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किसी देश को धार्मिक-राष्ट्र घोषित करना यानी मूर्खों के हाथ राजपाट आना है

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
March 6, 2021
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किसी देश को धार्मिक-राष्ट्र घोषित करना यानी मूर्खों के हाथ राजपाट आना है

यानी, वोही देश सनातनी-राष्ट्र / इस्लामिक-राष्ट्र आदि हो सकता है जिसमें ना कोई स्कूल हो, ना कोई कॉलेज हो, ना ही कोई रिसर्च-इंस्टिट्यूट हो; ना संसद हो, ना राजभवन हो; ना पीएमओ हो, ना सीएमओ हो; ना न्यायालय हो, ना सचिवालय हो; ना जहाज हो, ना हवाई-जहाज हो; ना ट्रेन हो, ना बस हो; ना साईकिल हो, ना स्कूटर हो आदि-आदि ऐसा कुछ भी ना हो. हर घर मन्दिर / मस्जिद हो, सभी देशवासी ता-उम्र बचपन से बुढ़ापे तक प्रतिदिन सुबह से शाम तक सनातन / इस्लाम से जुड़े नित्य-कर्म विधिवत पूर्ण करने में लगे रहते हों.

सभी धर्मगुरुओं ने एक पूर्ण-इन्सान (a perfect-man) ‘निश्छल व निष्कपट इन्सान’ को परिभाषित किया है. छली व कपटी इन्सान को अधर्मी व कुकर्मी बताया है. धर्मी व सत्कर्मी व्यक्ति उसे बताया है जो निश्छल व निष्कपट हो. शायद ही किसी धर्मगुरु ने ऐसा कहा हो कि धर्म को सामान्य से भिन्न विशेष व विशिष्ट बनाया जाये; दूसरों से अलग दर्शाया जाये; धर्म के लिये अलग से कोई तामझाम किया जाये.

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पाउलो फ्रेरे : ‘कोई भी शिक्षा तटस्थ नहीं होती, लोगों को बदलने के लिए तैयार करता है अथवा सत्ता की रक्षा करता है.’

फिर भी, सभी धर्म अत्यंत ही विशेष व विशिष्ट हैं; परस्पर अलग-अलग हैं; भांत-भांत का तामझाम रखे हुये हैं. हर धर्म के साथ अनेकों नित्य-कर्म जुड़े हुये हैं, जिन्हें विधिवत पूर्ण करने में इन्सान को पूरा-दिन लग जाये. हर धर्म के साथ वेशभूषा झंडा व कई प्रतीक-चिन्ह भी जुड़े हैं, जिन्हें धारण करने से धर्म एक बोझ व कष्टकारी लगने लगता है. एक well-dressed तथाकथित सच्चा धर्मावलम्बी ? सामान्य-इन्सान ना लगकर पाखण्डी व ढोंगी लगता है, जैसे धर्म पर अहसान कर रहा हो; देवलोक से सीधा पृथ्वीलोक पर यूहिं well-dressed ही आया हो.

उदाहरणार्थ, आप सही रूप में सनातनी तभी बन सकते हैं, अगर आप मन्दिर के पुजारी हों, सदा सनातनी वेशभूषा में रहते हों; आपकी रोजीरोटी मन्दिर को मिलने वाले दान से चलती हो; आप पर घर-गृहस्थी की कोई जिम्मेदारी ना हो अतः सनातन-धर्म से जुड़े सभी नित्य-कर्म विधिवत पूर्ण करने हेतु फ्री हों. इसी प्रकार आप सही रूप में मुसलमान तभी बन सकते हैं, अगर आप मस्जिद के इमाम हों; सदा मुस्लिम वेशभूषा में रहते हों; आपकी रोजी-रोटी मस्जिद को मिलने वाले दान से चलती हो; आप पर घर-गृहस्थी की कोई जिम्मेदारी ना हो. अतः इस्लाम-धर्म से जुड़े सभी नित्य-कर्म विधिवत पूर्ण करने हेतु फ्री हों. इत्यादि-इत्यादि.

किसी देश को तथाकथित धार्मिक-राष्ट्र घोषित करने का औचित्य तभी है अगर सभी देशवासी सही रूप में तथाकथित सच्चे धर्मावलम्बी हों. यानी सभी देशवासी सदा धार्मिक वेशभूषा में रहते हों; ता-उम्र प्रतिदिन सुबह से शाम धर्म से सम्बन्धित नित्य-कर्म विधिवत पूर्ण करते हों. फर्जी-सनातनी बनकर सनातन-सनातन चिल्लाना; फर्जी-मुसलमान बनकर इस्लाम-इस्लाम चिल्लाना, धर्म का जनाजा निकालना है; धर्म का तमाशा बनाना है.

यानी, वोही देश सनातनी-राष्ट्र / इस्लामिक-राष्ट्र आदि हो सकता है जिसमें ना कोई स्कूल हो, ना कोई कॉलेज हो, ना ही कोई रिसर्च-इंस्टिट्यूट हो; ना संसद हो, ना राजभवन हो; ना पीएमओ हो, ना सीएमओ हो; ना न्यायालय हो, ना सचिवालय हो; ना जहाज हो, ना हवाई-जहाज हो; ना ट्रेन हो, ना बस हो; ना साईकिल हो, ना स्कूटर हो आदि-आदि ऐसा कुछ भी ना हो. हर घर मन्दिर / मस्जिद हो, सभी देशवासी ता-उम्र बचपन से बुढ़ापे तक प्रतिदिन सुबह से शाम तक सनातन / इस्लाम से जुड़े नित्य-कर्म विधिवत पूर्ण करने में लगे रहते हों.

जीवनयापन की आपाधापी; विकास के ऊंचे और ऊंचे मुकाम तक पहुंचने की आतुरता एवं आधुनिक से आधुनिक दिखने की होड़ में व्यस्त इन्सान के लिये विशेष व विशिष्ट तरह से सृजित धर्म को विधिवत निभा पाना लगभग असम्भव है. ऐसी स्थिति में किसी देश को धार्मिक-राष्ट्र घोषित कर देना, धर्म को नौटंकी बनाना है ! ये, अति-मूर्खतापूर्ण कृत्य है; अति-सत्तालोलूपता की स्थिति है; मानव जाति के विकास व उत्थान को बाधित करना है; राष्ट्र की उन्नति व तरक्की को ग्रहण लगाना है.

धर्म-गुरुओं में भाषीय-विविधता वेशभूषीय-विविधता व्यवहारिक-विविधता तार्किक-विविधता आदि होना स्वाभाविक था, लेकिन सभी धर्म-गुरूओं की वाणी में निश्छलता व निष्कपटता ही वर्णित की गई है, फिर भी धर्म की विशेषतायें, विशिष्टतायें प्रतीक-चिन्ह आदि बनाकर धर्म को बोझ व काम बना दिया है; धर्म को specific & आर्टिफीसियल बना दिया है; गुरूओं की वाणी यानी निश्छलता व निष्कपटता को हाईलाइट करने की बजाये गढ़ी गई धर्म की विशेषताओं विशिष्टताओं व प्रतीक-चिन्हों का प्रचार कर-करके; धर्म-गुरुओं के जयकारे लगा-लगाके; उलूल-जूलूल कथायें किस्से-कहानियां प्रसंग गढ़-गढ़के व सुना-सुनाके धर्म को तगड़ा इमोशनल झुनझूना बना लिया है.

धर्म एक शिक्षक है, धर्म का काम इन्सान को इन्सान बनाना है; बौद्धिक व वैचारिक विकारों को दूर करके ‘निश्छल व निष्कपट इन्सान’ रचना है. धर्म स्वयं ढोंग व पाखण्ड, छल व कपट साथ लेकर चलेगा तो इन्सान के अंदर से ढोंग व पाखण्ड, छल व कपट कैसे दूर कर पायेगा ?! यानी धर्म के उद्देश्यों की पूर्ति ? धर्म के सहज व सरल, सामान्य व साधारण होने से ही सम्भव है.

सहज व सरल सनातन ही इन्सान को सच्चा-सनातनी बना सकता है; सहज व सरल इस्लाम ही इन्सान को सच्चा-मुसलमान बना सकता है; सहज व सरल सिख-इज्म ही इन्सान को सच्चा-सिख बना सकता है; आदि-आदि. सहजता व सरलता यानी धर्मनिरपेक्षता ही धर्म है; कट्टरता व धर्मान्धता ? अधर्म हैं; एन्टी-सनातन हैं; एन्टी-इस्लाम हैं; एन्टी-सिखइज्म हैं.

इन्सान और सत्ता के बीच ? कुत्ते व हड्डी वाला सम्बन्ध होता है, साम्राज्यवाद यानी सत्तालोलूपता, इन्सान को ‘फूट-डालो, राज-करो’ नीति पर चलने यानी इंसानों को धर्म जाति आदि के आधार पर बांटने हेतु उकसाता है. सत्ता-केन्द्रिकरण, इस उकसावे को ऊर्जा देता है; प्रोत्साहित करता है. सत्ता-विकेन्द्रिकरण, इस उकसावे को कुछ हद तक नियंत्रित कर देता है; शांत कर देता है.

सत्ता-विकेन्द्रिकरण यानी सम्पूर्ण व वास्तविक लोकतंत्र आमजन की जरूरत है, लोकतंत्र में सम्पूर्णता व वास्तविकता कायम रखना आमजन का जन्मसिद्ध अधिकार है। लोकतंत्र में सम्पूर्णता व वास्तविकता बिन ? आमजन के हाथ-पले कुछ नहीं है; ‘बिल्ली को दूध की रखवाली बैठाना है’ संविधान व कानून की सुरक्षा असम्भव है.

  • पवन कुमार पहवा, आन्तरिक दलीय लोकतंत्र जागरूकता अभियान

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