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तय करो – नौकरी चाहिए या नफरत ?

ROHIT SHARMA by ROHIT SHARMA
January 29, 2022
in गेस्ट ब्लॉग
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तय करो - नौकरी चाहिए या नफरत ?

रविश कुमार

रेलवे की भर्ती परीक्षा को लेकर सड़क पर उतरे छात्रों को भी नफरत की हवा का नुकसान उठाना पड़ रहा है. नफरत की राजनीति में सीधे शामिल होने या साथ खड़े होने के कारण नौकरी के इनके आंदोलन को कोई गंभीरता से नहीं लेता है.

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ट्विटर पर पत्रकार राणा अय्यूब के खिलाफ अश्लील हमलों को देख रहा था. एक महिला पत्रकार की बातों से असहमति हो सकती है तो उसे दर्ज करानी चाहिए लेकिन उसके महिला होने और मुस्लिम होने को लेकर जिस तरह की अश्लील बातें कहीं गई वो शर्मनाक हैं. 26 हज़ार से अधिक ट्वीट किए गए केवल गाली और धमकी देने के लिए. दुनिया भर के पत्रकारों संगठनों को इसकी निंदा करनी पड़ी है. ये सब कौन कर रहा है ? क्या इस तरह की अश्लील बातों को लिखने के बाद भी नौजवानों को नहीं लगता कि ये भाषा गुंडा की है या विश्व गुरु की.

भले ही रेलवे की भर्ती परीक्षा को लेकर सड़क पर उतरे इन छात्रों में से कोई इस तरह की हरकत में शामिल न हो लेकिन नफरत की हवा का नुकसान उन्हें भी उठाना पड़ रहा है. नफरत की राजनीति में सीधे शामिल होने या साथ खड़े होने के कारण नौकरी के इनके आंदोलन को कोई गंभीरता से नहीं लेता है. वो राजनीति भी नहीं जिसकी चपेट में आकर ये नफरत की सुरंग में धकेले गए हैं.

रेलवे की भर्ती परीक्षा में एक करोड़ से ज्यादा छात्र फार्म भरते हैं. इस संख्या ने सरकार को भले ही थोड़ी देर के लिए डरा दिया लेकिन इसके बाद भी तीन साल से यह परीक्षा नहीं हुई है. और रेलवे की यही एक मात्र परीक्षा नहीं है. हर किसी को भरोसा हो गया है कि ये नौजवान नफरत में ही रहेंगे, नौकरी मांगने लायक नहीं बचे हैं.

राज्यसभा में जितेंद्र सिंह ने बताया है कि केंद्र सरकार में मार्च 2020 तक 8 लाख 72 हज़ार से अधिक पद खाली हैं. अगर मीडिया एक महीने रोज़ इसका कवरेज कर दे तो पौने नौ लाख नौजवानों को नौकरी मिल जाएगी. इतनी सरकारी नौकरी होते हुए भी सरकार नहीं दे रही है. भर्ती परीक्षा निकाल कर पूरी नहीं कर रही है. उल्टा नौजवानों को उपदेश दिया जा रहा है कि अपना रोज़गार करें और दूसरों को नौकरी दें.

इन दिनों नौजवान लुटे पिटे नज़र आ रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि किसी अपने ने जेब काट ली है और जेबकतरे का नाम नहीं लिया जा रहा है. नफरत से निकलने के लिए इन्हें सौ झूठ से लड़ना पड़ेगा और इसके लिए पढ़ना पड़ेगा. जिसके लिए ईमानदारी है न धीरज और न किताबें खरीदने के लिए पैसा.

आज उसी नफरत के कारण जनता को भी इनकी मांगों पर भरोसा नहीं हो रहा है. सरकार तो गंभीरता से नहीं ही लेती है. लेती तो पिछले सात साल में अलग-अलग राज्यों में इन नौजवानौं ने असंख्य आंदोलन किए हैं, उसका कुछ नतीजा निकलता. सब इस भरोसे हैं कि चुनाव होगा तो जात या धर्म पर वोट करेंगे. यहां तक कि जिस गोदी मीडिया से इनके परिवारों में नफरत का ट्यूशन लिया जाता है वह भी इनकी चिन्ता नहीं कर रहा है.

उनका भरोसा गलत भी नहीं है. ठीक दो दिन बाद इस देश की जवानी की पोल खुल जाएगी जब ट्विटर पर गोड्से हमारा हीरो है, ट्रेंड कराने वाले आ जाएंगे. हर साल तीस जनवरी को कौन लोग हैं जो गांधी की हत्या पर जश्न मनाने आ जाते हैं.

30 जनवरी को गोड्से को हीरे बताने वाले ट्विट की भरमार हो जाती है. #NathuramGodse, #नाथूरामगोडसेअमर_रहे. गांधी की हत्या का जश्न 1948 में भी मना था और आज भी मनाया जाता है. जब समाज में हत्यारा नायक बनने लगे तो इसका मतलब है कि नरसंहार की तैयारी की जा रही है.

ये लोग आसमान से नहीं आते हैं बल्कि घर समाज से आते हैं. एक नेता, एक संगठन के समर्थक ही नहीं है बल्कि नेता और संगठन की तरफ से भी इन्हें संरक्षण मिलता है. गांधी से कांग्रेस के भीतर और बाहर भी लोगों ने असहमति रखी, दलितों ने भी असहमति रखी. गांधी से नफरत भी बहुतों ने की. इसमें हिन्दू भी शामिल थे और मुसलमान भी. लेकिन उनकी हत्या का जश्न मनाने वाले उस समय भी उसी सोच के थे और आज भी उसी सोच के हैं.

2014 के बाद गांधी की हत्या को लेकर पब्लिक स्पेस में बहुत कुछ कहा गया. हत्या को जायज़ ठहराने के इशारे भी किए गए और साफ-साफ समर्थन भी किया गया. सोशल मीडिया पर गांधी को गाली देने वाले लाखों की संख्या में भद्दे मीम फैला दिए गए.

2023 में गांधी की हत्या के 75 साल हो जाएंगे. उनकी जयंती के 150 साल की तरह क्या ऐसा हो सकता है कि गांधी की हत्या के 75 साल पर भी विशेष कार्यक्रम किए जाएं ताकि आज के नौजवानों को हम नफरत के रास्ते पर जाने से बचा सकें ?

150वीं जयंती के लिए स्वच्छ भारत का अभियान चला था, गांधी की हत्या के 75वें साल में दिमाग़ से नफरत की सफाई का अभियान चलना चाहिए. नफरत की बात हो रही है इसलिए गांधी की हत्या की बात हो रही है. जिस नफरत ने उनकी हत्या की, वही आज भी जारी है.

आप भूल गए हैं हम नहीं भूले हैं. 2020 का साल था और दिन 30 जनवरी का ही दिन था. शाहीनबाग से आगे जामिया के छात्रों के प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने वाला यह नौजवान खुद को रामभक्त कहता था. गांधी की हत्या करने वाला नाथूराम का सरकारी नाम रामचंद्र था. बाद में गोड्से ने हैदराबाद की जेल के रिकार्ड में नाथूराम कर दिया.

30 जनवरी, 2020 के दिन गोली चलाने वाला यह नौजवान कई महीनों के बाद हरियाणा की एक महापंचायत में एक धर्म विशेष के खिलाफ नफरती नारे लगा रहा था. लोग तालियां बजा रहे थे. गिरफ्तार हुआ और अब ज़मानत पर है. इसलिए 30 जनवरी के मौके पर नौजवानों से सवाल होना चाहिए कि उनके मन में किसी से नफरत करते हुए नायक बनने का ख्याल कहां से पैदा होता है ?

क्या वे जानते हैं कि गांधी को किसने मारा, किस सोच ने मारा ? बिहार के रसूल मियां का गीत मशहूर है. गीत भोजपुरी में है तो यूपी-बिहार के नौजवानों को समझ भी आ जाएगा. आपके लिए भी समझना आसान है. रसूल मियां पूछ रहे हैं कि उनके गांधी को कौन मार सकता है ? तीन-तीन गोली मारने का ख्याल कहां से आ सकता है ? चंदन तिवारी ने इस गीत की आत्मा को अपनी आवाज़ में हु-ब-हू उतार दिया है. आप ध्यान से सुनेंगे तो आपके ही घर में कई लोग नज़र आने लगेंगे इसलिए ध्यान से मत सुनिएगा.

हमारे नौजवानों को नफरत के रास्तों पर धकेला गया है. वे जिन ज़िलों में पढ़ते हैं वहां के स्कूल कालेज रद्दी हो चुके हैं. डिग्री के लिए सरकार को फीस देते हैं और पढ़ाई के लिए कोचिंग वालों को. इस बीच में किताबों को पढ़ना और चीज़ों को लेकर सवाल करने का उनका अभ्यास खत्म होता जा रहा है. आज बिहार के नौजवान एक ढंग का कालेज नहीं बता सकते हैं लेकिन जात और धर्म के नाम पर पोलिटिक्स में उनकी सक्रियता देखिए.

इस राजनीति ने उनके सारे रास्ते बंद कर दिए हैं. इस बर्बादी में उनकी भी सक्रिय भूमिका है. सौ फीसदी. हिन्दी प्रदेश के नौजवान अब केवल दो चीज़ों पर गर्व करने लायक बचे हैं या तो अपने जात पर गर्व कर लें या फिर दूसरे धर्म से नफरत करने के नाम पर अपने धर्म पर गर्व कर लें या फिर दो तीन किताबें बता रहा हूं, उसे ही पढ़ लें.

पेंग्विन से हाल ही में आई धीरेंद्र कुमार झा की किताब नाथूराम गोड्से के व्यक्तित्व को समझने का प्रयास करती है. पैदा होते ही कई बच्चों के मर जाने के बाद जब विनायकराव और लक्ष्मी के चौथी संतान के रूप में लड़का हुआ तो बुरी आत्माओं से बचाने के लिए इस संतान का लालन पालन लड़की के रूप में किया जाने लगा. लड़कियों के कपड़े पहनाए गए. उसके नाक में नथ पहनाई गई, जिससे पुकार का नाम हो गया – नाथू.

1929 में अंग्रेज़ी में ख़राब नंबर आने के कारण मैट्रिक की परीक्षा फेल कर गया. परिवार की आर्थिक तंगी से लड़ते हुए और अपने आप की खोज में नाथूराम विनायक दोमादर सावरकर के संपर्क में आया. गोड्से ने गांधी के आंदोलन में सक्रियता नहीं दिखाई.

धीरेंद्र ने लिखा है कि गांधी की विचारधारा उसे खींच रही थी लेकिन सावरकर के मिलने के बाद वह दूसरी दिशा में खिं‍चने लगा. धीरे-धीरे उसका जीवन एक राह पर चल पड़ा और वो राह थी हिन्दुत्व की. भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की. इस पूरी प्रक्रिया में काफी वक्त लगा क्योंकि परिवार का खर्चा चलाने के लिए गोड्से को कुछ साल इटारसी में दुकान पर काम करना पड़ा और फिर कपड़ा सिल कर बेचने का काम भी करना पड़ा.

मुस्लिम तुष्टीकरण के बोगस तर्कों के नाम पर गांधी जी के प्रति उसकी शुरूआती श्रद्धा जाती रही और वह मुसलमानों से नफरत करने की सोच पर चल पड़ा. गांधी की हत्या कर देता है.

धीरेंद्र कुमार झा की किताब के अलावा अशोक कुमार पांडे ने भी हिन्दी में एक किताब लिखी है. राजकमल प्रकाशन से छपी इस किताब का नाम है ‘उसने गांधी को क्यों मारा.’ आप अगर गांधी की हत्या के पीछे की सोच को कम मेहनत में जानना चाहते हैं तो जेम्स डब्ल्यू. डगलस की किताब ‘गांधी: अकथनीय सत्य का ताप’ भी पढ़ सकते हैं. दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान ने इस पुस्तिका का प्रकाशन किया है. 30 जनवरी के दिन इन तीन किताबों का अध्ययन कीजिए और रसूल मियां को जवाब दीजिए कि किसने उनके गांधी जी को तीन गोली मारी.

इस सवाल का जवाब आज भी हासिल किया जाना चाहिए कि गांधी की हत्या किसने की ? इसका जवाब ही नौजवानों को नफरत की राह पर जाने से बचाएगा. तभी वे नौकरी की बात कर पाएंगे.

हम एक और उदाहरण देना चाहते हैं कि कैसे धर्म के नाम पर नफरत की राजनीति ने युवाओं को हत्या की राजनीति की तरफ धकेला है. जिसके कारण कभी वे भीड़ बने तो कभी भीड़ को सही बताने के लिए खड़े होने लगे.

मैं आज तक इस भीड़ को नहीं भूल सका. कहां तो इन नौजवानों को केंद्रीय सचिवालय औऱ रेलवे की नौकरी करनी थी लेकिन इन्हें नफरत की नौकरी में लगा दिया गया. ये भीड़ बन गए और एक पुलिस अफसर इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या कर दी.

राजनीति चाहती है नफरत करें, मैं चाहता हूं ये नागरिक बनें. इस भीड़ के छंटते क्या होता है, वो भी ज़रा देख लें. बुलंदशहर की इस भीड़ को आप प्राइम टाइम में कई बार देख चुके हैं. इसी भीड़ ने 3 दिसंबर, 2018 को इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या कर दी थी.

हमारे सहयोगी समीर अली इस भीड़ में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार राहुल सिंह और प्रशांत नट के घर गए. दोनों ही परिवार बहुत ग़रीब हैं. इनके घर बता रहे हैं कि किसी ने इनकी गरीबी का इस्तेमाल किया है. इतनी गरीबी में कोई नफरत का सामान कहां से जुटाएगा ? ज़ाहिर है इस घर में नहीं तो ऐसे कई घरों में नफरत के सामान पहुंचाए गए ताकि इनके बच्चे नफरत करें और मिडिल क्लास के बच्चे आईआईटी दें.

दोनों के परिवार तीन साल से अपने बेटों को बचाने के लिए वकील नहीं कर पा रहे हैं. इनके मां-बाप कहते हैं कि भीड़ देखकर रुक गए थे मगर हत्या में शामिल नहीं थे. ऐसा दोनों ही लोगों के परिजनों का मानना है. जेल में बंद एक आरोपी प्रशांत नट की 2010 में शादी हुई थी. पत्नी कहती है कि पति ने कभी किसी से झगड़ा नहीं किया. गांव की संगत और लोगों की बातों में आ गए और भीड़ देखने खड़े हो गए. उसी की सज़ा भुगत रहे हैं.

यह मामला इस वक्त कोर्ट में है. मुमकिन है हत्या में ये आरोपी शामिल न हों लेकिन जो भीड़ बनी थी वो तो हत्या की ज़िम्मेदार थी. हम इसी भीड़ की बात कर रहे हैं, इसके भीतर जिस सोच ने आग भरी उसी सोच ने गोड्से को हत्यारा बना दिया.

अदालत का जो भी फैसला आए लेकिन आप इतना तो समझ सकते हैं कि अगर नफरत की राजनीति ने भीड़ नहीं बनाई होती तो आज राहुल और प्रशांत ज़िंदगी की दूसरी राह पर होते. जेल में नहीं होते. भीड़ के नाम पर बेकसूर फंसाए जाते हैं और कसूरवार बचाए जाते हैं. इस खेल से फायदा केवल राजनीति को होता है.

हिंसा की इस सोच का विरोध ही गांधी की हत्या पर रखा गया मौन है. दो मिनट के लिए रखे जाने वाले मौन का मकसद ही यही है कि हम ज़रा रुक कर विचार करें कि तैश में क्या करने जा रहे हैं ? केंद्र सरकार में आठ लाख से अधिक पद खाली हैं. अगर नौजवानों ने नफरत का रास्ता छोड़ दिया और नौकरी की बात शुरू कर दी तो नियुक्ति पत्र की बहार लग जाएगी.

कल बिहार बंद था. बहुत से छात्र शामिल हुए और नहीं भी हुए. समझने का प्रयास कीजिए. कल्पना कीजिए कि यूपीएससी की परीक्षा इस देश में तीन-तीन साल तक न हो. फार्म भरने के बाद आईआईटी की परीक्षा का डेट ही न निकले. फार्म भरवा कर इन नौजवानों को हवा में छोड़ दिया जाता है.

गनीमत है कि नफरत की चपेट में है वर्ना जिस दिन ये नौकरी न मिलने के आर्थिक कारणों को समझने लगेंगे औऱ सवाल करने लगेंगे, जवाब देना मुश्किल हो जाएगा. गोदी मीडिया ने इनकी हिंसा को दिखाया. हिंसा तो गलत है ही, इनकी समस्या को कोई नहीं दिखाएगा.

राजनीतिक दलों की हालत ये हो गई जिस खान सर पर मुकदमा किया गया है उसी से अपील करवाना पड़़ा कि छात्र आंदोलन में भाग न लें. केंद्र सरकार को कहना पड़ा है कि एक ही बार में परीक्षा होगी लेकिन इस सवाल का जवाब नहीं है कि तीन साल क्यों लगे ? परीक्षा कब होगी और नियुक्ति पत्र कब मिलेगा ?

कोरोना में प्रधानमंत्री की रैली हो जाती है, रेलवे की परीक्षा क्यों नहीं हो सकती थी ? यही नहीं एएलपी टेक्निशियन की परीक्षा के छात्र भी अलग-अलग बोर्ड को लेकर लिख रहे हैं कि सब कुछ होने के बाद नियुक्ति नहीं हो रही है. ऐसा क्यों हो रहा है ? यह समस्या राज्यों में भी है. कांग्रेस की सरकारों में भी है और बीजेपी की सरकारों में भी है.

हर सरकार को अपने खाली पदों को समय सीमा के भीतर भरना होगा. चूंकि इस समय हर मामले में केंद्र सरकार ही खुद को महान और सफल बताती है तो सबसे पहले 8 लाख पदों को उसे भर कर दिखाना चाहिए.

हमारे सहयोगी आलोक पांडे प्रयागराज के उन लॉज में गए जहां छात्र नौकरी का सपना देख रहे हैं. भर्ती का इंतज़ार करते हैं. भर्ती नहीं आती है और जब आती है तो भर्ती पूरी नहीं होती. ऐसी प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं कि कोई कोर्ट जाए और मामला लटक जाए. इन छात्रों के साथ खिलवाड़ किसने किया है ? जाति और धर्म के नाम पर होने वाली राजनीति ने.

उम्मीद है तीस जनवरी को जब ट्विटर पर कुछ लोग गोड्से को हीरो बता रहे होंगे तब आप अपने घर के नौजवानों को समझाएंगे कि नाथूराम की तलाश मत करो. नौकरी राम की तलाश में निकलो. हत्यारे को हीरो बनाओगे तो जेल जाओगे. गोदी मीडिया देखोगे तो नफरती बन जाओगे. प्राइम टाइम देखा करोगे तो डाक्टर बन जाओगे.

2 दिसंबर, 2021 को राज्यसभा में केंद्र सरकार ने बताया है कि 1 मार्च, 2020 तक केंद्र में 8 लाख 72 हज़ार पद ख़ाली हैं. तय कर लीजिए कि नौकरी चाहिए या नफरत.

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