Monday, June 8, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

शेख हसीना : बेटी ने अपना काम पूरा किया है…

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 6, 2024
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.2k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
शेख हसीना : बेटी ने अपना काम पूरा किया है...
शेख हसीना : बेटी ने अपना काम पूरा किया है…

बेटी ने अपना काम पूरा किया है…शेख हसीना 76 बरस की हो चुकी हैं. सत्ता में बीस बरस से ज्यादा हुए. एक लुंजपुंज और गरीब देश की कमान सम्हालने के बाद, उसे दक्षिण एशिया की इमर्जिंग इकॉनमी बनाने वाली हसीना की उपलब्धियां एक जीवन के लिए काफी हैं. इम्प्रेसिव हैं.

हालांकि बंगलादेश के उभरने की कहानी 90 के दशक से शुरू हो जाती है. सर्व प्रथम इरशाद की मिलिट्री गवर्मेन्ट ने विदेशी सहायता और नई नीतियों के बूते देश में बदलाव शुरू कर दिया था. सबसे अगुआ भूमिका वहां एनजीओज की रही. स्वसहायता समूहों का प्रयोग वहां से शुरू हुआ. माइक्रोक्रेडिट, माइक्रोयूनिट, छोटे व्यवसायों का संगठनीकरण इसके पहले माइलस्टोन थे.

You might also like

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

बंग्लादेश ग्रामीण बैंक के संस्थापक मोहम्मद यूनुस को नोबेल पीस प्राइज भी मिला. आगे चलकर इन छोटी छोटी यूनिट्स ने स्किल डेवलपमेंट और आधुनिकीकरण के साथ विदेशी कम्पनियों से अच्छे ठेके लिए.

सस्ता, उच्च गुणवत्ता का सामान बनाने में ऐसी प्रवीणता हासिल कर ली, कि दुनिया में एडिडास और नाइकी समेत तमाम बड़े ब्रांड जो कपड़ो, जूतों, बैग या खेल सामग्री में व्यापार करते है, अपना सामान बंगलादेशियो से बनवाने लगे.

जनता आगे बढ़ने लगे, और सरकार उसे सही माहौल, सही व्यापार नीति, सही समर्थन उपलब्ध कराए तो क्या चमत्कार हो सकता है, बंगलादेश उसकी केस स्टडी है. तो इरशाद और खालिदा के दौर में जो ‘लेबोरेटरी टेस्ट’ हुआ, शेख हसीना के दौर में वह जमीन पर तेजी से उतरा. बीस सालों में प्रति व्यक्ति आय, जीवन स्तर बढा. भूख, बीमारी और गरीबों की संख्या घटी. औरतों को आगे आने का अवसर मिला. मगर प्रशासन अलग चीज है, राजनीति दूसरी.

भारतीय उपमहाद्वीप के लोग, चाइनीज नहीं हैं. उन्हें राजनीतिक स्वतंत्रता भी बराबर चाहिए. वे सरकारें बदलना चाहते हैं, चेहरे बदलना चाहते हैं, प्रयोग करना चाहते हैं. लोकतन्त्र इसका मौका देता है, न दे तो वे सरकारें उखाड़ देते हैं.

और दूसरी तरफ, यहां लोकतन्त्र भी शैशव अवस्था में ही है. भारत हो, या पाकिस्तान, या बंग्लादेश.. सांप्रदायिकता हमारी राजनीति का इन्हेरेंट तत्व है. जनता विकास, जीवन स्तर, व्यापार से अधिक भावनात्मक मुद्दों पर उद्वेलित होती है. भारत ने इसे लम्बे समय तक एवॉइड किया लेकिन पाक-बांग्लादेश पैदा होते ही शीघ्र इसके ट्रेप में फंस गए. वहां की सेनाओ ने इसका फायदा उठाया. खुद सत्ता में आई, या अपने पिठ्ठु बिठाये.

हसीना नें इस राजनीति से बंग्लादेश में एक लंबा विराम दिया. पर इसके लिए तमाम हथकण्डे अपनाये. येन केन सत्ता से चिपकी रहीं. वही हथकण्डे अपनाए, जो कभी भारत में, इन्ही हालातों में इंदिरा ने अपनाए थे.

इसका कारण, विपक्ष में होने का डर भी रहा होगा. बंगलादेश में विपक्ष में होने का मतलब झूठे मुकदमे, जेल में होना, गोली मारा जाना, लिंच होना, कुछ भी हो सकता है. तो आज सत्ता छोड़ते ही भाग निकलीं. पर इंदिरा और हसीना में फर्क है. इंदिरा डटी रहीं. उन्होंने चुनाव कराए. जो इतने फेयर थे, कि हार गई. फिर जेल गयी, जांच झेली, हाथी पर चढ़कर नए सिरे से आगाज किया.

पर इंदिरा के पास उम्र थी, हसीना के पास नहीं. अच्छा होता, वे कुछ बरस पूर्व राजनीति से विदा ले लेती. जिस पॉपुलर जनवादी तख्तापलट, और पलायन के दाग से उनके करियर का अंत हो रहा है, वह इसकी हकदार नहीं थी.

और यही मेरा निष्कर्ष है. एक नेता वक्त की नदी को दिशा दे सकता है, ठहरा नहीं सकता. उसकी सक्षमता की, देने की सीमायें हो सकती हैं, जनता की मांग, आकांक्षाओं की नहीं. तो जब आप अपना बेस्ट दे दें, तो पीक पर रहते हुए ही पीछे हट जाना चाहिए. सुनहरे सूर्यास्त की ओर आपको बढ़ते देख, लोग रोयें, रोकें, मगर आप न रुकें. एक मुस्कान के साथ, अपने लोगों के दिलों में मीठी कसक छोड़ जाये.

हसीना वक्त रहते अपने करियर को वह खूबसूरत मोड़ देने में नाकाम रहीं. लेगेसी दागदार हो गयी. इसके बावजूद, बंगलादेश की 20 करोड़ जनता को उन्होंने एक अच्छा जीवन दिया. बंगबंधु की पुत्री के रूप में हसीना ने अपने हिस्से का काम किया है. तो उन्हें मलाल नहीं होना चाहिए. शेख मुजीब के पास जब वे जाएंगी, उन्हें पिता की शाबासी ही मिलेगी. वे जरूर मानेंगे, हिज डॉटर हैज डन हर जॉब…!

  • मनीष सिंह

Read Also –

बांग्लादेश में यूं ही नहीं हुआ तख्ता पलट..किसकी साज़िश !
बांग्लादेश के रूप में भारत ने कल एक अच्छा दोस्त खो दिया

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate
G-Pay
G-Pay
Tags: बंगलादेशमुजीबुर्रहमानशेख हसीना
Previous Post

बांग्लादेश के रूप में भारत ने कल एक अच्छा दोस्त खो दिया

Next Post

सिलबट्टे

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

by ROHIT SHARMA
June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

by ROHIT SHARMA
May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

by ROHIT SHARMA
May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

सिलबट्टे

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

विश्व गुरु बनने की सनक

October 30, 2020

क्या आप इस समाज को बेहतर बनाने के लिए उतनी मेहनत कर रहे हैं, जितनी जरूरत है ?

October 7, 2024

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026
Uncategorized

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.