Monday, June 8, 2026
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय
No Result
View All Result
Pratibha Ek Diary
No Result
View All Result
Home गेस्ट ब्लॉग

उत्तर प्रदेश में  चिकित्सकों और बुनियादी सुविधाओं के वगैर भी चल रहे हैं प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 25, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
0
3.3k
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

उत्तर प्रदेश में  चिकित्सकों और बुनियादी सुविधाओं के वगैर भी चल रहे हैं प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र

प्रतीकात्मक तस्वीर

You might also like

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

Vinay Oswalविनय ओसवाल, वरिष्ठ पत्रकार

उत्तर प्रदेश में चल रहे तीन हजार 621 स्वास्थ्य केन्द्रों  में से दो हजार 277 में बुनियादी सुविधाएं जैसे डॉक्टर, बिजली, पीने का पानी और केन्द्रों तक पहुंचने के लिए सड़कें नदारद हैं, यानी वह सिर्फ कागजों पर चल रहे हैं. सरकारी आंकडे बताते हैं कि सरकार बमुश्किल प्रति 927 लोगों के पीछे वह एक डॉक्टर ही उपलब्ध करा पा रही है. केंद्रीय स्वास्थ्य मन्त्री ने लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में यह आंकड़े उपलब्ध कराए हैं.

डॉक्टरों की उपलब्धता का यह आंकड़ा भी इसलिए कागजी है क्योंकि इनमें से भी बहुत से डॉक्टर रोजाना ड्यूटी पर नहीं आते. या तो वह लम्बी छुट्टी ले अपनी पत्नी या अन्य परिजनों, मित्रों द्वारा स्थापित निजी अस्पतालों को सेवाएं देते हैं, या फिर सिर्फ उपस्थिति की औपचारिकता पूरी कर ऐसे अस्पतालों, नर्सिंग होमों, चिकित्सालयों में पहुंंच जाते हैं.

अधिकांश कार्यरत कर्मचारियों की नियुक्ति ठेकेदारी प्रथा पर किये जाने की व्यवस्था है, जिन्हें स्थाई रूप से सेवा दे रहे डॉक्टरों की तुलना में बहुत कम पारिश्रमिक मिलता है. यह खेल सुचारू रूप से इसलिए चल रहा है कि जिला स्तर पर बैठे विभागीय अधिकारियों से लेकर सत्ताधारी नेताओं तक इस व्यवस्था की हर कड़ी इस तरह पोषित है कि सबकी  जरूरतें पूरी हो रही हैं. सब सन्तुष्ट हैं क्योंकि इस औपचारिक व्यवस्था का बोझ मरीज, उसके परिजन और सरकारी खजाने से मिलने वाली पगार सब पर पड़ता है.

सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने को मजबूर आर्थिक रूप से विपन्न लोगों की आवाज मीडिया उठाता है लेकिन वह भी नक्कारखाने में तूती से ज्यादा असर नहीं करती.

स्थिति की भयानकता का अंदाजा इस बात से लगता है कि प्रदेश में डॉक्टरों के कुल 4509 पद सृजित है, जिनमें से 3165 पर किसी डॉक्टर की नियुक्ति हीं नही की गई है. 270 केन्द्रों पर पेयजल की, 213 पर बिजली की और 459 केन्द्रों पर पहुंचने के लिए सड़कें ही नहीं है. पाठक अनुमान लगा सकते हैं कि प्रदेश में झोलाछाप डॉक्टरों के पनपने को बढ़ावा किसकी लापरवाही से मिल रहा है.

केंद्रीय स्वास्थ मन्त्री हर्षवर्धन ने बताया कि अपने-अपने राज्यों में स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सेवाएंं राज्य सरकारों द्वारा चलाई जाती है. केन्द्र राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों को उनके द्वारा चलाई जाने वाली स्वास्थ सेवाओं और कार्यक्रमों को मजबूती प्रदान करने के लिए आर्थिक और तकनीकी  सहायता उपलब्ध कराता है. इसी में ठेके पर डॉक्टरों की नियुक्ति के लिए सहायता भी शामिल है.

केन्द्र सरकार ने देश के विभिन्न मेडिकल कालेजों में पिछले पांच सालों में एमबीबीएस सीटों की संख्या 29,000 बढ़ाई है. डॉ. हर्षवर्धन के अनुसार वर्ष 2017-18 के बजट में केन्द्र ने डेढ़ लाख प्राथमिक केन्द्रों और उप-केन्द्रों को आयुष्मान भारत कार्यक्रम के अंतर्गत देख-भाल, स्वास्थ्य, रोगों की रोक-थाम एवं स्वास्थ्य कल्याण केन्द्रों में तब्दील करने की घोषणा की है.

इन केन्द्रों पर डॉक्टरों की उपलब्धता, बिजली, पीने के लिए पानी और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों तक पहुंचने के लिए सड़कों की व्यवस्था राज्य सरकार कैसे करेंगी, लोगों का यह सवाल, सरकार से उत्तर की प्रतीक्षा में अपनी जगह खड़ा है.

कागजों पर की गई कार्यवाहियों और घोषणाओं से मरीजों का इलाज नहीं होता है, सरकारों के सामने इस बात को समझने की कोई मजबूरी निकट भविष्य में खड़ी होगी, इसकी कोई सम्भावना अभी तो नजर नहीं आ रही है. हम सब  देख रहे हैं कि महाराष्ट्रा विधानसभा में चुनकर पहुंचे जनप्रतिनिधि मतदादाओं के निर्णय का चीरहरण कैसे कर रहे हैं.

Read Also –

बिहार के सरकारी अस्पतालों की व्यथा-कथा
नक़ली दवाओं का जानलेवा धन्धा
मुजफ्फरपुर के अस्पताल में मरते बच्चे और जिम्मेदारी से भागते अधिकारी और सरकार
मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौतें क्या किसी दवाइयों के परीक्षण का परिणाम है ?

[ प्रतिभा एक डायरी स्वतंत्र ब्लाॅग है. इसे नियमित पढ़ने के लिए सब्सक्राईब करें. प्रकाशित ब्लाॅग पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है. प्रतिभा एक डायरी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे…]

Previous Post

महाराष्ट्र : अनैतिकता की एकता

Next Post

बच्चा पैदा करने के लिए क्या आवश्यक है ??

ROHIT SHARMA

ROHIT SHARMA

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Related Posts

गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

by ROHIT SHARMA
June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

by ROHIT SHARMA
May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

by ROHIT SHARMA
May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

by ROHIT SHARMA
April 16, 2026
गेस्ट ब्लॉग

व्लादिमीर लेनिन का लियोन ट्रॉट्स्की के बारे में क्या मत था !

by ROHIT SHARMA
March 28, 2026
Next Post

बच्चा पैदा करने के लिए क्या आवश्यक है ??

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recommended

सत्ता के अहंकार में रोजगार पर युवाओं के साथ मजाक

February 16, 2018

कश्मीर में आतंकवादी हमला और प्रधानमंत्री-भाजपा की खामोशी

February 10, 2018

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Don't miss it

Uncategorized

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026
Uncategorized

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026
गेस्ट ब्लॉग

जिन्हें भाजपाई होने पर शर्म आती है, इसलिए खुद को समाजवादी कहते हैं

June 4, 2026
गेस्ट ब्लॉग

धरती और औरत, दोनों के प्रति आदिवासी समाज का नजरिया गैर आदिवासी समाज से भिन्न

May 30, 2026
गेस्ट ब्लॉग

ममता बनर्जी वही काट रही है जो उसने तीन दशकों में बोया था…

May 20, 2026
गेस्ट ब्लॉग

दिल्ली में FACAM के द्वारा आयोजित कार्यक्रम के नेतृत्वकर्ताओं पर दिल्ली पुलिस के आक्रामकता के खिलाफ बयान

April 16, 2026

About Pratibha Ek Diary

'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

Categories

  • Subroto's Corner
  • Uncategorized
  • आभा का पन्ना
  • कविताएं
  • गेस्ट ब्लॉग
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा

Recent News

भारत में अमीरी के प्रति, गैर बराबरी के प्रति गहरी सहनशीलता है

June 7, 2026

कैसे एक पेपर लीक का मुद्दा घूमते-घूमते ‘हिंदू-मुस्लिम’ तक पहुंच गया ?

June 7, 2026

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • ब्लॉग
  • गेस्ट ब्लॉग
  • युद्ध विज्ञान
  • लघुकथा
  • पुस्तक / फिल्म समीक्षा
  • कविताएं
  • ई-पुस्तकालय

© 2026 Pratibha Ek Diary. All Rights Reserved.