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मुख्यधारा के नाम पर संघ के सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का पर्दाफाश करने की जरूरत है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 25, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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मुख्यधारा के नाम पर संघ के सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का पर्दाफाश करने की जरूरत है

हिमांशु कुमार, सामाजिक कार्यकर्त्ताहिमांशु कुमार, सामाजिक कार्यकर्त्ता

आदिवासियों को मुख्यधारा में लाना चाहिये. मुसलमानों को मुख्यधारा में लाना चाहिये. दलितों को मुख्यधारा में लाना चाहिये. कश्मीरियों को मुख्यधारा में लाना चाहिये. पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों को मुख्यधारा में लाना चाहिये. दक्षिण भारतीयों को मुख्यधारा में लाना चाहिये.

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ऊपर लिखे गये ये सारे लोग मिला लिये जायें तो यह पूरा भारत हो गया. इसमें उत्तर भारत के कुछ अमीर मर्द शामिल नहीं हैं, जो सुबह खाकी नेकर पहन कर पार्क मे लाठी लेकर जमा होते हैं. यही मुट्ठीभर मर्द भारत की मुख्यधारा तय करते हैं. यही पतली-सी नाली ही मुख्यधारा घोषित कर दी गई है, तो भारत सरकार चाहती है कि भारत के सभी लोगों को इस मुख्यधारा में शामिल किया जाये. यानी मुसलमान औरतें अपने बच्चों को कृष्ण बनाती है तो वो मुख्यधारा मे हो जाती हैं. लेकिन जो मुसलमान सच्चर कमेटी की रिपोर्ट लागू करने की मांग करते हैं वो मुख्यधारा के मुसलमान नहीं हैं. जो आदिवासी सेना में शामिल होकर कश्मीर मे मारा जाता है वह आदिवासी तो मुख्यधारा का आदिवासी मान लिया जाता है. लेकिन जो आदिवासी जमीन और जंगल को अपना कहता है और उस जंगल पर किसी कंपनी के कब्जे के विरोध की लड़ाई लड़ता है, वह आदिवासी मुख्यधारा में नहीं है.

तो भारत की मुख्यधारा का मतलब है, भारत की आर्थिक सत्ता जिन अमीर पूंजीपतियों की मुट्ठी में है उनका समर्थन करना. इन अमीरों के लिये देश के आदिवासियों, किसानों की जमीनों पर कब्जे का समर्थन करना. इन अमीरों के लिये देश की बहुसंख्य आबादी यानी किसानों, मजदूरों, आदिवासियों, छात्रों, औरतों पर लाठी चलाने वाली , गोली चलाने वाली और जेलों में ठूंसने वाले सशस्त्र सैनिकों को समर्थन देना. नागरिक होने का अर्थ यह भी मान लिया गया है कि व्यक्ति सरकार के आदेशों का पालन करे. सरकार कहे कि अपना खेत अडानी को दे दो, तो किसान अपने खेत अडानी को दे दें. तब वह अच्छे नागरिक मान लिये जायेंगे. और अगर किसान कहें कि आपने मेरी जमीन छीनने के लिये मेरी बेटी के गुप्तांगों में पत्थर क्यों भरे ? और किसान सरकार के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर कर दे, तो वह किसान अच्छा नागरिक नहीं माना जायेगा. यानी संविधान मे दिये गये ‘हम भारत के लोग’ के अधिकार के अनुसार भारत में रहने की कोशिश करोगे तो मारे जाओगे. पूंजीपतियों की जेब में पड़ी हुई सरकार की ‘हां’ में ‘हां’ मिलाओगे तो अच्छे भारतीय माने जाओगे.

संविधान मे वर्णित ‘हम भारत के लोग’ बनने की कोशिश करोगे तो देशद्रोही घोषित कर दिये जाओगे. मुख्यधारा का अर्थ है इन चन्द मुट्टी भर लोगों के धर्म को पूरे देश का धर्म मानना. इन चन्द मुट्टी भर लोगों की संस्कृति, घूंघट, पैर छूना आदि को भारतीय संस्कृति मानना. बस्तर की लड़कियां अपनी उम्र के लड़के-लड़कियों के साथ रात रात भर घूमती हैं. शादियों में बिना माता-पिता को साथ लिये नाचने जाती हैं. बस्तर की युवतियां मेले मे रात भर नाचती हैं. सिर नहीं ढंकतीं, पैर नहीं छूतीं, करवा चैथ का व्रत नहीं रखतीं, देश की ज्यादातर औरतें करवा चैथ का नाम तक नहीं जानतीं लेकिन ‘करवा चैथ’ को भारतीय संस्कृति मान लिया गया है. हद है.

भारत की कोई मुख्यधारा नहीं है. करवा चैथ, पैर छूना, घूंघट करना भारत की मुख्य संस्कृति नहीं है. लड़कियों का शाम से पहले घर के भीतर घुस जाना भी भारतीय संस्कृति नहीं है. भगवान को मानना भी भारतीय संस्कृति नहीं है. करोड़ों आदिवासी, भगवान जैसे किसी जन्तु को नहीं जानते. साड़ी, बिंदी, राम, कृष्ण, पीपल की पूजा भी भारतीय संस्कृति नहीं है. इस देश मे हजारों संस्कृतियां हैं. कोई मुख्यधारा नहीं है. मुख्यधारा के नाम पर संघ के सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का पर्दाफाश करने की जरूरत है. हमें खुद को सरकार से डरने वाला नागरिक नहीं बनाना है. हम संविधान के वह जन्मदाता हैं, जो संविधान को आत्मार्पित करते हैं यानी खुद ही संविधान निर्माता और संरक्षक हैं. हम भारत के लोग हैं.




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