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पैगासस स्पाईवेयर

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
July 23, 2021
in गेस्ट ब्लॉग
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इस देश के बुद्धिजीवी की अक्ल का नमूना देखिए कि वह यह तो मान लेगा कि आपके फोन में बिना आपकी इजाजत यानी जीरो क्लिक से ऐसा पैगासस स्पाईवेयर इंस्टाल हो सकता है जो आपके फोन के हर तरह के डेटा को बिना आपके जाने बाहर भेज सकता है, लेकिन वह यह नहीं मानेगा कि EVM में कोई छेड़छाड़ हो सकती है. जिस बड़े पैमाने पर पैगासस स्पाईवेयर के जरिए देश के जाने-माने लोगों की जासूसी ठीक लोकसभा चुनाव के पहले से किया जा रहा था, वह इस बात का पुख्ता सबूत है कि केन्द्र की वर्तमान सरकार पूर्णतः असंवैधानिक सरकार है, जिसका सरकार में बने रहना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है.

पैगासस स्पाईवेयर

गिरीश मालवीय

सोशल मीडिया खासकर फेसबुक पर गिरीश मालवीय नाम के एक कांस्पिरेसी थ्योरिस्ट हैं, पहले वह इकनॉमी पर लिखते थे लेकिन आजकल वह कोरोना के पीछे चल रहे षड्यंत्र पर अक्सर लिखते रहते हैं. उनकी इस कांस्पिरेसी थ्योरी का मुख्य किरदार बिल गेट्स रहता है. वह अक्सर अपनी पोस्ट के माध्यम से गाहे बगाहे उस निशाना लगाए रहते हैं. उन्होंने बिल गेट्स से भारत की मोदी सरकार से सम्बन्धों पर काफी सारी पोस्ट लिखी है.

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वैसे मुझे तो उन पर कभी यकीन नहीं हुआ लेकिन आज मैं चौंक गया जब वायर ने पैगासस खुलासे में भारत में बिल गेट्स फाउंडेशन से जुड़े दो नामो का खुलासा किया. पहला नाम था गगनदीप कंग का और दूसरा नाम था बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन के निदेशक एम. हरि मेनन का.

आखिर बिल गेट्स से जुड़े इन दो लोगों की जासूसी कराने की सरकार को क्या सूझी ? मुझे याद है कि गिरीश मालवीय ने भारत मे बिल गेट्स फाउंडेशन की गतिविधियों को लेकर सोशल मीडिया पर काफी कुछ लिखा था इसलिए मैंने उनकी वाल से इस सम्बंध में की गई पुरानी पोस्ट पढ़ने का निश्चय किया.

गगनदीप जी को हम बाद में देखेंगे पहले हरि मेनन को देखते हैं. दरअसल हरि मेनन भारत में बिल गेट्स फाउंडेशन के सर्वेसर्वा हैं. क्या यह वाकई इतना महत्वपूर्ण संगठन है जिसके निदेशक की जासूसी की जाए ?

बिल ऐंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने भारत के लिए हरि मेनन को 24 मई 2019 कंट्री निदेशक नियु्क्त किया था. 2019 नवम्बर के मध्य में बिल गेट्स भारत आए थे और स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने बिल ऐंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के साथ नेशनल डिजिटल हेल्थ मॉडल पर MOU (समझौता ज्ञापन) किया.

इस एमओयू पर हस्ताक्षर मंत्रालय में संयुक्त सचिव (अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य) लव अग्रवाल और बीएमजीएफ के निदेशक एम. हरि मेनन ने किए थे. जनवरी 2020 में इस MOU को आश्चर्यजनक रूप से ‘पूर्व प्रभाव’ से मंजूरी दे दी गयी.

बिल गेट्स के आगमन पर नवम्बर 2019 में नीति आयोग के वाइस चेयरमैन राजीव कुमार ने बिल गेट्स की मौजूदगी में ‘हेल्थ सिस्टम फॉर ए न्यू इंडिया: बिल्डिंग ब्लॉक्स- पोटेंशियल पाथवेज टू रिफॉर्म’ रिपोर्ट पेश की थी. यह रिपोर्ट भारत के आगामी स्वास्थ्य व्यवस्था का रोडमैप है, क्योंकि यह व्यवस्था उस मध्य वर्ग के लिए है जो अब तक किसी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली जैसे आयुष्मान भारत के दायरे में नहीं आते हैं, शायद आने वाले दिनों में उनकी यह योजना भी सामने आ जाएगी.

नवम्बर में ही कृषि सांख्यिकी पर नई दिल्ली में होने वाली ग्लोबल कॉन्फ्रेंस में बिल गेट्स मुख्य वक्ता थे. इस कांफ्रेंस की थीम थी – सतत विकास के लक्ष्य हासिल करने के लिए कृषि में बदलाव की सांख्यिकी’. यह कांफ्रेंस यूएन के फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (एफएओ), यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर, वर्ल्ड बैंक, मिलिंडा एंड गेट्स फाउंडेशन और अन्य एजेंसियों के साथ पार्टनरशिप में भारत के कृषि मंत्रालय ने आयोजित की थी.

बिल गेट्स का उदबोधन कृषि उत्‍पादन के लिए नए डिजिटल उपकरणों के उपयोग और कृषि के सर्वोत्तम आंकड़ों की आवश्यकता के आसपास ही केंद्रित था. यानी कृषि और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विषय जो आज सबसे अधिक चर्चा में है, उसे लेकर इतनी महत्वपूर्ण गतिविधियां हो रही थी और मोदी सरकार हरि मेनन की जासूसी करवा रही थी.जब हरि मेनन इतने महत्वपूर्ण है तो इसका मतलब है कि उनसे पहले बिल गेट्स फाउंडेशन के भारत के निदेशक भी महत्वपूर्ण होंगे.

हरि मेनन के ठीक पहले बिल ऐंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन का भारत में कामकाज नचिकेत मोर संभाल रहे थे, जिनकी नियुक्ति बिल गेट्स ने 2016 में की थी, इसके साथ ही वह भारतीय रिजर्व बैंक के एक डायरेक्टर भी थे.

स्वदेशी जागरण मंच के सह – संयोजक अश्विनी महाजन ने 2017 में मोदी को लिखे गए पत्र में कहा था कि ‘भारतीय रिजर्व बैंक के बोर्ड में नचिकेत मोर को बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं है. यह हितों में टकराव का मामला है, क्योंकि उनके प्रधान नियोक्ता बीएमजीएफ को विदेशी फंड प्राप्त होता है और आरबीआई फंड का नियामक है.’

बिल गेट्स का फाउंडेशन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए काम कर रहा है ताकि स्वास्थ्य एवं कृषि क्षेत्रों में सरकारी नीतियों को उनके पक्ष में प्रभावित कर सके. स्वदेशी जागरण मंच ने मांग की थी कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अलावा नीति आयोग, भारतीय मेडिकल अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और केंद्रीय कृषि, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालयों को निर्देश दिए जाएंगे कि वे ऐसे संगठनों एवं उनके प्रतिनिधियों से दूरी बनाए रखें लेकिन उनकी इस चिट्ठी को कोई तवज्जो नहीं दी गई.

वैसे गिरीश मालवीय ने लिखा था कि नचिकेत मोर ने ही जन-धन खाते की मूल योजना की अनुशंसा की थी, जिसे बाद में मोदी ने अपनाया और उसका खूब प्रचार-प्रसार किया गया. गिरीश मालवीय ने तो अपनी एक पोस्ट में यहां तक दावा किया कि भारत में नोटबंदी बिल गेट्स और उनके अमेरिकी सहयोगियों के ही इशारे पे की गई. अब पता लगा है कि पैगासस स्पाई वेयर के जरिए हरि मेनन की जासूसी की गयी है तो मुझे लग रहा है कि गिरीश मालवीय की बातों में कुछ सच्चाई तो जरूर होगी.

पैगासस खुलासे में वायरोलॉजिस्ट गगनदीप कांग का भी नाम सामने आया है लेकिन हमारा बिका हुआ मीडिया मैडम का सही इतिहास नहीं बता रहा है. उसे आश्चर्य हो रहा कि गगनदीप कांग जी का नाम इस खुलासे में कैसे आ गया ? वह सिर्फ यह बता रहा है कि कांग को संभावित सर्विलांस के लिए 2018 में चुना गया था, जब वो निपाह वायरस के खिलाफ लड़ाई में मदद कर रही थीं, लेकिन वह यह नहीं बता रहा है कि गगनदीप जी कर बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन से कैसे अंतरंग संबंध हैं और वह कैसे भारत की वेक्सीन नीति से जुड़ी हुई है ? विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO के दक्षिण पूर्व-एशिया के टीकाकरण तकनीकी सलाहकार समूह की अध्यक्ष रही हैं.

WHO में सौम्या स्वामीनाथन भी डिप्टी जनरल के तौर पर बैठी हुई यह दोनों नियुक्तियां बिल गेट्स के इशारे पर ही हुई है क्योंकि वह WHO को अमेरिका यूरोप से भी ज्यादा फंडिंग करते हैं. सौम्या, एमएस स्वामीनाथन की बेटी हैं. यह वही स्वामीनाथन है जिन्हें भारत की हरित क्रांति का जनक माना जाता है. इनके पीछे अमेरिकी लॉबिंग का अच्छा खासा इतिहास रहा है.

खैर जाने दीजिए हम इस वक्त गगनदीप की बात कर रहे हैं. बिल गेट्स ने उन्हें कोरोना वैक्सीन से जुड़े एक बड़े महत्वपूर्ण संगठन CEPI में वाइस चेयरमैन पद पर भी नियुक्त करवा दिया. CEP यानी टीम कोएलिशन फॉर एपीडेमिक प्रीपेयर्डनेस इनोवेशंस का गठन 2017 में बिल गेट्स के सहयोग से उस वक्त किया गया था, जब पश्चिम अफ्रीका में जानलेवा इबोला कहर बरपा रहा था.

इस संस्था ने जैव तकनीकी शोधों के लिए वैज्ञानिकों पर बेइंतिहा पैसे खर्च किए थे. जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है यह संगठन मौजूदा दौर की खतरनाक बीमारियों के लिए तेजी से वैक्सीन तैयार करता है. कोरोना वायरस के टीके बनाने के लिये इसने कई कंपनियों को फंड उपलब्ध कराया है.

भारत में बिल गेट्स की प्रतिनिधि गगनदीप कांग चाहती है कि मोदी सरकार उन कम्पनियों की वेक्सीन के सौदे करे जिनके न थर्ड ट्रायल का पता है और न सेफ्टी एफिकेसी डाटा का. और उन्हीं की इच्छानुसार मोदी सरकार कोविड सुरक्षा स्कीम के तहत जायडस कैडिला, बायो ई और जिनेवा की कोरोना वैक्सीन के देश में निर्माण के लिए हजारों करोड़ की फंडिंग कर रही है.

साफ है कि गगनदीप कंग की ऐसी ही गतिविधियों पर निगाह रखने के लिए मोदी सरकार ने पैगासस स्पाई वेयर के जरिए उन पर निगाह रखी होगी.

क्या अशोक लवासा की इसलिए जासूसी करवाई गयी क्योकि वह ‘ईवीएम-वीवीपैट में खामियां ढूंढने में दिलचस्पी दिखा रहे थे ?

पेगासस से जुड़े खुलासे में चुनाव आयोग के पूर्व अधिकारी अशोक लवासा का भी नाम आया है. आप शायद अशोक लवासा को भूल गए होंगे. मै आपको याद दिला देता हूं.

अशोक लवासा हरियाणा कैडर के (बैच 1980) के रिटायर्ड आईएएस अधिकारी हैं. लवासा का 37 सालों का प्रशासनिक अधिकारी के रूप में कैरियर रहा है. वह भारत के चुनाव आयुक्त बनने से पहले वो 31 अक्तूबर 2017 को केंद्रीय वित्त सचिव के पद से सेवा-निवृत्ति हुए थे. इसके बाद उन्हें चुनाव आयुक्त बनाया गया.

चुनाव आयुक्त अशोक लवासा वही है जिन्होंने लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान आचार संहिता के कथित तौर पर उल्लंघन के मामले में पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ शिकायतों वाले चुनाव आयोग के क्लीन चिट देने के फैसले पर असहमति जताई थी. उन्होंने पीएम मोदी और अमित शाह से जुड़े पांच मामलों में क्लीन चिट दिए जाने का विरोध किया था. ये मामला वर्धा में एक अप्रैल, लातूर में नौ अप्रैल, पाटन और बाड़मेर में 21 अप्रैल तथा वाराणसी में 25 अप्रैल को हुई रैलियों में मोदी के भाषणों से संबंधित था.

पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ मिली आचार संहिता उल्लंघन की शिकायतों की जांच के लिए गठित समिति में मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा, अशोक लवासा और सुशील चंद्रा शामिल थे. मोदी औऱ शाह को क्लीन चिट दिए जाने पर चुनाव आयुक्त लवासा का मत बाकी दोनों सदस्यों से अलग था और वह इन आरोपों को आचार संहिता के उल्लंघन के दायरे में मान रहे थे. लेकिन बहुमत से लिए गए फैसले में दोनों के आचरण को आचार संहिता का उल्लंघन नहीं मानते हुए क्लीनचिट दे दी गई.

सिर्फ इतना ही नहीं लवासा के मत को भी रिकॉर्ड पर नहीं लिया गया. लवासा चाहते थे कि उनकी अल्पमत की राय को रिकॉर्ड किया जाए. उनका आरोप है कि उनकी अल्पमत की राय को दर्ज नहीं किया जा रहा है. जब पुणे के आरटीआई कार्यकर्ता विहार दुर्वे ने यह जानने के लिए एक आरटीआई लगाई कि लवासा की इन टिप्पणियों में आखिर क्या लिखा है ? तो उसका जवाब देते चूना (चुनाव या चुतिया) आयोग आरटीआई अधिनियम के तहत चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की असहमति वाली टिप्पणियों का खुलासा करने से इनकार करते हुए कहा कि ‘यह छूट-प्राप्त ऐसी सूचना है जिससे ‘किसी व्यक्ति का जीवन या शारीरिक सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है.’

जैसे ही पता चला कि लवासा ने चुनाव आयुक्त के पद पर रहते हुए मोदी के लिए प्रतिकूल टिप्पणियां लिखी है, उनके विरुद्ध पूरे प्रशासनिक अमले को सक्रिय कर दिया गया. तुरंत लवासा की पत्नी, बेटे और बहन को आय से अधिक संपत्ति और इनकम घोषित न करने के आरोपों में नोटिस भेज दिया गया.

लेकिन इससे भी मोदी सरकार का जी नहीं भरा. फिर इस बात की जांच कराई गयी और विद्युत मंत्रालय ने अपने सभी पीएसयू के चीफ विजिलेंस ऑफिसरों को यह पता लगाने का आदेश दिया कि कहीं लवासा के विद्युत मंत्रालय में 2009 से लेकर 2013 के कार्यकाल के दौरान कुछ कंपनियों को फायदा तो नहीं पहुंचाया गया.

नवम्बर 2019 में पूर्व IAS ऑफिसर के गोपीनाथन ने लवासा के सम्बन्ध में बहुत महत्वपूर्ण बयान दिया था. गोपीनाथन ने कहा कि लवासा को ‘सरकार इसलिए निशाना बना रही है’ क्योंकि उन्होंने ‘ईवीएम-वीवीपैट में खामियां ढूंढने में दिलचस्पी दिखाई थी.

गोपीनाथन ने ट्वीट करके लिखा, ‘एक चुनाव आयुक्त जिसने ईवीएम-वीवीपैट की प्रक्रिया में खामियां ढूंढने में दिचलस्पी दिखाई, उसे सरकार ने निशाना बनाया. हम अभी भी चुप हैं और उन्हें उनकी छवि खराब करने और बदनाम करने दे रहे हैं.’ अब आप समझ ही सकते है कि अशोक लवासा को क्यों सर्विलांस के लिए चुना गया था.

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई मोदी सरकार का सांठगांठ

वायर ने खुलासा किया है कि भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली सुप्रीम कोर्ट की कर्मचारी से संबंधित तीन फोन नंबर इज़राइल स्थित एनएसओ समूह की ग्राहक- एक अज्ञात भारतीय एजेंसी द्वारा निगरानी के उद्देश्य से संभावित हैक के लिए लक्ष्य के रूप में चुने गए थे. यानी यह साफ है कि उस दौरान उस महिला की गतिविधियों की जानकारी निकाल कर इस मामले को सेटल किया गया.

मुझे याद है कि चीफ जस्टिस रंजन गोगोई पर यौन शोषण के आरोप सामने आए थे तो लगभग पूरा मीडिया और सोशल मीडिया भी यही मानकर इस घटना का विश्लेषण कर रहा था कि जस्टिस रंजन गोगोई को उक्त महिला फंसा रही है, यह रंजन गोगोई के खिलाफ कोई साजिश है जिसमें वह महिला सबसे बड़ा मोहरा है लेकिन अब साफ हो गया है कि वह महिला मोहरा नहीं थी. वह पीड़ित थी और पैगासस के जरिए उसकी एक्टिविटी को ट्रेस कर के उसे मोहरा बनाया गया.

और सुप्रीम कोर्ट में उस वक्त चल रहे रॉफेल जैसे बहुत महत्वपूर्ण केसेस की फाइलों को निपटाया गया. बाद में ईनाम के बतौर गोगोई जी को राज्यसभा का सदस्य बनाया गया और सेटलमेंट के बतौर उस महिला को पुर्ननियुक्ति दी गयी. उसके पति को भी दिल्ली पुलिस ने वापस नौकरी पर बहाल किया. आपको एक बार पूरा घटनाक्रम याद दिला देता हूं.

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई के खिलाफ लगे यौन शोषण के आरोप ने न्‍यायपालिका को हिलाकर रख दिया था. दरअसल मामला कुछ यूं था कि 35 वर्षीय महिला सुप्रीम कोर्ट में जूनियर कोर्ट असिस्टेंट के रूप में काम कर रही थी. महिला ने उस वक्त मुख्य न्यायाधीश रहे रंजन गोगोई के खिलाफ 22 न्यायाधीशों को एक एफिडेविट भेजकर शिकायत दर्ज की थी.

यह एक सामान्य शिकायत नहीं थी, बल्कि एक सीजेआई के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत थी. इस एफिडेविट में उसने 10 और 11 अक्टूबर, 2018 को CJI निवास पर उसके साथ हुई कथित घटना का विस्‍तृत ब्‍यौरा दिया है. पूरा देश इस घटना से हतप्रभ रह गया था. सभी के दिमाग मे यही आया कि यह मामला बनावटी है और रंजन गोगोई को उस समय चल रहे महत्वपूर्ण मामलों से हटाने का प्रयास है.

तत्कालीन वित्त मंत्री ने तो इस शिकायत का दोष वामपंथी ताकतों पर डाल दिया. जेटली ने अपने ब्लॉग में उस वक्त इस घटना का जिक्र करते हुए लिखा, ‘अस्थिरता पैदा करने वाली ताकतों में बड़ी संख्या में वामपंथी या अति वामपंथी विचारधारा के हैं. इनका न तो कोई चुनावी वजूद है न ही जनसमर्थन. इसके बावजूद ये लोग मीडिया और शैक्षणिक संस्थानों में असमानुपातिक रूप से अब तक मौजूद हैं. जब इन्हें मीडिया की मुख्यधारा से बेदखल कर दिया गया तो इन्होंने डिजिटल और सोशल मीडिया का सहारा ले लिया.’

जस्टिस रंजन गोगाई ने इस आरोप को सिरे से नकार दिया. जस्टिस रंजन गोगोई ने तो उस समय यहां तक कहा कि इसकी भी जांच होनी चाहिए कि इस महिला को यहां (सुप्रीम कोर्ट) में नौकरी कैसे मिल गई जबकि उसके खिलाफ आपराधिक केस है ?

रंजन गोगोई ने अपने ही खिलाफ जज बनने का फ़ैसला ले लिया. शनिवार 20 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में जो कुछ हुआ वह न्याय के उपहास से कुछ भी कम नहीं था. चीफ जस्टिस ने अपने संवैधानिक पद का उपयोग (दुरुपयोग) करते हुए उन पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों को न केवल नकारा, बल्कि शिकायतकर्ता के खिलाफ नकारात्मक टिप्पणी करते हुए स्वयं पर लगे आरोपों को न्यायिक व्यवस्था के विरुद्ध एक बड़ी साजिश बताया. साथ ही साथ इस मामले में मीडिया की भी आवाज दबाने की कोशिश की. इसके अलावा अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल ने भी शिकायतकर्ता की गैरमौजूदगी में उसका चरित्र हनन किया गया.

जब यह मामला कोर्ट के सामने आया तो उस वक्त अटॉर्नी जनरल ने भी रंजन गोगोई का पक्ष लेते हुए कहा कि पुराने मामले में पुलिस द्वारा कैसे इस महिला को क्लीन चिट दी गई ? साथ ही चीफ जस्टिस तो अपने खिलाफ आरोप देखकर कहने लगे कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता ही खतरे में है.

महिला को झूठा सिद्ध करने के लिए उस वक्त बहुत से खेल खेले गए. कहा जाने लगा कि मुख्य न्यायाधीश को एक झूठे मामले में फंसाया जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट के वकील उत्सव बैंस ने दावा किया था कि सीजेआई गोगोई को यौन शोषण के झूठे आरोपों में फंसाने की साजिश की जा रही है. उन्होंने मामले में एक एयरलाइन संस्थापक, गैंगस्टर दाऊद इब्राहिम और एक कथित फिक्सर को इसके लिए जिम्मेदार बताया और दावा किया कि एक अजय नामक व्यक्ति ने प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ आरोप लगाने के लिए 1.5 करोड़ रुपये की पेशकश की गई थी.

बाद में जस्टिस पटनायक ने इस बात को झूठा करार दिया. जस्टिस ए. के. पटनायक जांच समिति ने उपरोक्त महिलाकर्मी को शीर्ष अदालत और मुख्य न्यायाधीश को बदनाम करने की साजिश में शामिल होने के मामले में क्लीन चिट दे दी. बाद में उच्चतम न्यायालय ने महिला के आरोपों की इनहाउस समिति से जांच करवाई, जिसने छह मई को मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को भी क्लीन चिट दे दी थी.

इस पूरे प्रकरण पर आप विहंगम दृष्टि डालेंगे तो आप देखेंगे कि खुले आम न्याय की हत्या हुई है. कमाल की बात है कि सुप्रीम कोर्ट दोनों ही पक्ष को राहत दे दी. रंजन गोगोई को भी क्लीन चिट मिल गयी, महिला को भी क्लीन चिट दे गई. और आज यह भी साफ हो गया कि पूरे मामले को पैगासस जैसे स्पाई वेयर का इस्तेमाल कर के सेटल किया गया था.

बीज उत्पादक कंपनी मोंसैंटो ब्रांड के अधिकारियों की पेगासस स्पायवेयर के जरिये निगरानी

मुझे इस बात की खुशी है कि मेरा अध्ययन हमेशा देश के असली मुद्दों यानी नब्ज पर ही रहा है, चाहे वह पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा से जुड़ा मामला हो चाहे बिल गेट्स फाउंडेशन के हरि मेनन से, चाहे वायरोलॉजिस्ट गगनदीप कंग से, अपनी आलेख के माध्यम से आप के सामने इन सब लोगों की सच्चाई मैं इन खुलासों से पहले ही लेकर के आ चुका था.

इसी कड़ी में एक नाम और जुड़ा है. कल पता चला है बीज उत्पादक कंपनी मोंसैंटो के कुछ अधिकारी भी लीक हुई उस सूची में शामिल हैं, जिन पर पेगासस स्पायवेयर के जरिये निगरानी करने के योजना थी. पिछले कई सालों से अपनी कई आलेखों के जरिए मैं आपको मोनसेंटो द्वारा GM बीजों को भारतीय कृषि में खपाने के खतरों और इरादों के बारे में आगाह करता आया हूं.

मोनसेंटो ब्रांड इस प्लेनेट (ग्रह) के सबसे खराब ब्रांड में से एक है. पूरी दुनिया मे वे इतने बदनाम हो चुके हैं कि उन्होंने कुछ साल पहले अपना यह नाम छोड़ने का फ़ैसला किया और वह अब मल्टीनेशनल कंपनी बेयर के साथ जुड़ चुके हैं.

भारत में लाखो किसानों की आत्महत्याओं के पीछे का बड़ा एक कारण मोनसेंटो भी है. महाराष्ट्र का विदर्भ एक दशक से अधिक समय से देश से किसानों की आत्महत्या का केंद्र बना हुआ है. ये सब अधिकतर बीटी कपास उगाने वाले किसान थे. यह कृषि को इतना महंगा कर देते हैं कि किसान को कर्ज के जाल में उलझकर कर अपनी जान देने के अलावा कुछ नही सूझता. यह बीटी तकनीक अमेरिकी बहुराष्ट्रीय बीज कंपनी मॉनसेंटो द्वारा विकसित की गई है.

अब यह पूरा मामला क्या है, ये समझिए. भारत में बीटी कपास एकमात्र ट्रांसजेनिक फसल है, जिसे भारत में व्यावसायिक खेती के लिये सरकार द्वारा अनुमोदित किया गया है. लेकिन जैसे बिल गेट्स अपने विंडोज संस्करण में बदलाव लाता है, मोनसेंटो भी अब अपने सेकण्ड और थर्ड जेनेरेशन का बीज लेकर आया है. (बिल गेट्स की भी मोनसेंटो में बड़ी हिस्सेदारी है. यकीन न आए तो गार्जियन का लिंक देख लीजिए.)

बीटी कपास को तो अनुमति है लेकिन इस एचटीबीटी बीज को भारत भूमि पर उगाने की भारत सरकार द्वारा मान्यता नहीं दी गई है. देश में हर्बिसाइड-टोलरेंट (एचटी) कपास की खेती को जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (जीईएसी) ने अभी तक मंजूरी नहीं दी है.

दरअसल एचटीबीटी कपास मोनसेंटो द्वारा विकसित थर्ड जेनरेशन की आनुवंशिक रूप से संशोधित तकनीक है, जो अपने आप को ग्लाइफोसेट नामक खरपतवारनाशी से बचाने के लिए पौधे को ताकत प्रदान करता है.

कुछ सालों से विशेषकर महाराष्ट्र में एचटी बीटी कपास अवैध रूप से उगाया जा रहा है. पिछले साल एचटीबीटी कपास के 30 लाख अनाधिकारिक पैकेट बेचे गए हैं. यहां एक बात समझ लीजिए कि यह चाहे बीज अधिकृत रूप से आए या अनाधिकृत रूप से, बिकना तो मोनसेंटो का ही बीज है क्योंकि इस तकनीक पर उसका एकाधिकार है. अगर भारत में अनाधिकृत रूप से बीज आ रहा है तो भी मोनसेंटो अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती.

महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में उपलब्ध कराए जा रहे इन बीजों के अवैध डिस्ट्रिब्यूशन के खिलाफ देश भर के किसानों ने अपनी आवाज उठाई और फरवरी 2018 में महाराष्ट्र की तत्कालीन भाजपा सरकार ने एक एसआईटी का गठन किया था, जिसे ऐसी कंपनियों की जांच करनी थी जो कथित तौर पर बिना मंजूरी के ही बीटी कपास की बिक्री कर रहे थे.

इस जांच में माहिको मोंसैंटो बायोटेक (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड, मोंसैंटो होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड और मोंसैंटो इंडिया लिमिटेड जैसी कंपनियों के नाम सामने आया था. और अब प्रेगासस प्रोजेक्ट इन्वेस्टिगेशन के तहत पता चला है कि साल 2018 में जब ये दोनों जांच चल रहे थे, उस दौरान माहिको मोंसैंटो बायोटेक (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड और मोंसैंटो इंडिया के छह वरिष्ठ अधिकारियों के नंबर उस सूची में डाले गए थे, जिनकी निगरानी के लिए संभावित टारगेट के रूप में चुना गया.

माहिको और मोंसैंटो (अब बेयर) ने दावा किया कि वे एचटीबीटी बीज के गैरकानूनी उत्पादन या वितरण में शामिल नहीं हैं, जबकि असली फायदा उन्हीं को मिल रहा था. इसके बावजूद मोदी सरकार ने इन्हें पूरी तरह से क्लीन चिट प्रदान कर दी.

मोदी सरकार को यह बहुत अच्छे से पता है कि इस तरह की GM फसलों को उगाने के क्या नुकसान है. वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार GM यानी जेनेटिक मोडीफिकेशन वाली फसलों के पौधों में कीटनाशक के गुण आ जाते हैं. इससे फसलों का कीड़ों से बचाव तो होता है, लेकिन इस कीटनाशक क्षमता से फसलों की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है. ये बीज गैर जीएम फसलों को संक्रमित करने की क्षमता भी रखते हैं.

एचटीबीटी बीज से संबंधित ग्लाइफॉसेट जो मॉनसेंटों के ‘राउंडअप’ नामक खरपतवारनाशक का एक अहम हिस्सा है, कैंसरकारक तथा डीएनए को क्षति पहुंचाने वाला पाया गया है. एक ताजा शोध के अनुसार ग्लाइफॉसेट के कारण कैंसर होने का खतरा 41 प्रतिशत तक बढ़ जाता है.

मोन्सेंटों ने अपने खरपतवारनाशी ग्लाइफोसेट की सुरक्षा के बारे में भी झूठ बोल कर ग्लाइफोसेट से कैंसर होने की बात को छिपाया था. अब मोन्सेंटों को अमरीका की अदालतों के निर्देश पर अरबों रुपए कैंसर के मरीजों को मुआवजे के तौर पर देना पड़ रहा है. फिलहाल 14000 ऐसे मामले अमरीका की अदालतों में लंबित हैं.

किसी भी बड़े मीडिया संस्थान की यह औकात नहीं है कि इस तरह की जानकारी अपने पाठकों / दर्शकों को दे दे. इसलिए आपको इसे यही पढ़ना और समझना होगा.

पूर्व सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा की जासूसी क्या इसलिए की गई कि वह रॉफेल मामले की जांच पर आगे बढ़ रहे थे ?

पेगासस प्रोजेक्ट की अगली कड़ी में ‘द वायर’ ने खुलासा किया है कि 23 अक्टूबर 2018 को जब आधी रात को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आलोक वर्मा को सीबीआई प्रमुख के पद से हटाया था, उसके फौरन बाद ही किसी ऐसी भारतीय एजेंसी ने आलोक वर्मा और उनके परिवार के सदस्यों के फोन नंबर निगरानी सूची में डालने का आदेश दिया था. जिस समय आलोक वर्मा को पद से हटाया गया, उस समय उनके कार्यकाल के तीन महीने बाकी थे.

आपको याद होगा कि 25 अक्टूबर 2018 में सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा के सरकारी बंगले के सामने की सड़क पर इधर-उधर ताक-झांक करते देखे गए चार व्यक्तियों को पकड़ा गया था. बाद में पता चला था कि चारों इंटेलिजेन्स ब्यूरो के लोग थे और अब पैगासस खुलासे में पता चला है कि उनके और उनसे जुड़े लोगों के फोन टैप हो रहे थे. आखिर आलोक वर्मा से ऐसी गलती क्या हो गयी ?

दरअसल उस वक़्त आलोक वर्मा के पास कुल सात महत्वपूर्ण मामलों की फ़ाइलें थी. इसमें सबसे महत्वपूर्ण थी रॉफेल से जुड़ी फाइलें. राफेल से जुड़े दस्तावेज आलोक वर्मा के पास पहुंच चुके थे. राफेल मामले की गहन तफतीश चल रही थी. दो पूर्व केन्द्रीय मंत्रियों और प्रशांत भूषण ने रॉफेल मामले के सिलसिले में 4 अक्टूबर 2018 को जांच ब्यूरो के निदेशक आलोक वर्मा से मुलाकात के बाद जांच ब्यूरो में अपनी शिकायत दायर की थी. इस मामले से जुड़े कई अहम दस्तावेज और दूसरे सबूत आने वाले थे. सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा राफेल सौदे की फाइल मंगाने के लिए रक्षा सचिव संजय मित्रा को चिट्ठी लिख चुके थे. सरकार चाहती थी वर्मा यह चिट्ठी वापस ले लें.

आलोक वर्मा किसी भी वक्त में विमान सौदे की जांच की घोषणा कर सकते थे. आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक के पद पर काम करने के लिए अगर चंद घंटे और मिल जाते तो केंद्र सरकार हिल जाती.

रॉफेल के अलावा उनके पास मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया में रिश्वत का मामले की फाइल भी रखी हुई थी. इसमें उड़ीसा उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आईएम कुद्दुसी का तथा इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश एस. एन. शुक्ला का भी इसमें नाम था. अगर यह जांच अपने अंजाम पर पहुंच जाती तो देश की न्यायपालिका की असलियत लोगों के सामने आ जाती.

आलोक वर्मा के पास कोयले की खदानों के आवंटन मामले में प्रधानमंत्री के सचिव आईएएस अधिकारी हंसमुख अधिया के ख़िलाफ़ शिकायत पुहंच गयी थी. इस मामले के खुलने से भी मोदी सरकार मुश्किल में पड़ सकती थी. इसके अलावा संदेसरा और स्टर्लिंग बायोटेक के मामले की जांच पूरी होनी वाली थी. इसमें सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना की ​कथित भूमिका की जांच की जा रही थी.

जाहिर है भ्रष्टाचारी मोदी सरकार को आलोक वर्मा फूटी आंख नहीं सुहा रहे थे. वह उन्हें एक दिन और भी बर्दाश्त नहीं कर सकती थी. इसलिए इतिहास में पहली बार किसी सीबीआई प्रमुख को भ्रष्टाचार और काम में लापरवाही का आरोप लगाकर हटाया गया.

रातों-रात प्रधानमंत्री की अगुवाई वाली नियुक्ति समिति ने आलोक वर्मा की जगह संयुक्त निदेशक एम. नागेश्वर राव को तत्काल प्रभाव से सीबीआई निदेशक के पद का प्रभार दिया. जबकि कानून में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि सीबीआई निदेशक को 2 साल से पहले हटाया जा सके.

वर्मा ने इसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज जस्टिस ए. के. पटनायक की देखरेख में सीवीसी ने सीबीआई के पूर्व निदेशक आलोक वर्मा पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की थी.

आलोक वर्मा की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने साफ फैसला दिया था कि श्री वर्मा को अधिकारविहीन बनाकर छुट्टी पर भेजने का फैसला कानूनन गलत था क्योंकि इसका निर्णय करने का हक केवल उस तीन सदस्यीय उच्च समिति के पास ही था, जो उन्हें नियुक्त करती है. जबकि सरकार ने जबरन छुट्टी पर भेजने का फैसला केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त की रिपोर्ट पर लिया.

जस्टिस पटनायक ने विभिन्न मीडिया हाउस से बातचीत करते हुए साफ कहा कि वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के कोई साक्ष्य नहीं हैं और पीएम मोदी के नेतृत्व वाले पैनल द्वारा आलोक वर्मा को हटाना बहुत ही जल्दबाजी में लिया गया निर्णय था.

आलोक वर्मा को इस प्रकार पद से हटाया जाना साफ दिखाता है कि यह सरकार रॉफेल ओर अन्य मामलों में अपने खिलाफ आए भ्रष्टाचार के सुबूतों से कितना डरी हुई थी.

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