
दिल्ली के जंतर-मंतर पर आम आदमी पार्टी की एक सभा के दौरान एक किसान गजेन्द्र की आत्महत्या ने देश के प्रधानमंत्री मोदी को जगा दिया और उसने त्वरित टिपण्णी करना शुरू कर दिया. तमाम दलाल मीडियाओं ने इस आकस्मिक घटना को यों पेश करने लगा मानों अरविन्द केजरीवाल के कारण ही उक्त किसान ने आत्महत्या का रास्ता अपनाया हो. परन्तु वक्त ज्यादा नहीं बीता है. किसानों के आत्महत्या अब आगे बढ़कर सरकारी हत्या का रूप ले लिया है.
हजारों की तादाद में किसानों ने जहां आत्महत्या का रास्ता अपनाया है वहीं सरकारों ने आन्दोलन कर रहे किसानों को आतंकवादी या असमाजिक तत्व बताकर उसकी हत्या करने पर उतारू है.
मंदसौर में पुलिस की गोली से मारे गये किसानों की संख्या ने जहां मोदी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगने दी वहीं उसकी दलाल ‘गोदी मीडिया’ ने इस खबरों को यथासंभव दबाने का भरसक कोशिश किया. गजेन्द्र की आत्महत्या को लेकर दिन भर बहस चलाने वाली ‘गोदी मीडिया’ के लिए किसानों की सरकारी हत्या पर चंद घंटे देना भी गवारा लगा.
दरअसल शहरों में सस्ता मजदूर आपूर्ति करने के लिए वल्र्ड बैंक और आईएमएफ के निर्देशानुसार मोदी सरकार देश भर में किसानों को खेती से बेदखल करने की नीति पर चल रही है. इस कारण देश भर में किसानों की हालत जहां भयावह बन गई है, वहीं शहरों में बेरोजगार मजदूरों की संख्या में भी भारी इजाफा हुआ है.
देश में साम्राज्यवादी नीतियों को सख्ती से लागू करने की मोदी सरकार की प्रतिबद्धता ने देश को भयावह अंधकूप में ले जा रही है.
साम्राज्यवादी नीतियों के अनुसार देश की सरकारों की प्रमुखता काॅरपोरेट घरानों और साम्राज्यवादी पूंजी की सेवा, हो गई है. मोदी सरकार इस ‘सेवा’ के सबसे बड़े पैरोकार (दलाल) बनकर उभरा है.
2016 की आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार भारत के 17 राज्यों में किसान परिवार की सलाना औसतन आय महज 20 हजार रूपये यानि महज 1700 रूपये प्रति माह रह गई है जबकि वहीं अंबानी जैसे काॅरपोरेट घरानों की पत्नी नीता अंबानी अपने सुबह की चाय पीने मात्र पर 2 लाख रूपये प्रति कप की दर से खर्च कर रही है. यह इस देश में बन रही विशाल खाई को सहज ही दर्शाता है.
वहीं खुद को ‘फकीर’ कहने वाले देश के प्रधानमंत्री की 10 लाख की सूट, डेढ़ लाख की कलम और 42 हजार की थाली खाने वाले नरेन्द्र मोदी आखिर भला किस नजरिये से किसान को देखते हैं, यह मंदसौर की घटना में पुलिस की गोली से मारे गये 8 किसानों की लाशें साफ बयां कर रही है.
इससे भी बढ़कर जब उसके मंत्री किसानों को आतंकवादी या असामाजिक तत्व घोषित करते हुए ‘राष्ट्रवाद का फूटा ढ़ोल’ बजाने की कोशिश करते हैं तो हर देशवासियों के सर पर बल पर जाना लाजिमी है.
गजेन्द्र से लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे तलिमनाडु के किसान सहित मंदसौर में किसानों की सरकारी हत्या तक की घटना ने एक बात साफ तौर पर जाहिर कर दी है कि उनकी मांगें लगभग एक समान हैं. देश भर में किसानों की साफ और स्पष्ट मांगें हैं, जिन्हें चंद शब्दों में यों पिरोया जा सकता है:
1. किसानों का कर्ज माफ किया जायें.
2. किसानों को लागत मूल्य का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन (एमएसपी) मूल्य दिया जायें.
3. 60 साल से ज्यादा की उम्र वाले किसानों को पेंशन देने का इंतजाम किया जायें.
4. स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू किया जायें.
स्वामीनाथन अयोग की सिफारिशें:
दरअसल डॉ. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में नवम्बर, 2004 में ‘नेशनल कमीशन ऑन फारमर्स’ नाम की एक कमिटी बनी थी. दो साल की गहन जांच-पड़ताल के बाद इस कमिटी ने 6 रिपोर्ट तैयार कर सरकार को सौंप दी. इन रिपोटर्स में तेज और समावेशी विकास के खातिर कुछ सुझाव दिये थे, जो इस प्रकार हैं:
1. फसल उत्पादन मूल्य से 50 प्रतिशत ज्यादा दाम किसानों को मिले.
2. किसानों को अच्छी क्वालिटी के बीज कम दामों पर मुहैय्या करायी जाये.
3. गांवों में किसानों की मदद के लिए विलेज नाॅलेज सेंटर या ज्ञान चैपाल बनाया जाये.
4. महिला किसानों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड जारी किये जाये.
5. किसानों के लिए कृषि जोखिम फंड बनाया जाये ताकि प्राकृतिक आपदाओं के आने पर किसानों को मदद मिल सकें.
6. 28 प्रतिशत भारतीय परिवार गरीबी रेखा से नीचे रह रहें हैं जिनके लिए खाद्य सुरक्षा इंतजाम किया जाये.
ऐसी सिफारिशें जो बेहद ही मामूली हैं, देश की सरकारों ने इसे कचरे में फेंक रखा है.
काॅरपोरेट घरानों के हजारों-लाखों करोड़ के कर्जे को पलक झपकते माफ करने वाली मोदी सरकार को किसानों के कर्ज माफ करने में “बैंलेस सीट” बिगड़ने लगता है. न्यूनतम लज्जा को भी ताक पर रख कर उसके मंत्री और सांसद किसानों की हत्या को असमाजिक तत्व बताकर जायज ठहराने लगते हैं तो वहीं किसान की आत्महत्या को कर्ज के साथ-साथ दहेज, प्रेम सम्बन्ध और नामर्दी साबित करने जैसी बातें कर किसानों का सरेआम मजाक उड़ाते हैं.
गजेन्द्र के आत्महत्या मामले में तड़ातड़ ट्विट करने वाले देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मंदसौर के किसानों की सरकारी हत्या पर भयावह चुप्पी इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि किसानों की लाशें गिनने की इस प्रक्रिया में और भी तेजी आ सकती है.
दरअसल मोदी सरकार और उसकी ‘गोदी मीडिया’ सवाल उठाने वाले देश के किसानों-मजदूरों-आदिवासियों-मुसलमानों-युवाओं और बुद्धिजीवियों को एक स्पष्ट संकेत दे रही है ‘‘या तो खामोश रहो अथवा आतंकवादी-नक्सलवादी-माओवादी बताकर भून दिये जाओगे.’’
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This government is forcing people to take up arms against the exploiters. Revolution will be thankful to this government in future.
भारतीय किसान अपने श्रम मूल्य को उत्पादन मूल्य मे शामिल नही करते है बावजूद कृषि मे घाटा के कारण किसान मजदूर की श्रेणी मे पहुंच गए है आर्थिक राजनीतिक सामाजिक हैसियत मे लगातार गिरावट के कारण किसान का आक्रोश वाजिब है किसान से जीविका जमीन छिनने का प्रयास काग्रेस भाजपा दोनो राज मे चल रहा है 50% मुनाफा देना तो दूर लागत भी नही मिलता है हिन्दू राज के सपने की असलियत यही है जो देख रहे है सभी धार्मिक सत्ता अन्तरवसतु मे फासीवादी सत्ता ही होती है बात स्पष्ट है
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