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‘द नेशन वांट्स टु नो !’ की जाने हकीकत

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 9, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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रिपब्लिक टीवी के जम्मू कश्मीर ब्यूरो चीफ तेजिंदर सिंह सोढी ने बीते दिनों इस्तीफा दे दिया. रिपब्लिक टीवी की एच. आर. प्रमुख / उपाध्यक्ष को भेजा गया उनका इस्तीफा, इस चिल्लम-चिल्ली के गणतंत्र (रिपब्लिक) और उसके सर्वेसर्वा अर्णब गोस्वामी की स्याह हकीकत उघाड़ के रख देता है. अनुवाद इन्द्रेश मैखुरी ने किया है. यह अनुवाद उसी नेशन के सुलभ संदर्भ हेतु किया गया है जिसकी ओर से खड़े हो कर अर्णब बाबू चीखते रहते हैं- द नेशन वांट्स टु नो ! तो नेशन जाने उनकी भी हकीकत !

'द नेशन वांट्स टु नो !' की जाने हकीकत

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द्वारा : तेजिंदर सिंह सोढी <…………….@………com>
दिनांक : रविवार, 30 अगस्त, 2020, 9:19 रात्रि
विषय : इस्तीफा
प्रति : हनी कौर <……….@………..com>

प्रिय हनी,

प्रमोशन के लिए बधाई, मेरा विश्वास करो एच. आर. हैड से उपाध्यक्ष पर प्रमोशन किसी भी कंपनी में महत्वपूर्ण उपलब्धि होती है, बशर्ते कि वह कंपनी रिपब्लिक न हो, पर रिपब्लिक में तो एक मात्र सर्वोच्च नेता और उनकी पत्नी, जो हर चीज का सूक्ष्म प्रबंधन करती हैं, वही सब कुछ हैं, बाकी सब तो फिलर (जगह भरने वाले) हैं, चाहे वे किसी भी पद पर क्यूंं न हों.

यह मैं आपको अपने निजी अनुभव से बता रहा हूंं कि यहांं सब कुछ अर्णब से शुरू हो कर गोस्वामी पर खत्म हो जाता है. आपको यदि मेरी बात पर भरोसा न हो तो पिछले एच. आर. हैड से पूछ सकती हैं. क्या आपने कोई ऐसी कंपनी देखी है, जिसे पूरी एच. आर टीम ने तीन साल से कम समय में अलविदा कह दिया हो ?

समय सबसे बड़ा शिक्षक है और मैं ईमानदारी से यह प्रार्थना करता हूंं कि आपको उस सब से न गुजरना पड़े, जिससे उन सब को गुजरना पड़ा, जिन सब ने कंपनी छोड़ी, परंतु फिर भी आपके प्रमोशन पर मेरी शुभकामनायें.

मैं सोया हुआ था, जब मुझे अर्णब की पत्नी का फोन आया. वे इस कंपनी के शुरू होने से पहले एक कांंग्रेस समर्थक अखबार में मात्र एक ब्यूरो रिपोर्टर थीं ! उन्होंने मुझे बताया कि वे और अर्णब मेरे काम से बड़े खुश हैं और उन्होंने मेरा प्रमोशन करने का निर्णय लिया है. मैं चौंका कि खुश होने का क्या मतलब, कोई भी प्रमोशन यदि किया जाना है तो वह योग्यता पर आधारित होना चाहिए.

मैं तुरंत ही फोन काटना चाहता था, जबकि दोनों पति और पत्नी यह शेख़ी बघार रहे थे कि वे अपने स्टाफ के प्रति कितने दयालु और उदार हैं कि ऐसे समय में जब तमाम मीडिया संस्थान लोगों को निकाल रहे हैं, उनकी तनख़्वाहें घटा रहे हैं, वे अपने स्टाफ का प्रमोशन कर रहे हैं !

मुझे कहा गया कि इस प्रमोशन के साथ मेरी जिम्मेदारियांं बढ़ जाएंगी और मैं डेस्क को स्टोरीज़ के मामले में गाइड कर सकता हूंं, यह और चौंका देने वाली बात थी क्यूंकि यही तो मैं पिछले दो साल से कर रहा था, जब से डेस्क पर मौजूद हर समझदार शख्स ने डेस्क को अलविदा कह दिया था.

इस प्रमोशन के साथ एक बंदिश थी और वो थी की तनख्वाह अभी नहीं बढ़ेगी और वह बाद में बढ़ाई जाएगी पर रिपब्लिक के सर्वोच्च नेता चाहते थे कि हम इस बात को प्रचारित करें कि अर्णब कितने उदार हैं कि उन्होंने अपने स्टाफ का प्रमोशन किया. (हम लोगों को कैसे बताते, पूर्व में तो कंपनी, स्टाफ को इस बात के लिए धमका चुकी थी कि वे अपने सोशल मीडिया परिचय में रिपब्लिक का नाम हटा दें), पर जैसा कि आप जानती हैं उनकी इमेज ही है, जिसके वे परवाह करते हैं, इसलिए वो मुझसे खास तौर पर चाहते थे कि मैं इसे (प्रमोशन की खबर को) सोशल मीडिया में पोस्ट करूंं. मैंने ऐसा एक-दो दिन के लिए किया भी पर उसके बाद मुझे अपनी गलती समझ में आ गयी तो मैंने उस पोस्ट को डिलीट कर दिया.

हम सब जानते हैं कि अर्णब खूब पैसा बना रहे हैं, उनकी चौकड़ी के लोग भी खूब पैसा बना रहे हैं पर जो लोग वास्तविक काम करते हैं, वे कुछ कौड़ियां ही पाते हैं.
रिपब्लिक टीवी का संपूर्ण स्टाफ दो साल से व्यग्रतापूर्वक वेतन वृद्धि का इंतजार कर रहा है. दो साल पहले एपरेजल की प्रक्रिया शुरू हुई, फॉर्म जमा किए गए पर उसके बाद उनके बारे में किसी ने कुछ नहीं सुना.

स्टाफ को तो कोई वेतन वृद्धि नहीं दी गयी पर उन्होंने उस पैसे का इस्तेमाल हिन्दी चैनल को शुरू करने और उसके लिए नया स्टाफ भर्ती करने के लिए किया, रिपब्लिक टीवी का स्टाफ अपने हाल पर छोड़ दिया गया.

इस साल अगस्त में जब मुझे आपका ईमेल मिला कि मेरा प्रमोशन कर दिया गया है, मैं तुरंत ही उस मेल का जवाब देना चाहता था, लेकिन मैंने कुछ दिन इंतजार करने का फैसला किया और अगर आपको याद हो तो इस्तीफा देने के कुछ घंटे पहले मैंने प्रमोशन के प्रस्ताव को अस्वीकार करने वाला ईमेल आपको भेजा. अगर आपको याद हो तो मैंने अपने इस्तीफे में लिखा था कि इस्तीफे के कारणों के लिए मैं एक विस्तृत मेल आपको भेजूंंगा, तो यह रहा ईमेल.

मैंने कभी रिपब्लिक टीवी में नौकरी के लिए आवेदन नहीं किया था. मैं पहले जिस कंपनी के साथ काम कर रहा था, मैं उससे पूरी तरह प्रसन्न और संतुष्ट था. वह 2017 में मेरी शादी का दिन था जब अर्णब के ऑफिस से किसी ने मुझे फोन करके कहा कि अर्णब मुझ से बात करना चाहते हैं. मैं उस समय गुरुद्वारे में अपने फेरों के शुरू होने का इंतजार कर रहा था. मैंने सोचा कोई मेरे साथ मज़ाक कर रहा है तो मैंने उसे डपट दिया और कहा कि कुछ दिन बाद फोन करे.

मैं हैरत में पड़ गया जब कुछ दिन बाद फिर कॉल आया और व्हाट्स ऐप वीडियो कॉल के जरिये अर्णब से मेरी बात करवाई गयी. बहुत नरमी और शालीनता से उन्होंने बात की और मैं भी बहुत उत्साहित था क्यूंकि अब तक हमने उन्हें टीवी पर देखा था और यह पहली बार था जब हम एक-दूसरे से बात कर रहे थे.

उन्होंने टाइम्स नाऊ छोड़ने के कारण मुझसे साझा किया. उन्होंने बताया कि कैसे विभिन्न मसलों पर प्रबंधन द्वारा उन्हें अपमानित किया गया और क्यूं उन्हें एक महीने तक स्टूडियो में नहीं घुसने दिया गया. उन्होंने कहा कि वे एक नए चैनल के साथ आ रहे हैं जो टाइम्स नाऊ के साम्राज्य को ध्वस्त कर देगा. एक डेविड, शक्तिशाली गोलियथ का मुक़ाबला करेगा.

(अनुवादक : यह बाइबल की एक कथा का उद्धरण है,जिसमें गोलियथ एक दैत्याकार राजा है, जिससे सब भयभीत हैं और अंततः युवा डेविड पत्थरों से उसे परास्त कर उसी की तलवार से उसे मार देता है)

उन्होंने मुझे बताया कि किसी ने मेरे नाम की संस्तुति की है और वे मुझे अपनी टीम में लेने को उत्सुक हैं. उन्होंने वायदा किया कि रिपब्लिक, टीवी समाचार उद्योग में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा और सत्ता में बैठे लोगों से सवाल करेगा तथा ऐसा चैनल बनेगा जो वंचितों की आवाजों को स्वर देगा. मूलतः यह एक समग्र समाचार चैनल होगा.

मैंने उन्हें बताया कि मैं अखबार की पृष्ठभूमि से हूंं और टेलिविजन का मेरा कोई अनुभव नहीं है. उन्होंने मुझसे कहा कि वे नए चेहरे चाहते हैं और रिपब्लिक ऐसा संस्थान बनेगा जो युवा प्रॉफ़ेशनल्स द्वारा संचालित किया जाएगा और उनकी टीम में केवल युवा पत्रकार होंगे.

यह मैं आपको आश्वस्तकारी तरीके से कह सकता हूं कि वो जबरदस्त प्रेरक वक्ता हैं, मेरे जैसा आदमी जिसने कभी टेलिविजन में जाने की नहीं सोची थी, वह उनकी टीम में शामिल हो गया. जब वेतन पर बातचीत हुई तो उन्होंने मुझे कहा कि अभी उनके पास पैसे नहीं हैं, इसलिए वे मुझे मेरे पूर्व नियोक्ता द्वारा दिये जा रहे पैकेज पर ही लेंगे पर उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि जैसे ही कंपनी पैसा कमाने लगेगी, मेरा वेतन दोगुना कर दिया जाएगा.

जब मैंने इस्तीफा दिया तो मेरे पूर्व प्रधान संपादक ने प्रस्ताव दिया कि यदि मैं इस्तीफा न दूँ तो मेरे वेतन में बीस हजार रुपये की वृद्धि की जाएगी, पर सिद्धांतवादी व्यक्ति होने के नाते मैंने उनसे आग्रह किया कि मैं अर्णब को वचन दे चुका हूंं, इसलिए वे मुझे जाने दें.

आज पीछे मुड़ कर देखने पर रिपब्लिक में आने के अपने फैसले पर मुझे अफसोस होता है. उन्होंने पत्रकारिता का क्रांतिकारीकरण नहीं बल्कि गंभीर पत्रकारिता की हत्या कर दी, उसे एक चुटकुले में तब्दील कर दिया और कहीं न कहीं मैं स्वयं को भी इस अपराध में भागीदार समझता हूंं.

चैनल लांच हुआ और अपने पहले हफ्ते में ही वह टीआरपी में पहले नंबर पर पहुंंच गया. हम सब खुश और उत्साहित थे क्यूंकि यह हमारी मेहनत का फल था. सफलता सस्ते में नहीं आई थी, उसमें हमारा खून-पसीना शामिल था.

मैं खुश था कि अर्णब, टीम के योगदान को स्वीकार कर रहे थे पर सब जगह अर्णब ही अर्णब थे. पूरे देश में बड़े-बड़े होर्डिंग लगाए गए, केवल अर्णब का महिमामंडन करते हुए. अगर विश्वास न हो तो हिन्दी चैनल के टीआरपी में पहले नंबर पर आने के बाद दिल्ली में लगाए गए होर्डिंग देख लीजिये.

शुरुआती कुछ हफ्तों बाद ही मुझे महसूस हुआ कि चैनल सिर्फ और सिर्फ अर्णब का, अर्णब के लिए है और टीम वर्क या सामूहिक प्रयास में उनका कतई भरोसा नहीं है. कुछ महीनों में मैंने महसूस किया रिपब्लिक के लिए बाकी सब फिलर हैं, जो दिन भर स्क्रीन पर अर्णब की अनुपस्थिति को भरने की कोशिश करते हैं और शाम को मंच अर्णब के हवाले होता है.

यह महसूस होने लगा कि अर्णब वो बरगद का पेड़ हैं, जिसके नीचे कोई दूसरा पेड़ नहीं उग सकता क्यूंकि वो किसी और को चैनल का चेहरा बनते हुए बर्दाश्त नहीं कर सकते. उन्होंने हर मुमकिन तरीके से यह सुनिश्चित किया कि संगठन में सब यह महसूस करें कि बाकी सब प्रतिद्वंदी हैं.

एक घटना घटी जब रिपब्लिक की टीम को दिल्ली में कांंग्रेस की प्रेस कॉन्फ्रेंस कवर नहीं करने दिया गया. हम से कहा गया कि हम सब अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस दफ्तर के बाहर काली पट्टी बांध कर प्रदर्शन करें. मैंने सोचा अरे रुको, ये क्या है. यह एक पत्रकार का काम थोड़े है कि वह किसी राजनीतिक पार्टी के खिलाफ प्रदर्शन करे ? पर हमारे पास कोई विकल्प नहीं था, इसलिए सब ने वैसा ही किया.

एक सुबह मुझे डेस्क से किसी का फोन आया (मैं उस ‘किसी’ का नाम नहीं लूंंगा क्यूंकि उनका अर्णब ने इतना उत्पीड़न किया कि दफ्तर में बैठे-बैठे उन्हें भयानक दिल का दौरा पड़ गया) और मुझसे कहा कि मैं सुनंदा पुष्कर के घर के पास छुप जाऊं और सही वक्त पर वो मुझे बताएंगे कि क्या करना है.

छुपना क्यूं है ? वे अपने स्टाफ पर कभी भरोसा नहीं करते थे, इसलिए आखिरी क्षण तक कुछ नहीं बताया जाता था. मैं उस घर पर गया और अचानक मुझे घर में घुसने को कहा गया और माइक सुश्री पुष्कर के वयोवृद्ध पिता के मुंह पर लगा कर, उनसे जबरन यह कहलवाने को कहा गया कि उनकी बेटी की हत्या के लिए शशि थरूर जिम्मेदार हैं. मैंने कोशिश की पर जब मैंने उनके वृद्ध पिता को देखा, मेरे आंसू आ गए. मैं कमजोर पड़ गया. मेरी मनस्थिति स्थिर नहीं रह पाई. मैंने डेस्क को बताया पर उन्होंने मुझे कहा कि अर्णब मुझ से बेहद नाराज़ हैं और वो चाहते हैं कि पिता से कैमरे पर यह कहलवाया जाये कि थरूर ने उनकी बेटी को मारा है.

मैंने ऐसा करने से इंकार कर दिया और वहांं से चला आया. हांं, एक नौकर से मैंने जरूर बात की, जिसने थरूर और सुश्री पुष्कर के रिश्ते के बारे में अच्छी बातें कही पर वे कभी प्रसारित नहीं हुई.

अगले दिन अर्णब ने मुझे बुलाया और मुझ पर बेइंतहा चिल्लाये. उन्होंने मुझसे कहा कि सुश्री पुष्कर के पिता को कैमरे पर थरूर पर आरोप लगाता न दिखा कर, मैंने उन्हें निराश किया है.

यह तो वह पत्रकारिता नहीं थी, जिसके लिए मैं रिपब्लिक में आया था. संवाददाताओं को अर्णब की ओर से लोगों पर हमलावर होने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था.
उत्तर प्रदेश के एक संवाददाता को तत्कालीन मुख्यमंत्री का पीछा करने का दृश्य लाने को कहा गया, जब वो नहीं कर सका तो उससे कहा गया कि वह मुख्यमंत्री के घर की दीवार फांद कर ऐसा करे. उसने कहा कि सुरक्षाकर्मी उसे गोली मार देंगे; अर्णब की पत्नी ने उस पर फिर भी ऐसा करने के लिए दबाव बनाया तो उसने अगले दिन इस्तीफा दे दिया.

जैसे-जैसे पैसा और ताकत आती गयी, अर्णब की हेकड़ी बढ़ती गयी और जैसे वो टीवी पर किसी की नहीं सुनते थे, वैसे ही वो अपने स्टाफ की भी नहीं सुनते थे. उन्होंने, उनको अपमानित करना, उन पर चिल्लाना, गाली देना और यहांं तक की मारपीट तक शुरू कर दी.

वे लोग जो अपने अच्छी स्थापित और अच्छे वेतन वाली नौकरियांं छोड़ कर ऐसे वक्त में उनके साथ आए थे, जब रिपब्लिक का न कोई वर्तमान था, न भविष्य, उन सब ने उन्हें छोड़ना शुरू किया. कुछ ने इसलिए छोड़ा क्यूंकि उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया जा रहा था और कुछ ने इसलिए छोड़ा क्यूंकि उन्हें महसूस हुआ कि यह पत्रकारिता नहीं है, जो वे यहांं कर रहे हैं.

धीरे-धीरे सब ने छोड़ना शुरू कर दिया. पहले उत्तर प्रदेश के रिपोर्टर ने छोड़ा, उसके बाद मध्य प्रदेश, फिर पश्चिम बंगाल, राजस्थान, चंडीगढ़, बंगलुरु और हर ब्यूरो ने संपादकीय नीतियों के चलते इस्तीफा दे दिया.

जब मैं उनसे बात करता हूंं तो वे कहते हैं कि वे रिपब्लिक में वास्तविक पत्रकारिता करने आए थे, ना कि किसी राजनीतिक पार्टी की कठपुतली बनने के लिए और ना ही उन पर चोट करने के लिए जो उस राजनीतिक पार्टी से सहमत नहीं हैं.

उन सब ने महसूस किया कि अर्णब अपने पुराने नियोक्ताओं और पुराने सहकर्मियों तथा हर उस व्यक्ति से जो उनके चिल्लाने के अस्त्र से असहमति रखता है, अपने व्यक्तिगत झगड़े निपटाने के लिए अपने दो चैनलों का उपयोग कर रहे हैं.

लगभग सब प्रमुख एंकरों ने रिपब्लिक छोड़ दिया. हमें अभी भी याद है कि कैसे एक बेहतरीन एंकर को अपमानित करके घसीटते हुए स्टूडिओ के बाहर धकेल दिया गया और वह वापस नहीं आया. जो लोग उनकी कोर टीम में थे, जिन्हें अर्णब का दाहिना हाथ और मस्तिष्क कहा जाता था, सबने उन्हें छोड़ दिया. वे सब अपने व्यावसायिक जीवन में बहुत अच्छा कर रहे हैं. उन सब ने फैसला किया कि वे इस बात का खुलासा नहीं करेंगे कि उन्होंने रिपब्लिक क्यूं छोड़ा. एक पूर्व एंकर के अनुसार, ‘उनके पास एक मंच है, जिससे वे आपके खिलाफ नकली धारणायें गढ़ सकते हैं.’

जिस व्यक्ति ने मेरे नाम की संस्तुति की थी, वे थे श्री अदित्य राज कौल, जो मुझ से जम्मू में कई बार मिले थे और उन्होंने मुझे काम करते हुए देखा था. आदित्य राज कौल वो व्यक्ति थे जो टाइम्स नाऊ और बाद में रिपब्लिक में कई एक्सक्लूसिव स्टोरीज के कारक थे. जब मैंने और आदित्य ने एक साथ सुंजवा आतंकी हमले को कवर किया तो मैंने देखा कि वे किस कदर सुसंगत व्यक्ति थे. उनका टीम में होना अर्णब के सौभाग्य की बात थी क्यूंकि ब्रेकिंग न्यूज़ इनपुट से लेकर एक्सक्लूसिव और साक्षात्कार तक रिपब्लिक पर कौल साहब ही होते थे.

हम मज़ाक में कहते थे कि अर्णब को रिपब्लिक टीवी का नाम बदलकर अदित्य टीवी कर देना चाहिए. अर्णब उन पर कोई अहसान नहीं कर रहे थे बल्कि हर स्टोरी के ब्रेक होने के पीछे आदित्य थे. आदित्य एक तरह से नेटवर्क की रीढ़ थे पर एक दिन हमें पता चला कि आदित्य ने इस्तीफा दे दिया है. आज तक मुझे नहीं मालूम कि अर्णब और आदित्य के बीच क्या हुआ पर चूंकि अब हम अर्णब को अच्छी तरह जानते हैं तो कोई भी समझ सकता है कि उन्होंने क्यूं छोड़ा होगा.

अर्णब ये कभी बर्दाश्त नहीं कर सकते थे कि आदित्य उनसे ऊपर बढ़ जाएंं इसलिए आदित्य की चैनल से विदाई हो गयी. आदित्य के जाने के बाद चैनल की रीढ़ ही टूट गयी. हम सबने उनकी जगह भरने की बहुत कोशिश की पर पूरी टीम के लिए मिलकर भी उनकी बराबरी करना मुमकिन नहीं था. हम सब ने बहुत कोशिश की पर अर्णब ने इन प्रयासों को कभी मान्यता नहीं दी.

आपके आने से पहले चैनल छोड़ने वाले कुछ और नामों का मैं उल्लेख करना चाहता हूंं.

स्नेहेश एलेक्स फिलिप, देश के ख्यातिलब्ध रक्षा संवाददाता हैं. रिपब्लिक में आने से पहले वे एक प्रमुख भारतीय समाचार एजेंसी के पाकिस्तान संवाददाता थे. उन्होंने अर्णब गोस्वामी की पूर्वाग्रही संपादकीय नीतियों और स्टाफ के साथ अर्णब के व्यवहार के कारण रिपब्लिक छोड़ दिया. आज भी रिपब्लिक में खबर लिखने के लिए रिपोर्टर उनके लिखे हुए की मदद लेते हैं.

हरिहरन रिपब्लिक में आने से पहले दक्षिण भारत के स्टार एंकर थे, उन्होंने कुछ ही महीने में छोड़ दिया. कारणों का अनुमान कोई भी लगा सकता है.

मैंने अपने जीवन में परीक्षित लूथरा जैसा मृदुभाषी और अपने काम के प्रति समर्पित व्यक्ति नहीं देखा. हम सब जानते हैं, वे क्यूं छोड़ कर गए. आजकल वे शानदार काम कर रहे हैं.

सकल भट जो दूरदर्शन में 17 सालों तक प्राइम टाइम एंकर थी, रिपब्लिक में शामिल हुई पर जैसे अर्णब किसी को अपने से आगे बढ़ते नहीं देख सकते, वैसे ही वे यह भी बर्दाश्त नहीं कर सकते कि किसी की फ़ैन फॉलोइंग उनसे ज्यादा हो इसलिए उनके पर क़तर दिये गए. उन्होंने त्यागपत्र दे दिया, फिर दूरदर्शन में चली गयी और आज फिर वहांं प्राइम टाइम एंकर हैं.

पूजा प्रसन्ना जो अर्णब के साथ टाइम्स नाऊ छोड़ कर रिपब्लिक में शामिल हुई, उन्होंने इस कंपनी को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. कई हफ्तों तक परिवार से भी अलग रही ताकि अर्णब मुंबई में अपना स्टूडियो स्थापित कर सकें. उन्होंने रात-दिन काम किया पर वे भी अब रिपब्लिक के साथ नहीं हैं. कारण का अनुमान लगाने का काम मैं पुनः आप पर छोड़ता हूंं.

प्रेमा श्रीदेवी जिन्हें एक समय नेटवर्क की रीढ़ समझा जाता था, उन्हें भी संगठन छोड़ना पड़ा. मुझे अभी भी याद है कि चैनल के लॉच होने से पहले एक कॉन्फ्रेंस कॉल के दौरान अर्णब ने कहा था कि ‘वे प्रेमा के बिना कुछ नहीं हैं.’
यह सूची अंतहीन है और हर किसी का उल्लेख मेरी जल्द ही आने वाली किताब में होगा. मैं आपको पहली प्रति भेजूंंगा, यह वादा है.

मैं जब यह लिख रहा हूंं तो मुझे पता चला कि पिछले एक हफ्ते में कई लोगों ने अपने इस्तीफे दे दिये क्यूंकि उन्हें रिया चक्रवर्ती का इंटरव्यू ना ला पाने के लिए अपमानित किया गया.

एक तरफ प्रतिद्वंदी चैनल के खिलाफ रिया का इंटरव्यू प्रसारित करने के लिए अर्णब उच्च नैतिक मानदंडों का दिखावा करते हैं और दूसरी तरफ वे अपने लोगों को उसका इंटरव्यू ना ला पाने के लिए उत्पीड़ित और अपमानित करते हैं.

भले ही आज अर्णब दावा करते हैं रिपब्लिक देश में सबसे बड़ा नेटवर्क है, हकीकत यह है कि ज़्यादातर राज्यों में उनका एक भी संवाददाता नहीं है और जिन राज्यों में लोगों ने इस्तीफा दे दिया, कोई भी प्रॉफेश्नल पत्रकार शामिल होने का इच्छुक नहीं है.

दिल्ली में आपके पास बीट संवाददाता नहीं हैं क्यूंकि कोई आना ही नहीं चाहता. एक क्राइम रिपोर्टर जो एयरफोर्स और नेवी की वर्दी में फर्क नहीं कर सकता उनके लिए रक्षा मामले कवर करता है. दो साल पुरानी एक स्टोरी, जो उस समय मैंने कवर की थी, उसका फुटेज चला कर वह वेबकूफ़ बन गया और फिर उसने सेना पर फर्जी वीडियो देने का आरोप लगाया. उसने एक फर्जी स्क्रीनशॉट भी शेयर किया ताकि यह सिद्ध कर सके कि सेना के एक वरिष्ठ अफसर ने उसे वह वीडियो दिया है.

पिछले कुछ सालों से अर्णब परिवारवाद के खिलाफ खूब चिल्लाते रहते हैं, लेकिन मैं समझता हूंं कि उन्हें इस मामले में बोलने वाला अंतिम व्यक्ति होना चाहिए. उनकी पत्नी (जिनकी एक मात्र योग्यता यह है कि वे अर्णब की पत्नी हैं), दोनों चैनल के क्रियाकलाप संभालती हैं. उनके एक खास पिट्ठू जो हाल में कार्यकारी समाचार संपादक बनाए गए हैं, उनकी पत्नी डिजिटल डेस्क की हैड बनाई गयी हैं (क्यूंकि वे वहीं की रहने वाली हैं, जहां की अर्णब की पत्नी हैं).

एक अन्य व्यक्ति जिन्हें अब सीनियर एसोसिएट एडिटर बना दिया गया है और रक्षा मामले कवर करते हैं और उनकी पत्नी हिंदी चैनल की इनपुट हैड बना दी गयी हैं और उनका काम नोएडा ऑफिस के स्टाफ पर नजर रखना है कि कौन डेस्क पर बैठा है और कौन नहीं, इसलिए अर्णब को परिवारवाद पर प्रवचन देना बंद कर देना चाहिए.

मेरे लिए चीजें थोड़ी अलग थी क्यूंकि मेरा एकमात्र काम उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती को निशाना बनाना और उनके खिलाफ बोलना था, जो मैंने किया. मेरा काम यह सुनिश्चित करना था कि उन्हें राष्ट्र विरोधी सिद्ध किया जाये और वो जो भी बोलें, उसमें मीनमेख निकाली जाये, मैंने इसे अच्छी तरह से निबाह दिया.

चूंकि मैं झूठ बोलने में सहज नहीं महसूस करता था, मैंने रक्षा मामलों की तरफ अपना ध्यान केंद्रित करना शुरू किया, क्यूंकि रक्षा हमेशा से मेरी विशेषज्ञता रहा है और मैंने कई एक्सक्लूसिव स्टोरीज की भी, पर कई वरिष्ठ अधिकारी मुझ से कहते थे- ‘तेजिंदर तुम सही आदमी हो, जो गलत कंपनी में है.’

मैं एक शादीशुदा आदमी हूंं..मेरी एक बेटी है और एक परिवार है, जिसके भरण पोषण की ज़िम्मेदारी मुझ पर है. हर महीने कई ईएमआई हैं, जो मेरी ओर ताक रही होती हैं तो मुझे अपने सिद्धांतों की हत्या करके, यह जानते हुए भी कि जो हम रिपब्लिक में कर रहे हैं, वह पत्रकारिता नहीं है, अर्णब के साथ काम करना पड़ा.

05 अगस्त को जो हुआ उसने ताबूत में अंतिम कील ठोक दी. जिस इंटरव्यू के लिए मैं महीनों से कोशिश कर रहा था, वह दूसरे रिपोर्टर को दे दिया गया क्यूंकि वह उसी क्षेत्र का है, जहां की अर्णब की पत्नी है और इस रिपोर्टर ने उस आत्महत्या के लिए उकसाने के केस को ढांंपने में अर्णब की मदद की जिसके लिए अर्णब के खिलाफ मुंबई में एफ़आईआर दर्ज है.

अर्णब ने मुझे अपने शो के बाद बुलाया और चिल्लाना व गाली-गलौच शुरू कर दिया पर अब मेरी सहनशक्ति चरम पर पहुंंच चुकी थी और अब मैंने उसी भाषा और उसी शब्दावली में, संभवतः कुछ अतिरिक्त शुद्ध पंजाबी शब्दों के साथ जवाब दिया, जिन्हें वो जीवन भर याद रखेंगे.

वह एक बकैत को अपना मंच साथी पैनलिस्टों को गाली देने के लिए उपलब्ध करवाते थे, अर्णब अपने स्टाफ को गंदगी का टुकड़ा संबोधित करते थे और मांं-बहन की गालियों का इस्तेमाल करते थे, तो मैंने सोचा कि यह सही वक्त है कि इनको, इनकी ही दवाई का स्वाद चखाया जाये.

आप विश्वास कीजिये, जिस दिन से मैंने इस्तीफा दिया, उन सबने जिनके साथ मैंने कभी काम किया था या जो अभी भी अर्णब के साथ काम कर रहे हैं, उन्होंने मुझे बधाई दी और उनकी आवाज़ बनने के लिए शुक्रिया अदा किया. आप जानती हैं कुछ ने इस्तीफा दे दिया है और कुछ ही जल्द देने वाले हैं.

नयी प्रतिभाओं की भर्ती के नाम पर अर्णब उनका शोषण कर रहे हैं, उन्हें नौकरी के नाम पर कौड़ियां दे रहे हैं. वे डेस्क पर युवा कॉलेज स्नातकों को भर्ती कर रहे हैं या ऐसे लोगों को जिनको संपादकीय समझ शून्य है ताकि उनकी संपादकीय नीतियों के खिलाफ बोलने वाला या उन्हें चुनौती देने वाला कोई न हो, जो संपादकीय नीतियां एक खास राजनीतिक पार्टी के व्हाट्स ऐप संदेशों से निर्देशित होती हैं.

अर्णब ने कई श्रमों क़ानूनों का उल्लंघन किया है क्यूंकि उन्होंने हमें रिपब्लिक टीवी (अंग्रेजी चैनल) के लिए भर्ती किया और फिर हमें हिन्दी चैनल के लिए भी काम करने को मजबूर किया. फिर फरमान आया कि यदि डिजिटल डेस्क के लिए हर हफ्ते, निर्धारित संख्या में स्टोरी न की तो वेतन में कटौती की जाएगी.

यह धमकी श्रम क़ानूनों के खिलाफ थी क्यूंकि इस बात का उल्लेख रिपब्लिक में शामिल होते वक्त हमारे साथ किए गए करार में नहीं था और एचआर टीम, जिसने नोट भेजा, उसे भी उत्पीड़न के लिए अदालत में घसीटा जा सकता है.

अर्णब की अपने स्टाफ के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है. उन्होंने स्टाफ को फील्ड में जाने को मजबूर किया चाहे कंटेनमेंट जोन ही क्यूंं न हो. मैं जानता हूं कि यह कितना मुश्किल और खतरनाक था पर हमने इस फरमान का भी पालन किया.

मेरे पास कंपनी का लैपटाप है और चूंकि इस बात का मैं गवाह रहा हूं कि कंपनी कैसा व्यवहार करती है, अपने पूर्व कर्मचारियों के देयों का भुगतान नहीं करती, मैं लैपटाप तभी लौटाउंगा जबकि मेरे देयों का भुगतान कर दिया जाये, मुझे अनापत्ति प्रमाणपत्र , अवमुक्ति पत्र दे दिया जाये और अगर यह 20 दिन में न किया गया तो मेरे पास श्रम न्यायालय जाने के अलावा कोई चारा नहीं होगा.

हालांकि मैं जानता हूं कि अर्णब प्रतिशोधी स्वाभाव के व्यक्ति हैं और मेरे करियर तथा मेरी नौकरी पाने की भविष्य की संभावनाओं को नष्ट करने का हर मुमकिन प्रयास करेंगे, पर किसी को उनके खिलाफ बोलना ही होगा तो मैंने सोचा कि वह कोई मैं ही क्यूंं नहीं. कम से कम इस व्यक्ति के शोषण के खिलाफ बोल कर और युवा जो गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता की आस में आते हैं, बंधुआ मजदूर बनने से तो बचेंगे.

मैं यह भी रिकॉर्ड में ले आना चाहता हूं कि मेरे या मेरे परिवार के साथ कुछ बुरा होता है, कोई दुर्घटना, कोई अवांछित घटना मेरे या मेरे परिवार के साथ होती है तो इसके लिए अर्णब और उनकी पत्नी ज़िम्मेदार होंगे. मैं यह बात लिखित में जल्द ही अपने स्थानीय पुलिस स्टेशन को भी दे दूंगा.

हनी कौर, मैं आपको शुभकामनायें देता हूं और प्रार्थना करता हूं कि आपको वो सब न झेलना पड़े जो पिछले एचआर हैड को झेलना पड़ा था.

सादर,
तेजिंदर सिंह सोढी
पूर्व ब्यूरो प्रमुख रिपब्लिक टीवी
अब एक स्वतंत्र आदमी

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'प्रतिभा एक डायरी' दुनिया के किसी भी हिस्से में उत्पीड़ित, शोषित जनता द्वारा शोषण उत्पीड़न के खिलाफ, साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ, जाति, धर्म, नस्ल, क्षेत्र, लिंग के आधार पर हो रहे जुल्म के खिलाफ बुलंद किए गए आवाज का पक्षधर है. इस वेबसाइट पर प्रकाशित किसी भी रचना को जनहित में किसी भी भाषा में, अंशतः या पूर्णत: प्रकाशित किया जा सकता है. अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.

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