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केरला स्टोरी : वास्तविक मुसलमान इस फ्रेम में कहां फिट होता है ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
May 9, 2023
in गेस्ट ब्लॉग
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‘तुम्हारा भगवान हर किसी के साथ रासलीला करता फिरता है, एक भगवान है जिसकी बीवी को राक्षस उठा ले जाता है और वह बंदरों की मदद लेता फिरता है, तुम्हारा एक भगवान अपनी मरी हुई बीवी के शव को ले के घूमता है.’

शब्दों में उलटफेर हो सकती है क्योंकि मैंने फिल्म नहीं देखी, लेकिन हालिया रिलीज फिल्म से निकले सवाल कुछ ऐसे ही हैं— फेसबुक के धुरंधर जिनके जवाब लिखते फिर रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि यह फूहड़ और दूसरे के धर्म का मज़ाक उड़ाने वाले सवाल हैं किसके ? क्या किसी मुसलमान ने यह कहीं पूछे हैं किसी से ? नहीं…! यह सवाल एक मुस्लिम लड़की का किरदार निभाने वाली हिंदू अभिनेत्री ने पूछे हैं, तीन हिंदू लेखकों ने लिखे हैं और दो हिंदू निर्देशकों ने इन्हें फिल्मी पर्दे पर उतारा है.

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वास्तविक मुसलमान इस फ्रेम में कहां फिट होता है ? कहीं भी नहीं— लेकिन इन सवालों और इल्जामों को मुसलमानों का मान लिया गया है, और सयाने फिल्म देख कर अपमानित भी महसूस कर ले रहे हैं. इसके जवाब में थियेटर के अंदर और बाहर अपनी नफरत का प्रदर्शन भी कर रहे हैं और डेढ़ सयाने सोशल मीडिया पर इनके जवाब लिख रहे हैं.

यह कुछ ऐसा है कि मुसलमान खुद एक नाटक लिखें, और एक मुसलमान एक्टर स्टेज पर हिंदू पंडित बन कर पेश हो और इस्लाम को गालियां दे, मुसलमानों का मजाक बनाये, पैगम्बर पर कीचड़ उछाले और दर्शक दीर्घा में बैठे मुस्लिम दर्शक मारे अपमान के आग बबूला होते वहीं कपड़े फाड़ने पर उतर आयें. कोई लाॅजिक है इस बात का ? फिर इसके बचाव में यह तर्क गढ़ा जाये कि भले ऐसा पेश करने वाले सब हिंदू हों, लेकिन है तो सच ही— क्या कुछ हिंदू ऐसा करते नहीं ? यही आप इस अपनी पसंदीदा फिल्म के फेवर में करते नहीं घूम रहे ?

ठीक है, आप कहने को तर्क दे सकते हैं कि कुछ मुसलमानों के ऐसे बयान हो सकते हैं, तो भाई फिर उस तर्ज पर ढेरों हिंदू भी मिल जायेंगे, जो ठीक वैसे ही मुसलमानों, उनके धर्म और उनके पैगम्बर को गाली देते फिरते हैं इसी सोशल मीडिया पर. क्या वे कोई आइडियल या व्यापक समाज का सच हो सकते हैं कि उन्हें इस लापरवाही से फिल्मी पर्दे पर उतारा जाये कि उन्हें देखने वाला एकदम से मन में नफरत पाल ले, थियेटर के अंदर बाहर गाली दे, सोशल मीडिया पर कलम घिस के उनकी फूहड़ बातों के जवाब दे ?

फिल्म बनाना एक कला है, जो संवेदनशीलता भरी जिम्मेदारी की डिमांड करती है, भले पर्दे पर इतिहास उकेरना हो, या किसी क्रूर घटना का सच उकेरना हो, इस बात का पूरा ख्याल रखा जाता है कि वह दर्शकों को एक अच्छा मैसेज दे, न कि उन्हें दूसरों से नफरत के लिये उकसाये. ऐसा लगता है जैसे फिल्म बनाने जैसी जिम्मेदारी भरी कला को भी दक्षिणपंथी फिल्मकार रेडियो रवांडा के अगले चरण के रूप में विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं.

फ़िल्म बनाने वालों ने तो होलोकास्ट जैसे अति संवेदनशील विषयों पर भी फिल्में बनाई हैं, जो सच्चाई को ही बयान करती हैं, लेकिन बनाने वालों ने कितनी संवेदनशीलता से उन्हें हैंडल किया है, कभी महसूस किया है आपने ? फिल्म उस सारी सच्चाई को कह जाती है, लेकिन फिर भी देखते वक़्त दर्शक दूसरे वर्ग की नफरत में पागल नहीं हो जाता, बल्कि फिल्म में दिखाया गया आतताई, शोषक या आरोपी पक्ष तक उन्हें सराहता है. और यहां कैसे बनाई जा रही हैं ? सब कुछ खुद ही मुसलमान बन के कहे ले रहे, कड़वा से कड़वा. बुरे से बुरा दिखाये ले रहे, बिना इस बात की रत्ती भर परवाह किये कि ऐसा कंटेंट दर्शकों के दिमाग़ को एक पूरे समुदाय से सीधे नफरत करने के लिये ट्रिगर कर रहा है.

ऐसा लग रहा है जैसे सच कहने के बहाने फिल्में नहीं बनाई जा रहीं, बल्कि ठीक जर्मनी की तर्ज पर बहुसंख्यक वर्ग को, देश के एक अल्पसंख्यक वर्ग के नरसंहार के लिये मानसिक रूप से तैयार करने की पटकथा लिखी जा रही हो, जिसकी प्रायोजक जर्मनी की तरह ही यहां भी सत्ता ही है. ठीक है, बड़ा सच जानना है आपको फिल्म के ज़रिये— तो एक ईमानदार टेस्ट कीजिये. फिल्म देखते वक़्त महसूस कीजिये उस नफरत को, जो आपमें उन ढाई-तीन घंटों में भर गई है.. और फिर घर पहुंच कर, थोड़ा दिमाग़ ठंडा करके अपने आसपास के, जिनसे आपका परिचय है, उन मुसलमानों को देखिये और सोचिये कि क्या वे आपकी उस नफरत के वाकई हकदार हैैं ?

यहां इस बात का बहाना मत लीजिये कि जिन्हें आप जानते हैं, वे तो अच्छे हैं लेकिन दुनिया के बाकी सारे मुसलमान वैसे ही बुरे हैं, जैसा आपने मान लिया है— सच यह है कि बाकी मुसलमान भी ऐसे ही हैं. अच्छे-बुरे सब मिक्स, जैसे हर धर्म में होते हैं. हिंदू भी वैसे ही नफरती और धर्म के नाम पर जान लेने वाले मिल जायेंगे, जैसे मुसलमान मिलेंगे— लेकिन मुसलमान भी दूसरों के लिये जान देने वाले मिल जायेंगे, जैसे हिंदू मिलेंगे. सारे देवता कहीं नहीं होते, सारे शैतान कहीं नहीं होते. एक समाज सबसे मिल कर बनता है— सिर्फ चंद बुरों को आइडियल मान कर अगर आप पूरे समाज को उसी परिभाषा में फिट करना चाह रहे हैं तो सबसे पहले आपको आइना देखना चाहिये, उस हिसाब से आप ख़ुद भी उतने ही बुरे हैं, जितने आपके धर्म के दंगाई.

एक नमन तो उन्हें भी बनता है जिन्हें उन फिल्मों से सच्चाई पता चलती है, जहां पहले ही सबकुछ काल्पनिक होने का डिस्क्लेमर दे दिया जाता है. और सबसे कठोर नमन उस नमूने के लिये बनता है जिसके हाथ में सभी जांच एजेंसियों की बागडोर और सभी न्यूज़ एजेंसियों पर जिसका होल्ड हो, लेकिन जिसे सारा सच और साजिशें फिल्म से ही समझ में आते हैं.

नोट: कृपया ‘नमूने’ शब्द को गाली नंबर 92 के रूप में न अंकित करें, इसका अर्थ सैम्पल, माॅडल, प्रोटोटाईप आदि होता है.

  • अशफाक अहमद

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