है.
  2. दूसरा, उसकी अर्थव्यवस्था और आर्थिक समृद्धि.
  3. तीसरा, देश की घोषित और अघोषित अंतर्राष्ट्रीय नीतियां.
  4. चौथा, उसकी सामरिक और तकनीकी क्षमताएं.

अब एक एक कर हम इन चारों मानकों पर भारत की स्थिति का आकलन करते हैं.

देश के विभाजन के बाद भारत का भूगोल बदल गया और अब भारत strategic importance का देश नहीं रहा. भारत से ज़्यादा पाकिस्तान है, इसलिए कि पाकिस्तान के साथ अच्छे रिश्ते रखने का मतलब है कि एक तरफ़ अफ़ग़ानिस्तान और पश्चिमी एशिया और दूसरी तरफ़ चीन और भारत पर भी अंकुश रखना. इसलिए पाकिस्तान को बना बनाया F 16 या F 35 मिल जाता है और भारत को तेजस का इंजन भी नहीं मिलता है.

आर्थिक दृष्टि से हम एक भिखारी देश हैं और आर्थिक असमानता के मानदंडों पर हम रवांडा या हैती बन गए हैं. नोटबंदी और जीएसटी के बाद जिस तरह से MSME sector और असंगठित क्षेत्र को योजनाबद्ध तरीक़े से मोदी ने अपने मित्रों के माध्यम से देश में Oligarchy स्थापित करने की कोशिश की, उसका नतीजा आज दिख रहा है. हाल ये है कि पिछले चालीस सालों में सबसे ज़्यादा बेरोज़गारी है. अभी मैं disguised unemployment की बात नहीं कर रहा हूं, उस पर फिर कभी.

नतीजा ये हुआ कि हमारा manufacturing sector धराशायी हो गया और हम छोटी से छोटी चीज़ों के लिए आयात पर निर्भर करने लगे. आज हमारे पास तीन महीने के आयात के लिए विदेशी मुद्रा बची हुई है. ऐसे परिवेश में अगर विदेश में नौकरी करने वाले भारतीयों का 100 to 125 thousand crores remittance, जिसका एक बड़ा हिस्सा अमरीका से आता है, पर ग्रहण लग जाए तो सोचिए क्या होगा !

मोदी सरकार के आने के बाद भारत धीरे-धीरे अपने गुटनिरपेक्षता की नीति से दूर होता गया. संघ की नाज़ी वैचारिक प्रतिबद्धता भाजपा को इज़राइल के पक्ष में और फ़िलिस्तीन के पक्ष में खड़ा करने को मजबूर कर दिया. ऐसे में हमारे मुस्लिम पड़ोसियों की नज़र से उतरना स्वाभाविक था.

इस बिंदु पर यह समझने की ज़रूरत है कि fascist tokenism से आप देश को गदहा बना कर राज कर सकते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संभव नहीं है. यही कारण है कि मोदी चाहे जहां भी जाकर मस्जिद की तारीफ़ करें या किसी शेख के गले पड़ें, इसका कोई चिरस्थायी प्रभाव नहीं होता है, सिवाय दो कौड़ी के भारतीय प्रेस में हेडलाइन बनाने के.

दूसरी तरफ़, अंबानी के अंड कोष चाटने की प्रक्रिया में रुस से सस्ता तेल खरीद कर दलाल मोदी ने अमरीका को नाराज़ कर दिया है. मैंने पिछली बार लिखा था कि रुसी तेल टैंकरों पर प्रतिबंध का असर भारत पर रुस से अधिक पड़ेगा, क्योंकि रुस साइबेरियन गैस पाइपलाइन से यूरोप को सीधे सप्लाई कर अपनी हानि की भरपाई कर लेगा. आज जब अमेरिका नाटो से बाहर निकलने की बात कर रहा है तो यूरोपीय देशों के पास रुसी तेल पर अमरीकी प्रतिबंध का कोई मतलब नहीं रह गया है.

सामरिक और तकनीकी दृष्टि से भी भारत आज सबसे कमज़ोर स्थिति में है. हमारे पास युद्धक विमानों की भारी कमी है, जिसकी चिंता हाल में ही एयर चीफ़ मार्शल ने सार्वजनिक तौर पर की है. सच तो ये है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी फ़ौज होने के बावजूद हमारे पास दस दिनों से ज़्यादा एक full fledged war लड़ने के लिए गोला बारूद भी नहीं है.

ऐसे में कारगिल के झड़प को और बालाकोट कौवा मार स्ट्राइक पर फ़िल्म बनाने के सिवा हमारे पास अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन करने के अलावा और कोई चारा नहीं है. आप राष्ट्रवादी फ़िल्मों को देख कर फूल कर कुप्पा हो सकते हैं, लेकिन इससे सच्चाई नहीं बदल जाती है.

अब आप समझ चुके होंगे कि इन चारों महत्वपूर्ण मुद्दों पर फिसड्डी देश के बारे अमरीका जैसी महाशक्ति क्या सोचती है. मज़ेदार बात तो यह है कि वाशिंगटन पोस्ट ने जब ट्रंप के शपथग्रहण समारोह में नहीं बुलाए जाने वाले नेताओं की सूची जारी की तो उसमें नरेंद्र मोदी का नाम भी नहीं था. मतलब हम सिर्फ़ अमरीका के दोस्त होने के क़ाबिल ही नहीं रहे, हम उनके लिए exist ही नहीं करते हैं.

सालों पहले मुझे पता चला था कि आम अमरीकी या यूरोपीय लोग भारत के बारे कुछ नहीं जानते हैं और न ही जानने की इच्छा रखते हैं. उन दिनों इंटरनेट नहीं आया था और मैं भी जवान था, इसलिए इस ख़बर पर सहसा यक़ीन नहीं हुआ था. आज के सूचना क्रांति के दौर में भी अगर ये सच है तो कहीं न कहीं हमारा पिछड़ापन ही इसका कारण है.

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क्या ट्रंप ही झूठों का सरदार हैं या कोई और भी हैं

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