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रुस का यूक्रेन युद्ध बोल्शेविक क्रांति से भी बड़ी लड़ाई है और इसके मायने भी बड़े और व्यापक हैं

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 9, 2025
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रुस का यूक्रेन युद्ध बोल्शेविक क्रांति से भी बड़ी लड़ाई है और इसके मायने भी बड़े और व्यापक हैं
रुस का यूक्रेन युद्ध बोल्शेविक क्रांति से भी बड़ी लड़ाई है और इसके मायने भी बड़े और व्यापक हैं

लोकतांत्रिक उत्तर काल के मायने व पेचीदा राजनैतिक दौर; जिन लोगों को नाटो, यूरोपीय यूनियन व अमेरिका के लोकतंत्र में आकर्षण दिखता है उन्हें समझना चाहिए कि इन्ही लोकतांत्रिक देशों ने ही सोवियत विघटन के बाद नाटो की संगठित शक्ति के दुरुपयोग से आधे एशिया व अफ्रीका में कुल 2 करोड़ बेगुनाहों को मौत के घाट उतारा व 30 करोड़ से ज्यादा लोगों को बेघर करके विस्थापित किया, जो दसियों हजार किलोमीटर दूर पलायन को मजबूर हुए. यह सब इस क्षेत्र की तेल व भौतिक सम्पदा को कब्जाने के लिए छल कपटपूर्ण तरीके से लोकतंत्र स्थापित करने के नाम पर किया गया.

आज इन क्षेत्रों के अस्थिर किए गए देशों में से आधे से अधिक देशों में गृह युद्ध चल रहे है, जिनमें सच्चा लोकतंत्र आ चुका है. यह सब विनाशक, मानवहन्ता काली करतुते चीन, रूस व उत्तर कोरिया ने नही की जिन्हें भारत सहित अन्य लोकतांत्रिक जगत व उनका मीडिया दिन रात तानाशाह कहते व बोलते नहीं थकते, जिन्हें केवल फ्रांसिस क्रांति व यूरोपीयन पुनर्जागरण में ही लोकतंत्र दिखता है और शी जिन पिंग, पुतिन व किम में तानाशाही दिख रही हो !

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उन सबको याद रखना चाहिए कि अगर मार्क्स से प्रेरित लेनिन-ट्रोट्स्की की 1917 की बोल्शेविक क्रांति, स्टालिन के नेतृत्व में लाल सेना की हिटलर पर विजय व चीन में माओ के नेतृत्व में जन क्रांति नही होती तो पूरी दुनिया में आज भी दासों व औरतों की सरेआम मण्डिया सजी मिलती. आज भी हम आधुनिक सभ्य मूल्यों के ‘जिस आभामंडल में जी रहे है उसके पीछे वैश्विक मेहनतकश वर्ग व रूसी लाल सेना की कुर्बानियों से निकले सभ्य सरोकारों’ को हमें नहीं भूलना चाहिए.

जो लोग लोकतांत्रिक पश्चिम की सब कार्यवाहियों का अनुसरण कर रहे वे लोग इतिहास से सबक क्यों नही लेते और यह क्यों नही समझते कि लगभग 100 -125 वर्ष पहले दुनिया की क्या दुर्दशा थी ? यह हमें नहीं भूलना चाहिए कि अगर भारतीय सामंती वर्ग हमारे यहां शक्तिशाली व मजबूत नहीं होता तो यूरोपीयन जातियां 16 वी व 17 वी सदी में हमारा उसी तरह जातीय नरसंहार करती जैसा उन्होंने अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के साथ किया.

हमें यह समझना चाहिए कि यूरोपीयन शासक सत्ताओं का मूल चरित्र अब भी उसी तरह का उत्पीड़क, लुटेरा व शोषक है जैसा मार्क्सवाद व विश्व मेहनतकश वर्ग की संगठित शक्ति के उभरने से पहले था. हमें यह समझना चाहिए कि यूरोपीयन लुटेरों ने विश्व मेहनतकश वर्ग की उभरती संगठित शक्ति व सोवियतों की नाजी जर्मनी पर विजय के भय से लोकतंत्र के सभ्य मूल्यों को स्वीकारने का लबादा ओढ़ रखा है और वह सोवियत विघटन के बाद तेजी से इसे बोझ समझ कर फेंकना चाह रहे हैं और फेंक भी रहे हैं.

हमें यह समझना चाहिए कि जिस दिन यूक्रेन मोर्चे पर रूसी हार गए उसके तीसरे दिन अमेरिका के नेतृत्व वाला यूरोपीयन लुटेरा दुनिया को ढाई दिन के झोंपड़े में बदल देगा. यह समझ लो कि यूक्रेन मोर्चे पर रूसी सेना दूसरी बार दुनिया के लिए अपनी कुर्बानी दे रही है. जिस दिन यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ था उन्ही दिनों में मैंने लिखा था और आज पुनः फिर कह रहा हूं कि यूक्रेन युद्ध बोल्शेविक क्रांति से भी बड़ी लड़ाई है और इसके मायने भी बड़े और व्यापक हैं.

यूक्रेन में रूस व ब्रिक्स के आर्थिक मोर्चे पर चीन इस लड़ाई का अग्रिम मोर्चा है जिसके साथ भारत व ब्राजील खड़े हैं इसलिए अमेरिका व पश्चिम लुटेरे चीन व ब्राजील के नही झुकने पर अब पूरा ध्यान भारत पर लगा चुके हैं. ऐसे में अमेरिका व भारत का टैरिफ वार बहुत बड़ा शक्ति प्रदर्शन है कि वैश्विक शक्तियों के धुर्वीकरण में भारत किधर है. ऐसी बदलती दुनिया के मायने समझने के लिए अगर हम लोकतांत्रिक युग को दो हिस्सों में बांटकर देखना व समझना नही चाहते तो हम ऐतिहासिक गलती कर रहे होंगे.

जो लोग आधुनिक राजनैतिक इतिहास को दो भागों में बांटकर समझने की कोशिश नही कर रहे वो लोग राजनैतिक समझ के मामले में दिशाहीन व दिग्भ्रमित हो रहे है. एक वह लोकतांत्रिक युग का समय था जो सोवियतों से प्रभावित व उसके दबावों से औपनिवेशिक व साम्राज्यवाद विरोधी संघर्षो से सभ्य मानव मूल्य रच रहा था, जिसमें पश्चिम की लुटेरी, हिंसक व शोषक शक्तियां दुनियाभर से अपने बोरिया बिस्तर समेट रही थी और मार्क्सवादी दबाव में जाति, धर्म-मजहब, लिंग, भाषा व नस्ल आदि भेदभाव को छोड़कर न्याय, समानता, स्वतंत्रता, सहिष्णुता के मूल्यों को स्वीकार रही थी.

लुटेरी पश्चिमी शक्तियां वैश्विक मेहनतकश वर्ग के नेतृत्व में उठे विद्रोह के स्वर की शक्ति को पहचान कर अपनी पितृभूमि में भी नए सभ्य मूल्यों को लागू करने को विवश हुई. यह शीतकालीन दो धुर्वी दुनिया थी जब मेहनतकश वर्ग की उठती शक्ति व सोवियतों के नेतृत्व की ताकत से भयभीत यूरोपीयनों ने अपने 1930 के आर्थिक संकट से उबरने के लिए केन्स को पालनहार मानना पड़ा व राज्य ने केन्स की कल्याणकारी योजनाएं लागू की.

लोकतंत्र का दूसरा समय तब आया जब 1991 में सोवियत संघ बिखर गया व पूर्वी यूरोप के सोवियत साथी भी टूटकर पश्चिम के साथ मिल गए. ये यूरोपीयन मुल्क भी अपनी तासीर के अनुकूल नाटो व यूरोपीय यूनियन व यूरोपीय संसद के साथ हो गए. इन्होंने साझा सेना, साझा संसद के बाद साझा मुद्रा स्वीकार की और दुनिया पर पुनः राज करने व भौतिक संसाधनों को कब्जाकर लूटने के इरादे से आधे अफ्रीका व आधे एशिया को फौजी बुंटो तले रौंदने का साथ दिया, जिसमें 2 करोड़ से अधिक बेगुनाह को मौत के घाट उतारा व 30 करोड़ से अधिक को विस्थापित किया जो दसियों हजार किलोमीटर दूर जीने के लिए पलायन को मजबूर हुए.

ऐसे में हमे समझना चाहिए कि उतर काल और कोई और नहीं बल्कि 1991 के सोवियत विघटन के बाद लोकतांत्रिक दुनिया कि तस्वीर को बताता व व्यक्त करता काल है.

  • भागाराम मेघवाल (Director, The School of International Studies)

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