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Home कविताएं

ये मलिन बस्ती

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 11, 2022
in कविताएं
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3.2k
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ये मलिन बस्ती
ये मलिन बस्ती

ये मलिन बस्ती
यहां पर हड्डियों के आदमी हैं
पीर का स्थायी डेरा
आह का है ये ठिकाना
टट्टरौं में टाट लिपटे
बहुत छोटे-छोटे घर हैं
और इन छोटे घरों में
है बड़ों का आना-जाना.

ये मलिन बस्ती
यहां पर भूख का
साम्राज्य रहता.
मर्द, औरत, बाल-बच्चे
हैं सभी मैले कुचैले
देह पर बनियान जर्जर
नेकरा, चड्डी फटी है
सलवटी लुंगी
लगे पैबंद जिसमें
वो पहनने-ओढ़ने के काम आती.
चार ईंटें हैं इधर
चार ईंटें हैं उधर
और उस पर एक पत्थर
है यही कुर्सी
यही बिस्तर बनेगा
है यही दर ओ ठिकाना
और इन छोटे घरों में
है बड़ों का आना-जाना.

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कौन है श्रेष्ठ ?

आठ या बारह बरस के
लड़कियां हैं और लड़के
पन्नियों को बीनते हैं
गंदगी के ढेर से
आदमी रिक्शा चलाएं
हाथ का ठेला लगाएं
जो मिले जितना मिले
गांजा, चरस के काम आए
शाम ढलते जिस्म नाज़ुक
बेबसी में रूप बदलें
तब कहीं छोटे घरों में
रोज़ आए आबोदाना
और इन छोटे घरों में
है बड़ों का आना-जाना.

पट बदल आते पुजारी
मुंह छुपाए शेख़ आते
और बिन नागा किए ये
तय समय पर रोज़ आते
ये बड़े घर के बड़े हैं लोग
इनके पास में कई गाड़ियां हैं
रंग भी सबके अलग हैं
व्यस्त रहते हैं हमेशा
जब भी ये घर से चलेंगे
बात ये कह के चलेंगे
कंपनी का मामला है
अफसरों से बात होगी
देर तक मीटिंग चलेगी
रात का खाना वहीं है
वापिसी कुछ लेट होगी
कुछ न कुछ हर दिन बहाना
और इन छोटे घरों में
है बड़ों का आना-जाना.

कार पार्किंग में रखेंगे
कुछ क़दम पैदल चलेंगे
हाथ देकर एक रिक्शेवाले
से कुछ यूं कहेंगे
तीसरे नम्बर के चौराहे पे
मुझको छोड़ देना
डेढ़ घंटे बाद आना
फिर यहीं पर छोड़ देना
बोल जल्दी क्या चलेगा ?
दो गुना भाड़ा मिलेगा
रिक्शेवाला बोलता है
हमको दो पैसे कमाना
और इन छोटे घरों में
है बड़ों का आना-जाना.

  • डॉ. सुनील त्रिपाठी निराला

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