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साम्प्रदायिक नफ़रतों के लिए पलक पांवड़े बिछाना मिडिल क्लास को बहुत भारी पड़ा है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 26, 2025
in गेस्ट ब्लॉग
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हेमन्त कुमार झा, एसोसिएट प्रोफेसर, पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

वह 1990 के दशक का शुरुआती दौर था. चंद्रशेखर प्रधानमंत्री थे. गांवों में तब तक सस्ते टेप रिकॉर्डर और सस्ते कैसेट घर घर तक पहुंच चुके थे. राम मंदिर आंदोलन अपने उरूज़ पर था. ठीक से याद नहीं, लेकिन तब शायद ‘एक एक आदमी एक एक ईंट लेकर अयोध्या पहुंचे’ जैसा कोई कार्यक्रम चल रहा था. इस कार्यक्रम को कोई पवित्र सा नाम दिया गया था.

तभी, एक साध्वी का नाम अचानक से चर्चित हो उठा. हिन्दी पट्टी के घर घर में उनका नाम जाना जाने लगा और लोग उनके बारे में और अधिक जानने को उत्सुक होने लगे. यह नाम था साध्वी ऋतंभरा का.

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लोगों को राम मंदिर आंदोलन से जोड़ने के लिए और अपना राजनीतिक एजेंडा साधने हेतु लोगों का ब्रेन वाश करने के लिए भाजपा और संघ के लोग फ्री में टेप रिकॉर्डर के कैसेट बांटा करते थे, जिनमें नेताओं, साधुओं, साध्वियों आदि के रिकॉर्डेड भाषण रहते थे.

नेताओं के भाषण तो तब भी एक लिमिट में ही रहते थे लेकिन साधुओं और साध्वियों के भाषणों में लोकतान्त्रिक, राजनीतिक या सामाजिक मर्यादाओं की ऐसी की तैसी करते हुए न जाने कितने लिमिट तोड़ दिए जाते थे. उन लिमिट्स को तोड़ने में साध्वी ऋतंभरा सबसे आगे थी. लगता ही नहीं था कि इस साध्वी को कानून आदि का कोई डर भी है.

उनकी भाषण शैली अच्छी थी. सिर्फ अच्छी ही नहीं, कह सकते हैं कि बहुत अच्छी थी. वाणी में ओज था शब्दों की संपदा थी उनके पास. अपने भाषणों के दौरान टनकदार बोली में जब वे लोगों का आह्वान करती थी तो तमाम लिमिट्स टूट जाते थे.

कोई पढ़ा लिखा आदमी यह सब सुन कर सोचता ही रह जाता था कि एक साध्वी ऐसा कैसे बोल सकती है. आखिर, किसी भी संत महात्मा के लिए मनुष्यता सबसे बड़ी चीज है, भले ही कोई मनुष्य किसी भी धर्म का अनुयायी हो.

तब तक हिन्दी पट्टी का मिडिल क्लास इतना ‘धार्मिक’ नहीं हुआ था जितना बाद के वर्षों में होता गया. तब, जनमानस में नेहरू के समन्वयवादी विचारों की ही अधिक स्वीकार्यता थी और मिडिल क्लास के मानस का विकास आमतौर पर इन्हीं वैचारिक आधारों पर हुआ करता था.

लेकिन, उन कैसेट्स की प्रभावकारिता उम्मीद से अधिक निकली. लोग रुचि ले ले कर यह सब खूब सुना करते थे और बीच बीच में इतने उत्साहित हो उठते थे, इतने पराक्रमी हो उठते थे कि लगता था कि अभी अगर रेडियो पर न्यूज में बोले कि उत्तर पश्चिम में खैबर दर्रे से मुहम्मद गोरी या बाबर की सेना आ रही है तो सिर्फ हमारे गांव के ये लोग ही जाकर उनके घोड़ों की लगाम थाम लें.

साध्वी ऋतंभरा के भाषणों की सबसे अधिक मांग थी. वे ‘डायरेक्ट एक्शन’ टाइप की शैली में इस इस तरह का आह्वान करती थी कि लगता था कि सुनने वालों के दिल और दिमाग में ही नहीं, देह के अंग अंग में आग लग गई हो. क्या बूढ़े, क्या जवान…हर तरह के लोग आक्रामक प्रेरणाओं से भर उठते थे.

किसी खास धर्म के लोगों के प्रति नफरत फैलाने का यह संगठित आयोजन अच्छी खासी सफलता प्राप्त कर रहा था और पाठ्यक्रम में, सार्वजनिक जीवन के रीति व्यवहार में संवैधानिक समानताओं की शिक्षा पाए, समन्वय की भावनाओं के साथ विकसित और जवान होते हिन्दी पट्टी के मिडिल क्लास के मन में सांप्रदायिक भावनाओं का ज्वार उमड़ने लगा था.

डेढ़ पसली का मेरा एक अत्यंत ही नजदीकी मित्र यह सब सुन कर अचानक से जैसे किसी उन्माद से घिर जाता था, ‘…एकदम ठीक बोलती है, यही शब करना होगा, वरना ये शब ऐशे नहीं शुधरेंगे…’.

हालांकि, तब से लगभग चौंतीस पैंतीस वर्ष गुजरे, लेकिन आज भी मुझे साध्वी ऋतंभरा के भाषणों के ऐसे कई वाक्य याद हैं जो कानून की लिमिट तोड़ते थे, सार्वजनिक विमर्श की मर्यादा की ऐसी की तैसी कर देते थे. कभी नहीं भूला, क्योंकि वे ऐसी बातें थी जिन्हें सार्वजनिक तौर पर बोलने वालों को कानून की गिरफ्त में लेना जरूरी था.

लेकिन, देश, खास कर हिन्दी समाज एक अंधेरी सुरंग में जा रहा था और कानून के रखवाले पता नहीं क्यों, विवश से लग रहे थे. देश की राजनीति तेजी से बदल रही थी और तमाम नेतागण और राजनीतिक दल अपनी गोटियां सेट करने में लगे थे.

मुझे अच्छी तरह याद हैं साध्वी के कई वाक्य…शब्दशः याद हैं लेकिन मैं यहां इस सार्वजनिक मंच पर उनका उल्लेख नहीं कर सकता, करना भी नहीं चाहिए. कोई संत, कोई साध्वी मनुष्य मनुष्य में भेद कैसे कर सकता है ? वह भी धर्म के आधार पर !

अभी कल एक पुराने, शायद एक साल पुराने किसी वीडियो को यूट्यूब पर देख रहा था. बाबा बागेश्वर महाराज अपनी सुंदर सी मुखाकृति को बेहद कुरूप और कुटिल शक्ल में ला कर हिन्दू युवाओं का आह्वान कर रहे थे कि धर्म की रक्षा के लिए वे हथियार उठा लें…और भी, ऐसी ही बहुत कुछ सड़ी गली लेकिन आग लगाने वाली बातें. आखिर यूं ही ये सांप्रदायिक राजनीति वाले, ये मीडिया वाले और विकृत मानस का शिकार हो चुके मिडिल क्लास की एक बड़ी संख्या इन बाबाओं को स्टारडम नहीं दे रहे.

बेरोजगार हाथों को धर्म की रक्षा के लिए हथियार उठाने का आह्वान…! और तब भी, ऐसे बाबा की जयजयकार ! 1990 के दशक के शुरुआती दौर से शुरू हुआ यह अभियान नई सदी के तीसरे दशक के ठीक बीच तक आकर एक मुकाम पा चुका है और अब इसके ढहने की बारी है.

आर्थिक मुद्दों पर ऐसे लेखों, ऐसे विडियोज की बाढ़ आ चुकी है जो प्रामाणिक आंकड़ों के साथ डिटेल में यह बता रहे हैं कि भारत का मिडिल क्लास आज आर्थिक रूप से गहरे गड्ढे में गिर गया है, उसकी आमदनी के अनुपात से अधिक महंगाई और मुद्रा स्फीति बढ़ रही है और उसकी मेहनत का असली लाभ खरबपति कॉरपोरेट समुदाय उठा रहा है. वह बेहाल नहीं, बहुत बुरी तरह बेहाल है.

सांप्रदायिक विमर्शों को हवा देकर अपना आधार मजबूत करने वाली राजनीति, जिसकी अर्थनीति का आधार क्रोनी कैपिटलिज्म है और जो मूलतः मेहनतकश विरोधी है, उसके लिए पलक पांवड़े बिछाना मिडिल क्लास को बहुत भारी पड़ा है. निम्न वर्ग की तो बात ही क्या करनी. उसके श्रम की लूट का अभियान उसे कुछ किलो अनाज या ऐसा ही और कुछ फ्री में देकर बिना किसी बाधा के चल रहा है.

इतिहास का एक चक्र पूरा हो चुका है. अब, बदलावों की आहट थोड़ी बहुत आने लगी है. देर सबेर किसी खास एजेंडा को मजबूत करने वाली मूढ़ताओं और सार्वजनिक मूर्खताओं के उत्सव की गूंज कम होगी. आज 2025 का गणतंत्र दिवस है. न्यूज में देखा कि साध्वी ऋतंभरा को ‘पद्मभूषण’ मिला है. अचानक से पैंतीस वर्ष पहले का वह माहौल याद आ गया.

इंटरनेट पर सर्च किया कि साध्वी बीते वर्षों में क्या करती रही और आजकल क्या कर रही हैं तो जो जानकारी मिली उससे बहुत संतोष मिला, बहुत अच्छा लगा. वे वृंदावन में रहती हैं और अनाथ बच्चों के लिए वात्सल्य आश्रम नाम की कोई संस्था चला रही हैं. यह असली संत और साध्वी का काम है.

अनाथ बच्चों के बारे में सोचकर मै हमेशा बहुत भावुक हो जाता रहा हूं. इसलिए, साध्वी के इस आश्रम के बारे में जान कर भी भावुक हुआ और सच में, संतोष हुआ यह सोच कर कि ईश्वर उन्हें इन सत्कर्मों के लिए उनके अतीत के उन कदमों के लिए शायद माफ करें जब उनका संतत्व राजनीति का औजार बन गया था.

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