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कोरोना एक बीमारी होगी, पर महामारी राजनीतिक है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
August 7, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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कोरोना एक बीमारी होगी, पर महामारी राजनीतिक है

बर्लिन में कोरोना के नाम पर जारी लॉकडाऊन के खिलाफ प्रदर्शन

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गिरीश मालवीय
क्या भारत के बुध्दिजीवी वर्ग का यह फर्ज नहीं था कि वह लॉकडाउन के पीछे जो पूंजीवादी दिमाग काम कर रहा है, उसे समझता और लोगों को समझाता ?

कोरोना एक बीमारी होगी, पर महामारी ये राजनीतिक ही है. अब रूस दावा कर रहा क‍ि उसकी कोरोना वायरस वैक्‍सीन क्लिनिकल ट्रायल में 100 फीसदी सफल रही है. वह सितंबर-अक्‍टूबर तक देशभर में टीकाकरण शुरू कर देगा.

इस बात से WHO का पेट बहुत जोर से दुखने लगा है. रूस के वैक्सीन बनाने के दावे पर अब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने संदेह जाहिर कर रहा है. रूस के स्वास्थ्य मंत्री ने पिछले शनिवार को ही ऐलान किया कि उनका देश अक्टूबर महीने से कोविड-19 के खिलाफ नागरिकों को बड़े स्तर पर वैक्सीन लगाने का कैंपेन शुरू करने की तैयारी कर रहा है ओर वो भी नि:शुल्क यानी फ्री.

इस दावे पर विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रवक्ता क्रिस्टियन लिंडमियर ने कहा, ‘जब भी ऐसी खबरें आएं या ऐसे कदम उठाए जाएं, हमें सतर्क रहना होगा. ऐसी खबरों के असली अर्थ को सावधानी के साथ पढ़ा जाना चाहिए.’

साफ दिख रहा है कि WHO का कोरोना का बना बनाया खेल खराब हो रहा है. अरे ! एक बात बताइये कोई संप्रुभ देश यदि वेक्सीन बना रहा है और अपने नागरिकों को ही दे रहा है तो आपको क्या दिक्कत है ? अच्छी वेक्सीन है, बुरी वेक्सीन है, ये पुतिन जाने और रूस के नागरिक जाने ? आपका पेट क्यों दु:ख रहा है ?

साफ-साफ कहिए न कि हम तो उसी वेक्सीन को सही होने का सर्टिफिकेट देंगे जो बिल्लू भयंकर जी बनाएंगे ! दरअसल नागरिकों को निःशुल्क वेक्सीन दी जाएगी तो इनका सारा कमाई का और न्यू वर्ल्ड ऑर्डर बनाने का प्लान चौपट हो जाएगा.

अगर WHO की नीयत साफ होती तो वह खुलकर वेक्सीन का स्वागत करता. रूस का वेक्सीन बनाना और उसे फ्री में बांटना WHO को बहुत अखर रहा है. यह सारी बातें अब शीशे के तरह साफ नजर आ रही है लेकिन इस बारे में कोई बड़ा नेता, पत्रकार या मीडिया समूह बोलना नहीं चाहता. ऐसा वो क्यों नहीं चाहते इसका अंदाजा आप खुद ही लगाइए इसलिए ऊपर लिखा है कि कोरोना एक बीमारी जरूर है, पर महामारी ये राजनीतिक ही है.

तब भी उन्हें भारत में मौते कम लग रही है ! उन्हें पैनिक क्रिएट करने के लिए और मौतें दिखानी है. आप तो यहांं कोरोना जांच की रिजल्ट पॉजिटिव आने की बात कर रहे हो, अगर मरीज को बहुत हल्के-फुल्के लक्षण हो, मरीज हस्पताल में भर्ती हो, उसे हार्ट अटैक आ जाए और उसकी कोरोना जांच रिपोर्ट नहीं आयी हो तो भी मरीज की मौत को कोरोना सिन्टम्स में आधार पर कोरोना से हुई मौत में दर्ज किये जाने का प्रावधान 10 मई के बाद से किया जा चुका है.

एक बार फिर आगाह कर रहा हूंं कि अमेरिकियो डाटा विशेषज्ञों द्वारा भारत मे कोविड से हुई मौतों की संख्या बढाकर बताने के लिए दबाव बनाया जा रहा है. जनसत्ता में खबर छपी है कि ग्लोबल एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत में कोरोना संक्रमितों के आंकड़े जुटाने में कोताही बरती जा रही है. वह भारत में अमेरिका से 20 गुना कम मौतों पर सवाल उठा रहे हैं जबकि ICMR द्वारा भारत में मृत्यु दर WHO के निर्देश पर 10 मई के बाद से बढ़ा चढ़ाकर दिखाई जा रही हैं.

जॉन हापकिंस इंस्टीट्यूट फोर एप्लाइड इकोनॉमिक्स के फाउंडर और को-डायरेक्टर स्टीव एच हैनके कहते हैं कि खराब डेटा कलेक्शन प्रणाली और भ्रष्ट ब्यूरोक्रेसी के चलते सही आंकड़े सामने नहीं आ पाए हैं. यह सिर्फ कल की बात नहीं है. 20 जुलाई को भारत की अनेक न्यूज़ वेबसाइट में खबर छपी कि अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट ने भारत में कोरोना से हो रही मौत के आंकड़ों पर सवाल उठाए हैं.

अखबार ने इन आंकड़ों को ‘रहस्य’ करार दिया है अमेरिका और ब्राजील में जब कोरोना के कुल मामले 10 लाख थे तो मौत की संख्या करीब 50 हजार हो चुकी थी लेकिन कुल 10 लाख मामलों पर भारत में कोरोना से मौत का आंकड़ा 25 हजार रहा (मध्य जुलाई तक).

अब रोज लगभग 800 संक्रिमितो की मौत दर्ज की जा रही है. मृत्यु की संख्या 40 हजार को क्रॉस कर गयी है. अब भी अमेरिकी डेटा विशेषज्ञ को यह संख्या कम लग रही है.

आपने कभी ध्यान देने की कोशिश की है कि दरअसल मृतकों की संख्या ज्यादा दिखाने से डर फैलाने में आसानी होती है यदि केस अधिक निकलते हैं और रिकवरी भी अच्छी होती है तो तो उतना डर नही फैलेगा लेकिन यदि मृतकों की संख्या निरंतर बढ़ती हुई होगी तो बड़ा दहशत क्रिएट करने में मदद मिलेगी.

जॉन हापकिंस यूनिवर्सिटी कुछ महीने पहले अपने लोगो का इस्तेमाल कर के कहती है कि भारत में इस महामारी से लाखों लोग मरेंगे, उस वक्त उसके ‘लोगो’ का दुरुपयोग करने के लिए उनकी निंदा की गई थी. ईरान के बारे में भी ऐसी खबरें फैलाई जा रही हैं कि वहांं भी मौतें कम कर के बतलाई जा रही है. रूस में तो बहुत ही कम मौतें दर्ज की गई है. ब्रिटेन समेत यूरोप में पिछले दो महीने में मृत्यु दर में बहुत कमी आयी है.

इसलिए अब नए सिरे से डेथ रेट बढ़ता हुआ दिखाने का दबाव है. दरअसल अमेरिकियों का यह पुराना खेल है. एड्स के बारे में आप जानते हैं कि किस तरह 90 के दशक में इस बीमारी का भय फैलाया जा रहा था कि करोड़ों लोगों की मृत्यु हो जाएगी. भारत में भी एड्स रोगियों के डाटा को बढ़ा-चढ़ा कर बतलाया गया.

2007 की शुरुआत में कहा गया कि ‘भारत में एचआइवी के मरीजों की संख्या 57 लाख है और बढ़ती जा रही है दुनिया मे सबसे ज्यादा एड्स के मरीज भारत में होंगे.’ लेकिन 2007 की गर्मियों में ‘लैंसेट’ में एक शोध आया. तब अमेरिकी डाटा एक्सपर्ट की पोल खुली. तब जाकर यूएनएड्स से लेकर डब्लूएचओ तक तमाम अमीर फाउंडेशन ने अपनी आंकड़े सुधारे और इसे 25 लाख कर दिया गया. यानी साफ था कि पहले भारत के मामले में 128 प्रतिशत की अतिश्योक्ति की गई थी.

आप जानते है कि ये आंकड़े क्यों बढाकर पेश किए जा रहे थे ? क्योकि उस वक्त बिल गेट्स एड्स नियंत्रण के लिए 10 करोड़ डॉलर के अनुदान के साथ भारत आए थे और आशंका जताई थी कि ‘2010 तक भारत में एड्स के 2-2.5 करोड़ मामले हो सकते हैं.’

कृपया बहुत ध्यान से कोरोना की मृत्यु दर को बढाने वाले इस खेल को समझने का प्रयास कीजिए. मैं जानता हूंं एक भी कोरोना को लेकर हाय-हाय मचाने वाला बुद्धिजीवी जवाब नहीं देगा, क्योंकि उनकी बुद्धि अभी और कुछ सोच नहीं पा रही है. यह सब इसलिए सम्भव हो रहा क्योंकि हम पर वैज्ञानिक शब्दों और डेटा की इतनी अधिक बमबारी की जा रही है कि हमारा बुद्धिजीवी वर्ग बिलकुल हक्का-बक्का रह गया है. उसने अपने दिमाग का इस्तेमाल करना छोड़ दिया है.

लोग पूछते हैं कि आप कोरोना वायरस पर इतना जो लिख रहे हैं, यदि यह सच है तो भारत की बात छोड़िए बाकी दुनिया के लोग कुछ क्यों नहीं बोल रहे हैं ? मेरा जवाब यही होता है कि दुनिया भर मे लोग बोल रहे हैं पर आपको उनकी खबरें नहीं दिखाई जाती इसलिए आपको ऐसा लगता है कि कोई कुछ नहीं बोल रहा.

कल जर्मनी के बर्लिन में लगभग लाख लोगों ने एक साथ सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया है. आपका मीडिया आपको यह खबर नही दिखाएगा. और यह कोई पहला प्रदर्शन नहीं है. दुनिया भर में अब तक सड़कों पर उतरकर लोग सैकड़ों प्रदर्शन कर चुके हैं लेकिन कभी आपको आपका मीडिया यह नहीं बताएगा क्योंकि पूरी दुनिया का मीडिया उन पूंजीपतियों का गुलाम मीडिया है जो इस कोरोना महामारी से लाभ उठा रहे हैं.

आप जानते हैं बर्लिन में प्रदर्शनकारी क्या नारे लगा रहे थे ? वे क्या बोल रहे थे ? वे चिल्ला रहे थे ‘महामारी कभी नहीं हुई.’ एक आदमी चिल्लाया, ‘बि ल गे ट् स कोरोनोवायरस के पीछे है और हर किसी को जबरदस्ती टीका लगाना चाहता है. और जर्मन सरकार उसे ऐसा करने में मदद कर रही है, लॉकडाउन एक साजिश है. नो फौसी, नो गेट्स, नो फियर.

वे कह रहे थे कि प्रतिबंधों ने उनके अधिकारों को रौंद दिया था. उन्होंने सीटी बजाई और ‘स्वतंत्रता’ और ‘प्रतिरोध’ शब्द जोर-जोर से चिल्लाने लगे. वे नारे लगा रहे थे कि ‘सबसे बड़ी कांस्पिरेसी-कोरोनोवायरस-महामारी’ है. हम मास्क हर वक्त नहीं लगा सकते. ‘हमें ये “न्यू वर्ल्ड आर्डर ” बिल्कुल पसंद नहीं है’ और हमें बिल गेट्स जैसे लोगो की वैक्सीन नहीं चाहिए, नो लॉक डाउन.

जर्मनी में सरकार महामारी की सेकंड वेव की बात कर रही है तो प्रदर्शनकारी चिल्ला रहे थे ‘हम दूसरी लहर हैं.’ कुछ ने ‘मास्क ऑन, ब्रेन ऑफ’ जैसे नारे लगाए. कुछ लोग कोरोना- फेक अलार्म जैसी टी शर्ट पहने हुए थे.

ऐसे ही प्रदर्शन पोलैंड में, ऑस्ट्रेलिया में, अमेरिका में और यूरोप के अन्य कई देशों में हुए हैं लेकिन उनकी खबरें कभी सामने नहीं आती और अगर भूले भटके से आ भी जाए तो उसे किसी और ही अंदाज में प्रस्तुत किया जाता है.

बहुत दिनों से मन में यह प्रश्न घूम रहा था कि ‘आखिर लॉक डाउन का आईडिया विश्व मे पहली बार किसको आया ?’ जब यह वीडियो देखा तो यह देखकर मैं हक्का बक्का रह गया कि लॉक डाउन मूल रूप से अमेरिका के रॉक फेलर फाउंडेशन द्वारा सुझाया गया गया आइडिया था, जो उनके 2010 के ‘सेनेरियो फ़ॉर फ्यूचर टेक्नोलॉजी एंड इंटरनेशनल डेवलपमेंट’ नामक पेपर में पब्लिश किया गया था.

अगर यह वीडियो जैसा कि दावा किया गया है कि यह वीडियो 2014 का है, सच है तो मुझे अब यह मान लेने में कोई हिचक नहीं है कि कोरोना का सारा खेल न्यू वर्ल्ड ऑर्डर को विश्व मे लागू करने के लिए ही रचा गया है.

दरअसल हम हिंदुस्तान के लोग बहुत भोले भाले हैं. अमेरिका में लोग सरकारों पर कड़ी नजर रखते हैं. 2002 में सार्स महामारी का ख़ौफ़ फैलाया गया, पर आश्चर्यजनक रूप से यह वायरस अपने आप ही खत्म हो गया. कैसे हो गया ? इसका कोई एक्सप्लेनेशन नही मिलेगा ?

फिर 2009-10 के दौरान H1N1 को लेकर WHO ने अमेरिका को लेकर गंभीर चेतावनी तक जारी कर दी थी. यूरोप में और अमेरिका में भी बिग फार्मा ने इसमें खूब मुनाफा कमाया लेकिन यह खबर भारतीय मीडिया की कभी सुर्खियां नही बनी.

फिर आया 2014 का दौर जब अफ्रीका में आई महामारी इबोला को लेकर यह कहा गया कि यह वायरस जल्द ही पूरी दुनिया मे फैलने वाला है लेकिन विश्व की तत्कालीन राजनीति- आर्थिक परिस्थितयां मुफीद नहीं थी. यह वीडियो तभी का बताया जा रहा है. इस वीडियो में महामारी आने पर चीन का रिएक्शन किस तरह का होगा, यह बताया गया है और एग्जेटली 2019-20 में एक-एक बात बिलकुल सही उतरी है. आप खोजी पत्रकार हैरी वॉक्स का यह वीडियो एक बार देख लीजिए, सब खेल साफ नजर आ जाएगा.

http://www.pratibhaekdiary.com/wp-content/uploads/2020/08/10000000_1226409484370755_287176439524246086_n-1.mp4

कोरोना काल मे सबसे अधिक निराश मुझे तमाम बुद्धजीवियों ओर वामपंथी मित्रों ने किया है. ठीक है आप कोरोना को आप एक बीमारी मान रहे हो, उसे एक महामारी भी मान रहे हो, आप मानो, आपको पूरा हक है लेकिन आप कम से कम उसके पीछे जो खेल रचा जा रहा है जो उसे तो बेनकाब करो. उसके पीछे जो दक्षिणपंथ एक दुरभिसंधि रच रहा है, उसके बारे में तो लोगो को बताओ.

भारत में मोदी सरकार द्वारा जो सवा दो महीने का ड्रेकोनियन लॉकडाउन लागू किया गया, उससे कोरोना को तो कोई फर्क नहीं पहुंचा लेकिन देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से बर्बाद हो गयी. लेकिन एक भी वामपंथी और बुद्धिजीवी वर्ग के व्यक्ति ने उसके खिलाफ कोई आवाज बुलंद नहीं की. आपसे ज्यादा अच्छा विरोध तो पूंजीपति वर्ग के प्रतिनिधि राजीव बजाज ने किया जिन्होंने साफ साफ यह कहा :

मैंने पूरी दुनिया में कहीं से भी इस तरह के लॉकडाउन के बारे में नहीं सुना, जैसा भारत में लागू किया गया. दुनिया भर से मेरे सभी दोस्त और परिवार हमेशा बाहर निकलने के लिए स्वतंत्र रहे हैं. यह काफी अजीब है. मुझे नहीं लगता कि किसी ने कल्पना की थी कि दुनिया को इस तरह से बंद कर दिया जाएगा. मुझे नहीं लगता कि विश्व युद्ध के दौरान भी दुनिया बंद थी. तब भी चीजें खुली थीं. यह एक अनोखी और विनाशकारी घटना है’

राजीव बजाज ने जापान और स्वीडन का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि वे इन दोनों देशों ने लॉकडाउन नहीं लगाया लेकिन उनके यहांं भी कोरोना कंट्रोल में आ गया है.

राजीव बजाज तो विकसित देशों के उदाहरण दे रहे थे, मैं आपको पाकिस्तान का उदाहरण देता हू. कल मैं पाकिस्तान के आंकड़े देख रहा था, आप सभी जानते हैं कि पाकिस्तान ने लॉकडाउन नही लगाया. इमरान ने उस वक्त कहा था :

पाकिस्तान अमेरिका, यूरोप और चीन की तरह लॉकडाउन लागू नहीं कर सकता है. देश की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं कि पूरे देश में लॉकडाउन लगा सकें. हमारा कमजोर वर्ग जिनमें 25 मिलियन लोग शामिल हैंं, वे दैनिक या साप्ताहिक मजदूरी पर रहते हैं. हम कैसे लॉकडाउन लगा सकते हैं ?

उस वक्त हमारा मीडिया लॉकडाउन नहीं लगाने पर पाकिस्तान को कितना क्रिटिसाइज कर रहा था आपको याद होगा. पाकिस्तान में कब्रिस्तान में कब्र खोदते हुए लोगों के विजुअल चलाए जा रहे थे, मीडिया में ‘पाकिस्तान बर्बाद हो जाएगा’ यह कहा जा रहा था.
आप जानते हैं परसों पाकिस्तान के आंकड़े क्या थे ?

पाकिस्तान में 281,863 कुल केस है जिसमें से 256,058 लोग रिकवर कर चुके हैं. मौतें 6,035 हुई है. पाकिस्तान पूरी तरह से रिकवर कर चुका है. अब वहां मात्र 25 हजार के आसपास ही एक्टिव पेशेंट है. पिछले 24 घण्टे में मौतें वहांं मात्र 18 हुई है जबकि भारत मेंं रोज अब 800 मौतें हो रही है और वो भी तब जब हम भारत मे सवा दो महीने का टोटल लॉक डाउन लगा कर अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर चुके हैं.

और भी तमाम बड़े छोटे देश हैं जिन्होंने अपने यहांं टोटल लॉकडाउन नही किया, वे भी कोरोना से उबरते हुए नजर आ रहे हैं लेकिन अब कोई उनकी सफलता की बात नहीं कर रहा है.

क्या भारत के बुद्धिजीवी वर्ग का यह फर्ज नहीं था कि वह लॉकडाउन के पीछे जो पूंजीवादी दिमाग काम कर रहा है, उसे समझता और लोगों को समझाता ?

(गिरीश मालवीय के सोशलमीडिया के पोस्टों से संग्रहित)

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