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Home गेस्ट ब्लॉग

NRC संविधान की बुनियादी अवधारणा के खिलाफ

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 22, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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NRC पर गिरीश मालवीय कहते हैं, आप समझ नहीं पा रहे हैं. बात दरअसल NRC की नहीं है. NRC तो चारा है. NRC के पीछे जो ‘नागरिकता संशोधन विधेयक’ छुपा हुआ है वो है असली खेल.

पिछली लोकसभा भंग होने के साथ ही मोदी-1 में लाया गया विवादित नागरिकता संशोधन विधेयक भी रद्द हो गया था. मोदी सरकार ने 8 जनवरी, 2019 को इसे लोकसभा में पेश किया था, जहां ये पारित हो गया, लेकिन राज्यसभा में ये बिल पास नहीं हो पाया था, अब इसे दुबारा से लाने की कोशिश की जा रही है.

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यह ऐसा विधेयक था जो भारत के पिछले 70 सालों के संसदीय इतिहास में कभी नहीं आया था. यह विधेयक भारतीय संविधान की मूल अवधारणा के खिलाफ है. यह हमारी संविधान की प्रस्तावना की मूल भावना के विपरीत है.

दरअसल सरकार के नागरिकता संशोधन विधेयक में पड़ोसी देशों अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के हिंदू, पारसी, सिख, जैन और ईसाई प्रवासियों को नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है, लेकिन मुसलमानों को नहीं. इस विधेयक में यह प्रावधान किया गया है कि ग़ैर-मुस्लिम समुदायों के लोग अगर भारत में छह साल गुज़ार लेते हैं तो वे आसानी से नागरिकता हासिल कर सकते हैं, लेकिन मुस्लिम मतावलंबियों को यह छूट हासिल नहीं होगी.

कभी किसी ने सोचा भी नही था कि भारत में नागरिकता का आधार धर्म को बनाया जाएगा और धार्मिक आधार पर लोगों से नागरिकता प्रदान करने को लेकर भेदभाव किया जाएगा. पर अब यह सच होने जा रहा है.

संघ चाहता है कि मोदी सरकार नागरिकता संशोधन विधेयक को एक बार फिर संसद में पेश करे. दरअसल NRC में एक गड़बड़ भी हो गयी है. एनआरसी की फ़ाइनल सूची से जो 19 लाख लोग बाहर रह गए हैं, उनमें 13 लाख हिंदू और अन्य आदिवासी समुदाय के लोग शामिल हैं और उन्हें अब कैसे भी करके बचाना है.

लेकिन पूर्वोत्तर की शरणार्थी समस्या कभी भी हिन्दू वर्सेज मुस्लिम नहीं था. यह मुद्दा हमेशा से स्थानीय वर्सेज बाहरी था.

नागरिकता (संशोधन) विधेयक 1985 के असम समझौते का उल्लंघन करता है. सरकार की ओर से तैयार किया जा रहा राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) और असम समझौता ये दोनों धर्म को आधार नहीं मानते. ये दोनों किसी को भारतीय नागरिक मानने या किसी को विदेशी घोषित करने के लिए 24 मार्च, 1971 को आधार मानते हैं.

असम समझौता बिना किसी धार्मिक भेदभाव के 1971 के बाद बाहर से आये सभी लोगों को अवैध घुसपैठिया ठहराता है. जबकि नागरिकता संशोधन क़ानून बनने के बाद 2014 से पहले आये सभी गैर-मुस्लिमों को नागरिकता दी जा सकेगी, जो कि असम समझौते का उल्लंघन होगा. इसलिए यहांं समझने लायक बात यह है कि NRC का मुद्दा उठा कर, घुसपैठियों की बात कर के देश में हिन्दू वोट बैंक को पक्का किया जा रहा है

दरअसल बीजेपी की राजनीति देश में हिंदू वोट बैंक मज़बूत करने की कोशिश है. पहले दलित वोट बैंक होता था, मुस्लिम वोट बैंक होता था, पिछड़ा वोट बैंक हुआ करता था, लेकिन अब इनसे कहीं आगे हिंदू भी अब वोट बैंक बन चुका है.

पूर्वोत्तर क्षेत्र के कई छात्र संगठन प्रस्तावित नागरिकता संशोधन विधेयक में पहले ही विरोध में उतर चुके हैं. पूर्वोत्तर क्षेत्र के लोग प्रस्तावित संशोधन के खिलाफ हैं, क्योंकि यह धार्मिक आधार पर लोगों को नागरिकता देगा.

उदाहरण के तौर पर मिज़ोरम के संदर्भ में इसका मतलब यह होगा कि यह कानून बनने के बाद चकमा बौद्धों को वैध कर देगा, जो अवैध तरीके से बांग्लादेश से राज्य में घुसे हैं. ऐसे ही नागालैंड और अन्य राज्यों की स्थिति है.

लेकिन इन सब बातों को सिरे से खारिज कर मोदी सरकार जल्द ही फिर से सिटिजनशिप अमेडमेंट बिल (Citizenship Amendment Bill-CAB) लाने वाली है. इसलिए बार-बार NRC के बहाने घुसपैठियों का तर्क दिया जा रहा है. इस खेल को जनता जितना जल्दी समझ ले उतना अच्छा है.

उधर पुरुषोत्तम शर्मा NRC पर बताते हैं कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी राज्य में एनआरसी लागू करने की बात कर रहे हैं. ये मूर्ख नहीं, अपने ही नागरिकों के खून के प्यासे दैत्य हैं.

पहाड़ के दो तिहाई नागरिक रोटी-रोजी की तलाश में पलायन कर चुके हैं. जो गांवों में बचे हैं, उनमें भी दलितों की संख्या काफी है, जो 90 प्रतिशत से ऊपर भूमिहीन हैं और उनके पास कोई पुराना रिकार्ड नहीं है.

इसी तरह समय-समय पर आई आपदाओं में जिनका सब कुछ चला गया, उनके पास नागरिकता साबित करने को क्या बचा है ? तराई भाबर के खत्तों में सदियों से बसे गुर्जर व खत्तावासियों के पास भी कोई पुराना रिकार्ड नहीं है. तराई भाबर की लगभग 80 प्रतिशत बसावट 1951 के बाद की है, जिनके पास राज्य की नागरिकता साबित करने का कोई सबूत नहीं है. इस तरह से हिसाब लगाएं तो पहाड़ के 75 प्रतिशत नागरिक और तराई भाबर के 80 प्रतिशत नागरिक तो सीधे इनके नागरिकता रजिस्टर से बाहर हो जाएंगे.

ज्यादातर राज्यों में आज इन एनआरसी समर्थक दैत्यों की ही सरकारें हैं, जो वहां रोजगार के लिए बसे बाहरी राज्यों के लोगों को नागरिकता रजिस्टर में दर्ज नहीं करेंगे. ऐसे में उत्तराखंड के नागरिकों की 75 प्रतिशत आबादी इन हत्यारों के डिटेंशन कैम्पों में मरने को मजबूर होगी.

एनआरसी का विरोध करें. धर्म के नाम पर अपने ही नागरिकों के खून के प्यासे इन दैत्यों को सत्ता से बाहर करने के लिए प्रतिरोध संघर्ष तेज करें.

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