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आरएसएस चीफ का बयान : धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक व्यवस्था पर आतंकी हमला

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
December 30, 2019
in गेस्ट ब्लॉग
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आरएसएस चीफ का बया: विशाल लोकतांत्रिक देश की धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक व्यबस्था पर आतंकी हमला
अभी हाल में ही आरएसएस चीफ मोहन भागवत जी ने अपनें एक बयान में कहा कि – “आरएसएस देश के 130 करोड़ लोगो को हिन्दू मानता हैं.”

एक ऐसे समय मे जब देश में चारो तरफ सांप्रदायिक तनाव का माहौल है, सरकार के विभिन्न निर्णयों से देश के अल्पसंख्यक अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रहें हैं, भागवत का यह बयान न केवल गैर-जिम्मेदाराना हैं बल्कि असंवैधानिक भी हैं.

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अगर कायदे से समझें तो आरएसएस चीफ का यह बयान धर्मनिरपेक्ष देश की विविधता और संवैधानिक मुल्यों पर सीधे-सीधे आतंकी हमला की तरह हैं. मोहन भागवत का यह बयान देश के अल्पसंख्यकों में डर और असुरक्षा के माहौल को और बढ़ायेंगी.

ऐसा नही की आरएसएस के द्वारा इस तरह के अलगाववादी असंवैधानिक बयान कोई पहली बार दिया गया हैं. आरएसएस के नीतियों और कार्यक्रमों का अवलोकन करने पर यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि देश मे साम्प्रदायिक दंगे को जन्म देने के अलावा, इस संगठन का कोई और काम नही है. आरएसएस का ऐतिहासिक पृष्टभूमि वैसे ही अलगाववादी कृत्यों और साम्प्रदायिक दंगों से रक्तरंजित है और वर्तमान कवायद उस बुनियादी अलगाववादी सोच और विचारधारा की नींव पर ऊंची साम्प्रदायिक इमारत खड़ा करने की है. भागवत का यह बयान एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा हैं. सत्ताधारी बीजेपी के आइडियोलॉजिकल थिंक टैंक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का यह बयान अल्पसंख्यकों को उकसाने वाली है.

अपने मातृ संगठन आरएसएस के कोख से निकले बीजेपी ने हालिया दिनों में कई विवादास्पद फैसलें लिए है जो देश के अल्पसंख्यकों में अविश्वास का भाव पैदा किया है. तीन तलाक, आर्टिकल 370 जैसे मुद्दें हो या सर्वोच्च न्यायिक संस्था माननीय सुप्रीमकोर्ट द्वारा राम मंदिर मुद्दे पर दिया गया फैसला हो, बीजेपी को पूर्ण विश्वास था कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों से उन्हें सियासी लाभ जरूर मिलेगा लेकिन ऐसा दूर-दूर तक हुआ नहीं और एक-एक कर बीजेपी शासित राज्यों में सत्ता की सिंहासन बीजेपी से छिन गई.

हालिया नागरिकता संसोधन बिल के पारित हो जाने के बाद एक बार फिर बीजेपी का सियासी षड़यंत्र खुद उलझ गया. पूर्वोत्तर से उपजी विरोध की आग जल्द ही पूरे देश भर में फैल गई. देश के श्रेष्ठ उच्च शिक्षण संस्थान इस कानून के विरोध में सड़को पर आ गए, तमाम ख्यातिप्राप्त पत्रकार, वैज्ञानिक, बुद्धिजीवी वर्ग, वकील, लगभग तमाम विपक्षी राजनैतिक दल इस कानून के विरोध में खड़े हो गए. यहांं तक कि एनडीए के कई घटक दल ने भी सरकार को गृहयुद्ध जैसी स्थिति की बात कहकर सकते में डाल दिया. झारखंड में जहांं बीजेपी ‘अबकी बार 65 पार’ के नारे लगाये, वहांं भी सत्ता से बेदखल हो गई.

आज भी पुरें देश में शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और संघ के लोग इस विरोध प्रदर्शन की आड़ में हिंसा भी फैलाने से नही चूक रहे हैं. पश्चिम बंगाल में आरएसएस के कार्यकर्ता लुंगी पहनकर आग लगाते पकड़े गए है, उत्तरप्रदेश में तो कई जगह पुलिस द्वारा तोड़फोड़ करने के वीडियो वायरल हो रहे हैं, पुलिस पर एक विशेष समुदाय के लोगों के बर्बरतापूर्ण दमन के आरोप भी लग रहे हैं, जो सत्ता की निरंकुशता और अहंकारी फासीवादी नीतियों को ही सामने ला रही हैं.

संघ की कट्टर हिंदुत्ववादी नीतियां देश में लगातार नफरत और अलगाववाद की भावना को भड़का कर देश की अखंडता को ख़तरे में डाल रही है. 1937 में सावरकर ने हिन्दू महासभा के अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण देते हुये द्विराष्ट्र के सिद्धांत को मजबूती के साथ रखा और हिंदुओं और मुसलमानों के लिए पृथक राष्ट्र की बात रखी.

आरएसएस की द्वारा देश मे बोयें गए नफ़रत का परिणाम ही था स्वतंत्रता बाद देश के विभिन्न हिस्सों में साम्प्रदायिक देंगे हुए. इन्ही साम्प्रदायिक दंगों के कारण हुए भयंकर रक्तपात की विभीषिका को देखते हुए महात्मा गांंधी ने देश विभाजन को स्वीकार कर लिया लेकिन यहांं भी संघियों के हिंदू राष्ट्र के मंसूबों पर पानी फिर गया. वर्तमान समय में संघ अपने इसी पुराने एजेंडे को अमलीजामा पहनाने में जुटा है.

आज भले ही आरएसएस अपने को जितना भी राष्ट्रवादी संगठन कह लें लेकिन वस्तुतः यह संगठन आतंकी विचारधारा की पर्याय बन चुकी है. 1925 में आरएसएस की स्थापना हुईं और 1947 में देश को आजादी मिली लेकिन अगर इतिहास के पन्नों को हम शिद्दत से खंगालने का काम करें तो इस बीच के अंतराल में एक भी संघी का नाम नही मिलेगा, जो आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया हो. अंग्रेजों की एजेंट व जासूस के रूप में काम करने वाली आरएसएस आज राष्ट्रभक्ति का जितनी स्वांग रच ले लेक़िन इससे न तो इनके पुरखों की कुकर्मो पर परदा पड़नेवाला है और न ही इनकी खतरनाक विभाजनकारी आतंकी विचारधारा व सोच को ही छिपाया जा सकता है.

भगत सिंह के फांंसी के समय संघी शोभा लाल की गवाही हो या चंदशेखर आजाद के ख़िलाफ़ अंग्रेजोंं की मुखबिरी करने वाले संघी वीरभद्र तिवारी का कारनामा या फिऱ आजाद हिन्द फ़ौज में हिन्दुओं को भर्ती होने से रोकने का देशद्रोही कृत्य इन संघियोंं के पूर्वजों की ऐतिहासिक सच है. महात्मा गांंधी के हत्यारें आंतकी संघी नाथूराम गोडसे गांधी की हत्या के बाद ‘अल्लाह-हू-अकबर’ के नारे लगाकर देश मे सांप्रदायिक दंगे फ़ैलाने की घिनौनी नापाक हरक़त की थी.

आजादी के बाद भी तिरंगें को जलाने वाले संघियों ने कई दशकों बाद मजबूरी में राष्ट्रध्वज सिर्फ इस कारण स्वीकार करना मुनासिब समझा कि इस आड़ में वो अपने पुराने ख्वाहिश हिन्दू-राष्ट्र के सपनों को साकार कर मनुवादी विचारधारा को लागू कर सकें और हिंदुत्व की आड़ में पिछड़ों, दलितों और समाज के निचले तबके का सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक शोषण कर सकें. मोहन भागवत का हालिया बयान आरएसएस के इसी हिडेन एजेंडे का एक हिस्सा हैं.

आरएसएस चीफ का यह बयान धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की संवैधानिक व्यबस्था के साथ-साथ सामाजिक-धार्मिक व्यबस्था पर भी आतंकी हमला की तरह ही हैं. आरएसएस के इन्ही एजेंडों के कारण कई देश इसे अलगाववादी उन्मादी संगठन मानता है. ये राष्ट्र स्प्ष्ट मानते हैंं कि आरएसएस मानवाधिकारों का खुलेआम उल्लंघन करता हैं.

महाराष्‍ट्र के पूर्व आईजी (पुलिस) एस.एम. मुशरिफ ने राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ को देश का नंबर 1 आतंकी संगठन बताया था. इसका जिक्र उन्होंने अपने किताब ‘हू किल्‍ड करकरे’ में किया है. उन्होंने बताया कि यह आरएसएस एक ब्राह्मणवादी व्‍यवस्‍था है.

वर्ष 2015 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आतंकी संगठन घोषित करवाने के लिए तीन भारतीयों माइकल मसी, हाशिम अली और कुलविंदर सिंह ने अमेरिकी अदालत की शरण ली थी थी. इन तीनों ने आरएसएस पर उनका जबरन धर्म परिवर्तन करवाने का आरोप लगाया था. तीनों ने सिख अधिकार संगठन सिख्स फॉर जस्टिस (एसएफजे) की मदद ली. एसएफजे पहले से ही आरएसएस को आतंकी संगठन घोषित करवाने की कोशिश में लगी है.

तीनों ने अपनी शिकायत जज लॉरा टेलर स्वेन की अदालत में लगाई थी. माइकल ईसाई, हाशिम मुस्लिम और कुलविंदर सिख हैं. इनकी शिकायत थी कि 2014 में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से आरएसएस उनके परिवारों को जबरन हिंदू बनाना चाह रहा है. शिकायत के साथ यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है. यह वही रिपोर्ट है, जिसमें दावा किया गया था कि दिसंबर, 2014 में हिंदू संगठनों ने यूपी में 4 हजार ईसाई और 1 हजार मुस्लिम परिवारों के जबरन धर्म परिवर्तन का एलान किया.

कुल मिलाकर देखा जाए कि देश की विविधता और धर्मनिरपेक्षता से आरएसएस को न अतीत में कोई वास्ता रहा है और न वर्तमान मेंं है. भागवत के बयान से यह स्पष्ट हो गया है कि यह संगठन देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अब गम्भीर खतरा बनता जा रहा है. अगर समय रहतें इस अलगाववादी उन्मादी संगठन के क्रियाकलापों पर अंकुश न लगाया गया तो यह देश की अखंडता को छिन्न-भिन्न कर देगा. उम्मीद करता हूंं कि देश में ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के जन्मस्थली के रूप में स्थापित आरएसएस चीफ के इस साम्प्रदायिक बयान को विशाल धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश की पूरी आवाम संजीदगी के साथ समझने की कोशिश करेंगें और देश मे साम्प्रदायिक तनाव उत्पन्न करनें की ऐसी किसी नापाक साजिश को सफल नही होने देंगीं.

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