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Home गेस्ट ब्लॉग

क्षत्रियों के नाम में ‘सिंह’ लगाने का रहस्य

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 24, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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क्षत्रियों के नाम में 'सिंह' लगाने का रहस्य

क्षत्रिय अपने नाम के अंत में ‘सिंह’ क्यों लिखते हैं ? यदि हिन्दुओं में नामकरण की पद्धति को देखा जाए तो इसके संबंध में उल्लेख मनुस्मृति में मिलता है जिसके अध्याय १ श्लोक ३३ में वर्णित है कि –

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मांगल्यं ब्राह्मणस्य स्यात्क्षत्रियस्य बलांवितम् ।
वैश्यस्य धन संयुक्तम् शूद्रस्तु जुगुप्सितम् ।।

इस श्लोक के अर्थानुसार देखा जाए तो तो ब्राह्मण का नाम मंगल सूचक, क्षत्रिय का नाम बल सूचक और वैश्य का नाम धन सूचक तथा शूद्र का नाम घृणा सूचक होना चाहिए.

यदि हम पुराने इतिहास में जाकर अध्ययन करते हैं तो बड़े से बड़े बलंकारी क्षत्रिय हुए हैं जिनके नाम के अंत में “सिंह” नहीं है जैसे अर्जुन, भीम, नकुल, भीष्म, दुर्योधन, कर्ण, कृष्ण, बलदाऊ ,राम, लक्ष्मण, सुग्रीव, बाली इत्यादि. और यदि हम पृथ्वीराज चौहान के समकालीन क्षत्रियों के नामों का अध्ययन करते हैं तो भी हमें सिंह शब्द का प्रचलन दिखाई नहीं देता है, जैसे पृथ्वीराज, जयचंद , मलखान, ब्रह्मा इत्यादि.

यदि इसके बाद के इतिहास का अध्ययन करते हैं तो पता चलता है कि क्षत्रिय अपने नाम के अंत में वीरता सूचक शब्द जैसे ‘मल’ या ‘पाल’ जैसे शब्दों का प्रयोग करने लगे थे. हम पूर्ण दावे के साथ कह सकते हैं कि लगभग पंद्रहवी/सोलहवीं शताब्दी तक यानी जब तक भारत पर अकबर का शासन नहीं था तब तक क्षत्रियों में ‘सिंह’ शब्द का प्रचलन दिखाई नहीं देता है, क्योंकि उस समय के क्षत्रिय महाराणा प्रताप, राणा सांगा, शक्ति प्रताप, भारमल इत्यादि ऐसे क्षत्रियों के नामों को देखा जा सकता है, जिनके अंत में ‘सिंह’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया था.

ऐतिहासिक अध्ययन से पता चलता है कि सम्राट अकबर ने सबसे पहले ‘सिंह’ शब्द की उपाधि उस गद्दार को दी, जिसने अकबर की मदद अपने सगे भाई महाराणा प्रताप के खिलाफ मुगलों की तरफ से लड़ा जिसका नाम है, शक्ति प्रताप तो अकबर ने शक्ति प्रताप को सिंह की उपाधि अपने वतन के गद्दार को देकर शक्ति ‘सिंह’ बना दिया, जिस तरह से अंग्रेजों ने अपने वफादारों को ‘हिज हाईनेस’ की उपाधि प्रदान की, ठीक उसी तरह से मुगलों ने अपने वफादारों को ‘सिंह’ की उपाधि देकर सम्मानित किया.

मुगल सम्राट की वफादारी क्षत्रियों ने दूसरे क्षत्रियों के विरुद्ध युद्ध लड़कर और लड़ाई जीत कर सिद्ध की, तो कई क्षत्रियों ने अपने राज्य को सुरक्षित रखने की दृष्टि से मुगलों के सम्राट अकबर के साथ रोटी-बेटी का संबंध स्थापित करके अपनी वफादारी सिद्ध की और ‘सिंह’ की उपाधि प्राप्त कर अपने आप को गौरवान्वित महसूस किया.

इस क्रम को देखा जाए तो सबसे पहले आंबेर के कछवाह राजा भारमल ने अपनी बेटी जोधा बाई का निकाह अपने राज्य को बचाने की दृष्टि से अकबर के साथ सन् 1562 करके ‘सिंह’ की उपाधि प्राप्त की, तो वहीं दूसरी ओर राजा भगवंत दास के पुत्र मानदास ने अकबर की तरफ से लड़कर कई राज्य जीते और सिंह की उपाधि प्राप्त करके मानदास से मानसिंह बन गया.
15 नवम्बर, 1570को बीकानेर के राजा राय कल्याण राठौर ने अपनी भतीजी अकबर को निकाह कर ‘सिंह’ की उपाधि प्राप्त करके कल्याण सिंह बन गया और अपना राज्य सुरक्षित कर लिया.

सन् 1570 में ही जोधपुर के राठौर राजा मालदेव ने अपनी बेटी रुक्मावती का निकाह अकबर के साथ करके सिंह की उपाधि प्राप्त की और अपने राज्य को बचा लिया. सन् 1573 में नगर कोट का राजा जयचंद ने अपनी बेटी का निकाह अकबर के साथ करके सिंह की उपाधि प्राप्त की और अपने राज्य को बचा लिया.

इसी प्रकार सन् 1577 में डुंगूर पुर के गहलौत राजा रावल ने अपना राज्य बचाने के चक्कर में अपनी बेटी का निकाह अकबर के साथ किया और ‘सिंह’ की उपाधि प्राप्त करके रावल सिंह बन गया. ठीक इसी प्रकार सन् 1581 में मोरता के राठौर राजा केशवदास ने अपने राज्य को बचाने के चक्कर में अपनी बेटी का निकाह अकबर के साथ करके ‘सिंह’ की उपाधि प्राप्त की.
इसी प्रकार बलशाली क्षत्रियों ने अपनी बेटियां मुगलों को यानी अकबर, जहांगीर,औरंगजेब एवं उनके उत्तराधिकारियों को भेंट की और गौरवशाली ‘सिंह’ की उपाधि प्राप्त की और अपने राज्य को बचाने में कामयाब हुए. मुगल काल समाप्त होते होते सभी क्षत्रियों में अपने नाम के अंत में ‘सिंह’ शब्द का प्रयोग प्रचलन में आ गया था. भारत की आजादी के बाद तक ‘सिंह’ की उपाधि पर केवल क्षत्रियों का एकाधिकार था.

जैसे ही भारत आजाद हुआ तो शूद्र भी आजाद हुए और उन्होंने भी क्षत्रियों की देखा-देखी अपने नाम के अंत में ‘सिंह’ शब्द का प्रयोग शुरू कर दिया है, जिस पर वर्तमान में भी क्षत्रिय एतराज जताते हैं और कहते है कि अब तो चमार-चूहड़े भी सिंह लिखने लगे हैं जबकि वे बेचारे सच्चाई से रूबरू नहीं है. मैं तो खासकर शूद्रों से गुजारिस करता हूं कि ‘सिंह’ शब्द पर केवल क्षत्रियों का एकाधिकार है, जो उन्होंने अपनी बेटियां मुगलों को भेंट करके प्राप्त किया है.

य़ह उपाधि उनके लिए ही सुरक्षित रहना चाहिए और हमें ऐसी कायरता भरी उपाधि ‘सिंह’ का प्रयोग कतई नहीं करना चाहिए, इसे तो केवल क्षत्रियों के लिए छोड़ दो जो कम-से-कम उन्हें उनके ‘गौरवशाली अतीत’ की यादें ताजा करती रहेगी.
और क्षत्रिय गर्व से कह सकेंगे कि ‘सिंह शब्द की उपाधि उन्होंने मुगलों से वीरता भरे कारनामे करके प्राप्त की है.”

  • मदारी मेहतर

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