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बिहार के सरकारी अस्पतालों की व्यथा-कथा

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 23, 2019
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बिहार के सरकारी अस्पतालों की व्यथा-कथा

Ravish Kumarरविश कुमार, पत्रकार

आज बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने एक ट्वीट किया है कि राबड़ी देवी बताएं, उनके शासन में मेडिकल कॉलेजों की क्या स्थिति थी. यह सुनकर किसी को भी लग सकता है कि राबड़ी देवी का कार्यकाल समाप्त होने के बाद काफी कुछ सुधार हुआ होगा.

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सुशील मोदी को बताना चाहिए कि 2005 के बाद से जब नीतीश सरकार सत्ता में आई और वे भी कुछ समय को छोड़ दें तो उप मुख्यमंत्री रहे, तो इन 14 वर्षों में बिहार में कितने नए सरकारी मेडिकल कॉलेज बने. बेतिया, पावापुरी और मधेपुरा में सरकारी अस्पताल बनाने का ऐलान हुआ था मगर अभी तक दो ही चालू हो पाए हैं. सुशील मोदी यह भी बता सकते हैं कि ऐसा क्या हो गया बिहार में कि 2017-18 के बजट में 1000 करोड़ की कमी करनी पड़ गई. जरूर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की तारीफ होती है लेकिन वह भी तो पर्याप्त नहीं है. कुछ जगहों के पीएचसी को छोड़ दें तो सरकार बताए कि उसके पास पीएचसी के लिए पर्याप्त डाक्टर हैं. जब बिहार में 5000 डाक्टरों की कमी है तो जाहिर है उस कमी का असर प्राइमरी हेल्थ सेंटर पर भी होता होगा. बिहार सरकार को बताना चाहिए कि वह चार साल तक राज्य में बनने वाले दूसरे एम्स के लिए ज़मीन क्यों नहीं खोज पाई. क्यों उसे दरभंगा मेडिकल कालेज को ही एम्स में अपग्रेड करना पड़ा. 2015-16 के बजट में ही अरुण जेटली ने बिहार में एक नए एम्स बनाने की घोषणा की थी.




इस घोषणा के तीन साल बाद 19 दिसंबर 2017 को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय एक बयान जारी करता है और बताता है कि नए एम्स की ताज़ा स्थिति क्या है. राज्यसभा में स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी चौबे बयान देते हैं. जो इस बार भी स्वास्थ्य राज्यमंत्री हैं. 2017 में बयान देते हैं कि बिहार सरकार से गुज़ारिश की गई है कि वह नए एम्स की स्थापना के लिए 3-4 विकल्पों के नाम सुझाए. मगर राज्य सरकार अभी तक इन जगहों की पहचान नहीं कर पाई है.

2015 में घोषणा होती है कि बिहार में नया एम्स बनेगा. 2015 से 2019 आ जाता है नए एम्स के लिए ज़मीन नहीं मिल पाती है. इतने साल में दूसरा एम्स बनकर तैयार हो गया होता. जब 2019 का लोकसभा चुनाव नज़दीक आ गया तब जाकर 4 मार्च 2019 को जेपी नड्डा स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर घोषणा करते हैं कि दरभंगा मेडिकल कालेज को ही एम्स बनाया जाएगा. सरकार को पता होता है कि न तो पत्रकार और न जनता को कुछ पता होता है इसलिए कुछ भी घोषणा कर दो. ताली लूट लो. मैंने ऐसा क्यों कहा… इसका जवाब आपको 2014 में स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा के बयान से मिलेगा. 28 नवंबर 2014 को प्रेस इन्फोर्मेशन ब्यूरो प्रेस रिलीज जारी करता है कि प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत 39 कालेज हैं जिन्हें अपग्रेड किया जाना है. इसमें मुजफ्फरपुर का श्री कृष्ण मेडिकल कालेज भी है और दरभंगा मेडिकल कालेज भी है. आठ महीने बाद फिर से जुलाई 2015 में एक और प्रेस रिलीज जारी होती है और उसमें भी कहा जाता है कि दरभंगा मेडिकल कालेज अपग्रेड होगा. जाहिर है 2015 से 2019 तक प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत दरभंगा मेडिकल कालेज को अप्रगेड नहीं किया जा सका. सिर्फ घोषणा की गई. मार्च 2019 में दरभंगा मेडिकल कालेज को लेकर दूसरी घोषणा होती है कि इसे एम्स में अपग्रेड किया जाएगा. 2014 से लेकर 2019 के बीच यह अस्पताल यानी मेडिकल कॉलेज एक बार अपग्रेड होने की लिस्ट में आता है और एक बार एम्स के रूप में अपग्रेड होने की सूची में आता है.




दरभंगा मेडिकल कॉलेज को लेकर दो-दो बार प्रेस रिलीज जारी होती है कि इसे अपग्रेड किया जाएगा. तब तक इसे एम्स में अपग्रेड करने की बात नहीं थी. क्योंकि एम्स अपग्रेड कर नहीं बनता. शायद दरभंगा मेडिकल कॉलेज पहला है जिसे अपग्रेड कर एम्स बनाने की घोषणा की गई. आप प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना की वेबसाइट पर जाकर देखें, एम्स बनाने और मेडिकल कॉलेजों को अपग्रेड करने की बात थी. इधर केंद्र सरकार परेशान है कि राज्य सरकार नए एम्स के लिए जमीन नहीं दे पा रही है. हिमांशु शेखर ने श्री पाद नाईक से बात की. वे पिछली मोदी सरकार में भी स्वास्थ्य राज्य मंत्री थे.

श्री पाद नाईक ने कहा ‘ वही तो दिक्कत हुई है… जमीन नहीं है, अगर राज्य सरकार जमीन देती तो आज तक ये काम एकदम कम्पलीट हो जाता. ऐसा मैं नहीं कहता हूं लेकिन, कम से कम काम शुरू तो हो जाता. तो राज्य सरकार को फिर भी विचार करना है. एक बड़ा इंस्टीट्यूट जब तक वहां नहीं होगा, रिसर्च सेंटर नहीं होगा, तो एंसिफ्लाइटिस जैसे रोगों पर काबू कैसे पाएंगे.’

बिहार सरकार चार साल में नए एम्स के लिए जमीन नहीं खोज पाई. अब इस देरी के लिए राबड़ी देवी से पूछा जाए या सुशील मोदी से. सुशील मोदी ने तो आसानी से राबड़ी देवी से सवाल कर दिया लेकिन जब पत्रकारों ने उनसे सवाल किया तो जवाब ही नहीं दिया. पहले सुशील मोदी अपने खाते का तो हिसाब दे दें.

अब आप एक और सवाल पूछिए. दरभंगा मेडिकल कालेज को एम्स बनाने के लिए क्या वहां के डाक्टरों से राय ली गई थी. आप हर अस्पताल को एम्स नहीं बना सकते. एम्स की जवाबदेही दूसरी होती है और गैर एम्स मेडिकल कालेज की जवाबदेही दूसरी होती है. हमारे सहयोगी प्रमोद गुप्ता ने जानकारी भेजी है कि ज़िला प्रशासन ने एम्स के लिए 214 एकड़ ज़मीन चिन्हित कर राज्य सरकार को भेज दिया था. मगर केंद्र सरकार की स्वास्थ्य समिति ने पाया कि उस ज़मीन पर एम्स नहीं बन सकता है.




आप सुशील मोदी से यही पूछें कि मार्च 2019 में दरभंगा मेडिकल कालेज को एम्स में अपग्रेड करने की जो घोषणा हुई थी उसके लिए ज़मीन मिल गई है क्या. आप डीएमसीएच की इन तस्वीरों को देख रहे हैं. केंद्र सरकार ने 2015 में जो दरभंगा मेडिकल कॉलेज को अपग्रेड करने का फैसला किया था. इसके तहत एक सुपर स्पेशियालिटी अस्पताल की इमारत बनकर तैयार है. जिसे दिसंबर 2018 में ही चालू हो जाना था अभी तक चालू नहीं हो सकी थी. इसके पीछे सर्जरी वार्ड है. जिसे 2016 में ही खतरनाक घोषित कर दिया गया था मगर अभी भी वहां पर सर्जरी हो रही है. एक साल पहले नया सर्जरी वार्ड बनाने के लिए पैसे की मंज़ूरी दे दी गई लेकिन इमारत कहां बनेगी जगह की पहचान तक नहीं हो सकी है. ये है राज्य सरकार की प्राथमिकता का हाल. इस अस्पताल में कहीं ट्राली है कहीं ट्राली नहीं है. जहां ट्राली है तो उसे ले जाने वाला आदमी नहीं है. मरीज़ खुद ट्राली चलाकर जाता है. सारा परिवार इस मरीज़ को इसलिए उठाकर ले जा रहा है क्योंकि ट्राली नहीं है.

जनवरी 2019 तक बिहार सरकार को पता नहीं है कि इसे एम्स में अपग्रेड कर दिया जाए. क्योंकि जनवरी 2019 में बिहार सरकार डीएमसीएच को अपग्रेड करने के लिए अपना हिस्सा जारी कर रही थी. अचानक मार्च में ऐलान होता है कि दरभंगा मेडिकल कालेज एम्स में अपग्रेड होगा. सुशील मोदी ने ठीक कहा. इसका जवाब राबड़ी देवी को ही देना चाहिए क्योंकि इन सब सवालों का जवाब सुशील मोदी नहीं दे सकते हैं.

इस बीच मुजफ्फरपुर के श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज में दिमागी बुखार से होने वाली मौत की खबरें अब थमने लगी हैं. हमारे सहयोगी मनीष कुमार उनसे जानना चाहते थे कि जो बच्चा डिस्चार्ज होता है उसका ख्याल कैसे रखा जा रहा है. क्योंकि बच्चा पूरी तरह से ठीक नहीं होता है. उसे दूसरी समस्या रहती है. तो अस्पताल के सुप्रीटेंडेंट एसके शाही के जवाब से ऐसा नहीं लगा कि उन्हें पता भी है कि एक्यूट एंसिफ्लाइटिस के बच्चे को डिस्चार्ज होने के बाद केयर की ज़रूरत भी होती है.




सरकार कहती है कि मरने वाले बच्चों की संख्या 109 है. लेकिन क्या यह पूरी संख्या है. क्या इसमें वे बच्चे भी शामिल हैं जो अस्पताल मे नहीं पहुंच सके और गांव में ही दम तोड़ गए. मनीष कुमार और हबीब ने वैशाली ज़िला के भगवानपुर प्रखंड के कुछ गांवों का दौरा किया. जहां 15 बच्चों की मौत हुई है. गांव लौट आए लोगों से पता चल रहा है कि जब बच्चा बीमार हुआ तो अस्पताल तक ले जाने में उन्हें कितनी मशक्कत करनी पड़ी. आप इन लोगों को सुनिए. पता चलेगा कि इस अस्पताल से उस अस्पताल भेजे जाते रहे. ये जाते रहे. और बच्चे मरते रहे. ऐसा लग रहा है कि कोई अपनी जवाबदेही नहीं लेना चाहता था. सब मरने की जवाबदारी किसी और अस्पताल पर टालने के लिए मरीज़ों को दौड़ा रहे थे.

तीन अस्पताल का चक्कर लगाना पड़ा, इससे पता चल रहा है कि कोई अस्पताल इस आपात स्थिति के लिए तैयार नहीं था जिससे गांव से निकलते ही बच्चे को आपात चिकित्सा दी जा सके.

इन गांवों में सिस्टम नदारद मिला. लोगों ने मनीष और हबीब को बताया कि सरकार का कोई भी यहां जागरूकता के लिए नहीं आया है. जबकि पास पड़ोस के तीन चार गांवों में 15 बच्चों की मौत हुई है. इस गांव की गलियों से गुज़रते हुए रोने की आवाज़ आ रही थी. कोई अपनी बच्ची का श्राद्ध कर लौट रहा था तो कोई आयुष्मान योजना का लिफाफा दिखा रहा था. किसी को समझ नहीं आ रहा है कि उनके बच्चे कहां चले गए. उनकी क्या गलती थी. वे तो किसी तरह अपने बच्चों को सीने से लगाकर अस्पताल भागे थे. फिर क्यों नहीं बचा सके. मनीष को इन गांवों में एक भी पोस्टर नहीं दिखा जिससे पता चले कि जागरूकता के लिए निर्देश दिए गए हैं. एक गांव के लोगों ने बताया कि कई लोग अपने बच्चों को लेकर गांव छोड़ चुके हैं. 24 घरों में ताला लग गया है. हम यह सवाल सुशील मोदी से नहीं पूछ रहे हैं. क्योंकि राबड़ी देवी जवाब नहीं दे रही हैं कि 2005 के पहले उनके राज में क्या हालत थी. दरअसल बिहार की चिकित्सा व्यवस्था एक्सपोज़ हो गई है. उसकी पोल खुल गई है. जो आवरण चढ़ा था वो हट गया. इसलिए कोई जवाब नहीं दे रहा है. एक ने बताया कि मुखिया भी हाल पूछने नहीं आया. विधायक सांसद तो छोड़ ही दीजिए.




2005 से नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं, यह 2019 है. इतने सालों में यह तो नहीं कहूंगा कि मेडिकल को लेकर कुछ नहीं हुआ मगर सारे डिटेल देखने के बाद लगता है कि कुछ ही हुआ है. बिहार में 5000 डाक्टरों की क्यों कमी है. क्यों पटना में दुनिया का सबसे बड़ा अस्पताल बन रहा है. जब एम्स के लिए सरकार सक्रिय नज़र नहीं आती है तो दुनिया का सबसे बड़ा अस्पताल कोई नया सपना तो नहीं है. 2018 में मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया ने बिहार के तीन मेडिकल कालेजों का दौरा किया था. जो रिपोर्ट दी थी उसका जवाब सुशील मोदी खुद नहीं देना चाहेंगे. राबड़ी देवी से ही पूछना चाहेंगे. उस रिपोर्ट में एमसीआई ने कुछ फैसले किए थे. बेतिया सरकारी मेडिकल कालेज और वर्धमान मेडिकल कालेज अनुग्रह नारायाण मेडिकल कालेज गया. इन तीनों कालेज में एमसीआई ने 250 सीट कम कर दीं क्योंकि यहां पर 30 प्रतिशत शिक्षकों की कमी थी. ज़ाहिर है मेडिकल कालेज के लिए फिट नहीं लगा होगा. यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. बिहार सरकार ने चुनौती दी है कि 250 सीट पर प्रोविजनल एडमिशन की अनुमति दी जाए.

मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया की रिपोर्ट पढ़ें. गया के अनुग्रह नारायण मेडिकल कालेज में 20 प्रतिशत रेज़िटेंड नहीं थे. 31 फीसदी फैकल्टी नहीं थी. जो काफी नहीं है. 2017 में नेशनल रुरल मिशन की सीएजी ने आडिट की थी. बिहार के दस ज़िला अस्पतालों की आडिट की तो पता चला कि यहां पर 166 डाक्टर कम हैं. 224 नर्स कम  हैं. अस्पताल में नए स्टाफ के लिए ओरिएंटेशन नहीं होता है. जबकि इसके लिए पूरी गाइडलाइन है. बिहार में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ज़रूरत से आधे कम हैं. बिना एक्सपायरी डेट चेक किए हुए ही दवा दे दी जाती है.पैरासिटामोल और बी काम्पलेक्स जैसी आम दवाएं नहीं थीं.

अब आपको एक घोटाले की जानकारी देता हूं इसका ज़िक्र सीएजी की रिपोर्ट में हैं. अगर कोई गर्भवती महिला सरकारी अस्पताल में जाती है तो बच्चा होने पर उसे 500 से 1400 रुपये मिलेंगे, ये योजना थी. सीएजी ने मुंगेर में पाया कि एक लाख 18 हज़ार 703 माओं को इस योजना के तहत पैसे दिए गए लेकिन डिलीवरी हुई 1, 05 हज़ार 980 की. 13000 बच्चे सरकार के रिकार्ड पर ज्यादा पैदा हो गए. ये क्यों हुआ, चाहें तो सुशील मोदी जवाब दे दें या फिर राबड़ी देवी से ही पूछा जाए. उन्हीं से इस्तीफा मांगा जाए.




हिन्दुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट प्रसून कुमार मिश्र की है. नेशनल रूरल हेल्थ मिशन में 6 करोड़ 33 लाख का घोटाला करने वाली एक डाक्टर को गिरफ्तार किया गया है. यह घटना कैमूर ज़िले की है. डाक्टर इंदू सिंह ने कथित रूप से फर्जी डिलीवरी दिखाकर पैसे हड़प लिए. एक महिला की चार महीने के भीतर 12 डिलीवरी होती है. यही नहीं उसी महिला की 14 बार नसबंदी भी होती है. उसे सरकार की योजना के अनुसार पैसे दिए जाते हैं. जब नसबंदी होती है तो उस महिला की उम्र 36 साल दिखाई जाती है और जब वह चार महीने में 12 डिलीवरी करती है तो उसकी उम्र 29 साल दिखाई जाती है. इस खबर के अनुसार 11 ऐसी महिलाएं थीं जो चार महीने के भीतर पांच से बारह बार बच्चों को जन्म भी दे रही थीं और उसी दौरान उनकी सात से 11 बार नसबंदी भी हो रही थी. ये मेडिकल साइंस का कमाल है. चार महीने में एक महिला 12 बच्चे पैदा करती है क्योंकि डाक्टर को घोटाले करने हैं. यह खबर 30 मई 2017 की है. इस घोटाले के लिए सवाल किससे पूछा जाए. जवाब तो कोई देता नहीं.

इतनी डिटेल जानकारी से हमने क्या सीखा. यही कि आप जनता को सरकारें बीमा पकड़ा देती हैं और अस्पताल बनाना भूल जाती हैं. कुछ जगहों पर अस्पताल तो बन जाते हैं मगर वहां पर चालू करने के लिए डाक्टर और स्टाफ वर्षों तक पूरे नहीं हो पाते. यह संकट एम्स का भी है और दूसरे अस्पतालों का भी है. आप सोचेंगे कि क्या कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा है. मैं नहीं मानता. जब तक आप व्हाट्स ऐप में बिजी हैं तब तक सब अच्छा हो रहा है.




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