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उत्तर कोरिया : एक सामान्य आदमी की दृष्टि से

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 2, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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दुनिया का सबसे खूंखार डाकू अमेरिकी साम्राज्यवाद, जो पूरी दुनिया के जनता का सबसे बड़ा दुश्मन है, दुश्प्रचार उसका मुख्य अस्त्र है. उसने अपने इसी दुश्प्रचार का सहारा लेकर इराक के लोकप्रिय शासक सद्दाम हुसैन को मार डाला और समूचे इराक को नरक की जलती आग में झोंक दिया. अफगानिस्तान को बारुद के ढ़ेर में तब्दील कर दिया.

अमेरिकी साम्राज्यवाद दुश्प्रचार के इसी कुख्यात अस्त्र का सहारा लेकर दुनिया के प्रथम समाजवादी देश सोवियत संघ के खिलाफ दुनियाभर में विष वमन करता रहा. वही अब वह चीन और उससे भी आगे बढ़कर उत्तर कोरिया के खिलाफ विष वमन कर रहा है. निष्पक्ष दर्शक पत्रकार डॉ. नवीन, जैसा देखा, जैसा सुना और जैसा समझा, पाठकों के सामने पेश कर दिया.

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उत्तर कोरिया : एक सामान्य आदमी की दृष्टि से

उत्तर कोरिया विश्व के मुख्य देशों में एक नाम है, जो अर्थव्यवस्था में अपना एक अनोखा स्थान रखता है. 1910 तक जापान का गुलाम रहा देश लगातार औपनिवेशिक मुक्ति के संघर्ष में जुझता रहा, जिससे लगभग 15 अगस्त, 1945 ई. को और अधिकारिक रुप से 9 सितम्बर, 1948 ई. को आजादी मिली.

उत्तर कोरिया को आजाद कराने में महान सेनानायक किम इल सुंग की बहुत बड़ी भूमिका रही, जिन्होंने तात्कालिक समाजवादी लहर में क्रांति कर देश को मुक्ति दिलाई और देश को विभाजित रूप से स्वीकार कर एक देश बनाया. भले उत्तर कोरिया दक्षिण कोरिया और अमेरिका का शीत युद्ध बाद में भी चलता रहा. 1950-1956 ई. तक महान सोवियत नेता स्टालिन ने भी कोरिया की मदद इस मसले पर की तब कहीं जा कर अमेरिका और उसका पिट्ठू दलाल दक्षिण कोरिया शांत रहे. फिर भी आए दिन किसी न किसी रुप में उत्तर कोरिया को परेशान करने का काम दोनों करते रहते हैं. हालांकि दक्षिण कोरिया अच्छा पडोसी देश बन कर रहता है फिर भी उत्तर कोरिया इस सब को नजरअंदाज कर आज विकास की ऊंंचाई पर है.

वर्तमान उत्तर कोरिया डीपीआरके के नाम से जाना जाता है, जहांं 25.55 मिलियन जनसंख्या, 1,20,538 वर्ग किमी क्षेत्रफल, 11 प्रांत, प्योंगयेंग राजधानी. जूसे सोशलिस्ट स्टेट और जनवादी लोकतंत्रिक सरकार जिसमें सर्वोच्च, राष्ट्र रक्षा आयोग का अध्यक्ष पद जो किम इल सुंग से चलता हुआ 1994 में किम इल जोंग और वर्तमान तक पैतृक रुप से चलता आ रहा है. किम यांग इल वर्तमान प्रधानमंत्री हैं. सुप्रीम पीपुल्स असेंबली है जहां हमारे देश की संसद की तरह अप्रत्यक्ष चुनाव होता है.

वहा के नागरिकों को ‘उसिफजफ्सजगसीटसीतदोत्तदोसोयडियाफोडासीय’ कहते हैं, हालांकि इसका कोई अर्थ हमें ज्ञात नहीं हुआ, फिर भी लोग मिलनसार और मस्त मौला रहने वाले हसमुख लोग हैं, जो अपने प्रशासकों को बहुत प्रेम करते हैं. जिस कारण सामाजिक चेतना के बल पर 1972 में वहांं के संविधान ने मार्क्सवादी लेनिनवादी व्यवस्था को स्वीकार किया, जिसकी सबसे बडी प्रतिछाया कृषि व्यवस्था में सामुहिक खेती है, जो किसी की निजी भूमि नहीं है. अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में यह व्यवस्था है जो सम्मलित कृषि कार्य कर सरकार को अनाज बेचता है और इसी तरह आय का भी बंटवारा होता है, जो किसी कम्यून से कम नहीं है.

यह लेख लिखने का कारण यह है कि बहुत से मित्र जिनमें सभी तर्कशील लोग भी सम्मिलित हैं और और कुछ कम्युनिस्ट भी जो सर्टिफिकेट बांंटने की प्रतियोगिता में फासिस्टों से कम नहीं हैं, आए दिन वैश्विक भांड मीडिया और गोदी मीडिया की लैंग्वेज में उत्तर कोरिया और वहांं के वर्तमान प्रशासक किम-जोंग-उन को तानाशाह और न जाने क्या-क्या कहते फिरते हैं और वहांं की समाजिक, राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था को नरक और भी न जाने क्या-क्या शोषणकारी, भ्रष्टतम, बर्बर घोषित करते हैं.

मजे की बात यह है कि हमारे ही देश का पढा-लिखा वर्ग जो तर्क और विद्वता में शानी नहीं किसी का, वह भी इस सब भांड मीडिया और गोदी मीडिया की बातों को सही मानकर मुस्कुरा देता है या चुप्पी साध लेता है. कुछ कम्युनिस्ट साथी तो इतने बड़े वाले कलमतोड़ विद्वान हैं कि उनकी थीसिस में ‘उत्पादन के संबंध’ अधिरचना और अंतर्विरोध के किसी पैमाने पर उत्तर कोरिया फिट नहीं बैठता, सो वे कोई टिप्पणी ही नहीं करते, बस वे मौनी बाबा गुफाओं में बैठकर मार्क्स बाबा का ध्यान लगा कर उसी में रमे हुए हैं.

यदा-कदा भटक जाए तो लेनिन की अप्रैल थीसिस से उत्तर कोरिया का मैच न खाते हुए चिड़चिड़ा जाते हैं और गरियाने लगते हैं. लिबरलों के तो हाल ही क्या पूछो. लाल से उनको वैसे ही एलर्जी है, भले ही अपने सफेद चोले में कितने अहिंसा को हिंसा में बदल कर घुम रहे हो.

खैर, इस सबको यह लेख जबाब हो सकता है जो हमारे एक मित्र ने फोन पर हमें उत्तर कोरिया के यात्रा वृतांत बताया था. इसे लिखने की हिम्मत मुझे इसलिए भी मिली कि वो मित्र किसी भी तरह से राजनैतिक वैचारिक नहीं है. वामपंथी विचारधारा से तो दूर-दूर तक कोई नाता ही नहीं है. वह महज घुमने जाता है जो देखा उसे ज्यों का त्यों बता देता है. उसके अराजनैतिक होने पर ही मैं लिख रहा हूंं और साथ ही कुछ जानकारी कामरेड पुरूषोत्तम शर्मा जी ने भी शेयर की और कुछ गुगल से सर्च करके खोजा जो जानकारी सामान्य मैच करती हुई लगी, लिख दी.

हम और आप सभी और आम लोग भी एक तरह की मनोवृत्ति पर टिके हैं, जो कि प्रोपेगेंडा के तहत पूरी दुनिया में चल रहा है. तानाशाही सही नहीं है यह मै पहले ही कह दे रहा हूंं लेकिन वर्तमान की तथाकथित लोकतंत्रातिक देशों की तानाशाही हो या तथाकथित अहिंसा के पुजारियों के शिष्यों की, वह सब सर्वविदित है. अब इसमें न्यूनतम अधिकतम का खेल खेलना विषय से भटाना है. मूल रूप से कहना दोष सबका है. राज्य स्वयं ही हिंसा का पर्याय है.

किंग जोंग का तथाकथित रूप जो विश्व में पेश किया गया, वो विश्लेषक कैसे हैं ? हमें पता है वे दो हजार के नए नोट में चिप खोजते फिरते थे, जिनके कारण संसद में वित्त मंत्री की फजीहत भी हुई. मेरे एक मित्र ने उत्तर कोरिया के विषय में अपने निजी अनुभव बताए जो उसने अपनी आंखों से देखे सुने, वह भी वहांं के एक माह के प्रवास के दौरान. मैं इसका एक थोडा सा विवरण देना चाहूंगा. आपकी मर्जी आप विश्वास करेंगे या नहीं. 6 – 7 चीजों का उसने अनुभव किया.

  1. उस देश में एक भी भिखारी नहीं था जिस भी प्रांत में वह घुमने गया.
  2. सभी के लिए पूरी शिक्षा फ्री.
  3. सभी के लिए अस्पताल में इलाज फ्री. हर व्यक्ति का 6 माह में चेकअप, वह भी फ्री.
  4. चोरी का 12 साल में 1 भी केस नहीं दर्ज हुआ उस देश के किसी भी प्रांत में. एक अमेरिकी ने घूमने आने पर एक दुकान से एक मैप चुरा लिया था. उसे सजा काउंसिल से दी गई. पर वह इतना आशंकित था कि वह भयग्रस्त हो गया. उसे अमेरिका भेज दिया गया, जहांं उसकी इलाज के बाद मौत हो गई. यही किस्सा अमेरिका बार-बार दोहराता रहता है और आए दिन प्रोपेगेंडा कर उत्तर कोरिया को बदनाम करता रहता है. भारतीय मीडिया की तो बस पूछो ही मत.
  5. हर व्यक्ति को रोजगार है. कोई भी खाली नहीं बैठ सकता है. जो खाली बैठने का जुगत लगाने की कोशिश करता है, उसकी मनोचिकित्सक से काउन्सिल होती है और न्यूनतम उसे कृषि कार्य करना होता है.
  6. हर चीज न्यूनतम मूल्य पर हर किसी को उपलब्ध है, पर जमा करने पर दंड का प्रावधान. और वह भी काउंसिल द्वारा. एक बार किसी भी अपराध के लिए काउंसिल है. यानी सलाह है जो चेतावनी की शक्ल में दी जाती है. दूसरी बार गलती करने पर सख्त सजा है. फिर कोई सुनवाई नहीं.
  7. वहांं वेश्यावृत्ति नहीं है, जो दुनिया की सबसे बडी शोषणकारी सामाजिक बुराई है. जिस पर दुनिया का हर विकसित देश आज भी घडियाली आंसू बहा कर मौन खड़ा महिलाओं के शोषण को देख रहा है, वह उत्तर कोरिया में नहीं है. हर किसी महिला को स्वयं वर चुनने का अधिकार है.

और भी बहुत सी बातें हैं, पर इन बातों पर उसने पूरा आश्वासन दिया तब मैं सार्वजनिक कर रहा हूंं. वैसे उनके प्रति दुनिया में जो नफरत फैला दी गई है, इससे मेरी भी हिम्मत नहीं हो रही थी कि लिखूंं. पर, यह सब बात लगभग ऐसी ही, मुझे अन्य लोगों से भी ज्ञात हुई हैं, जिनका उनसे मीडिया के जरिये सम्पर्क रहता है, ज्ञात हुआ.

उत्तर कोरिया की सरकार अपने सम्पर्क बाहरी दुनिया से बहुत कम रखती है. सब संसाधन अपने लिए जुटा रखे हैं. किसी से कोई मतलब नहीं. होना भी नहीं चाहिए. लूट के लिए तथाकथित लोकतंत्र की पोल कोरोना ने खोल दी, जो अमेरिका आज विश्व का दादा बना फिर रहा है, उसकी अपने नागरिकों के प्रति लापरवाही देख सकते हैं.

समाजिक सरोकार से संबंधित सब कुछ खत्म कर चुका अमेरिका दूसरों को धमका कर दवा मांग रहा है, सर्वविदित है. कम से कम उस तानाशाह (उत्तर कोरिया) ने किसी को धमकाया तो नहीं दवा के लिए. और मजे की बात उत्तर कोरिया की स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी दुरुस्त है कि कोरोना दक्षिण कोरिया से आरम्भ हुआ ( तथाकथित अमेरिका और भांड भारतीय मीडिया के अनुसार चीन से) एक भी मरीज देश में नहीं रहा. जो था तुरंत इलाज था. ऐसे समाजिक संरचना बना कर किंग जोंग उन के दादा ने बहुत पहले से रखी थी, जैसे कभी माओ ने बनाई थी. जिस कारण तुरंत चीन भी बिमारी से निपट सका. यही कारण है अपने तो कुछ कर धर नहीं सकते, दूसरे पर दोष लगाओ.

तानाशाह कहांं नहीं है ? जहांं इलाज के नाम पर थाली ताली बजा रहे हैं या वहांं जहांं इतनी सुंदर व्यवस्था बनी है. खैर कुछ और भी विवरण उत्तर कोरिया के बारे में है.

जिस देश पर पिछले 70 वर्षों से आर्थिक और राजनीतिक प्रतिबन्ध लगाकर उसे दुनियां से सिर्फ इसलिए काटा गया हो कि वहां कम्युनिस्टों के नेतृत्व में जनता ने क्रांति कर दी, जिस मुक्त देश में अमेरिका ने अपनी सेना उतार कर उसका विभाजन कर आधे भाग पर अपनी सेना जमा कर अपनी कठपुतली सरकार बनाई हो, चीन की सीमा को छोड़ उसकी बाकी सीमा पर अमरीकी साम्राज्यवाद उसे कुचलने लिए पिछले 70 साल से अपने सैनिक अड्डे बना वहीं जमा हो.

जिस देश को न बाहर कुछ बेचने की इजाजत है और न बाहर से कुछ खरीदने की, जो अपने सीमित संशाधनों से अपनी जनता की संगठित ताकत के बल पर अपने देश को 70 वर्षों से चला रहे हों और साम्राज्यवादी ताकतों का मुकाबला कर रहे हों.

जिस देश में भूमि का राष्ट्रीयकरण हो और किसान की श्रेणी ही खत्म कर उन्हें एग्रीकल्चर वर्कर्स कोआपरेटिव में संगठित कर सामूहिक खेती का सिस्टम कायम किया हो, स्वास्थ्य सेवा पूरी तरह सार्वजनिक हो, शिक्षा का वैज्ञानिक ढांचा राज्य के पूर्ण दायित्व में हो, सबके लिए आवास की व्यवस्था सरकार करती हो, अस्पताल राजधानी से लेकर गांव व कारखाना स्तर तक हो. निजी वाहन की इजाजत कतई नहीं, हर स्तर पर सार्वजनिक वाहन प्रणाली हो,
शहरों की सड़कों पर गन्दगी के नाम पर सिगरेट की एक ठुड्डी भी न मिलती हो, जहां बच्चे आवारागर्दी करने के बजाए पढ़ाई और अन्य क्षेत्रों में अपना कैरियर बनाने के लिए मेहनत करते हों और सरकार उन्हें वह सहूलियत देती हो.

समाजवादी सरकार को बदनाम करना और कम्युनिस्टों की राह में रोड़ा अटकाना, यही काम अमेरिकी दलाल और भारतीय गोदी मीडिया का काम है. यह लेख तमाम लोगों के निजी अनुभव और कुछ सच के रुप, प्रसारित वीडियो के द्वारा प्रस्तुत है, जिसमें हर बात की पोल खोली गई है. इसको देख कर और आप अपने विवेक से निर्णय कीजिये कि वास्तव में ऐसा है जैसा मेनस्ट्रीम मीडिया दिखा रहा है ?

चलिए एक बार के लिए हम भी गलत बोल रहे हैं या लिख रहे हैं, क्या वे लोग जो वहा अमन चैन से रह रहे हैं वो भी गलत हैं ? कोरिया जैसे देश की आवाज दबा सकते हैं पर अमेरिका की नहीं, यह तो एक तरफा निर्णय है. वास्तव में है यह कि 80 या 90 के दशक में रुस को जैसे बदनाम किया गया, जैसे चीन क्यूबा को बदनाम किया गया, वियतनाम, वेनुजुला, चिली को बदनाम कर तबाह किया गया वैसे ही इन देशों को जिनमें धीरे धीरे अपने स्तर से समाजवादी व्यवस्था अपनाने की इच्छा हो रही है या जो उस पर चल रहे हैं, उनको नैतिक रूप से दुनिया के सामने ऐसा पेश किया जा रहा है कि वह विलेन ही लगे और कम्युनिस्ट पार्टी को हिंसा और बर्बरता का पर्याय घोषित किया जाए, यह सारी साजिश पूरी दुनिया में चल रही है.

यह लेख उन सब विरोधियों लिबरलों और तथाकथित कम्युनिस्टों को एक जीवंत प्रमाणित आधार देने की कोशिश है, जो सच में बहुत अंधकार में हैं गोदी मीडिया या दलाल अमेरिका मीडिया के कारण. यह वही मीडिया है जो पिछले साल जब अमरीका से वार्ता चल रही थी तो यही मीडिया कह रहा था कि किम ने वार्ता कर लौटने वाली अपनी बहन को गोली मार दी है. आज वही मीडिया कह रहा है कि किम की मौत के बाद अब वही बहन सत्ता संभलने वाली है.

अब सोचिए, कौन सही है ? जो किम को भी मारे दे रही मीडिया थी वह या यह ? हम किसी विचारधारा के अंधभक्त नहीं हैं, लेकिन जो सच है सच के साथ हैं. मेरा सच, तेरा सच. इतिहास और विज्ञान के आयनों में स्पष्ट होता है जिसे इतिहास द्वन्द्वात्मक रुप से कभी न कभी सामने लाता है.

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Comments 1

  1. A.K.Bright says:
    4 years ago

    दुनिया कौतूहलों से भरी पड़ी है और मार्क्सवाद दुनिया भर के दबे कुचले शोषित तबके के लिए एक श्रेष्ठ कौतूहल है और वह उस राजनीतिक व्यवस्था का प्रत्यक्ष साक्षी होने की कामना रखता है। यह दीगर बात है कि मानव सुख-समृद्धि के हर वर्तमान के पीछे एक अति कष्टकारी भूतकाल छिपा होता है और अपने वर्तमान से प्यार करने वाले लोग हमेशा भूतकाल के शहीदाना संघर्षों से ऊर्जा लेकर भविष्य के प्रति अपनी जबाबदेही भी सुनिश्चित करते हैं। हम उत्तर कोरिया की बहादुर जनता को सैल्यूट करते हैं।

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