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Home गेस्ट ब्लॉग

हिन्दू और मुस्लिम दोनों का मूल स्वभाव है – लड़ना

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 27, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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हिन्दू और मुस्लिम दोनों का मूल स्वभाव है - लड़ना

पं. किशन गोलछा जैन, ज्योतिष, वास्तु और तंत्र-मंत्र-यन्त्र विशेषज्ञ

हिन्दू और मुस्लिम दोनों का मूल स्वभाव लड़ना है. इसे ऐसे समझिये – जहां कथित हिन्दू-मुसलमान दोनों है, वहां वे एक-दूसरे से लड़ते हैं. और जहां दोनों साथ नहीं हैं, वहां वे अपने ही लोगों से आपस में लड़ते हैं इसीलिये ही लिखा है कि दोनों का मूल स्वभाव लड़ना है.

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जहां मुस्लिम नहीं है सिर्फ हिन्दू है, वहां हिन्दू आपस में जातियों के नाम पर लड़ते हैं. सवर्ण, अवर्णोंं के साथ. ब्राह्मण, दलितों के साथ. जाट, गुज्जरों के साथ. अहीर, कुर्मी के साथ. चमार, मोची के साथ एक दूसरे से लड़ते हैं. एक दूसरे की बस्तियां जलाते हैं. बच्चों का क़त्ल करते हैं. स्त्रियों से बलात्कार करते हैं अर्थात आपस में लड़ रहे है !

जिन देशों में सिर्फ मुसलमान रहते हैं या जहां हिन्दू नहीं हैं, वहां मुसलमान आपस में लड़ते हैं. शिया, सुन्नी के साथ. देवबंद, वहाबी के साथ. पसमांदा, अहमदियों के साथ फिरके बना कर एक दूसरे से लड़ते हैं. एक दूसरे को मार काट रहे हैं. अपनी इबादतगाहों और मस्जिदों में बम फोड रहे हैं. घरों को जला रहे हैं. औरतों का शोषण और बलात्कार कर रहे हैं. बीसियों फिरको में बंटे ये इस्लामिक अनुयायी एक-दूसरे फिरके के निर्दोष लोगों को पकड़ पकड़कर बेहरमी से क़त्ल कर रहे हैं. दूसरे देशों में रहने वाले मुसलमानों पर रासायनिक हमले कर रहे हैं अर्थात आपस में लड़ रहे है.

मैं दोनों धर्मों के मुर्ख-जाहिलों से कहना चाहता हूंं कि असल में ये लड़ना तुमने अपने जीने का तरीका बना लिया है.श इसीलिये जब कोई दूसरा नहीं मिलता तो आपस में ही लड़ने लगते हो. दूसरे की दौलत और दूसरे की मेहनत पर ही तुम्हारी सारी अमीरी टिकी है इसीलिये गिरोह या गुट बना कर दूसरे लोगों के साथ लड़ना ही तुम्हारी जिंदगी का मकसद बन गया है. बिना लड़े तुम्हारी रोटी और बोटी हजम नहीं होती है.

दूसरे की दौलत पर कब्ज़ा करने के लिये तुम गिरोह बनाते हो. तुम्हारे सम्प्रदाय असल में तुम्हारे समुदाय नहीं बल्कि तुम्हारी गिरोहबंदी है ताकि सुनियोजित तरीके से दुसरों को लूट सको. तुम्हे अमीर बनने के लिये और अपनी अमीरी को बनाये रखने के लिये ताकत चाहिये होती है इसीलिये तुम धार्मिक समूह संस्थायें बनाते हो ताकि सामने वाले की ताकत तुम पर हावी न हो. ये साम्प्रदायिकता असल में तुम्हारे लालच और ताकत की अंधी भूख का ही नतीजा है. बाकी तो तुम्हारे अल्लाह और भगवान के बारे में मेरा मूंह ना ही खुलवाओ तो अच्छा है.

हिन्दू और मुस्लिम, ये दोनों एक ही पूर्वज के अंश से निकली संतानें हैं, जो कालांतर में अलग-अलग हो गयी और इसीलिये ही इन दोनों मज़हब की पूजा पद्धति भले ही भिन्न-भिन्न है लेकिन आंतरिक तौर पर दोनों में लगभग सारी समानतायें है, यथा –

दोनों का ‘धर्म’ एक ही है अर्थात कट्टरवाद और आंतकवाद को बढ़ावा देना. दोनों ही दंगे करते हैं और इन दोनों के ही कारण पूरी दुनिया में दूसरों का जीना मुहाल हो रखा है.

  • दोनों ही अपने आपको सबसे श्रेष्ठ मानते हैं.
  • दोनों दूसरों पर अपना धर्म थोपते हैं.
  • दोनों धर्म परिवर्तन करवाते हैं.
  • दोनों अपना-अपना वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश करते हैं.
  • दोनों ही दुनिया की सब पुरानी वस्तुओं को अपने धर्म का बताकर कब्ज़ा करने की कोशिश करते रहते हैं.

दोनों ही एक-एक किताब के मुरीद हैं. एक गीता का तो दूसरा कुरआन का और दोनों ही इसे किसी कथित ईश्वर द्वारा दी गई शिक्षा मानते हैं, जबकि ये दोनों ही किताबें इंसानों द्वारा सातवीं सदी में लिखी गयी थी.

दोनों सुबह शाम स्पीकर से शोर करते हैं, एक प्रार्थना पूजा आरती के नाम पर तो दूसरा अजान के नाम पर. दोनों ही असहनशील होते हैं. विरोध सहन नहीं कर पाते. कुछ कहो तो मरने-मारने पर उतर आते हैं.

  • दोनों ही दाढ़ी बढ़ाने का समर्थन करते हैं.
  • दोनों ही जानवरों का मूत पीते हैं (हिन्दू गाय का मुस्लिम ऊंट का).
  • दोनों ही भस्म प्रयोग करते हैं (हिन्दू अगरबती धुप की भस्म का और मुस्लिम लोबान की राख का).
  • दोनों ही कपडा चढ़ाते हैं (हिन्दू चुनड़ी और मुस्लिम चादर).
  • दोनों ही फूल चढ़ाते हैं. एक चढ़ाता है दूसरा बरसाता है.
  • दोनों ही खाने की वस्तु चढ़ाकर खाते हैं. एक प्रसाद कहता है, दूसरा तवर्रुख़ कहता है.
  • एक मरे हुए को जलाता है और दूसरा दफ़नाता है पर दोनों ही उस मरे हुए की हड्डियों की पूजा करते हैं.

दोनों ही मूर्तियों की पूजा भी करते है फर्क इतना है कि हिन्दू खड़ी और बैठी मूर्ति की पूजा करता है और मुस्लिम पड़ी मूर्ति यानि मजार की पूजा करता है. खड़ी मूर्ति में राम पूजो या शंकर और पड़ी मूर्ति में पीर, बात एक ही है जो काम खड़ी मूर्ति में हो रहा है, वो ही काम तो पड़ी मूर्ति में भी हो रहा है.

दोनों चरणामृत पीते हैं. हिन्दू मूर्ति को नहलाकर पीता है और मुसलमान मजाररुपी कब्र धोकर पीता है और दोनों ही इसे दुनिया का सबसे पवित्र पानी मानते हैं. एक कहता है, ये गंगा के पानी से भी ज्यादा पवित्र है तो दूसरा कहता है कि इसके आगे तो जमजम का पानी भी कुछ नहीं. ये तो जमजम से भी ज्यादा पवित्र है.

  • दोनों ही स्त्रियों की आज़ादी के खिलाफ है.
  • दोनों ही स्त्रियों को घर में कैद करके रखना चाहते हैंं.
  • दोनों ही स्त्रियों के लिए नियम निर्धारित करते हैं.
  • दोनों ही स्त्रियों के कपड़ों को लेकर आदेश जारी करते हैं.
  • दोनों ही स्त्रियों को परदे में रखते है. एक घूंघट में, दूसरा बुर्के या हिजाब में.
  • दोनों को स्त्रियों का दूसरे मर्दों से बात करना पसंद नहीं है.
  • दोनों स्त्रियों को घर के चूल्हे चौके तक और घर में सात तालों में बंद रखना चाहते हैं.
  • दोनों स्त्रियों को भोग की वस्तु और बच्चे पैदा करने का साधन समझते हैं.
  • दोनों ही हर स्त्री को भोगना चाहता है लेकिन विवाह के समय एक वर्जिन स्त्री चाहता है.
  • दोनों ही बेटे पैदा करने लिए पागल है और बेटी के भ्रूण हत्या के लिये जिम्मेदार भी.

यानी, दोनों एक ही तरह की पाखंड के शिकार हैं. दोनों में कोई फर्क नहीं और ऐसा इसलिये भी है क्योंकि दोनों एक ही पूर्वज की संतानें हैं, जो बाद में देश-काल और परिस्थिति के कारण अलग-अलग हो गये और अब तो ये हर कोई जानता है कि जेनेटिक कोड हमेशा कायम रहता है.

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