Friday, July 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

निजीकरण व्यवस्था नहीं बल्कि पुनः रियासतीकरण है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 26, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

निजीकरण व्यवस्था नहीं बल्कि पुनः रियासतीकरण है

मात्र 70 साल में ही बाजी पलट गई. जहां से चले थे उसी जगह पहुंच रहे हैं हम, फर्क सिर्फ इतना है कि दूसरा रास्ता चुना गया है. इसके परिणाम भी ज्यादा गम्भीर होंगे.

You might also like

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

1947 में जब देश आजाद हुआ था, नई नवेली सरकार और उसके मंत्री देश की रियासतों को आजाद भारत का हिस्सा बनाने के लिए परेशान थे. तकरीबन 562 रियासतों को भारत में मिलाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपना कर अपनी कौशिश जारी रखे हुए थे क्योंकि देश की सारी संपत्ति इन्हीं रियासतों के पास थी.

कुछ रियासतों ने नखरे भी दिखाए, मगर कूटनीति और चतुरनीति से इन्हें आजाद भारत का हिस्सा बनाकर ‘भारत’ के नाम से एक स्वतंत्र लोकतंत्र की स्थापना की और फिर देश की सारी संपत्ति सिमट कर गणतांत्रिक पद्धति वाले संप्रभुता प्राप्त भारत के पास आ गई. धीरे-धीरे रेल, बैंक, बीमा, कारखानों आदि का राष्ट्रीयकरण किया गया और एक शक्तिशाली भारत का निर्माण हुआ.

मात्र 70 साल बाद समय और विचार ने करवट ली है. फासीवादी ताकतें पूंजीवादी व्यवस्था के कंधे पर सवार हो राजनीतिक परिवर्तन पर उतारू है. लाभ और मुनाफे की विशुद्ध वैचारिक सोच पर आधारित ये राजनीतिक देश को फिर से 1947 के पीछे ले जाना चाहती है यानी देश की सम्पत्ति पुनः रियासतों के पास ! लेकिन ये नए रजवाड़े होंगे कुछ पूंजीपति घराने और कुछ बड़े-बड़े राजनेता. निजीकरण की आड़ में पुनः देश की सारी संपत्ति देश के चन्द पूंजीपति घरानों को सौंप देने की कुत्सित चाल चली जा रही है. उसके बाद क्या ?

निश्चित ही लोकतंत्र का वजूद खत्म हो जाएगा. देश उन पूंजीपतियों के अधीन होगा जो परिवर्तित रजवाड़े की शक्ल में सामने उभर कर आयेंगे, शायद रजवाड़े से ज्यादा बेरहम और सख्त. यानी निजीकरण सिर्फ देश को 1947 के पहले वाले दौर में ले जाने की कबायद है, जिसके बाद सत्ता के पास सिर्फ लठैती करने का कार्य ही रह जायेगा.

सोचकर आश्चर्य कीजिये कि 562 रियासतों की संपत्ति मात्र चन्द पूंजीपति घरानो को सौंप दी जाएगी ! ये मुफ्त इलाज के अस्पताल, धर्मशाला या प्याऊ नहीं बनवाने वाले, जैसा कि रियासतों के दौर में होता था. ये हर कदम पर पैसा उगाही करने वाले अंग्रेज होंगे. निजीकरण एक व्यवस्था नहीं बल्कि पुनः रियासतीकरण है.

कुछ समय बाद नव रियासतीकरण वाले लोग कहेगें कि देश के सरकारी अस्पतालों, स्कूलों, कालेजों से कोई लाभ नहीं है, अत: इनको भी निजी हाथों में दे दिया जाए तो जनता का क्या होगा ? अगर देश की आम जनता प्राइवेट स्कूलों और हास्पिटलों के लूटतंत्र से संतुष्ट है तो सरकारी संस्थाओं को भी निजी हाथों में जाने का स्वागत करें.

हमने बेहतर व्यवस्था बनाने के लिए सरकार बनाई है न कि सरकारी संपत्ति मुनाफाखोरों को बेचने के लिए. सरकार घाटे का बहाना बना कर सरकारी संस्थानों को बेच क्यों रही है ? अगर प्रबंधन सही नहीं तो सही करे, भागने से तो काम नहीं चलेगा.

यह एक साजिश के तहत सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है. पहले सरकारी संस्थानों को ठीक से काम न करने दो, फिर बदनाम करो, जिससे निजीकरण करने पर कोई बोले नहीं, फिर धीरे से अपने आकाओं को बेच दो जिन्होंने चुनाव के भारी भरकम खर्च की फंडिंग की है.

याद रखिये पार्टी फण्ड में गरीब मज़दूर, किसान पैसा नहीं देता, पूंजीपति देता है. और पूंजीपति दान नहीं देता, निवेश करता है. चुनाव में निवेश और चुनाव के बाद मुनाफे की फसल काटता है.

आइए विरोध करें निजीकरण का. सरकार को अहसास कराएं कि वह अपनी जिम्मेदारियों से भागे नहीं. सरकारी संपत्तियों को बेचे नहीं. अगर कहीं घाटा है तो प्रबंधन ठीक से करे. वैसे भी सरकार का काम सामाजिक होता है, मुनाफाखोरी नहीं.

वर्तमान में कुछ नासमझ लोग चंद टुकड़ों के लिए झंडे और डंडे पकड़ के अपने आकाओं की चाटूगिरी में मग्न है. क्या यह बता सकते हैं कि यह अपने आने वाली पीढ़ी को कैसा भारत देंगे ? आज जो हो रहा है यदि हम उसको आंखें मूंदे देखते रहे तो याद रखना, उसके कत्ल पर मैं चुप था, मेरा नंबर अब आया. मेरे कत्ल पर आप भी चुप हैं, अगला नंबर आपका है. वक्त है अभी भी हमको अपनी आने वाली पीढ़ी को गुलाम होने से बचाना होगा .

  • डा. सी पी जैन, उदयपुर

[प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे…]

Previous Post

आपातकाल के 45वें वर्षगांठ पर शाह के ट्वीट का करारा जवाब दिया लोगों ने

Next Post

2025 का एक दृश्य : ग्राहक-सेल्समैन संवाद

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

by ROHIT SHARMA
July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

लोकतंत्र के अंतिम किले का पतन : भाजपा की ढाल बना चुनाव आयोग

by ROHIT SHARMA
June 16, 2026
Next Post

2025 का एक दृश्य : ग्राहक-सेल्समैन संवाद

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

‘कथांतर’ का ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ विशेषांक : संस्कृति की जन पक्षधारिता

June 5, 2024

फेसबुक और मोदी सरकार का गठजोड़

August 28, 2020

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
Uncategorized

‘ऑपरेशन कगार के खिलाफ और भारत में जनयुद्ध के समर्थन में लामबंदी जारी रखें’ – ICSPWI इटली

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

July 20, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.