Friday, July 24, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

बताइए, आदिवासियों के लिए आपने क्या रास्ता छोड़ा है ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 28, 2023
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter
बताइए, हत्या और बलात्कार से पीड़ित आदिवासियों के लिए आपने क्या रास्ता छोड़ा है ?
(प्रतीकात्मक तस्वीर) बताइए, आदिवासियों के लिए आपने क्या रास्ता छोड़ा है ?
हिमांशु कुमार, गांधीवादी विचारक

आदिवासी लड़की विजया सत्रह साल की थी. वह स्कूल में पढ़ती थी. वह छत्तीसगढ़ के दन्तेवाड़ा ज़िले के एक गांव में रहती थी. वह अपने परिवार वालों के साथ नजदीक के कस्बे किरंदुल बाज़ार गई थी. विशेष पुलिस अधिकारियों ने विजया और उसके साथ गए उसके परिवार के दो पुरुषों सोनू 55 वर्ष तथा बुधराम 18 वर्ष को पकड़ लिया.

विजया के साथ गए परिवार के दोनों सदस्यों को दंतेवाड़ा ले जाया गया, वहां उनकी पुलिस ने हत्या कर दी. उन दोनों की लाश कभी भी उनके परिवार को नहीं दी गई. विजया को किरंदुल थाने में एक महीने तक रखा गया. विजया बताती है – ‘मेरे साथ रोज़ बहुत सारे पुलिस वाले बलात्कार करते थे. एक महीने बाद मेरे मामा जो खुद विशेष पुलिस अधिकारी थे, उन्होंने बड़े अफसरों से कह कर मुझे घर जाने दिया.’

You might also like

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

विजया घर में रहने लगी. एक साल बाद विशेष पुलिस अधिकारी फिर से विजया के घर आये और उसे पकड़ कर गंगालूर थाना ले गये. विजया ने बताया यहां भी मेरे साथ पुलिस वाले रोज़ बलात्कार करते थे. पन्द्रह दिन के बाद एक रात विजया अंधेरे का फायदा उठा कर वहां से भाग निकली. अंधेरे में रास्ता भटक कर वह किसी दूसरे गांव में पहुंच गई. मैं जान बूझकर उस गांव का नाम नहीं लिख रहा हूं वरना पुलिस उन्हें पीट कर फिर से विजया को खोज लेगी.

कल रात विजया के गांव की महिलायें मुझे यह सब बता रही थी. महिलाओं ने बताया कि थाने से लौट कर नौ महीने बाद विजया के एक लड़का हुआ, जो बलात्कार की वजह से गर्भ ठहर जाने से हुआ. विजया अभी भी गांव में रहती है. कहने की ज़रूरत नहीं है कि विजया के मामले में कभी कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई. कोई जांच नहीं की गई. किसी को सज़ा नहीं हुई।

विजया की सुरक्षा के लिये मैनें उसका नाम बदल कर लिखा है और गांव का नाम भी नहीं लिखा है. लेकिन अगर सरकार इस मामले की जांच करना चाहे तो हम विजया को जांच दल के सामने पेश कर सकते हैं. बस्तर में आदिवासी महिलाओं की इस तरह की हज़ारों कहानियां बिखरी मिल जायेंगी. यह सब मुझे कल रात बुर्जी सत्याग्रह में आये आदिवासियों ने बताया. इसे मैं देशवासियों के सामने रख रहा हूं बताइए आपने आदिवासियों के लिए क्या रास्ता छोड़ा है ?

2

छत्तीसगढ के बीजापुर जिले के तोड़का आदिवासी गांव का दस साल का मनोज बकरी चरा रहा था. विशेष पुलिस अधिकारी उसे पकड़ कर जंगल में ले गए. मनोज को ज़मीन पर उल्टा लिटा कर उसकी गर्दन कुल्हाड़ी से काट दी. बाद में मां बाप लाश उठा कर लाए. नजदीक के गांव अंडरी में भी बारह साल के बच्चे सोढ़ी सन्नु को विशेष पुलिस अधिकारी गाय चराते समय पकड़ कर ले गए. बच्चे सोढ़ी सन्नु को विशेष पुलिस अधिकारी मार कर दफना दिए. इस बच्चे की लाश उसके परिवार को कभी नहीं मिली.

तोड़का गांव के साठ साल के बुज़ुर्ग ताती मंगू को विशेष पुलिस अधिकारियों ने घर से निकाल कर उसके नाक, कान, जीभ काट दी और कुल्हाड़ी से उसकी गर्दन काट दी. इसी गांव के दूसरे आदिवासी बुजुर्ग सुक्खू की भी विशेष पुलिस अधिकारियों ने जीभ, कान, नाक काटने के बाद कुल्हाड़ी से गला काट दिया. हिरोली गांव के पचास साल के कारम पांडू की सीआरपीएफ की नागा बटालियन ने गर्दन काट दी.

मरूंगा गांव में नौ आदिवासियों की पुलिस ने हत्या की, उनके नाम हैं –

  1. लेकाम लच्छू, 50 साल
  2. कोरसा सुक्खू, 60 साल
  3. कोरसा पांडू, 15 साल
  4. कोरसा लच्छू, 50 साल
  5. कोरसा सन्नू, 55 साल
  6. कोरसा आयतू, 45 साल (पिता सुक्खू)
  7. हेमला बदरू, 35 साल
  8. पुनेम कमलू, 34 साल
  9. कोरसा आयतु, 60 साल (पिता मासा)

यह जानकारी मुझे इन गांवों के आदिवासियों ने दी. यह लोग बुर्जी में चल रहे सत्याग्रह में आए हुए हैं. यह सभी घटनाएं भाजपा के शासन में हुई जब 2005 में सलवा जुडूम चला कर बड़े पैमाने पर आदिवासियों की हत्या की गई थीं. इन मामलों में किसी के खिलाफ कोई रिपोर्ट नहीं लिखी गई. किसी को कई सजा नहीं दी गई. आदिवासी पूरा दर्द और गुस्सा दिल में ले कर जी रहे हैं.

इस तरह की सैंकड़ों कहानियां मेरे पास जमा हो गई हैं जिन पर एक किताब लिखने की ज़रूरत है. इतिहास में यह दर्ज होना ही चाहिए कि भारत के आदिवासियों के ऊपर कितने अत्याचार हुए.

3

बड़ी कंपनियां कारपोरेट कंपनियों के लिए आदिवासियों की जमीनें हड़पने के लिए 2005 में भाजपा सरकार ने सलवा जुडूम अभियान शुरू किया था. इस अभियान में 644 से गांव में आग लगाई गई थी, हजारों आदिवासियों की हत्या की गई थी, हजारों आदिवासी महिलाओं से बलात्कार किए गए थे.

इस अभियान में सरकार ने 5000 लोगों को बंदूकें देकर उन्हें कहा था कि आप लोग विशेष पुलिस अधिकारी हो और गांव खाली कराने में इन लोगों का इस्तेमाल किया गया था. इन लोगों को सरकार ने विशेष पुलिस अधिकारी का नाम दिया था.

2011 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में सलवा जुडूम और इन विशेष पुलिस अधिकारियों को गैर संवैधानिक कहकर इनसे बंदूक वापस लेने का आदेश दिया था. लेकिन तब भाजपा सरकार ने और अब कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को नहीं माना और इन विशेष पुलिस अधिकारियों का नाम बदलकर डिस्टिक रिजर्व गार्ड यानि डीआरजी रख दिया है और इन्हें और ज्यादा खतरनाक बंदूकें दे दी है.

डीआरजी के कुछ मुख्य नेता है जो पहले नक्सली थे. लेकिन नक्सलियों ने निकाल दिया तो पुलिस में मिल गए हैं और अब उन्हें पुलिस अधिकारी बना दिया गया है. यह लोग बिना पढ़े लिखे हैं लेकिन सब इंस्पेक्टर तथा इंस्पेक्टर के पद पर प्रमोट कर दिए गए हैं.

यह लोग अपराधी गैंग की तरह काम करते हैं. गांवों में जाकर आदिवासियों को घरों से निकालकर गोली से उड़ा देते हैं. महिलाओं से बलात्कार करते हैं, निर्दोष लोगों को फर्जी मामलों में फंसाकर जेलों में डलवाते हैं. बड़ी कंपनियों के फायदे के लिए इन लोगों को इस्तेमाल किया जा रहा है.

इनमें से नारायणपुर जिले में काम करने वाला ऐसा ही एक डीआरजी का आधिकारी है, जिसका नाम सुक्खू नरोटे है. इसने कुछ समय पहले सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हमला करवाने में मुख्य भूमिका निभाई थी. बीजापुर जिले में बदरू है जो पहले नक्सली था और जिसने तब सोनी सोरी के पिता के पांव में गोली मारी थी, अब वह इंस्पेक्टर के पद पर प्रमोशन पाकर पुलिस अधिकारी बना हुआ है और अनेकों निर्दोष आदिवासियों की हत्या कर चुका है. यह भी अंगूठा छाप है.

इसी तरह सुकमा जिले में मड़कम मुदराज है, जिसने 2009 में सिंगारम के 18 आदिवासियों की हत्या की. गोमपाड़ में 16 आदिवासियों की हत्या की और 2016 गोमपाड़ गांव में ही मड़कम हिड़में के साथ बलात्कार के बाद हत्या किया. 2018 में नुलकातोंग गांव में 15 आदिवासियों की हत्या की थी. यह भी अनपढ़ है लेकिन अब पुलिस अधिकारी है.

आज भी वह खुलेआम नये अपराध कर रहा है. सिंगारम गांव के लोगों को धमका रहा है. छत्तीसगढ़ के नए मुख्यमंत्री कांग्रेस के भूपेश बघेल व मंत्री कवासी लखमा मंच पर उसकी पीठ थपथपा चुके हैं. पुलिस का काम गुंडों को सौंपने का यह प्रयोग बहुत खतरनाक है और आदिवासी इलाकों में तो इसने संविधान इंसानियत और कानून की कमर तोड़ दी है.

इन लोगों के खिलाफ ना तो पुलिस अधिकारी कुछ सुनने को तैयार है, ना नेता कोई कार्यवाही करने के लिए तैयार है और अदालतें इन लोगों के अपराधों को खुलेआम अनदेखा करती हैं बल्कि इनके खिलाफ किए गए अपराधों को उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं पर ही जुर्माना लगा देती हैं. बस्तर के आदिवासी इन लोगों के ज़ुल्म और दमन के नीचे दबकर बुरी तरह कराह रहे हैं लेकिन उनकी कोई सुनने वाला नहीं है.

Read Also –

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर हैण्डल पर फॉलो करे… एवं ‘मोबाईल एप ‘डाऊनलोड करें ]

scan bar code to donate
scan bar code to donate
Pratibha Ek Diary G Pay
Pratibha Ek Diary G Pay
Previous Post

हिन्डेनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट : 2014 का इतिहास दोहराया जाएगा ?

Next Post

सुप्रीम कोर्ट को माध्यम बनाकर भारत को फिर से गुलाम बना रही है मोदी सरकार ?

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

by ROHIT SHARMA
July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

by ROHIT SHARMA
July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

लोकतंत्र के अंतिम किले का पतन : भाजपा की ढाल बना चुनाव आयोग

by ROHIT SHARMA
June 16, 2026
Next Post

सुप्रीम कोर्ट को माध्यम बनाकर भारत को फिर से गुलाम बना रही है मोदी सरकार ?

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

अपराध

May 31, 2021

उद्योगपतियों की गुलाम मोदी सरकार ने खाद्य सामग्री पर लगाया 5% जीएसटी

July 19, 2022

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 1, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026
Uncategorized

‘ऑपरेशन कगार के खिलाफ और भारत में जनयुद्ध के समर्थन में लामबंदी जारी रखें’ – ICSPWI इटली

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

क्या कम्युनिस्ट पार्टी ने वास्तव में सुभाष चन्द्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा था ?

July 12, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जाति का सवाल वर्ग संघर्ष का ही एजेंडा है !

July 20, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 3 : उत्तर समन्वय समिति, सीपीआई माओवादी

July 22, 2026

उत्तर-आधुनिक अवसरवाद, भाग – 2, उत्तर समन्वय समिति (एनसीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)

July 20, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.