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बालश्रम को बनाए रखने की संचालक शक्ति की राजनीतिक आर्थिकी

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
June 18, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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बालश्रम को बनाए रखने की संचालक शक्ति की राजनीतिक आर्थिकी

ऐसा नहीं है कि सरकार उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों से अनभिज्ञ है. उसे पूरा अनुमान है कि भयानक बेरोजगारी और आर्थिक तंगी उत्पन्न होगी और उससे बेहाल लोग अपराध की ओर प्रवृत्त होंगे. तभी तो सारे पुलिस स्टेशन को चौकस रहने के लिए अलर्ट जारी किया गया है.

रात कभी ठेलों के नीचे
कभी दुकानों की आड़ में
कट जाती है आवारी जिंदगी
उम्र भर जुगाड़ में.

बिहार में बालश्रम की वर्तमान परिस्थितियों पर चिंता करने के पूर्व बालश्रम की राजनीतिक आर्थिकी को समझ लेना जरूरी है, क्योंकि वही बालश्रम को बनाए रखने की संचालक शक्ति है. इसके साथ ही संवैधानिक संदर्भों और कानूनी कवायदों पर भी चलते-फिरते एक नजर डालते चलेंगे.

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सामान्य रूप से बाल मजदूरी के कारणों को ढूंढते हुए कहा जाता है कि गरीबी के कारण उन्हें बचपन में मजदूरी करनी पड़ती है. दिखता भी यही है. कुछ सामाजिक विवशताएं भी हैं, किसी जाति-विशेष में जन्मे बच्चे अधिकांशत: बाल मजदूरी के दलदल में ढकेल दिये जाते हैं लेकिन जातियों के भी समृद्धि-प्राप्त परिवारों के बच्चे विद्यालय जाते हैं, न कि मजदूरी करने. इसलिए अंततोगत्वा, गरीबी बालश्रम की एक बड़ी वजह है.

किसी अमीर परिवार के बच्चे को कभी श्रम से उपार्जन करके स्वयं अपने या अपने परिवार का निर्वाह करते हुए नहीं देखा गया है. वे काम भी करते हैं तो फिल्म, विज्ञापन आदि उच्च आय और प्रसिद्धि प्रदान करने वाले क्षेत्रों में. वैसे भी इन क्षेत्रों में उपार्जन करने को ‘बाल श्रम’ नहीं माना गया है लेकिन गहराई में जब हम पड़ताल करते हैं और ढ़की हुई परतों को उघार कर देखने का प्रयास करते हैं तो एक दूसरी सच्चाई से भी रू-ब-रू होते हैं. वह सच्चाई यह है कि व्यवस्था अभिभावकों को बेरोजगार बनाकर भी बालश्रम के अवसर सृजित करती है.

अधिकांश बाल मजदूर बेरोजगार अभिभावकों की संतानें होते हैं. अनेक शोधों के अनुसार बाल मजदूर ऐसे माता-पिता की संतानें हैं, जिन्हें साल में सौ दिनों तक रोजगार नहीं मिलता है अर्थात् रोजगार तो मिल रहा है मगर बच्चों को, उनके माता-पिता को नहीं. इसका क्या कारण है ?

कारण है कि बच्चे सस्ता मजदूर होते हैं. उन्हें मामूली या न के बराबर मजदूरी देनी पड़ती है और कभी-कभी तो वे केवल पेट पर काम करते हैं. उनसे अधिक देर तक काम लिया जा सकता है. उनके बदले यदि वयस्क काम करते हैं तो उन्हें अधिक पगार या मजदूरी देनी पड़ती है. वे आठ घंटे से अधिक काम का ओवर टाइम और अन्य सुविधाएं मांगेंगे और मांगें पूरी न होने पर नियामक संस्थाओं में शिकायत करके नियोक्ता को परेशान करेंगे. बाल मजदूर इस तरह की कोई परेशानी नहीं खडा करता है और उसे न्यूनतम भुगतान करना पड़ता है.

इस तरह अधिकतम मुनाफे की मंशा से चलाये जा रहे उद्योग और धंधे तथा घरेलू कामगारों के रूप में बाल मजदूर को तरजीह देना नियोक्ता के लिए सब तरह से फायदेमंद होता है इसीलिए औद्योगिक क्रान्ति के पूर्व ‘बाल श्रम’ की अवधारणा भी नहीं मिलती है. औद्योगिक क्रान्ति के उपरान्त निजी मुनाफे पर आधारित उद्योगों की आवश्यकता ने बाल श्रम को पैदा किया है.

अर्थशास्त्र का सिद्धांत है कि उत्पादन में लागत कम हो और कीमत वही रहे तो लाभांश बढ़ जाता है. कृषि, घरेलू कामों और उद्योग धंधों में में कम लागत तथा अधिकतम लाभ की यही आर्थिकी बच्चों को मजदूर बनाती है. अब राजनीति इसमें किस तरह सहायक होती है, इसे समझने की कोशिश करते हैं.

यह सर्वमान्य है कि लोकतन्त्र पूंजीवाद की राजनीतिक व्यवस्था है. जिन देशों में निजी पूंजीवाद है, जो कि दुनिया के लगभग तमाम देशों में है, वहां राजनीतिक सत्ता पूंजीपतियों के मैनेजर के रूप में कार्य करती है. असल में सत्ता पूंजीपतियों के हाथ में होती है, सरकार उसकी सहूलियत के लिए व्यवस्थापक की भूमिका में होती है. अपने ही देश की स्थितियों को देखकर इसे आसानी से समझा जा सकता है. दुनिया के अन्य पूंजीवादी देशों के भी यही हालात हैं, जो सरकार निजी पूंजी के संरक्षण और संवर्धन के लिए नियुक्त होती है, वह ऐसे काम सख्ती से कैसे कर सकती है, जो काम पूंजीपतियों के लाभों के विरुद्ध हो !

यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ के द्वारा 18 वर्ष की अवस्था पूरी होने तक बच्चा माने जाने के बावजूद यूरोपियन देशों में 13 वर्ष और अमेरिका में 12 वर्ष से कम अवस्था को ही बच्चा की श्रेणी में रखा गया है. भारत में भी राजनीतिक रूप से तो 18 वर्ष की अवस्था पूरी होने के बाद ही वयस्क माना गया है, लेकिन काम करने और पढ़ने के मामले में उसे 14 वर्ष में ही वयस्क मान लिया जाता है.

राजनीतिक मंशा को इस तरह भी समझा जा सकता है कि 20 नवंबर, 1989 को संयुक्त राष्ट्र संघ की आमसभा के द्वारा जब जीवन, सुरक्षा, विकास और सहभागिता के चार मूल सिद्धांतों पर ऐतिहासिक ‘बाल अधिकार समझौता’ को पारित किया गया तो अमेरिका जैसे देश ने उस पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया और भारत ने 1992 में इस टिप्पणी के साथ हस्ताक्षर किया कि इसे एकाएक निर्मूल कर देना, भारत की अर्थव्यवस्था के लिए घातक होगा.

इसी से बालश्रम के प्रति राजनीतिक मंशा समझ में आ सकती है. इसीलिए 14 वर्ष की अवस्था तक बालश्रम को रोकने के प्रावधान के अनुपालम की उड़ती हुई धज्जियां सब लोग रोज देखते हैं. इसी सैद्धांतिकी को पृष्ठभूमि में रखकर देश और दुनिया की तरह बिहार में भी बालश्रम को देखना चाहिए.

राज्य के पास बालश्रम को रोकने के प्रावधान भी कागज पर लिखे हुए हैं. 1950 में बड़े धूमधाम से लागू हुए संसार के सबसे विशाल संविधान में बालश्रम की मनाही, शिक्षा की अनिवार्यता और बाल-गरिमा के संरक्षण की जवाबदेही राज्य को प्रदान की गई है. संविधान की धारा 21 (क) 6 से 14 वर्ष तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करता है. धारा 24 14 वर्ष से कम आयु वालों को कारख़ाना, खदान और संकटमय कार्यों में लगाने से मना करता है. धारा 39 (ङ) और (च) बच्चों की सुकुमारता के दुरुपयोग और शोषण से रक्षा की सिफ़ारिश करता है और आर्थिक विवशताओं के कारण आयु के प्रतिकूल कार्यों में संलिप्तता की मनाही करता है.

केंद्र ने 1986 में ही बालश्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम बनाया. बिहार में भी 2009 में बालश्रम उन्मूलन, विमुक्ति एवं पुनर्वास – राज्य कार्ययोजना का निर्माण किया गया. 2016 में बाल एवं किशोर श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम भी पारित हुआ. 2017 में भी बालश्रम उन्मूलन तथा किशोर श्रम निषेध एवं विनियमन हेतु राज्य कार्य योजना का निर्माण किया गया. इन प्रमुख अधिनियमों के बीच भी अनेक ऐसे नियम-कानून हैं, जो बालश्रम का निषेध करते हैं लेकिन इतने ढेर सारे नियम-क़ानूनों के बावजूद इतनी बड़ी तादाद में बाल श्रमिकों का होना ही क़ानूनों के कार्यान्वयन के प्रति राज्य की संजीदगी की पोल खोलता है.

इस आलेख की शुरुआत में कविता की जिन चार पंक्तियों को रखा गया है, अभिनंदन गोपाल लिखित ‘जिंदगी के नन्हें शहजादे’ शीर्षक वह कविता बिहार में बालश्रम उन्मूलन के स्टेट एक्शन प्लान के आमुख में दर्ज हैं. 2017 में ही तैयार उसी एक्शन प्लान में, विगत जनगणना के आंकड़ों के आधार पर, स्वीकारोक्ति है कि बिहार में 46 प्रतिशत बच्चे यानि लगभग आधे बच्चे, किसी-न-किसी रूप में बाल श्रमिक हैं.

व्यवस्था की बलिवेदी पर असमय बलि चढ़ा दिये गए इन बच्चों की संख्या 10,88,509 है और यह संख्या देश के कुल बाल श्रमिकों का 10.7 प्रतिशत है अर्थात संसार के एक तिहाई बाल श्रमिक केवल भारत में हैं और उनमें 100 में 11 बाल श्रमिक केवल बिहार से आते हैं. यद्यपि यह गणना पुरानी है, लेकिन पूरे देश की तरह बिहार ने भी बच्चों के प्रति अपनी संवेदनशीलता कभी नहीं दिखाई, इसलिए कोई दूसरी प्रामाणिक गणना उपलब्ध नहीं है.

2009 में प्रदत्त निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार के दबाव और आकर्षण तथा 2009 में ही बालश्रम उन्मूलन, विमुक्ति एवं पुनर्वास – राज्य कार्य योजना के तहत गठित बाल श्रमिक धावा दल के धावों के कारण बाल श्रमिकों की संख्या में कुछ कमी आई होगी, ऐसा माना जा सकता है. कितनी कमी आई, इसके बारे में तो कुछ नहीं कहा जा सकता. केवल इतना दिखाई पड़ा कि कुछ दिनों के बाद ही धावा दलों की तख्ती लगी गाडियां परिसर में खड़े-खड़े सड़ने लगी. बच्चे अब भी ढाबा, घरों, दुकानों, सवारी गाड़ियों और कृषि कार्यों, सफाई कार्यों में लगे हुए सबको दिखाई पड़ते थे, सरकार को छोड़कर अर्थात बाल श्रमिक अब भी बहुतायत रहे, केवल सरकार अन्यमनस्क हो गई. कहने का मतलब यह कि निजी मुनाफे पर आधारित पूंजीवाद और राजनीतिक सत्ता का अपवित्र गठबंधन बाल श्रम को कायम रखता है.

कोरोना के रूप में अचानक टपक पड़ी आपदा ने देश-दुनिया की तरह बिहार की व्यवस्था की भी चूलें हिला कर रख दी हैं. यद्यपि ठीक-ठीक गणना उपलब्ध नहीं है, क्योंकि मजदूरों के अंतर्प्रान्तीय आवागमन पर नजर रखने और उनकी सुरक्षा के लिए कोई विनियमन नहीं है. फिर भी विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार लगभग 30 लाख प्रवासी मजदूर बेरोजगार होकर बिहार लौटे हैं. अखबारी खबरों के अनुसार इनमें से 80 प्रतिशत दुबारा प्रवास पर जाने के इच्छुक नहीं हैं.

पहले से ही गरीबी और बेरोजगारी से त्रस्त बिहार जैसे प्रांत में कोरोना के कारण और ज्यादा गरीबी और बेरोजगारी बढ़ गई है. असंगठित क्षेत्र के कारीगर, मजदूर, सड़कों और गुमतियों में रोजगार करने वाले उद्यमी, दुकानों पर काम करने वाले श्रमिक – सबके-सब हतप्रभ की भांति भटक रहे हैं. किसानों के हाथ में तत्काल कुछ पैसे देने वाली सब्जी मिट्टी के मोल बिक रही है. कुछ नहीं सूझने पर सब बेरोजगार हुए लोग सब्जी बेचने के ही काम में लग गए हैं.

सरकार जिस स्किल मैपिंग के द्वारा योग्यतानुसार रोजगार सृजन का आश्वासन दे रही है, उसके बारे में तो पता नहीं कि क्या होगा, कब होगा और किस तरह होगा. यदि यह सब ठीक से चला भी, जिसकी कम गुंजाइश है, तो भी यह भोज के समय कोहड़ा रोपने जैसा है, जिसका फल तब प्राप्त होगा, जब उसकी उतनी जरूरत नहीं रहेगी. जिस मनरेगा के द्वारा सबको रोजगार देने कि चुनावी घोषणा लगातार की जा रही है, उसमें भ्रष्टाचार की सच्चाई बिना गांवों में गए नहीं जानी जा सकती है. अर्थात आर्थिक उपार्जन के सारे नाले यहां पहले से ही बंद हैं और जो लोग पहले से हैं, वे ही बिलबिला रहे हैं. इस तंगी में 30-35 लाख लोग और जुड़ जाएंगे तो क्या होगा ? सोचकर ही रहमदिल लोगों का कलेजा बैठ जाएगा.

ऐसा नहीं है कि सरकार उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों से अनभिज्ञ है. उसे पूरा अनुमान है कि भयानक बेरोजगारी और आर्थिक तंगी उत्पन्न होगी और उससे बेहाल लोग अपराध की ओर प्रवृत्त होंगे. तभी तो सारे पुलिस स्टेशन को चौकस रहने के लिए अलर्ट जारी किया गया है. यही वह परिस्थिति है, जिसके बारे में ऊपर इंगित किया गया था कि अधिकांश बाल श्रमिक बेरोजगार अभिभावक की संतानें होते हैं. पहले की पहलों से बालश्रमिकों के होने में जो थोड़ी कमी आई होगी, जिस कमी का कोई प्रामाणिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, अब इस नई आर्थिक परिस्थितियों के कारण, पहले के सारे प्रयासों पर पानी फेरते हुए, बाढ़ के पानी की तरह, बालश्रम में बेतहाशा वृद्धि होगी.

दाने-दाने को मुंहताज अभिभावकों की जैविक विवशता होगी कि वे अपनी मासूम संतानों को किसी के यहां काम पर रख दें ताकि, कम-से-कम उस बच्चे का पेट चल जाये और कुछ कमा सके तो घर में भी कुछ लाये. इस तरह लाखों बच्चे असमय मजदूरी की कालकोठरी में ढकेल दिये जाएंगे.

संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव एंटोनिओ गुटेरेस भी स्वीकारते हैं – ‘….. और पांच वर्ष की आयु से कम करीब 14.4 करोड़ बच्चों का भी विकास नहीं हो रहा है. हमारी खाड़ी-व्यवस्था ढह रही है और कोविद 19 ने हालत को बुरा बनाया है.’ बिहार इस भयावहता से बचा नहीं रहेगा और, यही परिस्थिति होगी बच्चों के श्रमिक बनने की. उन लाखों बाल श्रमिकों को बचाने के जो उपाय होने चाहिए थे, उसके लिए हमारी व्यवस्था न तो पहले से तैयार है और न ही प्रतिबद्ध.

सामान्य रूप से यह माना जाता है कि जो बच्चे विद्यालय नहीं जाते हैं, वे बाल मजदूर हैं. बच्चों को विद्यालय में मध्याह्न भोजन के साथ ड्रेस, किताब, साइकिल, छात्रवृत्ति आदि के नाम पर कुछ नकद राशि भी प्राप्त हो जाती है. विद्यालय बालश्रम से बचाने की सबसे मजबूत दीवार हो सकते थे परंतु विद्यालयों के पास इन अतिरिक्त लाखों छात्रों को संभाल सकने लायक न तो पर्याप्त शिक्षक हैं और न ही कक्षाएं. पड़ोस में विद्यालय की उपलब्धता भी, कभी विद्यालयों को समाप्त करके और कभी दूसरे विद्यालयों में समाहित करके, धीरे-धीरे खत्म की गई है.

मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्राप्त हुए 11 वर्ष हो गए हैं, लेकिन बिहार के 70,958 विद्यालयों में पढ़ रहे 2 करोड़ 9 लाख बच्चों के लिए 4,67,877 शिक्षक ही उपलब्ध हैं. बिहार के बाल श्रम के उन्मूलन और किशोर श्रम के विनियमन के लिए मसौदा राज्य कार्य योजना के Chapter 4, Para 2 में भी शैक्षिक अवसरों के अभाव को ही बाल श्रमिक होने का प्रधान कारण बताया गया है – ‘मुद्दों की एक विस्तृत श्रृंखला शिक्षा के प्रति लोगों की धारणा को आकार देने के लिए जिम्मेदार लगती है. शिक्षण की खराब गुणवत्ता, शिक्षकों की उदासीनता, पात्रता प्राप्त करने में कठिनाइयों, स्कूल की दूरी और ट्यूशन या स्टेशनरी की अतिरिक्त लागत को वहन करने में असमर्थता को कुछ ऐसे कारकों के रूप में बताया गया, जो अक्सर माता-पिता को बच्चों को काम करने के लिए भेजने के उनके विवेकपूर्ण विकल्प निर्णय को देखते हैं.’

लेकिन इस स्वीकारोक्ति का कोई अर्थ नहीं है, क्योंकि इस चित्र को बदलने की कोई कोशिश नहीं हुई है. इसलिए यह तय है कि बिहार में फिर से लाखों बच्चों के नए बाल श्रमिक होने की संभावना की पृष्ठभूमि तैयार हो गई है. (लेखक राइट टू एडुकेशन फोरम, बिहार के प्रांतीय संयोजक हैं।

  • डॉ. अनिल कुमार राय प्रांतीय संयोजक, राइट टू एडुकेशन फोरम, बिहार

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