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अखण्ड भारत : हिंदुस्तान, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान …, जिधर देखो उधर तालिबान !

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 3, 2021
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अखण्ड भारत : हिंदुस्तान, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान ..., जिधर देखो उधर तालिबान !

Subrato Chatterjeeसुब्रतो चटर्जी

अमरीका में एक कहावत है, ‘When you know that the rape is inevitable, just enjoy it,’ मतलब, जब आप जानते हों कि बलात्कार को रोका नहीं जा सकता है तब आप संभोग का सुख लीजिए. अफ़ग़ानिस्तान के साथ अमरीका और उसके चमचे मोदी सरकार का एप्रोच कमोबेश यही है.

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  • द्वितीय विश्वयुद्ध में Dunkirk में तीन लाख ब्रिटिश फ़ौज जब हिटलर से हार कर आर्य समझे जाने की बिना पर हिटलर द्वारा ही safe passage दिया गया था, तब ब्रिटिश फ़ौज ने इसे glorious retreat का नाम दिया.
  • द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जब ब्रिटेन आर्थिक और सामरिक रूप से कंगाल हो गया और भारत जैसे सुदूर देश पर हुकूमत करने लायक़ ताक़त खो बैठा, तब भारत की आज़ादी को transfer of power या सत्ता के हस्तांतरण का नाम दिया.
  • आज जब अमरीका अफ़ग़ानिस्तान से अपना बोरिया बिस्तर समेट कर लौटने को बाध्य हुआ है, तब अमरीकी राष्ट्रपति इसे अपनी महान उपलब्धि बता रहे हैं.

History is a great leveller, यानी इतिहास सब को एक ही धरातल पर देर सबेर ला कर खड़ा कर देता है. औपनिवेशिक अतीत की छाया में पनपे हुए मानस में श्रेष्ठता बोध की ग्रंथि बहुत विकसित होती है, जिसके तीन उदाहरण मैंने आपको उपर दिया है. यही बोध हार को भी जीत के रूप में समझने को बाध्य करता है.

Rudyard Kipling का White Man’s Burden सिर्फ़ एक thesis नहीं है, यह विज्ञान, तकनीक और आधुनिक शिक्षा, उन्नत रण कौशल, औद्योगिक विकास के दम पर पश्चिम के देशों का स्वाभाविक दंभ है, जो उन्हें खुद को श्रेष्ठ मानने की उर्जा देता है. ये अलग बात है कि कभी अफ़्रीका के गहनतम अंधकार में तो कभी अफ़ग़ानिस्तान के क़बीलाई समाज की वास्तविकता के सामने यह उर्जा निरर्थक साबित हो जाती है.

पश्चिम के पूरब नीति में एक समझ की कमी साफ़ दिखती है, वह यह है कि पश्चिमी सभ्यता पूरब के लोगों का जाहिलियत, ग़ुलामी और फटेहाली और अशिक्षा से बेपनाह मुहब्बत को कभी समझ नहीं पाते. विश्व युद्ध की विभीषिका से अनभिज्ञ, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में पिछड़े हुए स्वैच्छिक ग़ुलामी की ज़ंजीरों को ढोते हुए आत्ममुग्ध पूरब के देशों की मानसिकता आज भी मध्ययुगीन है, थोपे हुए युद्ध से इसे बदलना संभव नहीं है.

ऐतिहासिक क्रम में पश्चिम ने जो प्राप्त किया है, उसे न तो क़ानून बना कर हम पा सकते हैं और न ही किसी थोपे हुए युद्ध की छाया में. अगर अफ़ग़ानिस्तान की एक बड़ी जनसंख्या अपने पिछड़ेपन पर गर्व करती है तो उसे बदलने के लिए वहां के लोगों को ही सामाजिक और राजनीतिक चेतना विकसित करने की ज़रूरत है.

भारत के साथ भी ठीक यही हाल है. अंग्रेजों से आज़ादी अंग्रेज़ीयत से आज़ादी नहीं थी, लेकिन पश्चिम की समझ को अपना कर हमने एक लोकतांत्रिक, प्रगतिशील समाज और देश का सपना देखा था. लाख कमियों के वावजूद हम अपने लक्ष्य की ओर 2014 तक धीरे-धीरे बढ़ रहे थे.

पूंजीवादी लोकतंत्र की सीमाओं के अंतर्गत ही सही, हम आर्थिक और राजनीतिक रूप से विकसित हो रहे थे. लेकिन, हम भूल गए थे कि जिस समय हमारे देश का एक तबका सकारात्मक पहल कर रहा था, ठीक उसी समय एक दूसरा बहुत बड़ा तबका नकारात्मक भूमिका में भी था. आज वही हिंदू तालिबान सत्ता में है.

दरअसल, जब आप राजनीतिक ideology के प्रभाव क्षेत्रों के लिहाज़ से दुनिया के नक़्शे को समझने की कोशिश करेंगे, तब आप समझेंगे कि इतिहास के एक विशेष बिंदु पर दुनिया के एक विशेष भू-भाग में एक विशेष तरह की राजनीतिक चेतना हावी रहती है.

धार्मिक उन्माद की जिस चेतना ने देश का विभाजन जिस तरह से किया, ये लाज़िमी था कि उस ज़हर का असर जनता के दिलोदिमाग़ से इतनी आसानी से उतरने वाला नहीं था. सांस्कृतिक, भाषाई, धार्मिक और क्षेत्रीय विविधताओं से मरहूम होने की वजह से पाकिस्तान पर इस ज़हर का असर बहुत जल्द पड़ा और देर तक रहा. इसके उलट, भारत पर इसका असर सशक्त लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रगतिशील तत्वों की बहुतायत के लिए देर से पड़ा, लेकिन पड़ा, जिसका नतीजा आज की सच्चाई है.

1992 में बाबरी मस्जिद को ढ़हाने के साथ धर्म-निरपेक्षता की बलि दी गई. 2002 में गुजरात दंगों में क़ानून के शासन की बलि दी गई, अंत में 2014 में आज़ादी के सारे मूल्यबोध की बलि दी गई जब मोदी चुन कर आए. उसके बाद हिंदू समाज के एक बड़े हिस्से का तालीबानीकरण सिर्फ़ समय की बात थी, जो कि आज दिख रही है. अब जब हिंदूकुश के दोनों तरफ़ तालिबान हैं तो दुश्मनी कैसी और क्यों ?

आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, शिक्षा, स्वास्थ्य, विदेश नीति, हर बात में नाकाम भारत की नपुंसक, अमरीकापरस्त राजनीतिक नेतृत्व के पास न तो तालिबान को आतंकवादी कहने का नैतिक बल है और न ही इच्छा शक्ति. आज जियो पॉलिटिकल यथार्थ में भारत की भूमिका बस इतनी ही है जितनी कि भारतीय उपमहाद्वीप में भूटान की.

इस परिस्थिति में एक महान देश को लाने के लिए मोदी और उनके समर्थकों का यह कृतज्ञ राष्ट्र सदैव आभारी रहेगा. हिंदुस्तान, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान …, जिधर देखो वहां तालिबान ! हो गया न अखंड भारत का सपना पूरा ?

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