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आदिवासी की ईसाइयत

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
September 27, 2021
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आदिवासी की ईसाइयत

Kanak Tiwariकनक तिवारी, वरिष्ठ अधिवक्ता, उच्च न्यायालय, छत्तीसगढ़

कुछ अरसा पहले बस्तर संभाग के एक पुलिस कप्तान ने कहा और सरकार को सूचित किया कि ‘आदिवासी क्षेत्र में ईसाइयत में धर्मांतरण मिशनरियों द्वारा किया जा रहा है.’ स्वाभाविक ही पक्ष विपक्ष में प्रतिक्रिया हुई. मुझे एक शुभचिंतक पाठक ने भी विस्तार से बस्तर में किए जा रहे धर्मांतरण को लेकर कई बातें टेलीफोन पर बताई थी. वे भी सरकारी कर्मचारी हैं. भारत में अंगरेजी राज आने का एक असर या अभिशाप हुआ कि ईसाइयत का धर्मपरिवर्तन के कारण काफी फैलाव हुआ. धर्मातरित ईसाइयों की संख्या अब भी मुख्य अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के मुकाबले बहुत कम है.

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अंगरेजी हुकूमत ईसाइयत के लिए स्वर्ण युग कहा जाएगा. मुगलिया सल्तनत के वक्त मुसलमान भारतीय संस्कृति में इस तरह रच बस गए कि उनके अलग होने की न तो कल्पना है और न संभावना. विवेकानन्द ने फिर भी धर्मांतरण के खिलाफ जेहाद बोला था. उन्हें अमेरिका में बौद्धिकों और धर्माचार्यों द्वारा जलील किया गया तो उनका झल्लाकर बहुत कुछ कह देना स्वाभाविक था. वैसे रामकृष्ण मिशन बनाने का ख्याल उन्हें ईसा मसीह के जन्मदिन ही इलहाम की तरह आया था. इसके साथ साथ उन्होंने अपने दोस्त मोहम्मद सरफराज हुसैन को पत्र लिखा कि जिस दिन इस्लामी देह में वेदांती मन होगा, वह भारत में धार्मिकता का उदय कहलाएगा.

आदिवासियों को दुनियावी कारणों से ईसाइयत में जबरिया या लालच के आधार पर धर्मांतरित कर लिया जाता रहा है लेकिन उसकी आदिवासी होने की मानसिकता का ईसाइयत में अंतरण नहीं हो पाता. गोविन्द गारे कहते हैं कि चाहे ईसाई हों या हिन्दू-दोनों ही आदिवासियों के उन्नयन और सुधार के नाम पर उनके अस्तित्व के मूल ढांचे पर हमला करते हैं. उन्हें उलझाऊ हालत में धार्मिक कहते हिन्दू या ईसाई बनाते हैं. वह आदिवासी की आस्था पर हमला होने से किसी तरह सांस्कृतिक परिवर्तन नहीं होता.

ग्रेस कुजूर कहती हैं कि शहरी सभ्यता से दिन प्रतिदिन व्यापक और सघन संपर्क होने के कारण आदिवासियों की बोली, रहन-सहन, भाषा और पहनावे में आधुनिकता के नाम पर हो रहा बदलाव स्वाभाविक भी है. उस पर रोक की ज़रूरत नहीं है. ऊपरी तत्वों की आड़ में आधुनिक सभ्यता का हमला आदिवासी जीवन के कई बुनियादी प्रतिमानों पर पड़ रहा है. आदिवासी अपनी मूल अस्मिता सुरक्षित रख पाने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं. बदलाव कुदरत का नियम होता है लेकिन अपनी जड़ों से उखड़ जाना नहीं.

भारतीय आदिवासी जनमंच के अध्यक्ष विवेक मणि लकड़ा के मुताबिक आदिवासियों की सरना संस्कृति गायब होती जा रही है. उनका आरोप है कि आदिवासी समाज बिखरा दिया गया है. इससे फायदा उठाते बड़े पैमाने पर आदिवासियों को ईसाइयत में शामिल किया जा रहा है. आदिवासी समाज को कच्चे माल की तरह उपयोग की वस्तु समझा जा रहा है. ब्रिटिश काल में आदिवासियों के सांस्कृतिक जीवन में दखलंदाजी की शुरुआत हुई थी. उनकी गरीबी के कारण मिशनरियों ने उनके बीच धर्मांतरण का कुचक्र चलाया. बड़े पैमाने पर मिशनरियों को सफलता भी मिली. नतीजतन ईसाइयत में तब्दील लोगों की सांस्कृतिक और सामाजिक आदतों की खाई मूल आदिवासियों से बढ़ती गई.

लकड़ा का आरोप है कि ईसाई मिशनरी उग्र, आक्रामक, धर्मप्रचार करते अनाप-शनाप धन खर्च करते हैं. ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, गुजरात और नागालैंड सहित कई राज्यों में ईसाई मिशनरियों की गैर-जरूरी गतिविधियों के कारण आदिवासियों के आपसी भाईचारे को खतरा पैदा हो गया है. पूर्वोत्तर प्रदेशों में आदिवासियों की बहुतायत है. धर्मांतरण को लेकर वहां कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट मतावलंबियों के बीच भी आपस में हिंसा होती रहती है.

धर्म प्रचार और धर्म परिवर्तन करने के बीच छोटा सा ही स्पेस है. मजहबपरस्त ईसाई मिशनरी जानबूझकर उसकी अनदेखी करते हैं. उनका मकसद धर्म प्रचार करने की आड़ में आदिवासियों को ईसाई बनाना है. कई राज्यों ने इस प्रक्रिया के खिलाफ लेकिन हस्तक्षेप भी किया है. आदिवासी इलाकों में ब्रिटिश हुकूमत के वक्त मिशनरियों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य कई तरह के जीवनयापन के साधनों पर बहुत धन खर्च किया और सेवा भी की. बेहतर जीवन की उम्मीद लिए गरीब आदिवासी ईसाई धर्म की ओर आगे होते रहे. उन्हें धीरे धीरे महसूस भी होता रहा कि धर्म बदलने से उनका जीवन स्तर सुधरा है. उनकी चिंताएं कम हुई हैं. अगली पीढ़ियों में भी ईसाइयत के लिए आकर्षण पैदा होने लगा. वह अस्वाभाविक मानवीय प्रक्रिया नहीं कही जा सकती.

आदिवासी समुदाय के एकमात्र कार्डिनल आर्चबिशप तिल्सेफर टोप्पो मानते हैं कि आदिवासियों के बीच कैथोलिक चर्च अभी शिशु अवस्था में है. संकेत है कि चर्च को जनजातियों के बीच आगे बढ़ने की संभावनाएं दिखाई दे रही हैं. भारत सरकार या प्रदेशों की सरकारों ने आदिवासियों के जीवन इंडेक्स के लिए बुनियादी सुविधाएं मुहैया भी नहीं कराई है. आजादी के सत्तर वर्ष बाद भी आदिवासी इलाकों में बदहाली, कर्ज, खूब शराबखोरी, जिस्मखोरी का आलम है.

पुलिस, राजस्व, जंगल और उद्योग विभाग सहित सरकारी कर्मचारी बादशाहों की तरह आदिवासियों को गरीब समझते सलूक करते हैं. उनकी दौलत और इज्जत तक की लूट हो रही है. आदिवासी ज्ञान पर डाका डाला जा रहा है. नक्सलवाद खत्म करने के नाम पर सुरक्षा सैनिक बड़ी संख्या में तैनात किए जा रहे हैं. वे शोषकों के रूप में भी नया चेहरा इतिहास को दिखा रहे हैं।

संविधान के अनुसार ईसाई धर्म अल्पसंख्यक धर्म है. आदिवासी संवैधानिक रूप से अल्पसंख्यक नहीं हैं. आदिवासी के ईसाइयत में शामिल होने पर उसकी पहचान आदिवासी के रूप में फिर भी कायम रहती है. जब ईसाइयों के रूप में सरकारों से व्यवहार करते हैं, तो कहते हैं कि हमें अल्पसंख्यक माना जाए. जब संवैधानिक और अन्य तरह की सुरक्षाएं दी जाती हैं, जिसके वे नौकरी, विधायन में निर्वाचन तथा शिक्षा आदि के लिए हकदार हैं, तब कहते हैं हम आदिवासी हैं.

ईसाइयत में तब्दील हुए ईसाई आदिवासी दोहरा जीवन जीने और दोहरे लाभ उठाने मजबूर हैं इसलिए भी गैर-ईसाई आदिवासियों और धर्म परिवर्तित आदिवासियों के बीच माहौल देश में गर्म हो रहा है. पूर्वोत्तर प्रदेशों में बुनियादी अर्थात् गैर-ईसाई आदिवासी लगभग खत्म हो चुके हैं. नागालैंड, मिजोरम और मेघालय जैसे राज्य तो ईसाई राज्य ही बन गए हैं. वहां ईसाइयों की आबादी, मसलन मेघालय में लगभग 65 प्रतिशत है और मुश्किल से हिंदू 15 प्रतिशत बचे हैं. नागालैंड में ईसाईयों का प्रतिशत 98 है और हिंदू आबादी केवल 2 प्रतिशत रह गई है. मिजोरम में भी यही हालात हैं, वहां 85 प्रतिशत ईसाई हैं.

(अपनी किताब ‘क्रिश्चियनिटी एंड ट्राइबल रिलीजन इन झारखंड’ में जे. एन. एक्का ने लिखा कि वर्ष 1850 में पहली बार चार स्थानीय उरांव आदिवासियों को ईसाई बनाया गया. बाद में तीन वापस अपने पुराने धर्म में आ गए. विरोध या सामाजिक बहिष्कार के डर से झारखंड से भाग गए थे. सरना आदिवासी समिति के महासचिव संतोष तिर्की आदिवासियों के ईसाई बनने के खिलाफ हैं.

1970 के दशक में आदिवासियों के जाने माने नेता कार्तिक उरांव ने संसद में मांग की थी कि ईसाई आदिवासियों को नौकरियों में अनुसूचित जनजाति के नाम पर मिलने वाले आरक्षण से बाहर कर देना चाहिए क्योंकि वह दोहरा लाभ लेते हैं. भाजपा और सरना धर्म अनुयायियों सहित कुछ और लोगों का भी तर्क है कि जो आदिवासी ईसाई बन गए हैं, उन्हें जनजातीय संस्कृति और परंपरा से दूर होते देखने पर उन्हें आरक्षण का फायदा नहीं मिलना चाहिए. सवाल संविधान का है. अभी तक कौन आदिवासी है और कौन आदिवासी नहीं है, इसके आधार तक स्थिर नहीं हुए हैं,

महात्मा गांधी ने कहा है कि ईसाई धर्म प्रचारक कई पीढि़यों से आदिवासियों की सेवा करते आ रहे हैं, लेकिन उनके काम में खामी यह है कि आखिर में वे इन भोले भाले लोगों से ईसाई बनने की उम्मीद करते हैं. ईसाई धर्म प्रचारक भी धर्मान्तरण के मकसद को छोड़कर सिर्फ इन्सानी नजरिए से उनकी सेवा करें तो कितना अच्छा हो.

गांधी ने यह भी कहा कि आप सच्चे मनुष्यों की खोज करना चाहते हैं और आप उनको पाना चाहते हैं तो गरीबों के झोंपड़ों में जाना होगा और उन्हें कुछ देने के लिए नहीं बल्कि बने तो उनसे कुछ लेने के लिए ही. मुझे आपमें सीखने की नम्रता और भारत के जनसाधारण से घुल मिल जाने की नीयत दिखाई नहीं देती.

ईसाई मिशनरी और ईसाइयत में धर्मांतरित आदिवासी भाजपा, विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आदि के खिलाफ हिंसा का आरोप लगाते हैं. उनका कहना है ये संस्थाएं ईसाइयों को जबरिया हिंदू धर्म में वापसी कराने तयशुदा अभियान चला रही हैं. ईसाई आदिवासियों और चर्च पर इसलिए हमला होता है जिससे डर के कारण हिंदू धर्म में लौट जाने के हालात बनें. ईसाइयत का प्रचार भी रोका जा सके.

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री कार्यकाल में राष्ट्रीय स्वयंसेक संघ, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा द्वारा हमले लगातार बढ़ रहे हैं. आरोप यह भी है कि जिन राज्यों में भाजपा सरकारें होती हैं, वहां हमले अचानक बढ़ जाते हैं, पुलिस कार्रवाई करने से पूरी तौर पर इंकार करती है.

इस मुद्दे पर संयुक्त राज्य अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने भारत के खिलाफ प्रतिबंध लगाने की सिफारिश तक की है. आयोग के नोट में छत्तीसगढ़ के धर्मांतरण विरोधी कानून का विषेष उल्लेख है. झारखंड में भी रघुवर दास सरकार ने धर्मांतरण पर प्रतिबंध लगाने ‘झारखंड रिलिजस फ्रीडम बिल‘ 2017 पास किया था.

सरना धर्म को मानने वाले गैर-ईसाई आदिवासियों का आरोप है कि चर्च उनके खिलाफ साजिश रचता है. उनके धर्म तथा संस्कृति को नुकसान पहुंचाता है जिससे उनकी असलियत और पहचान खत्म कर उन्हें जबरन फुसलाया जा सके. धर्मपरिवर्तित ईसाई आदिवासियों तथा मूल आदिवासियों में सामाजिक दूरियां लगातार बढ़ती रहती हैं, बल्कि दोनों पक्षों की ओर से बढ़ाई जाती हैं.

धर्मपरिवर्तित ईसाईयों में कुछ का यह कहना है कि अपनी जड़ों और संस्कृति से कटे नहीं हैं. हमने केवल परिवेश बदला है. उस बदलाव के बावजूद हम अपनी ही मिट्टी की उपज हैं. हमें शिक्षा, स्वास्थ्य और आधुनिक मूल्यों के प्रति जागरूकता मिली है लेकिन हम किसी हालत में आदिवासी संस्कृति से अलग या कटे हुए नहीं माने जा सकते.

इस सिलसिले में पीडि़त और प्रभावित पक्ष के कई आदिवासी छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट तक मुकदमा लेकर गए हैं. उन्हें वहां से कुछ न कुछ अनुकूल आदेश भी मिले हैं. हालांकि उनकी शिकायत है कि आदेश होने के बाद भी सरकार की ओर से कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है. सरना धर्म को मानने वाले गैर-ईसाई हैं. उनका आरोप है कि चर्च उनके खिलाफ साजिश रचता उनके धर्म और संस्कृति को नुकसान पहुंचाता है.

छत्तीसगढ़ में भी ईसाइयत का धर्मप्रचार होने के साथ-साथ आदिवासी इलाकों में धर्मांतरण तो हुआ है. सी.पी. एण्ड बरार प्रदेश रहने केे वक्त जस्टिस टी.पी. नियोगी की विस्तृत रिपोर्ट भी इस संबंध में बहुत कुछ कहती है. गांधी के साथ दिलचस्प हुआ कि दक्षिण अफ्रीका में उनके ईसा मसीह और ईसाइयत के प्रेम को लेकर व्याख्यान या लेख प्रसारित होते थे.

कुछ पादरियों ने मिलकर गांधी को ईसाई बनाना चाहा. उनका एक जत्था उस घर में पहुंचा जहां गांधी रहते थे. घंटों की असफल तकरीर के बाद सबसे बड़े ईसाई पादरी ने बाहर निकलकर कनिष्ठ सहयोगियों से कहा इस आदमी को ईसाई बनाने का ख्याल दिमाग से निकाल दो. यह हम तुम सबसे ज्यादा बड़ा मानसिक और आध्यात्मिक समझ में खुद ईसाई है.

हिन्दू धर्म को देखने की गांधी की दृष्टि इसीलिए हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई के नारे की राह के गीत गाती थी. इन सबके बावजूद इतिहास का सच है कि गांधी ने सबके लिए तो किया लेकिन आदिवासियों के लिए उतना सार्थक कुछ कर सकने का वक्त ने उन्हें मौका नहीं दिया. इसका उन्हें जीवन भर मलाल रहा है.

कोंडागांव में आदिवासी और गैर आदिवासी के नाम से हुए संघर्ष में अन्य लोगों के अलावा गांधीवादी समझ की मानव अधिकार कार्यकर्ता मेधा पाटकर भी आई थी. तब भी पुलिसिया और प्रशासनिक विवाद हुए. हिंसक झड़पें हुई. सब मिलाकर आदिवासी तो खरबूजा है. हर मजहबी चाकू उनके ऊपर गिरता है और वे ही कटते हैं.

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