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मथुरा के नंद भवन में नमाज पढ़ने वाले फैसल खान की गिरफ्तारी का मतलब

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
November 3, 2020
in गेस्ट ब्लॉग
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मथुरा के नंद भवन में नमाज पढ़ने वाले फैसल खान की गिरफ्तारी का मतलब

अगर एक मंदिर में नमाज पढ़ने से आपकी भावनाएं आहत हो रही हैं तो कुछेक बात जान लेने की जरूरत है. फैसल के लिए सबसे बड़ी चुनौती कट्टरपंथी हिन्दू नहीं बल्कि कट्टरपंथी मुस्लिम थे, जिन्हें नकारकर उन्होने अपने कंठ से कहा कि ‘कृष्ण सबके हैंं.’ मंदिर प्रांगण में नमाज सद्भावना के लिए थी, न कि हिंदुओं को चिढ़ाने के लिए और न ही इस्लाम को बढ़ाने के लिए.

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अगर फैसल अपराधी है तो पूरा भक्ति आन्दोलन भी अपराधी है. वे सारे साधू संत, मीरा, कबीर, नानक सब अपराधी हैं जो 15 वीं सदी में समन्वयवादी आन्दोलन के लिए लड़ रहे थे. चूंकि पूरा भक्ति आन्दोलन ही इस बात पर टिका हुआ था कि हिन्दू साधूसंत मुसलमान पीरों की दरगाहों पर मत्था टेक आते थे, मुस्लिम संत कृष्ण और राम के गीत गाते थे.

अगर फैसल को गिरफ्तार किया जाना विधिसम्मत है, तब हमें इतिहास की किताबों से आठवी सदी से सौलहवीं सदी तक चलने वाले भक्ति आन्दोलन को भी निकालकर फेंक देना चाहिए. शायद अब हमें सद्भावना, सहिष्णुता, सामंजस्य की जरूरत नहीं रह गई.

होना ये था कि सभी हिन्दू अपने धर्मं के चरमपंथियों की परवाह किए बिना ब्रज चौरासी (84 कौस) की परिक्रमा करने आए फैसल को गले लगाते. होना ये चाहिए था कि स्थानीय हिन्दु इस पर सीना फुलाते कि उनके धर्म में अभी भी इतनी सहिष्णुता और मोहब्बत बची हुई है कि बाकी मजहबों के लोग माथा टेकने से पहले भयभीत नहीं होते, इधर उधर नहीं देखते. राम राज्य में तो कल्पना ही इस बात की की गई है कि शेर और बकरी दोनों एक ही घाट पर पानी सकें.

बचपन से लेकर अब तक मथुरा में कितने ही साधू-संतों, महात्माओं के मुंह से सुना है ‘कृष्णम बंदे जगत गुरूम.’ फिर मंदिर प्रांगण में कृष्ण के दोनों पुत्र हिन्दू और मुसलमान अपनी-अपनी प्रार्थनाएं क्यों नहीं कर सकते ? हिन्दुओं की बृज चौरासी की परिक्रमा देने वाला, कृष्ण के गीत गाने वाला फैसल हमारे आंगन में अपने इश्वर की प्रार्थना भी नहीं कर सकता ? क्या हम इतने क्षुद्र, सिमित, संकुचित और निम्न स्तरीय परम्परा के लोग बन चुके हैं ?

मथुरा का नन्दभवन मंदिर मेरे घर से मात्र 40 किलोमीटर दूर है, उसी मन्दिर से मात्र 30 किमी दूर कवि रसखान की कब्र है, कवि रसखान, जिन्होंने लिखा –

‘कान्ह भये बस बांंसुरी के, अब कौन सखी हमको चहिहै।

निसि द्यौस रहे यह आस लगी, यह सौतिन सांसत को सहिहै।

जिन मोहि लियो मनमोहन को, ‘रसखानि’ सु क्यों न हमैं दहिहै।

मिलि आवो सबै कहुं भाग चलैं, अब तो ब्रज में बांंसुरी रहिहै।’

असल में सनातनी हिंदुओं को चरमपंथी हिंदुओं से सचेत रहने की जरूरत है अन्यथा आप उन सब सुंदर गीतों को खो देंगे जो मुसलमानों ने हिन्दू देवताओं की शान में गाए. आप हिंदुस्तान की सबसे सुंदर मूर्तियों, पोशाकों को खो देंगे जो मुसलमान कारीगरों ने गढ़ी. मथुरा-वृंदावन में कृष्ण और राधा की अधिकतर पोशाकें मुसलमान कारीगरों ने ही बनाई हैं.

ऐसे मुसलमानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती आप नहीं बल्कि उनके अपने धर्म के चरमपंथी हैं. इसके बावजूद कोई आपके मजहब, आपके देवता, आपकी परम्पराओं का सम्मान करने के लिए आगे आता है तो उसे गले लगाने की जरूरत है न कि उस पर FIR करने की.

एकबार ठहरकर सोचिए अगर शकील बदायुनी न होते तो कौन लिखता –

‘मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड़ गयो रे
मोरी नाजुक कलईया मरोर गयो रे’

कौन लिखता –

‘मन तड़पत हरि दर्शन को आज
मोरे तुम बिन बिगड़े सकल काज
विनती करत हूँ रखियो लाज’

अगर साहिर लुधियानवी न होते तो कौन गा पाता –

‘हे रोम रोम में बसने वाले राम
जगत के स्वामी हे अंतर्यामी
मैं तुझसे क्या मांगू’

अगर जावेद अख्तर न लिखते ‘ओ पालनहारे निर्गुण और न्यारे तुमरे बिन हमरा कौनो नाहीं’ तब कौन अपने मंदिरों, घरों में गा पाता ‘हमरी उलझन, सुलझाओ भगवन
तुमरे बिन हमरा कौनो नाहीं’

कौन सुन पाता ‘मधुवन में राधिका नाचे रे, गिरधर की मुरलिया बाजे रे’ अगर मोहम्मद रफी न गाते, अगर शकील बदायुनी इसे न लिखते. नाम में मोहम्मद और मुंह में राधिका का नाम !

तुम्हें मंदिर प्रांगण में नमाज पढ़ना इतना दु:ख गया तब तो मुसलमानों को रफी साहब के खिलाफ फतवा जारी कर देना चाहिए था. और ऐसा नहीं है कि मुस्लिम गीतकारों को अपने धर्म में विरोध का सामना नहीं किया. किया. लेकिन बावजूद इसके उन्होंने हिन्दू देवताओं की शान में गीत गाना नहीं छोड़ा.

आपको भी फैसल का साथ नहीं छोड़ना चाहिए, हमें ऐसा हिंदुस्तान बनाने के लिए लड़ना चाहिए जहां मस्जिद में राम सुनाई दे और मंदिर में नमाज.

  • श्याम मीरा सिंह

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