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हथियार रखना मौलिक अधिकार की दिशा में पहला कदम

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
October 12, 2017
in ब्लॉग
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3.3k
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नागरिकों को हथियार रखना उसी प्रकार एक मौलिक अधिकार है जिस प्रकार उसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, इंसाफ पाने का है. एक अशिक्षित कमजोर नागरिक मजबूत राष्ट्र का नींव कभी नहीं डाल सकता.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

अमरीकी चश्मों से हर चीज देखने के आदी हम एक अमरीकी सनकी के हत्याकांड से उद्वेलित होकर हथियारों को रखने की अमरीकी के मौलिक अधिकारों पर बहस करने लगे, जबकि अमरीका राष्ट्रपति ट्रम्प ने इस सवाल को छुआ तक नहीं. हथियार रखना मनुष्य का एक मौलिक अधिकार है, इस सत्य को समझना होगा. वगैर इसे समझे हम एकदम गलत निष्कर्ष पर पहुंच जायेंगे, खासकर शोषण आधारित इस वर्ग समाज में.

युद्ध और हिंसात्मक गतिविधियों के खिलाफ मानव इतिहास में सबसे पहले आवाज गौतम बुद्ध ने उठाया था और सारी दुनिया को अहिंसा का पाठ पढ़ाया था. लेकिन कट्टर ब्राह्मणवादी पुष्यमित्र शुंग की हिंसात्मक गतिविधियों ने पूरे देश से ही गौतम बुद्ध के अनुयायियों को खून में डुबाकर मिटा दिया और जिन मूल्यों के साथ गौतम बुद्ध आगे बढ़े थे, उसे दफना दिया.

इतिहास में दूसरी बार युद्ध और हिंसा के खिलाफ जिस देश ने सवाल उठाया और अपनी पूरी ताकत से युद्धों और हत्याओं के पैरोकारों के खिलाफ लड़ा, वह सोवियत संघ था.

युद्ध और हिंसाओं के सबसे बड़े पैरोकार अमरीकी साम्राज्यवादी सारी दुनिया के हत्यारों को जुटाकर नवजात सोवियत संघ को खत्म करने के लिए विशाल फौज लेकर टुट पड़ा और उसे खून में डूबो डाला. परन्तु वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लैस सोवियत संघ ने इस थोपे गये युद्धों का शानदार तरीके से सशस्त्र प्रतिकार किया और करोड़ों लोगों की बलि देने के बाद अमरीकी साम्राज्यवादियों को पीछे धकेल पूरी दुनिया में समाजवाद का परचम लहराया.

चंद वर्षों के बाद ही एक बार फिर अमेरिकी साम्राज्यवादी ने दुनिया भर के हत्यारों की फौजों को जुटाकर सोवियत संघ पर हमला बोल दिया. एक बार फिर सोवियत संघ ने करोड़ों लोगों की शहादत के दम पर अमरीकी साम्राज्यवादी ताकतों को पीछे धकेल दिया और हैवानियत का जीता-जागता नमूना हिटलर जैसी फासिस्ट ताकत को दफन किया.

उपरोक्त दोनों उदाहरण से एक चीज जो स्पष्ट होती है वह है युद्ध और हिंसा का अंत करने के लिए किसी एक समूह या देश की सद्इच्छा काफी नहीं है. युद्ध विरोधी ताकत को युद्ध और हिंसा का सहारा लेना होगा, जब तक की युद्धों का पैरोकार करनेवाली ताकतों को समूल रूप से नष्ट नहीं कर दिया जाता क्योंकि युद्ध और हिंसा का अंत किसी एक समूह, किसी एक देश की सद्इच्छा पर निर्भर नहीं करता.

विकास का पैमाना युद्धों का खात्मा क्यों नहीं है? न्यूयार्क टाइम्स में क्रिस हेड्गेस ने अपने एक आलेख में बहुत जबरदस्त तथ्य सामने रखा. उनके मुताबिक मानव समाज के 3400 सालों के लिखित इतिहास में केवल 268 साल शांति वाले साल रहे हैं यानी इस धरती ने बस आठ प्रतिशत समय शांति के साथ गुजारा है.

यह माना जाता है कि इतिहास में हुए युद्धों और हिंसक संघर्षों में लगभग 34.17 करोड़ लोग मारे गए हैं. कुछ अनुमान इस संख्या को एक अरब बताते हैं. बहरहाल बीसवीं सदी में हुए सबसे ज्यादा रक्तरंजित युद्धों के कारण इन सौ सालों में 18.5 करोड़ लोगों के मारे जाने का अनुमान लगाया गया है. दूसरा विश्व युद्ध इतिहास का सबसे खतरनाक युद्ध माना जाता है. जिसमें 2 करोड़ लोगों की जानें गईं.

दुनिया में हिंसा और अशांति के कारण जो राशि मानव कल्याण के लिए उपयोग में नहीं आ पायी, उसमें से लगभग 40 प्रतिशत (5.6 ट्रिलियन डॉलर) हिस्सा सेनाओं और सैन्य उपकरणों पर खर्च हुआ. जिन 10 देशों में सबसे ज्यादा अशांत माहौल है, उन देशों के कुल सकल घरेलू उत्प्पाद का 37 प्रतिशत हिस्सा युद्धों और टकराव की भेंट चढ़ गया. सीरिया का 66.9 प्रतिशत, ईराक का 57.6 प्रतिशत, अफगानिस्तान का 52.1 प्रतिशत, कोलंबिया का 36.9 प्रतिशत, दक्षिण सूडान का 36.2 प्रतिशत, उत्तर कोरिया का 32.4 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद अशांति की भेंट चढ़ रहा है.

अमेरिका के लिए यौद्धिक हिंसा की कीमत होती है 16049.83 करोड़ डॉलर. चीन को 7126.47 करोड़ डॉलर का आर्थिक भार पड़ता है. रूस पर 5177.58 करोड़ डॉलर, भारत पर 7419.06 करोड़ डॉलर, ब्राजील पर 4022.80 करोड़ डॉलर, सउदी अरब पर 3633.47 करोड़ डॉलर, ईराक पर 2803.24 करोड़ डॉलर, मैक्सिको पर 2644.46 करोड़ डॉलर का आर्थिक बोझ पड़ता है. यह राशि हमारे शिक्षा-स्वास्थ्य-सामाजिक सुरक्षा पर होने वाले कुल खर्चे से ज्यादा होती है. आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा युद्ध सामग्री और हथियार आयात करने वाला देश है. दुनिया के आयात में यह 13 प्रतिशत हिस्सेदारी रख रहा है.

स्टाकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इन्स्टीट्यूट के मुतबिक एक साल में हथियारों के सबसे बड़े 100 सौदागर लगभग 25,350 अरब रुपये के हथियारों का व्यापार करते हैं. इसमें से आधे से ज्यादा हथियारों का निर्यात अमेरिका और रूस करते हैं. भारत लगभग 3,400 अरब रुपये के हथियार खरीदता है. केवल वर्ष 2016 में दुनिया में घटी हिंसक घटनाओं-युद्धों की लागत 14.3 ट्रिलियन डालर (949000 अरब रुपये) रही. यह पूरी दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद का 12.6 प्रतिशत हिस्सा रहा. एक मायने में युद्धों पर प्रति व्यक्ति 1,953 डॉलर (1.30 लाख रुपये) औसतन खर्च आया.

युद्धों के पैरोकारों के जब इतने बड़े आर्थिक हित हों, तो वह शांति कैसे स्थापित होने दे सकता है ?  यदि शांति स्थापित हो गई तो खरबों डॉलर्स का यह व्यापार बंद हो जाएगा. लोगों का जीवन स्तर स्वतः ही ऊंचा उठ जायेगा और सबसे बड़ा बदलाव यह  होगा कि शोषण आधारित यह व्यवस्था ही खत्म हो जायेगा.

परन्तु कोई भी शासक वर्ग यह कभी नहीं चाहेगा. शासक वर्ग का यह छोटा परजीवी धनाढ्य समूह समाज के विशाल समूह के शोषण कर हासिल किये अपना स्वर्गिक सुख कभी नहीं छोड़ना चाहता. शासक वर्ग धर्म और सीमा रेखा की कहानियों के जरिये युुद्ध और हिंसा का माहौल तैयार करता है ताकि जब शिक्षा, स्वास्थ्य और खेती का बजट छीन कर अपने  सुख-सुविधा का इंंतजाम करें तब लोग चुप रहें. उसकी कोशिश रहती है कि लोग डरे रहें, कमजोर बने रहे ताकि सवाल न पूछें और शासक की निरंकुशता के खिलाफ खड़े न हों जायें. इसके लिये शासक वर्ग लोगों को हथियार रखने के मौलिक का हनन तक करता है और इसके लिए तर्क ढूंढता है.

यूपीए शासनकाल में भारत के गृह मंत्री से जब ‘अनिवार्य सैन्य शिक्षा और अनिवार्य सैन्य सेवा’ के नियमों को लागू कराने के बारे में पूछा तब उनका जवाब था, ‘भारत में ऐसा नहीं हो सकता है. अगर इसे लागू कर दिया गया तो सैन्य शिक्षा प्राप्त आधे लोग माओवादियों से जाकर मिल जायेगा.’ शासक वर्ग यह जानता है कि वह देश की आम जनता की मौलिक जरूरत शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, इंसाफ दिलाने में अक्षम है. अगर लोग सैन्य शिक्षा हासिल कर लिया तब वह सवाल करेगा. वह विद्रोह कर शासन व्यवस्था अपने हाथ में ले लेगा. उसका स्वर्ग छीन जायेगा.

भारत का वर्तमान शासक वर्ग तो इतना ज्यादा क्रूर है कि वह हथियार रखने की बात तो दूर देशवासियों को शिक्षा भी नहीं देना चाहती. आये दिन विश्वविद्यालयों के छात्रों पर हमले करती आ रही है. रिक्त पड़े शिक्षकों के पदों को समाप्त कर रही है. ताकि लोग शिक्षा हासिल नहीं कर सके और वह शासक से सवाल न कर सके.

यही कारण है नागरिकों को हथियार रखना उसी प्रकार एक मौलिक अधिकार है जिस प्रकार उसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, इंसाफ पाने का है. एक अशिक्षित कमजोर नागरिक मजबूत राष्ट्र का नींव कभी नहीं डाल सकता.

छोटे हथियारों पर हुए एक सर्वेक्षण के मुताबिक वर्ष 2016 की स्थिति में अमेरिका में प्रति 100 व्यक्तियों पर 112.6 बंदूकें थीं, यानी एक व्यक्ति के पास एक से ज्यादा बंदूकें! सर्बिया में 100 लोगों पर 75.6, यमन में 54.8, स्विट्जरलैंड में 45.7, सायप्रस में 36.4, सऊदी अरब में 35, इराक में 34.2, उरुग्वे में 31.8, स्वीडन में 31.6, फ्रांस में 31.2 और नार्वे में 31.3 बंदूकें हैं. साफ है जिन देशों हथियार रखने की स्वतंत्रता जितनी अधिक है, उस देश का विकास दर उतना ही अधिक है. भारत में हथियार रखना प्रतिबंधित होने के कारण आये दिन सैकड़ों की संख्या में कमजोर, दलित, आदिवासी, औरतेंं सतायी जा रही है, मारी जा रही है. देश के हर नागरिक को हथियार रखने के मौलिक अधिकारों को मान्यता देनी चाहिए, तभी यह देश आगे बढ़ सकेगा.

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Comments 1

  1. S. Chatterjee says:
    9 years ago

    Realised assessment of our times.

    Reply

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