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Home गेस्ट ब्लॉग

रूस-यूक्रेन युद्ध : कुछ नोट्स

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 26, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
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मशहूर फिल्म ‘बैटेलशिप पोतेमकिन’ का एक दृश्य शायद आपको याद हो. सीढ़ियों पर ऊपर से जार की सेना मजदूरों का कत्लेआम करती आगे बढ़ रही है. एक छोटा बच्चा अपने प्राम में सीढ़ियों पर लुढक रहा है क्योंकि उसकी मां को गोली लग गयी है. यह दृश्य ‘ओडेसा’ में फिल्माया गया था, जो इस वक़्त यूक्रेन का महत्वपूर्ण शहर है. इसी शहर पर इस वक़्त रूस की सेना भयानक बमबारी कर रही है. एक समय था जब यूक्रेन और रूस दोनों के मजदूर साथ मिल कर रूसी जार से लड़ रहे थे. ‘बैटेलशिप पोटेमकिन’ उसी युद्ध का हिस्सा था.

1917 की क्रांति के बाद यूक्रेन, जार्जिया, उज्बेकिस्तान के मजदूर रूसी मजदूरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर श्वेत आतंकवाद यानी अमेरिका-ब्रिटेन-फ्रांस-जर्मनी की सम्मिलित सेनाओं के खिलाफ लड़ रहे थे. उस वक़्त मजदूरों के इंटरनेशनल में जब रूस और जर्मनी के कामरेडों ने एक दूसरे से हाथ मिलाया तो पूरा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा था. उस वक़्त रूस और जर्मनी के बीच वही सम्बन्ध था जो आज भारत पाक के बीच है. यह अंतरराष्ट्रीयतावाद का दौर था. आज लगभग 100 साल बाद स्थिति एकदम उलट है.

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यूक्रेन और रूस का मजदूर एक दूसरे पर बन्दूक ताने खड़े हैं. यूक्रेन अमेरिका की गोद में बैठ कर रूस के खिलाफ अमेरिका की रणनीतियों को लागू कर रहा है. पुतिन लेनिन की आलोचना कर रहा है कि लेनिन ने उत्पीड़ित राष्ट्रों को आत्मनिर्णय का अधिकार नहीं दिया होता तो आज वह यानी पुतिन जार का सच्चा उत्तराधिकारी होता. अभी भी पुतिन का सपना रूस को जारशाही में तब्दील करने का ही है.

अमेरिका भूखे भेड़िये की तरह सोवियत रूस से टूटने वाले सभी पूर्वी योरोप के देशों को अपने आगोश में यानी अपने सैन्य संगठन नाटो में लेता जा रहा है, और इस तरह रूस की घेरेबंदी करता जा रहा है. इस वक़्त नाटो की सेनायें एकदम रूस की सीमा पर हैं. रूस की सीमा से लगे 14 में से 5 देश नाटो के सदस्य हो चुके हैं. यूक्रेन भी जल्द ही नाटो का सदस्य बनने वाला है.

रूस चाहता है कि नाटो का सदस्य बनने से पहले यूक्रेन से उन क्षेत्रों को अपने प्रभाव में ले लिया जाय (उन्हें ‘स्वतंत्र’ घोषित करके या अपने मे मिलाकर) जहां रूसी जनसंख्या ज्यादा हो, ताकी भविष्य में यूक्रेन के नाटो में जाने पर नाटो और रूस के बीच एक बफर ज़ोन बना रहे. इसी रणनीति के तहत रूस ने 2014 में क्रीमिया को यूक्रेन से अलग करके रूस में मिला लिया था.

अमेरिका इन भूतपूर्व समाजवादी देशों को नाटो में लाने के लिए पिछले दशकों में यहां ‘ओरेंज क्रांति’ के माध्यम से सत्ता पलट करवा कर रूस समर्थित या तटस्थ सरकारों को उखाड़ कर अमेरिका समर्थित सरकारें बिठा रहा है. 2014 से पहले यूक्रेन में रूस समर्थित सरकार थी. अमेरिका ने अथाह पैसा फेकते हुए और ‘सीआईए’ का इस्तेमाल करते हुए यूक्रेन में रूस समर्थित सरकार का तख्ता पलट करवाया और अपनी कठपुतली सरकार बिठाई. रूस ने इसी की प्रतिक्रिया में यूक्रेन पर हमला कर क्रीमिया को अपने कब्जे में ले लिया.

इसे विस्तार में जानना हो तो ‘ओलिवर स्टोन’ की मशहूर डॉक्युमेंट्री ‘यूक्रेन ऑन फायर’ देखी जा सकती है. ठीक इसी तरह प्रशांत महासागर में अनेक देशों और द्वीपों पर सैनिक अड्डे बनाकर चीन को भी लगातार घेरने की रणनीति पर अमेरिका काम कर रहा है. लगभग 3 लाख अमेरिकी सेना यहां तैनात है. अनेक परमाणु बम से लैस मिसाइल चीन की ओर रूख किये हुए है. ‘जान पिल्जर’ ने अपनी फिल्म ‘वार ऑन चाइना’ में इसे विस्तार से दिखाया है. ठीक इसी तरह रूस को घेरे हुए नाटो की सेनायें अपने परमाणु मिसाइलों को रूस की ओर किये हुए है.

ऐसी परिस्थिति में चीन और रूस भी पिछले दो दशकों से लगातार अपनी युद्ध क्षमता को बढ़ा रहे हैं और दुनिया एक बार फिर से तबाही की ओर बढ़ रही है. इस पर भारत का स्टैंड क्या है ?

भाजपा सरकार जिस तरह से हिन्दू-मुस्लिम राजनीति में मगन है, उससे भारत की विदेश नीति लगभग ख़त्म हो चुकी है. या यो कहें कि भारत की घरेलू नीति ने उसकी विदेश नीति को निगल लिया है. बचा खुचा काम चैनलो के हवाले कर दिया गया है. चैनलों को महज सनसनी और अपने एजेंडे से मतलब है. हां, उन्हें जरूर इस बात का दुःख है कि पुतिन ने भारत से बिना पूछे यूक्रेन पर हमला क्यों किया.

भावी परमाणु युद्ध पर नज़र रखने वाली संस्था The Doomsday Clock का कहना है की हम मध्य रात्रि से महज 100 सेकंड दूर हैं. हम पढ़ते आये हैं कि समय हमेशा आगे जाता है लेकिन आज शायद समय को ‘पीछे’ ले जाने की जरूरत है, उस चौराहे तक पीछे, जहां से हमने गलत रास्ता पकड़ लिया था.

  • मनीष आज़ाद

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